Sunday, October 23, 2011

डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प


·         मैथिली विहनि कथाक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. तारानन्द वियोगीसँ मुन्नाजीक भेल गप्प-सप्प
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·         मुन्नाजी:अपनेकेँ सर्वप्रथम बाल साहित्यपर अकादेमी पुरस्कारक लेल बधाइ। अहाँ जहिया लघुकथा लेखन प्रारम्भ केलहुँ मैथिली लघुकथा कतऽ छलै, अहाँक लघुकथा लेखन दिस कोना प्रवृत्ति जागल।
·         तारानन्द वियोगी:हम जहिया लघुकथा लिखब शुरू केने रही, एक विधाक रूपमे मैथिली लघुकथाक कोनो मोजर नै रहैक। ई बात जरूर छल जे छोट-छोट कथा सभकेँ लघुकथा मानि कऽ “मिथिला मिहिर”क विशेषांक सेहो बहार भ गेल छल। अनियतकालीन पत्रिका सभमे छोट-छोट कथा सभ यदा-कदा प्रकाशित होइत रहैत छल। मुदा एकर सभक औकाति “बोझ परहक आँटी” सँ बेसी किछु नै छल। पत्रिका सभ, “मिथिला मिहिर” सेहो, एहि कोटिक रचनाकेँ खाली बचल जगहकेँ भरबाक लेल “फीलर”क रूपमे उपयोग करै छल।
·         कथाकेँ अंग्रेजीमे शॉर्ट-स्टोरी कहल जाइ छै। तकर शब्दानुवाद “लघुकथा” मैथिलीक विद्वान लोकनि, आलोचक लोकनिमे प्रचलित छल। आचार्य रमानाथ झा शॉर्ट-स्टोरीकेँ लघुकथा की कहि देलनि जे मैथिलीमे भेड़ियाधसान परिपाटी चलि पड़ल। ओहुनो भारतीय कथा-साहित्यक तुलनामे मैथिली कथाकेँ जँ देखबै तँ पाएब जे आकारक दृष्टिमे मैथिलीक कथा छोट होइत अछि। आचार्य लोकनिक मतेँ यएह भेल लघुकथा। तखन आइ जाहि साहित्यकेँ अहाँ लघुकथा कहैत छिऐक तकरा लेल मैथिली लगमे कोनो स्पेस नै छलै। ने साहित्यमे, ने विद्वान लोकनिक मगजमे।
·         विभिन्न देशी-विदेशी लघुकथा सभकेँ यत्र-तत्र पढ़ैत-गुनैत हमरा कथा आ लघुकथाक पार्थक्यक अवगति भेल। हम देखलौं जे एहि दुनू रचना विधामे ने मात्र आकारमे, अपितु उत्स, स्वभाव आ प्रभावमे सेहो एक दोसरासँ सर्वथा भिन्न अछि। मैथिलीक भंडार दिस ताकलहुँ तँ देखल जे अनेक वरेण्य साहित्यकार जानैत-अनजानैत एहि क्षेत्रमे किछु सर्जनात्मक काज कऽ गेल छथि। हमरा सभसँ पहिने ई जरूरी लागल जे लघुकथा विधाक संरचना, स्वरूप आ स्वभावपर किछु बात स्पष्ट करी। एहि सन्दर्भमे हम कएकटा लेख लिखलहुँ। स्वयं हम मूलतः एक सृजनात्मक लेखक छी, तेँ अपनहुँ लघुकथा लिखऽ लगलहुँ। ताहि समय (१९८३-८५) मे हम “कोसी-कुसुम” पत्रिकाक संग जुड़ल रही। बातकेँ स्पष्ट आ जगजिआर करबाक लेल हम “कुसुम”क एक विशेषांक लघुकथापर सम्पादित कएल। बादमे “हालचाल”क संग जुड़लहुँ, तँ ई क्रम आर आगू बढ़ल।
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·         मुन्नाजी:लघुकथाक स्वभाव की अछि? ओहि सन्दर्भमे मैथिली लघुकथा कतऽ देखाइए? कथाकार-कवि लोकनि लघुकथा रचना आन्दोलनक प्रारम्भमे जुड़लाह मुदा समयान्तरे हुनकर ऐ सँ दूर होइत गेनाइ की प्रदर्शित करैत अछि?
