Tuesday, September 2, 2008

भैँटक लावा- जगदीश प्रसाद मण्डल



पछिला बाढ़ि। मोन पड़ितहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नाचए लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रुप बना नृत्य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्ह-पहचिन्ह मेटा समुद्र जेकाँ बनि गेल। जेम्हर देखू तेम्हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मुहेँ दौगल जाइत। कतेक गाम-घर पजेबाक नहि रहने घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनियाँ काटए लगल। एहन भयंकर दृश्य देखि लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नहि भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत बुझाए। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भसल। जेहने दुरगति घरक तेहने गाइयो-महीसि, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।
घरक नूआ-बिस्तर आ आनो-आन समानक मोटरी बान्हि माथपर लऽ अपनो डाँड़मे दू भत्ता खरौआ डोरी बान्हि आ बेटोक डाँड़मे बान्हि आगू-आगू मुसना आ पाछू-पाछू घरवाली जीबछी, बेटी दुखनीकेँ कोरामे लऽ कन्हा लगौने पोखरिक ऊँचका महार दिशि चलल। एखन धरि ओ महार बोन-झाड़ आ पर-पैखानाक जगह छल। जाहिमे साँप-कीड़ा बसेरा बनौने, बाढ़ि ओकरा घरारी बना देलक। जहिना इजोतमे छाँह लोकक संग नहि छोड़ैत, तहिना बरखा बाढ़िक संग छोड़ए लेल तैयार नहि। निच्चाँ पानिक तेज गति आ ऊपरसँ बरखाक नमहर बुन्न। महारपर मुसनाकेँ पहुँचैसँ पहिने बीस-पच्चीस गोटे अप्पन-अप्पन धिया-पूता, चीज-बस्तु आ माल-जालक संग पहुँचि चुकल छल। महारपर पहुँचि मुसना रहैक जगह हियाबए लगल। शौच करैक ढ़लान लग खाली जगह देखि मुसना मोटरी रखलक। मोटरी राखि बिसनाइरिक डाढ़ि तोड़ि खरड़ा बनौलक। ओहि खरड़ासँ खरड़ए लगल। एक बेर खरड़ि कऽ देखलक तँ मनमे पड़पन नञि भेलइ।
  फेर दोहरा कऽ खरड़ि चिक्कन बनौलक। चिक्कन जगह देखि दुनू बेकतीक मनमे चैन भेलै। मोटरी खोलि मुसना एकटा बोरा निकालि चारिटा बत्तीक खूँटा गाड़ि, खरौआ जौरसँ चारु खूट बान्हि, बत्तीमे बान्हि कऽ घर बनौलक। दोसर बोरा निच्चाँमे ओछा धियो-पूतोकेँ बैसौलक आ मोटरियोक समान रखलक। चिन्तासँ दुनू परानीक मूँह सुखाएल रहै। एक दिशि दुनू बच्चाकेँ मुसना देखए आ दोसर दिशि गनगनाइत बाढ़ि। माथपर दुनू हाथ दऽ जीबछी मने-मन कोसी-कमला महरानीकेँ गरिऐबो करैत आ जान बचबै लेल निहोरो करैत। दुनू बच्चो कखनो कऽ बाढ़ि देखि हँसैत तँ कखनो जाड़े कनैत।
बाढ़िक वेगमे एकटा घर भसिआएल अबैत देखि मुसना बाँसक टोन आ कुड़हरि लऽ दौगल। पानिमे पैसि हियाबे लगल जे कोन सोझे घर आओत। ठेकना कऽ हाँइ-हाँइ पाँचटा खुट्टा ठोकलक। आस्ते-आस्ते घर आबि कऽ खुट्टामे अड़कल, खूटामे अड़ल घर देखि घरवालीकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘हाँसू नेने आउ। घरक समचा सभ उघि-उघि लऽ जाउ।’’
  घरक ऊपरमे एकटा कुकूर सेहो भसैत आएल। ओ लोकक सुन-गुन पाबि कूदि कऽ महारपर चलि गेल। ठाठक बत्तीमे जहाँ मुसना हाँसू लगौलक आकि एकटा साँप लप दऽ हाथेमे हबक मारि देलकै। घरक भार थालमे गरल खुट्टा नहि सम्हारि सकल। पाँचो खुट्टा पानिमे गिर पड़लै। घर भसि गेलै। खूब जोरसँ मुसना कनबो करैत आ हल्लो करैत जे  हौ लोक सभ, दौड़ै जाइ जा हौ, हमरा साँप काटि लेलक। मुसनाक कानब सुनि घरवाली सेहो बपहारि काटए लागलि। बपहारि कटैत घरवालीकेँ मुसना कहलक- ‘‘हे गए दुखनी माए, नाग डसि लेलकौ। छाती लग बिख आबि गेल। कनिये बाकी अछि कंठ छुबै ले। धिया-पुताकेँ सोर पाड़ि कनी मूँह देखा दे। आब नै बचबौ।’’
  जीबछी हल्लो करै आ घरबलाक बाँहि पकड़ि उपरो करैत। महारक किनछरिमे पहुँचि जहाँ उपर हुअए लगल आकि दुनू गोटे पिछड़ि कऽ तरे-उपरे निच्चाँमे खसल। दुनू परानी भीजल तँ रहबे करै, आरो नहा गेल। मुदा तइयो ओरिया-ओरिया कऽ उपर भेल। महारपर आबि जीबछी चूनक कोहीसँ चून निकालि दाढ़मे लगौलक। साँपक बिख झाड़निहार गाममे एकोटा नहि। मुदा रौदिया एहि बेर दसमीमे चनौरा गहबरमे चाटी सिखने छल। सभ कियो रौदियाक खोज करए लगल। ओ रौदिया माछ मारए लेल सहत लऽ कऽ बाध दिशि गेल छल। एक गोरे ओकरा बजा अनलक। अबिते रौदिया सहत कातमे रखि हाथ-पएर धोए मुसना लग आबि बाजल- ‘‘हौ भाय, हमर चाटी सिद्ध नहि भेल अछि, किएक तँ हम एखन धरि गंगा स्नान नै केलहुँहेँ। मुदा तइयो बिसहाराकेँ सुमरि देखै छिऐ।’’
  मुसनाकेँ आगूमे बैसा रौदिया हाथेसँ जगहकेँ झाड़ि चाटी रखलक। सभ रौदिया दिशि देखैत। मुदा चाटी चलबे ने कएल। बाढ़िक दुआरे आन गामसँ झाड़निहार आ चट्टिवाहकेँ बजाएब महाग मोसकिल रहै। सभ निराश भऽ गेल। छाती पीटि-पीटि जीबछी कनबो करै आ देवी-देवताकेँ कबुलो करै। मुदा ढ़ोढ़ साँप कटने रहए तेँ बिख लगबे ने केलै।
गोसाइ लुक-झुक करए लगल। गामक ढ़ेरबा, बूढ़ि आ जुआन स्त्रीगण, चंगेरीयो आ चंगेरोमे काँच माटिक दिआरी लऽ पोखरिक घाट लग जमा भऽ कमला महरानीकेँ साँझ दऽ गीत गाबए लागलि‍। बच्चा सभ जए-जएकार करैत। तहि बीच लुखिया कमला महरानीकेँ पाठी कबुला केलक, सुबधी एक सेर मधुर। दोसरि साँझ धरि गीत-गाबि सभ घुरि कऽ आंगन आएल।
एक रफ्तारमे बाढ़ि पाँच दिन रहल। मुदा पोह फटितहि छठम दिन पानि कमए लगल। बाढ़िक पानि जहिना हुहुआ कऽ अबैए, तहिना जाइए। बेर झुकैत-झुकैत घर-अंगनाक पानि निकलि गेलै। मुदा थाल-खिचार रहबे करै। सातम दिनसँ लोक घर ठाढ़ करए लगल। बाढ़ि सटकितहि लोक परदेश दिशि पड़ाए लगल। गाममे ने एक्कोटा धानक गब बँचल आ ने खेत रोपए लेल बिरार। नारक टाल सभ कतए भसि कऽ गेल तेकर ठेकान नहि। गहुमक भुस्सी भुसकाँरेमे सड़ि-सड़ि गोबर बनि गेल। मनुक्खसँ बेसी दिक्कत माल-जालकेँ भऽ गेलै। आमक पात, बाँसक पात आन-आन गाछ सबहक पात काटि-काटि माल-जालकेँ खुआबए लगल। आन-आन गामसँ नार, भुस्सी कीनि-कीनि अानए लगल। मुदा माल-जाल तइयो अन-धुन मुइलै। जे बँचल रहै, ओहो सुखा कऽ संठी जेकाँ भऽ गेलै। तइ परसँ रंग-बिरंगक बीमारी सभ सेहो आबि गेलै। ककरो खुरहा तँ ककरो पेटझड़्ड़ी। किछु गोटे अपन सभ मालकेँ कुटमैती सभमे दऽ आएल।
चारिक अमल। पिसुआ भांग पीबि श्रीकान्त मैदान दिशिसँ आबि  दलानपर बैसि चाह पीबैत रहथि। सोगसँ अधमरु जेकाँ भेल। मने-मन सोचथि जे महाजनी तँ चलिये गेल आब अपनो साल भरि की खाएब? अगते धान सबाइ लगा देलहुँ। बड़ पैघ गलती भेल जे एक्को बखारी पछुआ कऽ नहि रखलौं। मुदा एक बखारी रखनहि की होइत। के ककरा मदति करत। ठीके कहब छै जे सभकेँ अपना भरोसे जीबाक चाही। भने दुआर परक बखारीक धान सठि गेल। कियो दरबज्जापर आओत तँ देखा देबै। मुदा अपनो तँ जरुरत अछि,  से कतए सँ आनब। लऽ दऽ कऽ घरक कोठीमे चाउर अछि, ओतबे अछि। एक्को धुर धान नञि बँचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। आब अबाद कएल नै हएत। आगू रब्बीयेक आशा। जे सभ दिन कीनि-बेसाहि कऽ खाइत अछि ओकरा तँ कोनो नै, मुदा हमरा लोक की कहत? चाह पीबिते-पीबिते श्रीकान्तकेँ चौन्ह अाबए लगलनि। मन पड़लनि जे बाबा कहने रहथि जे दरबज्जापर जँ क्यो दू-सेर वा दू-टका मांगए लेल आबए तँ ओकरा ओहिना नहि घुमबिहक। ओहिसँ लछमी पड़ाइ छथि। जीबछीकेँ अबैत देखि श्रीकान्त सोर पाड़लखिन। सालो भरि जीबछी हुनके कुटाउन कऽ गुजर करैत छलि। चाउर-चूड़ा कुटैमे जीबछी गाममे सभसँ बेसी लुरिगर। श्रीकान्तक लग आबि जीबछी हँसैत कहलकनि- ‘‘एत्ते किए सोगाइल छथि कक्का, हिनका एत्ते छनि तखन एते दुख होइ छनि, हमरा तँ किछु ने अछि  तेँ कि मरि जाएब।’’
  जीबछीक बात सुनि भखरल स्वरमे श्रीकान्त कहलखिन- ‘‘जहिना सभ किछु बाढ़िमे दहा गेल तहिना जँ अपनो सभ तुर भसि जइतहुँ, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नहि काटए पड़ैत।’’  मुस्की दैत जीबछी बाजलि- ‘‘एक्केटा बाढ़िमे एत्ते चिन्ता करै छथि काका,  कनी नीक की कनी अधलाह, दिन तँ बितबे करतनि।’’