·         तारानन्द वियोगी:लघुकथा आत्यन्तिक रूपमे एक “प्रो-एक्टिव” विधा थिक। ओहुनो अहाँ देखबै जे, जे रचना जतेक सरल आ संप्रेषणीय होइत अछि, ओकरा पाछू लेखककेँ ओतबे बेसी परिश्रम करऽ पड़ैत छैक। लघुकथाक तँ एतेक “सेन्सिटिव” मिजाज होइत छैक जे एक वाक्य जँ अहाँ फालतू लिखि गेलहुँ तँ ओ दूरि भऽ जाइत अछि। एतेक परिश्रम के करत, जँ करत तँ ताहिमे निरन्तरता कोना बनौने राखि सकत? एखनो अहाँ देखिते छिऐक जे एक सुव्यवस्थित विधाक रूपमे लघुकथाकेँ मैथिलीमे प्रतिष्ठा नै भेटि सकलैक अछि। फल अछि जे लोक दोसर-दोसर विधामे, जे प्रतिष्ठित अछि आ जाहिसँ ओकरा सहज रूपेँ स्वीकृति भेटि सकैक, ताहिमे कलम अजमबैत छथि। यएह मुख्य कारण भेल जे लेखक लोकनि लघुकथा-लेखनमे निरन्तरता नै बनौने राखि सकलाह। लघुकथापर केन्द्रित एक पत्रिका जँ मैथिलीमे हो तँ एहि स्थितिकेँ पार कएल जा सकैत अछि।
·         हमर अप्पन स्थिति अछि जे चहुँ दिस हमरा काजे-काज देखा पड़ैत अछि, अपन सक्क भरि तकरा सभकेँ सम्हारबाक, स्थिति स्पष्ट करबाक, जतबा जे प्रतिभा अछि तदनुरूप एक मानदंड गढ़बाक काजमे लागल रहैत छी। अहाँ सभ आगू बढ़ब तँ निश्चिते हमरा संग लागल पाएब। ओहुनो, हमर सोच अछि जे “जो पीछी आ रहे उन्हीं का, मैं आगे का जय-जयकार”।
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·         मुन्नाजी:२०म सदीक अन्तमे अहाँ सभ (प्रदीप बिहारी सेहो) मैथिली लघुकथाक संग्रह आनि अपन निश्सन उपस्थिति दर्ज केलहुँ, मुदा कथा आलोचक द्वारा एकर निङ्गेश बुझि टारि देल गेल, एकर की प्रमुख कारण छल?
·         तारानन्द वियोगी:देखू मुन्नाजी, हमरा सभक पीढ़ी बहुत संघर्ष कऽ कऽ आगू बढ़ल अछि। पुरातनपंथी लोकनि सेहो हमरा सभक विरुद्ध आ कम्यूनिस्टकेँ सेहो हमरा सभसँ दुश्मनी। साहित्यमे नवाचार दुनूकेँ समान रूपेँ नापसिन्द। एहना स्थितिमे किनकासँ हम मोजर मांगब आ के हमरा मोजर देताह? मैथिली आलोचना बहुतो तरहेँ अनेक सीमासँ घेराएल रहल अछि। एहि कारणेँ बहुतो लोक एकरा अविकसित धरि कहैत छथि। एहि सीमा सभक अतिक्रमण आब शुरू भेल अछि। हमहूँ ठोड़े काज “कर्मधारय”मे आ आनो ठाम केलहुँ अछि। हमरा पीढ़ीमे प्रदीप बिहारी लघुकथा लिखलनि, देवशंकर नवीन, विभूति आनन्द लिखलनि। शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, रमेश लिखलनि। हिनका सभक रचनाकेँ आइ पढ़ब तँ अहाँकेँ आक्रोश हएत जे ताहि दिनमे किएक ने एकरा बूझल-गुनल गेलै? खएर, जे भेल से भेल। आइ आरो सघनता-गम्भीरताक संग काज करबाक बेगरता छैक। अहाँ सभ आब उल्लेखनीय काज करब तँ अवश्ये मोजर हएत। बदलल परिस्थितिक अहसास अहूँ सभकेँ जरूरे होइत हएत।
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·         मुन्नाजी:२१म सदीक प्रारम्भमे मध्यम पीढ़ीक रचनाकार द्वारा ठाढ़ कएल आधारकेँ आगू करैत नव पीढ़ी एकरा जगजियार कऽ रहल छथि। अहाँ एकर वर्तमान दशा आ आगूक दिशा मादे की कहब?