  चीलम पीबैत मुसना ओसारपर बैसल। कसि कऽ  दम खींचि मने-मन सोचए लगल जे दू मास अगहन-पूस मुसहनि खुनि-खुनि गुजर करै छलहुँ। दस सेर जमो भऽ जाइ छल आ गुजरो कऽ लैत छलहुँ। ओहो चलि गेल। ने एक्को गब कतौ धान बँचल आ ने गाममे एकोटा मूस। दोसर दम खींचि धूँआकेँ घोटितहि मनमे एलै जे मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भात जँ जाड़क मासमे भेटए तँ एहिसँ नीक दोसर की हएत। एहेन खेनाइ तँ रजो-महरजोकेँ सिहिन्ते लागल रहतनि। ओ-हो-हो, भगवान गरीबेक सुख छीनि लेलनि।
मुसनाक पहिलुका नाम मकसूदन छल। मुदा मूस आ मुसहनिसँ बेसी सिनेह रहने लोक ओकरा मुसना कहए लगल। जीबछी आंगनक चुल्हिपर रोटी पकबैत। इनारपर हाथ-पएर धोय मुसना लोटामे पानि नेने आंगन आबि जलखै करै लऽ बैसल। टिनही छिपलीमे रोटी-नून जीबछी घरबलाक आगूमे देलक। अंगनामे दुखबाकेँ नहि देखि मुसना जोरसँ शोर पाड़लक। पिताक अवाज सुनितहि दुखबा दौगल आबि धुराइले हाथे-पएरे खाइले बैसि रहल। दुनू बापुत खाए लगल। चुल्हिये लगसँ मुस्की दैत जीबछी बाजलि- ‘‘ककरो किछु होउ, जकरा लूरि रहतै ओ जीबे करत। ऐठाम तँ देखै छिऐ जे एक्के दहारमे किदनि बहारक खिस्सा अछि। सभ हाकरोस करैए।’’
  मुँहक रोटी मुसना हाँइ-हाँइ चिबा जीबछी दिशि देखि कऽ बाजल- ‘‘तते ने माछ भसि-भसि आएल अछि जे खत्ता-खुत्तीमे सह-सह करैए। कने पानि तँ कम होउ। जखने पानि कम भऽ उपछै जोकर भेल आकि मछबारि शुरु कऽ देब। खेबो करब आ बेचबो करब। सदिखन दू पाइ हाथेमे रहत।’’
  अपन नहिराक बात मन पड़ितहि  जीबछी कहए लागलि- ‘‘हमरा नैहरमे पूबसँ कोशी आ पछिमसँ गंडकक बाढ़ि सभ साल अबैत छल। एहि बीच जे धार अछि ओकर पानि तँ घुमैत-फिरैत रहिते छल। सगरे गाम साउनेसँ जलोदीप भऽ जाइ छल। टापू जेकाँ एकटा परती टा सुखल रहैत छल। ओहिपर सौँसे गामक लोक बरसाती घर बना कऽ रहैत छल। कातिक अबैत-अबैत खेत सभ जागए लगैत छलै। तकर बाद लोक खेती करैत छल। गहिंरका खेत आ खाधि-खुधिमे भैँटक गाछ सोहरी लागल जनमै छल। अगहन बीतैत-बीतैत ओ तोड़ैबला हुअए लगैत छल। हम सभ ओहि भैँटकेँ तोड़ि-तोड़ि आनी, ओकरे दाना निकालि सुखा कऽ लावा भूजी। तते लावा हुअए जे अपनो खाइ आ बेचबो करी। काल्हि गिरहत कक्काक ओहिठाम जाएब आ कहबनि जे चौरीमे मनसम्फे भैँट जनमल अछि, ओ हमरा दऽ दिअ।’’
एखन धरि दुनू परानी मुसना, चाउर आ चूड़ाक कुट्टी करैत छल, सेहो ढ़ेकीमे। किएक तँ गाममे एक्कोटा छोटको मशीन धनकुटियाक नहि छल। अधिकतर परिवार अपन-अपन ढेकी-उखड़ि रखैत छल। मुसना सेहो कुट्टीक दुआरे अपन ढेकी-उखड़ि रखने अछि। नीक चाउर बनबैमे जीबछीक लोहा सभ मानैए। एहि बेरि तँ धनकुट्टी चलत नहि। मुदा बाढ़िमे आन गामसँ तते भैँट दहा कऽ चौरीमे आएल जे सापरपिट्टा गाछ सौँसे चौरीमे जनमि गेल अछि। तेँ जीबछी मने-मन चपचपाइत। दोसरकेँ भैँटक भाँज बुझले नहि छलै।
सभ दिन नहाइ बेरिमे जीबछी चौरी जा भैँट देखि-देखि अबैत छलि। चौरगर-चकरगर पात सौँसे चौरीकेँ छेकने। गोटि-पङरा फूल हुअए लगलै। फूल देखि जीबछीक मनमे होइ जे एत्तेटा फुलवारी इन्द्रो भगवानकेँ हेतनि की नहि। पाँचे दिनमे सौँसे चौरी फूल फुला गेल। अगता फूलक पत्ती झड़ि-झड़ि खसए लागल, फूलमे नुकाएल फड़ निकलए लगल। गोल-गोल, हरियर-हरियर। फड़ देखि जीबछी आमदनी बुझि, चौरी कातमे बैसि, नव-नव योजना मने-मन बनबए लागलि। अइ बेर एकटा खूब निम्मन महीस कीनब। जँ महीस जोकर आमदनी नै हएत तँ दूटा गाऐ कीनि लेब। अप्पन तँ सम्पति भऽ जाएत। ओकरे खूब चराएब-बझाएब। ओहीसँ तँ चारु परानीक गुजर चलत। जिनगी भरि तँ कुटौने करैत रहलहुँ मुदा एहि बेर कमलो महरानी आ कोसियो महरानी दुख हेरि लेलथि। मने-मन जीबछी दुनूकेँ गोड़ लगलकनि। अपन धन हएत, तइ परसँ मेहनत करब तँ कोन दरिदराहा दुख आबि कऽ हम्मर सुख छीनि लेत? मजगूत घर बान्हब, बेटा-बेटीक बिआह करब। नाति-पोता हएत, बाबा-दादी बनि कऽ जते दिन जीबी ओ कि देवलोकसँ कम भेलै। अही लए ने सभ हेरान अछि। कएलासँ सभ किछु होइ छै, बिनु केने पतरो फुसि।
घनगर गाछ देखि जीबछीक मनमे अएलै जे बीच-बीचमे सँ जँ गाछ उखारि देबै तँ सौरखियो करहर भऽ जाएत आ छेहर गाछ रहने फड़ो नमहर हएत। जइसँ दानो नीक हएत। एखनेसँ आमदनी शुरु भऽ जाएत। उत्साहित भऽ जीबछी कमठौन शुरु केलक। मुदा करहर उखारैमे तते डाँड़ दुखाइ जे हूबा कमि गेलै। कमठौन छोड़ि देलक। देखते-देखते फड़मे लाली पकड़ए लगलै।
  अगता फूल अगता फड़ भेल। नमहर-नमहर, पोछल-पोछल, गोल-गोल पुष्ट। रंगल फड़ देखि जीबछी बुझि गेल जे आब ई तोड़ैबला भऽ गेल। दोसर दिनसँ फड़ तोड़ैक विचार जीबछी मने-मन कऽ लेलक।
  दोसर दिन भोरे जीबछी रोटी पका, दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खा प्लास्टिकक बोरा लऽ फड़ तोड़ैले बिदा हुअए लगल आकि धक दऽ मन पड़लै जे बोरामे तँ फड़ राखब, मुदा पानिमे तोड़ि-तोड़ि कतए राखब। फड़ तोड़ैले तँ झोराक जरुरत हएत। झोरा तँ अपना अछि नहि! आब की करब? लगले जीबछी पुरना साड़ीकेँ फाड़ि दूटा झोरा सीलक। झोरा सीबि बोरो आ झोरोकेँ चौपेत एकटा झोरामे राखि, दुनू बच्चो आ दुनू गोटे अपनो चौर दिशि बिदा भेल।
  फड़क रुप-रंगसँ जीबछीक मन गद-गद। मुदा अनभुआर काज बुझि मुसना तर्क-वितर्क करैत। चौरक कात पहुँचि उपरका खेत जे सुखाएल छल मे दुनू बच्चो, बोरो आ रोटी-पानिकेँ रखि दुनू परानी भैँट तोडै़ले पानिमे पैसल। पानिमे पैसितहि जीबछीक नजरि भैँटक फड़क उपरे-ऊपर नाचए लगल। जहिना ककरो रुपैआक थैली भेटलासँ खुशी होइ छै, तहिना जीबछीक मनमे भेलै। एक टकसँ देखि जीबछी दुनू हाथे हाँइ-हाँइ फड़ तोड़ए लागलि। खिच्चा फड़ देखि जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘जुएलके फड़ टा तोड़ब। अजोहा एखन छोड़ि दियौ। पछाति तोड़ब।’’
  झोरा भरिते जीबछी ऊपर आबि-आबि बोरामे रखैत। मुसनो सएह करैत। दुनू बोरा भरि गेल। ऊपर आबि जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘कनी काल सुस्ता लिअ। पानिमे निहुड़ल-निहुड़ल डाँड़ो दुखा गेल हैत। अहाँ एत्तै रहू, हम एक बेर अंगनासँ रखने अबै छी।’’
  कहि जीबछी एकटा बोरा उठा आंगन बिदा भेलि। एक तँ पानिक भीजल, दोसर ओजनगर बस्तु। मुदा जीबछी भारी बुझबे ने करए। किएक तँ सम्पत्तिक मोटरी रहै किने। आंगन आबि ओसारपर बोरा रखि पुनः जीबछी चौर दिशि रमकल विदा भेलि। चौर पहुँचि पतिकेँ कहलक- ‘‘हम बोरा लै छी, अहाँ दुनू बच्चो आ डोलोकेँ सम्हारने चलू।’’
  आगू-आगू मुसना बेटीकेँ कोरामे दोसर हाथमे डोल आ बेटाकेँ लऽ चलल। पाछू-पाछू जीबछी माथपर बोरा लेने। थोड़े दूर बढ़लापर जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘भगवान दुःख हेरि लेलनि।’’
  मुदा  स्त्रीक बात सुनि मुसनाकेँ ओ खुशी नञि एलै जे जीबछीकेँ रहै। आंगन आबि जीबछी पहिलुके बोरा लग दोसरो बोरा रखि भानसक ओरियान करै लागलि।
चारिम दिन पहिलुके खेप भैँट तोड़ै काल मुसनाकेँ एकटा ठेंगी बाँहिमे पकड़ि लेलकै। जे ओ देखबे ने केलक। मुदा जखन ठेंगी भरि पोख खून पीबि भरिया गेलै, तखन मुसनाक नजरि पड़लै। ठेंगीकेँ देखितहि ओकर परान उड़ि गेलै। थर-थर कापए लगल। खूब जोरसँ घरवालीकेँ कहलक- ‘‘बाप रे बाप! देहक सभटा खून ठेंगी पीबि लेलक। कोन पाप लागल जे अइ मौगियाक भाँजमे पड़लौं। एक तँ बाढ़िक मारल छी जे भरि पोख अन्न नै होइए। सुखा कऽ संठी भेल छी। तइपर जेहो खून देहमे छलए सेहो ठेंगिये पीबि गेल। झब दे आउ ने तँ हम पानियेमे खसि पड़ब।’’
  मुसनाक बातकेँ अनठबैत जीबछी हाँइ-हाँइ फड़ो तोड़ैत आ मने-मन बजबो करैत- ‘‘जना नाग डसि नेने होइ, तहिना अड़राइए। भभटपन ने देखू। एहने-एहने पुरुख बुते परिवार चलत?’’
  दुन झोरा भरिते जीबछी मुसना लग आबि हाथेसँ ठेंगी पकड़ि एकटा चिचोरमे बान्हि देलक। मुदा जइ ठाम ठेंगी पकड़ने रहै तइ ठामसँ छड़-छड़ खून बहैत। अपन दहिना औंठासँ जीबछी दाबि देलक। कनिये कालक बाद खून बन्न भऽ गेलै। जीबछी फेर फड़ तोड़ैले पानिमे पैसल। तोड़ि कने काल बाद जीबछी कहलक- ‘‘आउ ने, आब किछु ने हएत।’’
  जीबछीक बात सुनि मुसना आँखि गुड़रि कऽ बाजल- ‘‘ई मौगिया जान मारैपर लगल अछि। जे कहुना मरि जाए। हमरा की दुनियामे सैँएक कमी छै? दोसर कऽ लेब। दुनू बच्चा दिशि देखैत बाजल- मुदा अइ टेल्हुक सभक की हेतै? बिलटि कऽ मरत की नहि?’’  पति दिशि देखि पत्नी मुस्की दैत बाजलि- ‘‘नञि तोड़ब तँ नञि तोरु। ओतै बैसि बच्चा सभकेँ खेलाउ।’’
  दुनू बोरा भरि जीबछी आंगन अनलक। सभकेँ सम्हारने मुसना सेहो आएल। आंगन आबि जीबछी चुल्हि पजारि, भानस कऽ दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेलक। खा कऽ जीबछी हाँसू लऽ भैँटक फड़ चीरि-चीरि दाना निकालए लागलि। लाल-लाल, गोल-गोल। मुसना सेहो दाना निकालए लगल। दुनू बच्चा दुनू भाग बैसि दूटा फड़केँ गुड़कबैत। दानाकेँ एकटा चटकुन्नीपर थोपि-थोपि रखैत जाए। मुदा कनिये काल बाद मुसनाकेँ चीलम पीबैक मन भेलै। ओ उठि कऽ चुल्हि लग जा आगियो तपए लगल आ चीलमो पीबए लगल। दानाक ढ़ेरी देखि जीबछी गर अँटबए लागलि जे एत्ते कत्तऽ कऽ राखब। गुनधुन करैत। एकाएक नैहरक बात मन पड़लै। मन पड़िते मूहसँ हँसी फुटलै। जीबछीकेँ हँसैत देखि मुसना अह्लादित भऽ कहलक- ‘‘ऐँ गै, कोन सोनाक तमघैल तोरा भेटि गेलौहेँ जे एना खिखिआइ छेँ।’’
  मुदा पाशा बदलैत जीबछी बाजलि- ‘‘एखैन तँ अन्हार भऽ गेलै, काल्हि भोरे एकटा खाधि टाटक कात अंगनेमे खुनि देबै।’’
  भोरे मुसना ढ़क जेकाँ गोल-मोल खाधि खुनलक। जीबछी दू-लेब कऽ कऽ लेबि, सुखौलक। ओहिमे भैँटक दाना सुखा-सुखा रखैत गेल। ऊपरसँ टाटक झँपना बना मुसना दऽ देलक।
  मास दिनक मेहनतिसँ जीबछीक आंगन भैँटक दानासँ भरि गेल। अनभुआर चीज तेँ चोरी-चपाटीक डरे नहि। भरल आंगन देखि जीबछीक मनमे समुद्रक लहरि जेकाँ खुशी हिलकोर मारए लगलै। कनडेरिये आँखिये मुसना दिशि देखि जीबछी मुस्किया देलक। घरवालीक मुस्की देखि मुसना खिसिया कऽ बाजल- ‘हमरा देखि-देखि तोरा हँसी लगै छौ। हँसि ले, जते हँसमे से हँसि ले। जाबे जीबै छियौ ताबे। भगवान केलखुन आ मरलियौ तखैन तोहर हँसी नगरक लोक देखतौ।’’
  मुदा जीबछीक लेल धैन-सन। किएक तँ खुशीसँ मन एते भरल रहै जे घरबलाक बात ओहिमे पैसिबे ने केलै। मने-मन जीबछी लावा भुजैक विचार करए लागलि। लावा भुजै लेल एकटा नम्हर खापड़ि चाही। बालु रखै लेल एकटा कोहा चाही। लारनि तँ अपनो खरहीसँ बना लेब। बाउलो नदी कातसँ लऽ आनब। जखन कुम्हनि ओहिठाम जाएब तँ कचकुह ताकि कऽ एकटा नमहर तौला लऽ लेब। ओकरे खापड़ि बना लेब। बालु धिपबैले मझोलको कोहासँ काज चलि जाएत। एकटा सरबाक काज सेहो पड़त। किएक तँ बालु जे देबै से तँ हाथसँ नञि हएत। ओइमे एकटा बत्तीक डाँट लगबए पड़त। लगा लेब। मुसनाकेँ कहलक- ‘‘लाबा भुजै लेल जारनक ओरियान करए पड़त।’’
  लावाक नाम सुनि मुसनाक मनमे खुशी भेलै। मुस्कुराइत उत्तर देलक- ‘‘एखन टेंगारी सुढ़िया लै छी। बेरु पहर गिरहत कक्काक गाछीसँ बाँझियो आ सुखल ठौहरियो सभ आनि देब।’’
  भरि दिनमे दुनू परानी जीबछी सभ कथूक ओरियान कऽ लेलक।
लावा भुजब जीबछी शुरु केलक। दू चुल्हिया चुल्हि। एक मूहमे खापड़ि, दोसरमे कोहा। खापड़िमे भैँटक दाना भुजैत आ कोहामे बालु धिपैत। पहिल घानी भुजि जीबछी एक चुटकी चुल्हिमे दऽ दोसर घानी भुजब शुरु केलक। दोसर घानीक लावा देखि जीबछीक मन तर-उपर करए लागल। पहिलुका घानीक लावा चंगेरीमे लऽ दुनू बच्चो आ घरोबलाकेँ आगूमे देलक। आगूमे लावा देखि मुसना मने-मन सोचए लगल जे ई मौगिया बड़ लुरिगर अछि। एहन स्त्री भगवान सभकेँ देथुन। कहू जे एखैन तक हम जे बुझितो ने छलौं से आइ खाइ छी। धिया-पुताकेँ पोसब कोन बड़का भारी बात छिऐ, समाजो लेल लोक बहुत किछु कऽ सकैत अछि।
  लावाक गमक पुरबा हवामे मिलि गामकेँ सुगंधित कऽ देलक। सुगंध पाबि टोलोक आ गामोक स्त्रीगण सभ लावा कीनैक लेल एक्के-दुइये जीबछीक आंगन अाबए लगल। मुदा एक्केटा जबाब जीबछी सभकेँ दैत- ‘पहिने गिरहत कक्काकेँ खुएबनि, तखन ककरो देब। भरि दुपहर जीबछी लाबा भुजलक। दू छिट्टा। दुनू छिट्टा लावा घरमे रखि ओहिमे सँ एक मुजेला लऽ साड़ीसँ झाँपि जीबछी मुसनाकेँ कहलक- ‘‘हम गिरहत कक्का ओहिठाम जाइ छी। अहाँ अंगनेमे रहब।’’  कहि जीबछी माथपर मुजेला लेने श्रीकान्त ऐठाम बिदा भेल।
  जीबछीक माथपर मुजेला श्रीकान्त गौरसँ देखि मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘बड़ खुशी देखै छी लछमी महरानी। मुजेलामे की चोराकऽ अनलहुँहेँ। कने हमरो देखए दिअ?’’