·         तारानन्द वियोगी:लघुकथाक क्षेत्रमे गम्भीरताक संग काज करएबला लोकक एखनहुँ अभाव छैक, से हमरा प्रतीत होइत अछि। किनकहुँ एक रचना जँ सुन्दर देखैत छियनि तँ लगले दोसर रचना औसतसँ नीचाँक देखा पड़ि जाइत अछि। एना किएक होइत छैक? स्पष्ट अछि जे बोध आ श्रमक मानक ओ लोकनि बनौने नै राखि पाबि रहल छथि। दोसर बात जे हमरा जरूरी लगैत अछि- भने बत्तीसे पेजक किएक ने हो- प्रत्येक रचनाकारक एक संग्रह जरूर एबाक चाही। कोनो उत्साही लोक एहि दिस सचेष्ट होथि तँ लघुकथापर एक लेखन-कार्यशालाक आयोजन कएल जाए। तात्पर्य जे सांस्थानिक उत्साहक संग एहि दिशामे काज करबाक बेगरता छैक।
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·         मुन्नाजी:मैथिलीये लघुकथाक समकालीन पंजाबीक “मिन्नी कथा”, ओड़ियाक “क्षुद्र कथा”, तमिलक “निमिषा”, मलयालमक “क्विन्तेर” राष्ट्रीय स्तरपर स्थापित होइत देखाइए मुदा मैथिली एहि पगपर अन्हराएल सन? एकर पाछाँ की कारण अछि, वा कमी अछि?  
·         तारानन्द वियोगी:मैथिलीमे मानक काजक अभाव नै छै, आ ने भाषामे वा भाषाकर्मी लोकनिमे क्षमताक अभाव छै। सांस्थानिक रूपसँ थोड़बे दिन काज कऽ कऽ देखियौ ने, भारतीय साहित्यक उपवनमे मैथिली लघुकथाक फूल सेहो तेहने भकरार लागत जेना पंजाबी, उड़िया वा मलयालमक।
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·         मुन्नाजी:जहिना अहाँ सभकेँ (अहाँ आ बिहाईजी केँ) उपेक्षित रखबाक प्रयास भेल, तहिना आइयो कथालोचक द्वारा नवका पीढ़ीक ऊर्जावान रचनाकार वा लघुकथाक प्रति समर्पित रचनाकारक कोनो नोटिस नै लेल जा रहल अछि। एहिमे कोनो कुटीचालि अछि वा आर किछु?
·         तारानन्द वियोगी:एहि प्रश्नक उत्तरमे हम दूटा बात कहब। पहिल तँ ई कहब जे के लेत अहाँक नोटिस? ककरा मोजर देने अहाँ मोजरबला लोक हएब? एतेक विवेकी आ क्रान्तिदर्शी लोक अहाँकेँ के देखाइत छथि? हम तँ साँच-साँच कहै छी मुन्नाजी जे हमरा एहन लोक क्यो नै देखाइत छथि। पहिने गुलामीक समय रहै तँ महाराज दरभंगाक मोजर देने राताराती लोक मोजरबला भऽ जाइ छला। आब ई भिन्न बात छै जे एहि भ्रममे महाराजक विवेकसम्पन्नता जिम्मेवार होइ छल आकि कोनो आन स्वार्थ?