  अनसुनी करैत जीबछी मुस्की दैत आंगन जा गिरहतनीक आगूमे मुजेला रखि कहलकनि- ‘‘काकी, थोड़े कऽ लाइ बना लिहथि। अखन थोड़े नोन-मरीच-तेल मिला कऽ देथु। जे कक्काकेँ दऽ अबै छिएनि।’’
  छिपलीमे लावा नेने जीबछी दरबज्जापर जा श्रीकान्तक आगूमे देलकनि। ओ छिपलीमे उज्जर-उज्जर रमदानाक लावा जेकाँ लावाकेँ निहारि-निहारि देखए लगलाह। जीबछी कहलकनि- ‘‘काका, की निङहारै छथिन, पहिने एक मुट्ठी मुँहमे दऽ कऽ देखथुन ने। भैँटक लावा छिऐ।’’
  एक मुट्ठी उठा श्रीकान्त मुँहमे देलखिन। लावाक कोमलता आ सुआद बुझि श्रीकान्त पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलखि‍न- ‘‘एत्ते सुन्नर वस्तुकेँ एखन धरि जनितहुँ नहि छलहुँ। धन्य अछि जीबछीक ज्ञान आ लूरि जे एहेन सुन्नर हराएल बस्तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात् देवी छी जीबछी। जाउ, सन्दुकमे सँ एक जोड़ साड़ी आ आंगी निकालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहिरा कऽ बिदा करब। गरीब-दुखियाक देवी छी जीबछी।’’
सभ दिन जीबछी लावा भुजैत छलि आ अंगनेसँ लोक सभ कीनि-कीनि लऽ जाइत। पनरह दिनक जमा कएल रुपैयो आ फुटकुरियो जीबछी मुसनाकेँ गनै लेल आगूमे देलक। पाइ देखि मुसनाक मन उड़ि गेल। मूहसँ ठहाका निकलल। एक टकसँ मुसना जीबछी दिशि देखि, कैँचा गनए लगल।

Monday, August 25, 2008

मैथि‍ली उपन्यास साहि‍त्यमे ग्रामीण चि‍त्रण- जगदीश प्रसाद मण्डल

मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण
साहि‍त्‍यक आधार मनुष्‍यक जि‍नगी होइछ। मनुष्‍येक जि‍नगीक ‍नींवपर भाषा साहि‍त्‍य ठाढ़ आ सुदृढ़ बनैत अछि‍। जे मनुष्‍यकेँ जीबैक कला सि‍खबैत अछि‍। गद्य-साहि‍त्‍यक वि‍धामे उपन्‍यासो छी। जइ‍ नींवपर साहि‍त्‍यक भवन ठाढ़ रहैत अछि‍ ओ माटि‍क नि‍च्‍चाँ दाबल रहैत अछि‍। जीवन परमात्‍माक सृष्‍टि‍ छी तँए अनन्‍त-अगम्‍य अछि‍। जहन कि‍ साहि‍त्‍य मनुष्‍यक सृष्‍टि‍ होइत तँए सुबोध-सुगम आ मर्यादि‍त होइत अछि‍। ऐ ‍जगतमे मनुष्‍य जे कि‍छु सत्‍य आ सुन्‍दर पौलक आ पाबि‍यो रहल अछि‍ वहए साहि‍त्‍य छी। ओना साहि‍त्‍य समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍ मुदा मनुष्‍यक अएना आ प्राकृति‍क अएनामे अन्‍तर अछि‍। प्राकृति‍क अएना वस्‍तुक बाहरी रूप देखबैत जहन कि‍ मनुष्‍यक अएनाकेँ दोहरी रूप होइत अछि‍। जइ‍सँ बाहरी आ भीतरी दुनू रूप देखैत अछि‍। ऐठामक (मि‍थि‍लाक) चि‍न्‍तनधारामे, प्रचलि‍त दार्शनि‍क चि‍न्‍तनधारासँ भि‍न्न कि‍छु एहेन वि‍शेषता सन्नि‍हि‍त अछि‍ जे अपन अलग पहचान बनौने अछि‍। जइ‍ आधारपर साहि‍त्‍यक दीप (ज्‍योति‍) कहब अधि‍क उपयुक्‍त हएत।
उच्‍च कोटि‍क साहि‍त्‍यि‍क सृजन लेल यथार्थ आ आदर्शक समावेश आवश्‍यक अछि‍। जकरा आदर्शोन्‍मुख-यथार्थवाद कहल जा सकैछ। अगर यथार्थवाद आँखि‍ खोलैत अछि‍ तँ आदर्शवाद उठा कऽ मनोरम स्‍थानपर पहुँचबैत अछि‍। चरि‍त्रकेँ उत्‍कृष्‍ट आ आदर्श बनेबा लेल जरूरी नै‍‍ जे ओ नि‍र्दोषे हुअए। ऐ‍ जटि‍ल संसारमे, जइ‍मे छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघ समस्‍या लधलो अछि‍ आ दि‍न-प्रति-दि‍न जन्‍मो लैत अछि‍, तइ‍ठाम नि‍र्दो चि‍त्रणक नि‍र्माण कठि‍न अछि‍। महानसँ महान पुरुषमे कि‍छु-ने-कि‍छु कमजोरी रहि‍ते‍ छन्‍हि‍, जेकरा नि‍खारब आगूक लेल महत्‍वपूर्ण अछि‍, तँए अनुचि‍त नै‍‍। वएह कमजोरीक सुधार मनुष्‍य बनबैत अछि जे उपन्‍यासक मुख्‍य बन्‍दु छी। साहि‍त्‍यक मुख्‍य अंग आदर्श छी जइ‍सँ रचना कलाक पूर्ति होइत अछि‍।
आदि‍कालेसँ आदि‍वासी‍क रूपमे पनपैत मि‍थि‍लाक समाज आइक वि‍कसि‍त समाजक सीढ़ी धरि‍ पहुँचल अछि‍। जंगली जीवनसँ लऽ कऽ सुसभ्‍य जि‍नगी धरि‍क इति‍हास मि‍थि‍लाक भूमि‍मे चंदनक गाछ सदृश दुनि‍याँक वातावरणमे अपन महमही बि‍लहैत रहल आ अखनो बि‍लहैक सामर्थ रखैत अछि‍। जे हमरा सबहक धरोहर छी तँए बचा कऽ राखब सभसँ पैघ दायि‍त्‍व बनैत अछि‍। जि‍नगीक आवश्‍यकता आ उत्‍पादन करैक जते शक्‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल जि‍नगी बना सामंजस्‍यसँ सभ मिल‍-जुलि‍ अखन धरि‍ रहला अछि‍। आगू बढ़ाएब आइक आवश्‍यकता छी। जइ‍ समाजमे अखनो बरहबरना (बारह-वर्ण) भोज, बरहबरना बरियाती (बि‍आहमे) बरहबरना कठि‍आरीक (जि‍नगीक अंति‍म क्रि‍या) चलैन अछि‍, की‍ आेइ‍ समाजकेँ तोड़ि‍ सासु-पुतोहू, पि‍ता-पुत्रक संबंधकेँ माटि‍क बरतन जकाँ फोड़ि‍-फाड़ि‍ ि‍द। जइ‍ समाजक बीच सभ संग मिलि‍ पावनि‍-ति‍हार, धार्मिक स्‍थानक नि‍र्माण केलनि‍, की ओकरा नस्‍त-नाबूद कऽ दि?
ओना मि‍थि‍लाक दुर्भाग्‍य कही आकि‍ देशक दुर्भाग्‍य, साठि‍ बर्ख पूर्वसँ लऽ कऽ हजारो बर्ख पूर्व धरि‍ परतंत्र रहल। परतंत्रताक जि‍नगी केहन होइ छै, कहब जरूरी नै‍‍। ओना जइ‍ रूपक वि‍देशी प्रभाव आन-आन क्षेत्रमे पड़ल आेइ‍सँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचल प्रभावि‍त भेल। अदौसँ अबैत वैदि‍क ढाँचामे सजल समाज अखनो धरि‍, एते दि‍नक गुलामीक उपरान्‍तो सजल अछि‍। मुदा भूमण्‍डलीकरणक प्रभाव जते तेजीसँ प्रभावि‍त कऽ रहल अछि‍ आेइ‍सँ बचैक लेल गंभीर सोचक जरूरत अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ मि‍थि‍लाक सूरत दृश्‍य सामने नाचए लगत। मि‍थि‍लाक संबंध जते पूर्वी प्रान्‍त बंगाल (पछि‍म बंगाल सहि‍त बंगलादेश) आसाम (मेघालय सहि‍त आसाम) आ नेपालक तराइ इलाकासँ रहल ओते पछि‍मी आ दछि‍नी प्रान्‍तसँ नै‍‍ रहल। घनगर अबादी होइबला इलाका रहने मि‍थि‍लाक बोनि‍हार (श्रमि‍क) बोि‍न करए नेपाल, आसाम आ बंगाल जाइत रहल अछि‍। पटुआ काटब, धोअब आ धान रोपब-काटब मुख्‍य काज रहल। जइ‍सँ संग-संग रहैक, खाइ-पीबैक, नचै-गबैक अवसर भेटल। कला-संस्‍कृति‍मे मि‍श्रण भेल। जइ‍सँ एक-दोसराक जि‍नगी मि‍लैत-जुलैत रहल अछि‍।
आजुक संस्‍थागत शि‍क्षण बेवस्‍थाक सदृश तँ संस्‍था कम छल मुदा पूर्वहि‍सँ गुरुकूल शि‍क्षण बेवस्‍थाक चलैन आबि‍ रहल छल। वि‍देशी शासकक संग भाषा-साहि‍त्‍य सेहो आएल। सामाजि‍क बेवस्‍थाक मजबूतीक चलैत ओ ओते तेजीसँ आगू नै‍‍ बढ़ि‍ सकल जते तेजीसँ बढ़क चाहि‍ऐक। ओना राज-काजमे अपन स्‍थान बना लेलक। जनसंख्‍याक (मि‍थि‍लाक) अनुपातमे पढ़ै-लि‍खैक बेवस्‍था नगण्‍य छल। कारण छल अखुनका जकाँ ने पढ़ै-लि‍खैक एते साधन छल आ ने पढ़ैक आवश्‍यकता बुझैत छल, जीबैक लूरि‍ सी ‍ लेब प्रमुख छल, जे परि‍वार (माए-बाप) सँ भेट जाइ छलै। कि‍छु एहनो काज (लूरि‍) छलै जे समाजोसँ भेटै छलै, जइ‍सँ स्‍पष्‍ट रूपे दू भागमे वि‍भाजि‍त छल। पढ़ल-लि‍खल लोकक समाज आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल उत्‍पादक समाज। मुदा समाज हुनके (पढ़ल-लि‍खल) सबहक देखाओल रास्‍तासँ चलैत रहल। पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच संस्‍कृत आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच अपन बोली (जे बादमे भाषा बनल) चलैत छल। नव-नव शब्‍दक जन्‍म सेहो होइत छल। वैदि‍क संस्‍कृत सेहो जनभाषाक नगीचे छल मुदा धीरे-धीरे परि‍नि‍ष्‍ठि‍त बनैत-बनैत दूर हटैत गेल। जइ‍सँ वि‍शाल जन-समूह संस्‍कृतसँ दूर भऽ गेल। जेकर प्रभाव जन-मानसक जीवनक अानो-आनो अंगपर पड़ल, कला-संस्‍कृतिपर सेहो पड़ल। जइ‍सँ लोक संस्‍कृति सेहो पनपल। संस्‍कृत समाजोन्‍मुखी नै‍‍ भऽ परि‍वारोन्‍मुखी हुअए लगल। समाजक बीच पालि-प्राकृत भाषाक जन्‍म भेल। समाज-सुधारक आ धार्मिक सम्‍प्रदायि‍क जनमानसक बीच पालि‍ भाषाक प्रयोग केलनि‍। ऐ रूपे संस्‍कृतसँ पाि‍ल, अपभ्रंश होइत आगू मुँहे ससरल। अपभ्रंशसँ मागधी आ मागधीसँ बि‍हारी, उड़ि‍या, बंग्‍ला आ असमि‍या भाषाक वि‍कास भेल।
बि‍हारी भाषाक अन्‍तर्गत भोजपुरी, मगही आ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। बि‍हारक मैिथली भाषा क्षेत्रसँ पछि‍म उत्तर-प्रदेशक पुबरि‍या भाग धरि‍ भोजपुरी भाषा बढ़ल। दछि‍न बि‍हार (गंगासँ दछि‍न) मगही आ गंगासँ उत्तर नेपालक तराइ धरि‍ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। ओना भाषाक संबंधमे कहल गेल अछि‍ जे- चारि‍ कोसपर पानी बदले आठ कोसपर वाणी।‍ बि‍हारक तीनू भाषा क्षेत्रक अन्‍तर्गत क्षेत्रीय बोली सेहो पनपैत रहल अछि‍।
गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल ि‍बहार, बंगाल आ आसामक बीच माटि‍-पानि‍ आ जलवायुक (कि‍छु वि‍षमता छोड़ि‍) समता सेहो अछि‍। समतल भूमि‍ आ एकरंगाह जलवायु रहने खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीमे सेहो समता अछि‍। धान सन प्रमुख अन्न तीनू राज्‍यक मुख्‍य उपज छी। एक रंगाह उपजा-बाड़ी आ खेतीक लूरि‍सँ खेति‍हरक एकरंगाह जि‍नगी बनल। खान-पान, आचार-वि‍चार, चालि‍-ढालि‍, कला-संस्‍कृतिमे एकरूपता आएल। मुदा प्राकृति‍क प्रकोप आ व्‍यापारि‍क अनुकूल भेने बंगाल आ मि‍थि‍लाक दूरी बढ़ौलक। जइ‍ठाम मि‍थि‍ला क्षेत्र पोखरि‍क पानि‍ जकाँ स्थि‍र (कहि‍यो काल पैघ भूमकम आ अन्‍हर-तुफान होइत) बनल रहल तइ‍ठाम बंगाल प्राकृति‍क प्रकोपसँ अधि‍क प्रभावि‍त होइत रहल अछि‍। व्‍यापारि‍क अनुकूलता (समुद्री मार्गसँ) सँ विदेशीक प्रभाव सेहो बढ़ल। कोनो भाषा-साहि‍त्‍य आेइ‍ठामक जि‍नगीसँ प्रभावि‍त होइत। ऐ‍ दृष्‍टि‍सँ जेहन उर्वर भूमि‍ बंगला साहि‍त्‍यकेँ भेटल ओ मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेटल। वि‍देशी कला-संस्‍कृतिक प्रभाव जते बंगालपर पड़ल ओते बि‍हारपर नै‍‍ पड़ल।
ओना मि‍थि‍लांचल प्राकृति‍क प्रकोप आ वि‍देशी शासनसँ ओते प्रभावि‍त नै‍‍ भेल जते बंगाल भेल। मुदा अनुकूल जलवायु रहने मि‍थि‍लांचलमे मनुष्‍यक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल। जइ‍सँ जनसंख्‍याक भार सभ दि‍न रहल। सामंतीक कुबेवस्‍था आ जनसंख्‍याक भारसँ मि‍थि‍लांचल गरीबीक जालमे सभ दि‍न फँसल रहल। जइ‍मे कला साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत रहल। समाजक स्‍थि‍ति‍केँ आरो भयावह बनबैमे जातीय आ साम्‍प्रदायि‍क योगदान भरपूर रहल। टुकड़ी-टुकड़ीमे समाज वि‍भाजि‍त भऽ गेल। जेकर प्रभाव कला-संस्‍कृतपर सेहो नीक-नहाँति‍ पड़ल अछि‍।
अर्द्ध-मागधीसँ नि‍कलल मैथि‍ली तेरहम-चौदहम शताब्‍दीमे ज्‍योति‍रीश्वरसँ पूर्व‍ वि‍द्यापति‍क रचनासँ प्रारंभ भेल। लोकक कंठ-कंठमे वि‍द्यापति‍ समाए अखनो गाबि‍ रहला अछि‍। एकटा ज्योतिरीश्वरक परवर्ती वि‍द्यापति‍ संस्‍कृत भाषाक राजपंडि‍त छलाह मुदा ज्योतिरीश्वरक पूर्ववर्ती विद्यापति समाजक जनभाषामे लिखलनि। जइ‍‍सँ संस्‍कृत-मैथि‍लीक संग अवहट्ठ (जनभाषा)मे कीर्तिलता आ कीर्तिपताका’ मे परवर्ती विद्यापति सेहो कहलनि‍- सक्कय वाणी बहुअन भावय‍.. उन्नैसम शताब्‍दीसँ पूर्व धरि‍ साहि‍त्‍य सृजन कवि‍तेमे होइत आबि रहल छल। आने-आने भाषा जकाँ मैथि‍ली गद्यक वि‍कास सेहो पछाति‍ भेल। साहि‍त्‍य सृजन मूलत: गद्य आ पद्यमे होइत। गद्यक चरम उपन्‍यास छी तहि‍ना पद्यक महाकाव्‍य।
साहि‍त्‍यक आने वि‍धा जकाँ उपन्‍यासो छी। सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍क दृष्‍टि‍सँ मैथि‍ली उपन्‍यासकेँ १९६०ई.सँ पूर्व आ साठि‍क पछाति‍केँ दू भागमे वि‍भाजि‍त कए आगू बढ़ैत छी। साठि‍क वि‍भाजन रेखाक पाछू देशक आजादी, ढहैत राजा-रजवाड़ आ भूमि‍-आन्‍दोलन प्रमुख कारण रहल अछि‍। साठि‍ ईस्‍वीसँ पूर्व मैथि‍लीमे नि‍म्नलि‍खि‍त उपन्‍यासक सृजन भऽ चुकल छल। ि‍नर्दयी सासु (१९१४), शशि‍कला (१९१५), पूर्ण वि‍वाह (१९२६) दुरागमन रहस्‍य (१९४६), कलयुगी सन्‍यासी (१९२१) रामेश्वर (१९१५), सुमति‍ (१९१८), मनुष्‍यक मोल (१९२४) चन्‍द्रग्रहन (१९३३) कन्‍यादान (१९३३), सोन्‍दर्योपासनक पुरस्‍कार (१९३८), सुशीला (१९४३) असहाया जाया (१९४५), जैबार (१९४६) पारो (१९४६) नवतुरि‍या (१९५६), कुमार (१९४६), भलमानुस (१९४७), कला (१९४६), वि‍कास (१९४६), चन्‍द्रकला (१९५०), प्रति‍मा (१९५०), मधुश्रावनी (१९५६) वीरकन्‍या (१९५०), वि‍दागरी (१९५०), अनलपथ (१९५४), वि‍द्यापति‍ (१९६०), कृष्‍णहत्‍या (१९५७), रत्‍नहार (१९५७), आन्‍दोलन (१९५८), दुर्वाक्षत (१९५८), आदि‍कथा (१९५८), चानोदय (१९५९), बि‍हाड़ि‍ पात-पाथर (१९६०), दुरागमन (१९४५), चामुन्‍डा (१९३३), मालती-माधव (१९३५)आजुक उपन्‍यास कलाक दृष्‍टि‍सँ भलेहि‍ं ऊपर लि‍खि‍त सभ उपन्‍यासकेँ सफले नै‍‍ कहब मुदा ऐ‍‍ बातसँ इनकारो करब जे आेइ‍ उपन्‍यासकार सबहक संगे जेहन सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल नै‍‍ अछि‍। हमरा सभकेँ ऐ‍‍ बातक सदति‍ धि‍यान राखए पड़त जे मैथि‍ली भाषा मि‍थि‍ला भूमि‍सँ जन्‍म नेने अछि‍ आ अखनो जीवि‍त अछि‍। पुरान भाषा मैथि‍ली रहि‍तो आइ धरि‍ राजभाषाक रूपमे राज-दरबार नै‍‍ पहुँचल, जे अवसर आइ भेटल, ओ प्रमाणि‍त करैत अछि‍ जे हम जीवि‍त भाषा छी। दुनि‍याँ अनेको एहेन राजभाषा अछि‍ जे मि‍थि‍ला क्षेत्र आ मैथि‍ली भाषासँ छोट अछि‍।
बीसम शताब्‍दीक पूर्वाद्धसँ आरंभ भेल उपन्‍यास साहि‍त्‍य कखनो कुदैत तँ कखनो ठमकि‍-ठमकि‍ चलि‍ अखनो चलि‍ रहल अछि‍। जे माटि‍-पानि‍ बंगला, असामी आ उड़ि‍या भाषा-साहि‍त्‍यकेँ भेट‍लै से मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेट सकलै तँए जँ आेइ‍ सभ साहि‍त्‍यसँ पछुआएल तँ ऐ‍‍मे आश्चर्य की? ओना साठि‍क दशकमे मि‍थि‍लो समाजमे मोड़ आएल मुदा साहि‍त्‍य ठमकले रहि‍ गेल। उपन्‍यास साहि‍त्‍यक वि‍षए-वस्‍तुमे बढ़ाेत्तरी अवश्‍य भेल मुदा जइ‍‍ रूपे हेबाक चाही से नै‍‍ भेल। जि‍नगीक मुख्‍य समस्‍या साहि‍त्‍यक गौण रूपमे आ गौण समस्‍या मुख्‍य रूपमे बनल रहल। मुदा सौभाग्‍यक बात छी जे नव-नव उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सर्वांगीण रूपकेँ दृष्‍टि‍मे राखि‍ लि‍खि रहलाह अछि‍। ओना मि‍थि‍लाक जे वास्‍तवि‍क रूप अछि‍ ओ अत्‍यन्‍त दयनीय अछि‍। जइ‍‍ बीच रहि‍ साहि‍त्‍य सृजन अत्‍यन्‍त कष्‍टकर अछि‍। मुदा मि‍थि‍ला तँ वएह धरती छी जइ‍‍ठाम एक-सँ-एक ऋृषि‍-मुनि‍ साधना कए अपन दृष्‍टि‍ देलनि‍ जे दुनि‍याँक सभसँ ऊपर अछि‍।
ग्रामीण चि‍त्रण- ग्रामीण शब्‍दक दू अर्थ दू जगहपर होइत अछि‍। समग्र दृष्‍टि‍सँ ग्रामीण शब्‍दक अर्थ क्षेत्र-वि‍शेषक सभ कि‍छुसँ होइछ आ ग्रामीण परि‍धि‍मे (गामक सीमाक भीतर) ग्रामीण शब्‍द सि‍र्फ ग्राममे रहनि‍हार मनुष्‍यसँ होइछ। प्रश्न उठैत ग्राम संग ग्रामीण आकि‍ अगबे ग्रामीण?