·         साहित्य अपन स्वभावेसँ क्रान्तिकारी होइत अछि। जँ ओ वास्तवमे एक सही साहित्य हो। एहेन साहित्य किछु लेबाक लेल नहि अपितु सदैव देबाक लेल लिखल जाइत अछि।
·         दोसर बात हम ई कहब जे अहाँ मोजर वा नोटिसक ख्याल केने बिना काज करू। कोनो सार्थक रचना जँ कलमसँ बहराए तकर संतोषकेँ सेलिब्रेट करू जे “जइ धरतीक अन्न-तीमन खेलिऐ तँ ओकरा लेल काजो केलियै”। ओना ईहो कहि दी जे हमरा सभक लेखनारम्भ कालमे जतेक कुहेस आ जाली पसरल रहै, ताहिमे आब बहुत परिवर्तन भेलैए। आलोचनोक परिदृश्य बदललैए आ पाठकक व्याप्ति सेहो बढ़लैए। इन्टरनेटक तँ एहिमे कमाल केने अछि।
·         मुन्नाजी:वर्तमानमे रचनाकार सबहक मैथिली लघुकथाक प्रति रुझानक बादो मैथिलीक विभिन्न समिति-संस्थाक प्रतिनिधि सबहक एकरा प्रति विरोध की दर्शाबैए? मैथिली लघुकथाकेँ आर समृद्ध करबा लेल आर की सभ काज कएल जाए? मैथिली लघुकथाक भविष्य की देखैत छी? एकरा स्थापित करबा लेल कोनो विशेष रुखि?
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·         तारानन्द वियोगी:लघुकथाक भविष्य हम बहुत नीक देखै छी। मैथिली लघुकथाक सेहो। अहाँ पुछब जे तकर कारण? कारण ई नै जे लोक आब बड्ड व्यस्त भऽ गेलैए तेँ छोट रचना बेसी पठनीय साबित भऽ सकत। वास्तविकता तँ ई अछि जे एखनो दुनियाँ भरिमे सभसँ बेसी उपन्यासे विधाक रचना पढ़ल जा रहल अछि।
·         लघुकथाक भविष्य वस्तुतः एकर स्वभावक कारणेँ उज्जवल छैक। एहिमे निहित व्यंग्य आ मार्मिकता आजुक सन्दर्भमे अति प्रासंगिक अछि। आजुक लोकक संवेदना क्षमता जाहि हिसाबे भोथ भेल अछि, एक सही लघुकथाक ओज ओकर ओंघी उतारि सकैत अछि।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

अमरनाथ जीसँ मैथिलीक प्रतिनिधि विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजी द्वारा भेल गप्पसप्प


कथा साहित्यक स्थापित रचनाकार एवं साहित्य अकादमीक (मैथिली परामर्शदातृ समिति) सदस्य माननीय अमरनाथ जीसँ मैथिलीक प्रतिनिधि विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजी द्वारा भेल गप्पसप्पक अंश प्रस्तुत अछि:-

मुन्नाजी: अहाँक मोनमे मैथिलीक रचनात्मक विचार कोना प्रस्फुटित भेल, पहिल रचना (लिखल) आ पहिल प्रकाशित रचना कोन अछि, आ कतऽ कहिया छपल?  
अमरनाथ: हमर जन्म एक एहन परिवारमे भेल, जतय अनेक तरहक विविधता छलैक। किछु घोर कर्मकाण्डी रहथि, तँ किछु शास्त्र-पुराणक विपरीत आचरण करथि खाद्य-अखाद्यमे विचार नहि करथि। भारत-चीनक युद्ध आ युद्धक चर्चा सँ आहत बाल मन आ १९६२ मे ज्यौतिषी द्वारा खण्ड प्रलय भूकम्प अथवा विनाशक भविष्यवाणीक कारणे घरक बाहर छोट-छोट शेडमे रहबाक विवशता मनकेँ उत्सुक बनौने रहए। तत्कालीन समाजमे अधिकांश तथाकथित समाज लोककेँ सोंगरपर ठाढ़ देखियनि। अर्थात् एकटा नौकर आ टहलू चाहियनि। आश्चर्य ई लागय जे जखन सभ मनुक्खे, तखन सम्बोधनमे यौ, हौ, रौ, हरौ अछि किएक? जे घाम चुबबैत अछि से न्यून किएक? एहन विडम्बनापूर्ण परिस्थितिमे हमर रचनात्मक विचार प्रस्फुटित भेल रहए।मिथिला शोध संस्थान, दरभंगा सँ मैथिलीक लेखिका राजलक्ष्मीपर आधारित पुस्तक प्रकाशित भेल छल जाहिमे हुनक लिखल पोथीपर मुख्यतया अभिमत संकलित छल। ओहि पोथीमे आचार्य रमानाथ झा आदिक विचार छपल अछि। हमर अभिमत कवितामे छपल अछि, हमर वैह पहिल छपल रचना थिक।
मुन्नाजी: अहाँ सभक रचनाक प्रारम्भिक कालमे मैथिली साहित्यक स्थिति की छल? अहाँक रचनात्मक प्रभाव केहेन रहल?   