ग्राम संग ग्रामीणक संबंध ओतबे नै‍‍ होइत जे हम अमुख ग्राम रहै छी। ग्राम आेइ‍ रूपे ससरैत आगू बढ़ए जइ‍‍ रूपे दुनि‍याँ ससरि‍ रहल अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ लोक भागि‍-पड़ा आेइ‍ठाम पहुँचत जइ‍‍ठाम सुगमतासँ सुभ्‍यस्‍त जि‍नगी भेटतै। ग्रामक उत्‍पादि‍त पूँजी माटि‍-पानि‍, गाछ-वि‍रीछ, नदी-नाला इत्‍यादि‍ मनुष्‍यक संग पूरैबला आर्थिक आधार छी। कोनो जुग अबौ आ जाओ, मनुष्‍यक जे मूल-समस्‍या अछि‍ ओ अनवरत रहबे करत। भलेहि‍ं उन्नति‍ भेलापर सुगमता आओत, नै‍‍ भेलापर जटि‍लता आओत। आजुक समैक मांग अछि‍ जे हमरा सबहक आर्थिक आधार ओहन बनए जे एक्कैसम शताब्‍दीक मनुष्‍य कहबैक अधि‍कारी बनी।
अंतमे, जहि‍ना पैघ गहवरमे सैकड़ो जगह पूजा ढारि‍ गोसाँइ खेलल जाइत तहि‍ना आइक समाजक मांग साहि‍त्‍यक अछि‍।

Wednesday, July 30, 2008

जगदीश प्रसाद मण्डल- अवतारवाद

अवतारवाद
जीव आ ईश्वर- जे कि‍यो शरीर धारण करैत आ छोड़ैत, जन्‍म लैत आ मरैत, ओ संसारी जीव होइत अछि‍। मुदा जे सर्वत्र व्‍याप्‍त, सर्वशक्‍ति‍मान, सर्वरक्षक गुणसँ मंडि‍त होइत ओ ईश्वर होइत। शास्‍त्रमे जे लक्षण ईश्वरक देल गेल अछि‍ आेइ‍ अनुसार ओ सबहक प्रति‍पालक सेहो होइत छथि‍। हुनक स्‍वभाव क्रुर भइये ने सकैत छन्‍हि‍। ि‍क तँ ओ महादयालु होइ छथि‍। संगहि‍ ओ सर्वत्र व्याप्‍त छथि‍ तँए कतौ अबै-जाइक जरूरते केना हेतनि‍।
प्रश्न उठैत अछि‍ जे ओ माछ आ काछुक रूप ि‍कअए धारण केलनि‍? ऐ‍ रूपमे एबाक की प्रयोजन भेलनि‍। मत्‍स्‍यावतार लऽ कऽ ि‍कअए शंखासुरक हत्‍या केलनि‍? जे स्‍वयं सर्वपालक सर्वव्‍यापी आ महादयालु छथि‍। हुनका ि‍कअए ककरोसँ द्वेष भेलनि‍? ि‍कअए ओ सुअर बनि‍ ि‍हरण्‍याक्षसँ पृथ्‍वी छीन अपना मुँहमे रखि‍ लेलनि‍। की पृथ्‍वी धीया-पूता खेलैक गेन्‍द सदृश अछि‍ जे ओ मुँहमे रखि‍ इतर पृथ्‍वीपर ठाढ़ भऽ हुनकासँ लड़ैत रहलाह आ अंतमे हत्‍या कऽ देलखि‍न। एतबे नै‍, नरसि‍ंह अवतार लऽ लोहाक खंभा फाड़ि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पेट फाड़ि‍ हत्‍या केलनि‍। की ईश्वर सभसँ पैघ हत्‍यारा छथि‍? वामन रूप धारण कऽ राजा बलि‍सँ तीन‍ डेग जमीन मांगि‍ सौंसे राज्‍य हड़ैप लेलनि‍, की दुनि‍याँमे सभसँ पैघ धोखाबाज वएह छलाह? हन धोखाबाजक आराधना कएलासँ  केहन फल भेटत अपनो वि‍चारि‍ सकै छी। भीख मांगब मायावी, असमर्थ जीबक (मनुष्‍यक) काज छी नै‍ की कर्मठ, ऐश्वर्यवान पुरुषक। ऐ‍ रूपे देखलापर झि‍‍ पड़ैत जे मनक माया, कल्‍पना ओर अज्ञानता सभकेँ भरमा देने अछि‍। ततबे नै‍, परशुराम बनि‍ हैहय-वंशीय क्षत्रिकेँ एक्कैस बेर‍‍ सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍। जहन एकबेर‍ वंश नाश कऽ देलखि‍न तहन दोहरा कऽ कतएसँ फेर क्षत्रि‍ए आबि‍ गेलाह जे दोहरबैत, तेहरबैत एक्‍कैस बेर‍‍ पहुँचि‍ गेलाह। अनन्‍त वि‍श्व- ब्रह्माण्‍डक रचैता ईश्वर दशरथक बेटा राम बनि‍ सीतासँ बियाहो कऽ लेलनि‍ आ हरण भेलापर गाछो-वृक्षसँ कानि‍-कानि‍ पता पुछलथि‍न। बि‍ना ओर-छोड़क समुद्रमे पाथरक पुलो बनबा देलखि‍न। इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍, अनेको प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍। हम सभ एक्‍कैसम शताब्‍दीक समर्थ चेतना छी नै‍‍ कि‍ सोलहम शताब्‍दीक बाल चेतना।
जड़-चेतनात्‍मक वि‍श्वसन्‍ताक वास्‍तवि‍क बोध नै‍‍ रहने पहि‍ने ि‍कछु गोटे जगतकर्त्ता ईश्वरक जाल ठाढ़ केलनि‍ आ पछाति‍ अपन स्‍वार्थ सि‍द्ध करए लेल नाना अवतारक कल्‍पना केलनि‍। छल करब, जोर-जबरदस्‍ती करब, यती-सतीक चरि‍त्र भ्रष्‍ट करब, की ईश्वरक काज थि‍क। ई सभ जाल-फरेबी मनुक्‍खक छी। एतबे नै‍‍ ईश्वरक नाओंपर मनुष्‍यक खून सेहो बहाओल गेल अछि‍। सेहो खून सि‍र्फ मानवेत्तर जीवेक नै‍‍ बल्‍कि‍ मूक, मासूम मनुष्‍यक सेहो। धनबल, शरीरबल, वि‍द्याबलादि‍सँ सेहो सदैव गरीब आदमी अत्‍याचारीक शि‍कार बनैत रहल अछि‍। जे अखनो आँखि‍क सोझमे दि‍न राति‍ भऽ रहल अछि‍।
श्रीमद्भागवतक स्‍कन्‍ध-१, अध्‍याय-३, श्‍लोक-५ सँ लऽ कऽ २५म श्‍लोक धरि‍ अवतारवादक व्‍याख्‍या अछि‍। जइमे नि‍म्न प्रकारक चर्चा अछि‍- (१) सनक- सन्नदन, सनातन, सनत्‍कुमार-ब्रह्मचर्य पालनक लेल, (२) सुअर- पृथ्‍वीकेँ रसातलसँ आनबाक लेल, (३) नारद- उपदेशकक लेल, (४) नर-नारायण- तपक लेल, (५) कपि‍ल- सांख्‍य शास्‍त्रक उपदेश देबा लेल, (६) दत्तात्रेय- उपदेश देबा लेल, (७) यज्ञ- रूचि‍प्रजापति‍क पत्नी आकूति‍सँ उत्‍पन्न भेल स्‍वायम्‍भुक मन्‍वन्‍तरक रक्षाक लेल, (८) ऋृषभदेव- परमहंसक आदर्श देखेबा लेल, (९) पृथु- पृथ्‍वीसँ औषधि‍ दोहनक लेल, (१०) मत्‍स्‍य- डूमल पृथ्‍वीकेँ नि‍कालबाक लेल जे शंखासुर वेदकेँ चोरा नेने रहए। जेकरा मारि‍ कऽ मत्‍स्‍य वेदक उद्धार केलक, (११) कच्‍छप- समुद्र मथैमे सहयोगक लेल, (१२) धन्‍वन्‍तरि‍- समुद्रसँ अमृतक घैल लऽ प्रकट भेला, (१३) मोहि‍नी- देवता-दानवक झगड़ा फड़ि‍छबैक लेल, (१४) नृसि‍ंह- हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारए लेल, (१५) वामन- बलि‍केँ ठकैक लेल, (१६) परशुराम-क्षत्रि‍क सामूिहक हत्‍याक लेल, (१७) व्‍यास- वेदक ि‍वभाजन करए लेल, (१८) श्रीराम- रावणकेँ मारए लेल, (१९-२०) बलराम-कृष्‍ण- पृथ्‍वीक भार उताड़ै लेल, (२१) कल्‍कि‍- पृथ्‍वीक भार उताड़ए लेल। ऊपर वर्णित बाइस अवतार संग-संग आन-आन शास्‍त्रमे हंस आ हयग्रीवक चर्चा सेहो अछि‍। सनकादि‍केँ उत्तर देबा लेल हंस आ मधुकैटभक हत्‍याक लेल हयग्रीवक चर्च अछि‍।
सभसँ पहि‍ने अवतारवादक भावना शतपथ ब्राह्मणमे भेटैत अछि‍। जेना ि‍क एच.याकोवी- इनकारनेशन, इन्‍साइक्‍लोपीडि‍या ऑफ रि‍लीजन एण्‍ड इथि‍क्‍स भाग ७१मे लि‍खने छथि‍। संग-संग एम. माेनि‍एर वि‍लि‍यम्‍स- द. वि‍जडम पृष्‍ट ३८१मे सेहो लि‍खने छथि‍। एच.राय चौधरी- अर्लि हि‍स्‍ट्री ऑफ बैष्‍णव सेक्‍टमे पृष्‍ट ९६मे सेहो लि‍खने छथि‍।