अमरनाथ: १९७४ ई. मे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक फगुआ अंकमे हमर पहिल हास्य व्यंग्य कथा स्वर्ण युगछपल रहए। १९७५ ई. मे क्षणिकालघुकथा संग्रह छपल, आचार्य सुरेन्द्र झा सुमनओहि पोथीक भूमिका लिखने छथि जाहिमे लघुकथाक औचित्यपर प्रकाश देने छथि। किरण जी, अमर जी, श्रीश जीक विचार छपल छनि। पछाति जयकांत मिश्र लिखलनि जे एहि संग्रहक प्रकाशन सँ मैथिली साहित्यक विकास भेल अछि। मिथिला मिहिर’, ‘द इण्डियन नेशन’, ‘आर्यावर्त्त’, ‘मैथिली प्रकाश’ (कोलकाता) मे क्षणिकाक समीक्षा छपल रहए। ताहिसँ ई अनुभूति भेल रहए जे कथाकारक रूपमे हमरा स्वीकार कऽ लेल गेल अछि। १९७४ ई. मे चाही एकटा द्रोपदी’ (कथा संग्रह) तथा १९७५ ई. मे ई क्षणिका’ (लघु कथा संग्रह) छपल रहए। हमरा अधिकांश श्रेष्ठ लेखक यथा रमानाथ झा, हरिमोहन बाबू, यात्री जी, किरण जी, सुमन जी आदिक सानिध्य आ स्नेह प्राप्त भेल रहए। मुदा हम बेशी हरिमोहन बाबूक लग रही आ तकर कारण रहए जे हम दर्शन शास्त्रक अध्ययन करैत रही आ मैथिलीमे लेखन दिस उन्मुख भेल रही। हरिमोहन बाबू संग बीतल क्षण हमर साहित्यिक जीवनकेँ गति प्रदान करबामे अत्यंत सहायक भेल छल।

मुन्नाजी: छठ्ठम/सातम दशकमे किछु रचनाकार मैथिलीमे साम्यवादी विचारक हो-हल्ला केलनि। अहाँक नजरिमे सत्यतः मैथिलीमे एहेन कोनो विचारधारा बनलै? अहाँपर एकर केहेन प्रभाव पड़ल?      
अमरनाथ: एकटा समय आयल रहैक जाहिमे संसारक जन समुदाय साम्यवादी विचार धारा दिस आकर्षित भेल रहए। सम्पूर्ण विश्वमे पक्ष-विपक्षमे बहस प्रारम्भ भेल रहैक। कतहु-कतहु क्रांतियो भेलैक, क्रांति सफलो भेलैक। मुदा मैथिली साहित्यिक परिप्रेक्ष्यमे अहाँ ठीके कहलहुँ जे हो-हल्लाभेलैक। हमहुँ मानैत छी जे मैथिली साहित्यमे साम्यवादी विचारधाराक जड़ि नहि जमि सकलैक। मैथिलीमे जे केओ अपनाकेँ साम्यवादी कहि कऽ प्रचारित करैत छथि से पाखंडी छथि। ई बात कने कटु अछि मुदा सत्य अछि कारण हुनक जीवनक सूक्ष्म निरीक्षणसँ परिलक्षित होएत जे ओ जातीय अहंकारसँ मुक्त नहि भेल छथि आ परम्परागत संस्कारमे लिप्त छथि। जनिकामे साम्यवादी चिंतन धारामे अग्रसर होएबाक अर्हते नहि छनि से भला वर्ग-संघर्ष, सर्वहारा, मैनिफेस्टो आ दास कैपिटल धरि कोना पहुँचताह। हँ, मैथिली साहित्यमे साम्यवादकेँ संगठित प्रचारक लेल आ आत्म-विज्ञापनक लेल हथकंडाक रूपमे इस्तेमाल कयल गेल अछि।