शुरूमे वि‍ष्‍णुक अपेक्षा प्रजापति‍क ि‍वशेष महत्‍व छलनि‍। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार प्रजापति‍ए मत्‍स्‍य (१/८/१/१) कूर्म (कौछु) (७/५/१/५) ओर वराहक (१४/१/२/११) अवतार लेलनि‍। प्रजापति‍क बराह रूपक कथाक चर्च तैत्तीरीय संहि‍ता (७/१/५/१) तैत्तरीय ब्राह्मण (१/१/३/६) तैत्तरीय आरण्‍यक (१०/१/८) ओर काठक संहि‍ता (८/१)मे प्रारंभि‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। जेकर चर्च डॉ. कामि‍ल बुल्‍के रामकथा अनुच्‍छेद १४०मे केने छथि‍।
ऐ‍ रूपे देखैत छी जे मत्‍स्‍य, कूर्म वराहक अवतार शुरूमे प्रजापति‍सँ छलनि‍। ि‍कन्‍तु पछाति‍ आबि‍ िवष्‍णुक महत्‍व बढ़लापर तीनूक संबंध ि‍वष्‍णुसँ भऽ गेलनि‍। महाभारतक नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७२) आ (१२/३३७) आ हरि‍वंश पुराण (४/४१)मे बराह आ वि‍ष्‍णुक संबंध मानि‍ लेल गेल। आगू आबि‍ तीनूक नाओंसँ एक एकटा महापुराण सेहो लि‍खल गेल। जइ‍मे तीनूक संबंध वि‍ष्‍णुसँ कए देल गेल अछि‍।
वामनावतार आ नृसि‍ंह अवतार शुरूहेसँ ि‍वष्‍णुसँ संबंधि‍त अछि‍। वामनावतारक चर्चा तैत्तीरीय संहि‍ता (२/२/३/१) शतपथ ब्राह्मण (१/२/५/५) तैत्तीरीय ब्राह्मण (१/७/१७) ओर ऐतरेय ब्राह्मण (६/३/७) मे भेल अछि‍। नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७३) ओर हरि‍वंशपुराण (१/४१) मे सेहो उल्‍लेख अछि‍। ि‍वष्‍णु पुराणमे (१/१६) नृसिहक कथाक वर्णन सेहो अछि‍।
शुरूमे परशुरामक अवतार वि‍षयक कथाक चर्च नै‍‍ भेटल अछि‍। मुदा नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७७) हरि‍वंश पुराण (१/४१/११२/१२०) आ वि‍ष्‍णु पुराण (१/९/१४३) मे वि‍ष्‍णुक अवतार मानल गेल अछि‍।
ऐ‍ रूपे प्राचीन साहि‍त्‍यमे अवतारवादक चर्चा होइतो वि‍शेष पूजाक चलनि‍ नै‍‍ भेल आ ने वि‍ष्‍णुक प्रधानते भेल रहए। कृष्‍णावतारक संग अवतारवादक ि‍वकासमे महत्‍वपूर्ण परि‍वर्तन प्रारंभ भेल। आेइ‍ समैसँ अवतारवाद भक्‍ति‍भावसँ जुड़ि‍ फुलैत-फड़ैत आजुक रूप धेने अछि‍।
वासुदेव कृष्‍ण भागवतक इष्‍टदेव छलाह। शुरूमे ि‍वष्‍णुक संग हुनक संबंध नै‍‍ छलनि‍। हेमचन्‍द राय चौधरीक अनुसार तेसर शताब्‍दी ई.पू. वासुदेव कृष्‍ण आ वि‍ष्‍णुक अभि‍न्नताक भावना उत्‍पन्न भेल।
अवतारवादक प्रक्रि‍यामे बौद्धधर्म जुड़ि‍ गेल। बौद्धधर्म आ भागवत सम्‍प्रदायक भक्‍ति‍मार्ग समान रूपसँ ब्राह्मण साहि‍त्‍यक कर्मकांड आ यज्ञ प्रधान धर्मक प्रति‍क्रि‍याक रूपमे उत्‍पन्न भेल आ वि‍कास केलक। जइ‍ कारणे धर्मक क्षेत्रमे ब्राह्मणक एकाधि‍कार ढील भेल। बौद्ध धर्मक अधि‍काधि‍क प्रचार-प्रसार देखि‍ भागवत समर्थक अपना दि‍सि‍‍ आकर्षित करए लेल भागवतक इष्‍टदेव वासुदेव कृष्‍णकेँ ि‍वष्‍णु-नारायणक अवतार मानि‍ लेलनि‍। तैत्तीरीय आरण्‍यक (१०/१/६)मे वासुदेव आ ि‍वष्‍णुक अभि‍न्नताक चर्च सभसँ पहि‍ने भेल अछि‍।
ऐ‍सँ अवतारवादककेँ भरपुर बल भेटल। संग-संग ि‍वष्‍णुक महत्‍व  सेहो बढ़ए लगल। जइसँ अवतारवादक पूर्ण भावना रसे-रसे ि‍वष्‍णु-नारायणमे केन्द्रि‍त हुअए लगल। आ वैदि‍क साहि‍त्‍यक आन-आन अवतारक क्रि‍या-कलाप वि‍ष्‍णुमे आरोपि‍त भऽ गेल।
एक दिसि‍ अवतारवाद बढ़ि‍ रहल छल तँ दोसर दिसि‍ रामक आदर्श चरि‍त्र जनमानसक बीच प्रबल भऽ रहल छल। रामायणक संग-संग रामक महत्‍व सेहो तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छल। रामक वीरताक वर्णनमे अलौकि‍कताक मात्रा सेहो बढ़ए लगल। एक दिसि‍ रावण पाप आ दुष्‍टताक प्रतीक बनि‍ जनमानसक बीच आएल तँ दोसर दिसि‍ पुण्‍य आ सदाचारक प्रतीक राम बनलाह। जेकर फल भेल जे कृष्‍णे जकाँ रामो ि‍वष्‍णुक अवतारक श्रेणीमे आबि गेलाह। भरि‍सक पहि‍ल शताब्‍दी ई. पूर्वेसँ राम ि‍वष्‍णुक अवतार मान जा लगलाह। महाभारतक संग-संग वायु, ब्रह्माण्‍ड, वि‍ष्‍णु, मत्‍स्‍य, हरि‍वंश इत्‍यादि‍ पुराणमे अवतारक तालि‍कामे राम सेहो छथि‍।
अवतारवादक पहि‍ल कल्‍पना शतपथ ब्राह्मणमे अछि‍। जे ईसासँ एक हजार वर्ष पूर्वक रचना मानल जाइत अछि‍। शतपथ ब्राह्मणमे कहल गेल अछि‍ जे प्रजापति‍ये माछ, कछुआ आ सूअरक अवतार धारण केलनि‍। जे शुद्ध कल्‍पनाश्रि‍त झि‍‍ पड़ैत अछि‍।
वामन अवतारक कल्‍पना तैत्तीरीय संहितामे अछि‍। हजार वर्ष पूर्व एकरो रचना मानल जाइत अछि‍। ओना वामन अवतारक कल्‍पना ऋृग्‍वेदक प्रथम मंडलक बाइसम सूक्‍तक अंति‍म (१६/२१) छह मंत्रसँ सेहो उद्भुत मानल जाइत अछि‍। इदं वि‍ष्‍णुवि‍चि‍क्रमे त्रेधा ि‍नदधे पदम। समूलमस्‍य पांसुरे। त्रीणि‍ पदा वि‍चक्रमे वि‍ष्‍णुर्गोपा अदाभ्‍य: अतो धर्माणि‍ धारयन्। (ऋृग्‍वेद- १/१२/१७-१८) टीका रामगोवि‍न्‍द ि‍त्रवेदी। वि‍ष्‍णु सूर्यक प्रतीक छथि‍। हुनक ि‍करण पएर ि‍छयनि‍। पृथ्‍वी, अंतरि‍क्ष आ द्युलोकमे कि‍रण माने रोशनी पड़ब तीन पएर पड़ब छि‍यनि‍। जे प्राय: सभ वैदि‍क जनै छथि‍। मुदा पाछू आबि‍ ऐ‍ सूत्रकेँ कथा गढ़ि‍ ि‍वष्‍णु वामनक कथा बनि‍ गेल अछि‍। कथा अछि‍ ि‍वष्‍णु वामन बनि‍ राजा बलि‍केँ ठकि‍ कऽ तीन डेग भूमि‍ मांगि‍ सौंसे राज्‍ये नापि‍ लेलनि‍। प्रश्न उठैत जे एहेन-एहेन ठककेँ जनमानस केना ईश्वर मानि‍ लेलक‍? पुराणक अनुसार ि‍वष्‍णुु इन्‍द्रक छोट भाए कहल गेल छथि‍। जे अपन जेठ भाय इन्‍द्रक गद्दी स्‍थापि‍त करए लेल बलि‍केँ धोखा देलनि‍।
मत्‍स्‍य, कच्‍छप, वराह, नृसि‍ंह, वामन, परशुराम इत्‍यादि‍ जे कि‍यो अवतारक श्रेणीमे एलाह, ि‍कयो पूजनीय नै‍‍ भऽ सकलाह। अवतारक अंति‍म छोरपर उदि‍त रामे आ कृष्‍णेटा पूजनीय भेलाह।
वस्‍तुत: श्रमणक (बौद्ध-जैन) उत्तारवादक प्रति‍क्रि‍यामे अवतारवादक कल्‍पना भेल। महावीर आ बुद्धदेव महापुरुष छलाह। (उत्तारक अर्थ-सामान्‍य जीवकेँ दोसरसँ ऊपर उठब होइत अछि‍ जखन कि‍ अवतारक अर्थ महान सत्ताकेँ ऊपरसँ नि‍च्‍चाँ उतरब होइत अछि‍)। अवतारवादक परम्‍पराक अनुसार परमात्‍मा उतरि‍‍ कऽ साधारण मनुष्‍य बनि‍ गेलाह। पहि‍ने कृष्‍णकेँ अवतार मानल गेलनि‍। जि‍न‍कर पूर्ण वि‍कास गीताक कृष्‍णवतारमे भेलनि‍। ताधरि‍ राम अवतारक श्रेणीमे नै‍‍ आएल छलाह। केवल धनुर्धारी वीर मानल जाइत छलाह। गीताकार कृष्‍णक मुँहसँ रामक संबंधमे कहबौलनि‍- राम: शस्‍त्रभृतामहम।
साक सौ वर्ष पूर्व धरि‍ चारू भाँइ रामकेँ वि‍‍ष्‍णुक अंशावतारे मानल जाइत छल‍ि‍न। रामक पूर्ण परब्रह्म ईसाक बाद अध्‍यात्‍म रामायणसँ शुरू भेल। ऐ‍ रूपे अवतारवादक गुन्‍जाइस माने अँटावेश वेदमे नै‍‍ पछाति‍ भेल।
प्रश्न उठैत जे अवतारवाद की थि‍क?
वि‍श्व अनंत देश आ काल-व्‍यापी अछि‍। वि‍श्वक मुख्‍य दू घटक-जड़ आ चेतन अछि‍। ओइमे अपन-अपन गुण-धर्म नि‍हि‍त अछि‍। ज‍सँ जगतक बेवस्‍था अनादि‍कालसँ अबाध गति‍ए चलि‍ रहल अछि‍। ऐ‍सँ  हटि‍ दोसर ईश्वरक कल्‍पना तथ्‍यसँ अलग हएब अछि‍। कहल गेल अछि‍ जे शंखासुर नामक राक्षस छलाह। ओ ब्रह्मा अोइ‍ठाम पहुँचि‍ वेद चोरा कऽ समुुद्रमे नुका कऽ रखि‍ लेलक। जेकरा पुन: प्राप्‍त  करए लेल वि‍ष्‍णु मत्‍स्‍यावतार धारण कए समुद्रमे शंखासुरकेँ मारि‍ वेद लऽ अनलनि‍। प्रश्न उठैछ- कि‍ ईश्वरक काज हत्‍या करब थि‍क? जे सर्वज्ञ, दयालु छथि‍ हुनकर हने कि‍रदानी हेतनि‍। ओ तँ अपना सत्‍प्रेरणासँ ककरो बदलैत छथि‍। एहि‍ना हि‍रण्‍याक्षक संबंधमे सेहो अछि‍। हि‍रण्‍याक्ष पृथ्‍वीकेँ चोरा कऽ टट्टीमे नुका रखलक। जेकरा वि‍ष्‍णु सुअरक अवतार लऽ थुथुनसँ पृथ्‍वीकेँ टट्टीसँ नि‍कालि‍, ि‍हरण्‍याक्षकेँ माि‍र ऊपर अनलनि‍। जइसँ पृथ्‍वीक उद्धार भेल। प्रश्न उठैछ- जखन पृथवीक चोरि भऽ गेल तँ ओकरा राखल कतए गेल। अपन गुरुत्‍वाशक्‍ति‍सँ पृथवी स्‍वयं धारि‍त अछि‍।
हने कथा हि‍रण्‍यकश्‍यपु आ प्रह्लादक सेहो अछि‍। प्रह्लाद वि‍ष्‍णुक भक्‍त रहथि‍ जे हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पसि‍न नै‍‍ रहनि‍। जइसँ बान्‍हि‍ देलखि‍न। प्रह्लादक दुख देखि‍ ईश्वर (वि‍ष्‍णु) नर आ नारायणक ि‍मश्रि‍त रूप बना खूटा फाड़ि‍ कऽ नि‍कलि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारलनि‍। प्रश्न उठैछ- एक प्रह्लादक लेल ईश्वर खूँटा फाड़ि‍ नि‍कललाह मुदा, चंगेज खाँ, नादि‍रशाह, ि‍मलाबटखोर, जमाखोर, घूसखोर शोषकक लेल नि‍न्न नै‍‍ टुटैत छन्‍हि‍?
वामन रूप बनि‍ बलि‍सँ भीख मंगलनि‍। भीख मांगब, छल करब मायावी मनुक्‍खक काज छी ने कि‍ ईश्वरक। जखन परशुराम हैहय क्षत्रि‍ए वंशक सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍ तँ फेर दोहरा-तेहरा, एते तक ि‍क एक्‍कैस बेर‍‍ कऽ केकर हत्‍या केलनि‍। जँ एहेन-एहेन हत्‍यारा ईश्वर होथि‍ तँ अपराधी ककरा कहबै?
अनंत वि‍श्वव्‍यापी जगत स्रष्‍टा ईश्वर (राम) दशरथक बेटा बनि‍ सीतासँ बि‍आह करए औताह। ततबे नै‍‍ हरण भेलापर कानि‍-कानि‍ गाछ-वृक्ष सभकेँ पता पुछथि‍न। गाए-चरबए लेल कृष्‍ण वृन्‍दावन आबि‍ नारी संग रास करए औताह। की यएह लक्षण ईश्वरक वेद कहैत अछि‍?
वि‍श्वमे मुख्‍य दू तत्‍व-जड़ आ चेतन अछि‍। जेकरा पुराकालसँ सांख्‍य दर्शन प्रकृति‍ आ पुरुष कहैत आएल अछि‍। जड़ प्रकृति‍मे अनेक तत्‍व अछि‍। जे सभ अनादि‍-अनंत अछि‍। ओइमे अपन-अपन स्‍वभाव सि‍द्ध गुण-धर्मक क्रि‍या, ओकर सम्‍पत्ति‍ छि‍ऐ। जइ‍सँ सृष्‍टि‍ नि‍रंतर वि‍द्यमान रहैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ पुरबा आकि‍ पछबा हवा जे बहैत अछि‍, ओकरा ि‍कयो पू आकि‍ पछि‍म जा कऽ ठेलैत अछि‍ आकि‍ अपन दबाबक नि‍मक अनुसार हवा स्‍वयं चलैत अछि‍। तहि‍ना बरखो होइत अछि‍। पानि‍ बरि‍सैक जे प्राकृति‍क नि‍अम छै, अनुकूल भेलापर बरखा होइत अछि‍। प्रकृति‍ जड़ छी। ओ ई नै बुझैए जे रौदी, कम बरखा आकि‍ बेसी बरखा ककरो नोकसान करत आकि‍ लाभ पहुँचाओत।
एक दिसि‍ १९८७ ईं.क पानि‍ (बरखा) मि‍थि‍लांचलकेँ दहा देलक तँ दोसर दिसि‍ राजस्‍थान, गुजरात, उड़ीसा इत्‍यादि‍ राज्‍यमे रौदी भऽ गेल। की एहने काज सर्वज्ञ, दयालु आ सर्वशक्‍ति‍मान ईश्वरक छि‍यनि‍?
झरनासँ पानि‍ नि‍कलब, धार बहब कि‍ ईश्वरेक प्रेरणासँ होइत अछि‍। चान, सुरूज, तरेगण हुनके माने ईश्वरेक कृपासँ चमकैत अछि‍। फूल वएह फुलबैत छथि‍। अजी-अजी अंधवि‍श्‍वासू कल्‍पना ठाढ़ कऽ अज्ञानी मनुष्‍यकेँ अदौसँ चालबाज सभ लुटैत आएल अछि‍!
जे मनुष्‍य ज्ञान अर्जन कऽ पवित्र आचरण बना स्‍वरूप स्‍थि‍ति‍ प्राप्‍त कऽ लैत वएह ऐ‍ जीवनकेँ सार्थक बना मुक्‍ति‍क अधि‍कारी बनैत छथि‍। जनि‍का लेल अलगसँ कोनो कल्‍पि‍त ईश्वरक प्रयोजन नै‍‍ छन्‍हि‍।
बीजकमे कबीर कहै छथि‍- ज्ञान हीन कर्ताकेँ भरमें, माये जग भरमाया।
छल करब, बलपूर्वक ककरो धन-इज्‍जत लुटब, ई सभ संसारी मनुष्‍यक काज छी नै कि‍ ईश्वरक। यती, सती-पति‍व्रता एवं सत्‍य बजनि‍हार आ सत्‍य बाटपर चलनि‍हारकेँ पथ-भ्रष्‍ट करब, पति‍त बनाएब, की‍ ई सभ वि‍वेकवान मनुष्‍यक काज छी? अवतारक संबंधमे कबीर कहने छथि‍- ‘दश अवतार ईश्वरी माया, कर्ता कै जि‍न पूजा। कहहि‍ं कबीर सुनो हो सन्‍तो, उपजै खपै सो दूजा।’ अर्थात् दस या चौबीस अवतारक कल्‍पना ईश्वरीए माया छी। आेइ‍ कल्‍पि‍त अवतारक पूजा करब, सत्‍यज्ञानसँ रहि‍त मनुष्‍यक काज छी। जहि‍ना अवतार तहि‍ना अवतारी माने ईश्वर, दुनू लोकक मनक कल्‍पना छी। ि‍कएक तँ जन्‍म आ मृत्‍य जगतक कर्ताकेँ केना भऽ सकैत अछि‍।
चौबीस अवतारमे श्रीराम, कृष्‍ण, महात्‍मा बुद्ध इत्‍यादि‍ ऐति‍हासि‍क महापुरुष छथि‍। बाकी सभ काल्‍पनि‍क थि‍क। ओना अवतार तँ उतरब आ जन्‍म लेबकेँ कहल जाइत अछि‍, जे प्राय: कर्मी जीवके होइत अछि‍।
अवतारवाद मनुष्‍यमे हीनभावनाक जन्‍म दैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ देश आ धर्मपर संकट एलापर अवतारी ि‍कए ने नि‍वारण करैत अछि‍।  जखन वि‍धर्मी सोमनाथक मंदि‍र लूटि‍ लेलक तखन पुजेगरी सभ ि‍कए मुँह तकैत रहि‍ गेल। ि‍कए ने ईश्वरकेँ पुकारि‍ बचौलक।
ताधरि‍ मनुष्‍य उन्‍नति‍ नै‍‍ कऽ सकैत अछि‍ जाधरि‍ ओ ई नै‍‍ बुझत जे धरतीपर मनुष्‍य सभसँ बलशाली अछि‍। ईश्वर, देवी-देवता, अवतारक कल्‍पना मनुष्‍यक आेइ‍ अंधकार मस्‍ति‍ष्‍कमे जन्‍म लैत अछि‍ जइमे ओ अपन दुर्बलताकेँ संयोगि‍ अवकाशक सास लैत अछि‍। वस्‍तुत: आत्‍मा जखन महात्‍माक रूपमे वि‍कसि‍त होइत तखन परमात्‍मा स्‍वयं बनि‍ जाइत अछि‍। काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्‍यादि‍ दुर्गुणपर जखन मनुष्‍य वि‍जय पाबि‍ जाइत अछि‍ तखन अपने-आपमे ईश्वर, परमात्‍मा, दैव आ ब्रह्मक रूप देखए लगैत अछि‍।
श्रीमद्भागवत-
दरि‍द्रो यस्‍त्‍वसन्‍तुष्‍ट: कृपणो योऽ जि‍तेन्‍द्रि‍य:।
गुणेष्‍वसक्‍तधीरीशो गुणसंगे वि‍पर्यय: /११/१९/४४
जेकरा चि‍त्तमे असन्‍तोष अछि‍ वएह दरि‍द्र छी। जे ि‍जतेन्‍द्रि‍य नै‍‍ अछि‍ वएह कृपण छी। समर्थ, स्‍वतंत्र आर ईश्वर वएह छथि‍ जि‍नकर चि‍त्त-वृत्ति‍ ि‍वषए-भोगमे आसक्‍त नै‍‍ छन्‍हि‍। अहीक वि‍परीत जे वि‍षयमे आसक्‍त अछि‍ वएह सोलहन्‍नी पापी छी।