मैथिली साहित्यमे हमरा जनैत कोनो ठोस विचार धारा नहि पनपि सकलैक आ तकरा कारण ई भेलैक जे बीसम शताब्दीक महत्वपूर्ण लेखक लोकनिपर, संस्कृत अथवा बांग्ला साहित्यक प्रभाव पड़ल रहनि। किछु लेखकपर अंग्रेजी साहित्यक प्रभाव सेहो पड़ल रहनि। स्वतंत्रताक पश्चात् मैथिली साहित्य बहुलांशमे हिन्दी साहित्यक छत्र छायामे चलि आएल। मैथिलीक साहित्यकार नामवर सिंह आ मैनेजर पांडेय दिस देखय लगलाह। ई दु:खद स्थिति अछि, मुदा सत्य यैह अछि। मात्र तीन गोट साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री आ राजकमल विचार धाराक दृष्टियेँ टिकल रहलाह। यात्री समतामूलक समाजक स्थापना लेल अग्रसर भेलाह आ परम सत्यधरि पहुँचि अस्तित्ववादी भऽ गेलाह। मानववाद हुनक कवितामे अंतर्निहित छनि। यात्री लिखैत छथि-
सत्य थिक संसार
सत्य थिक मानव समाजक क्रमिक उन्नति
क्रमिक वृद्धि-विकास
सत्य थिक संघर्षरत जनताक ई इतिहास
सत्य धरती, सत्य थिक आकाश
परम सत्य मनुक्ख अपनहि थिक

तहिना राजकमल साहित्य वर्जनाकेँ तोड़ैत तथाकथित धर्मात्मापाखंडीसभक प्रताड़नासँ कुहरैत, नोरसँ भीजल मिथिलाक नारीक जीवंत चित्रण केलनि। एही सन्दर्भमे हरिमोहन झाक नाम उल्लेखनीय अछि। खट्टर ककाक तरंग बुद्धिवादी चिंतन धाराक लेल गीतासदृश अछि। सभसँ महत्वपूर्ण बात ई अछि जे हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमलक मोसि कमला-गंडकी-वाग्मती-कोसीक पानिसँ बनल छलनि तेँ हुनकर साहित्यमे मिथिलाक सोहनगर माटिक सुगंधिक अनुभव होइत अछि। बीसम शताब्दीक वृहत्रयीमे यैह तीन साहित्यकार हरिमोहन झा, यात्री जी आ राजकमल छथि जे कालजयी छथि।
हमरापर कोन विचार धाराक प्रभाव पड़ल तकर विवेचन आ मूल्यांकनक दायित्व अहाँ सन युवा रचनाकारपर छोड़ि दैत छी।

मुन्नाजी: अहाँ अपन रचनाकालक प्रारम्भसँ एखन धरि लेखनक निरंतरता बनौने छी, मुदा आइ धरि ककरो द्वारा कोनो ठोस मूल्यांकन आ पुरस्कृत नञि भेलासँ केहेन अनुभव करैत छी?
अमरनाथ: मुन्ना जी, मैथिलीमे मूल्यांकन होइ नहि छै, करबऽ पड़ैत छै। ओहि लेल मैनेजमैंट चाही। ई मैनेजमैंट ने करय अबैत अछि आ ने हम सीखय चाहै छी। रहल गप्प पुरस्कारक। एकर अपन गणित छै। मैट्रिक धरि गणित आ विज्ञान रहए। प्रथम श्रेणी भेटल रहए। मुदा दर्शनशास्त्र प्रिय लागल। गणित छोड़ि देलिऐ। फेरसँ सीखल होएत? तखन अहीँ कहूँ, पुरस्कार कोना भेटत? मुन्ना जी, हम कहि सकैत छी जे देशक विभिन्न भागसँ हमरा पाठकक स्नेह भेटल अछि। ई की पुरस्कार नहि भेलै? हमर पोथीक तीन-तीन संस्करण भेल अछि। चारिम संस्करण प्रेसमे अछि। मैथिली लेखकक लेल ई की कम भेलै?

मुन्नाजी: कथा साहित्यमे अहाँ द्वारा लघुकथापर जमि कऽ लेखन भेल। मैथिलीक पहिल लघुकथा संग्रह क्षणिकादेलाक बाबजूद अहाँ लघुकथाकारक रूपमे हेराएल आ बेराएल रहलौं, एकरा पाछू समूहवाजी आ आर किछु कारण अछि?  
अमरनाथ: एहिमे हमर अपन दोष अछि। १९७५ ई. मे क्षणिकाछपल रहए। हाथो हाथ बिका गेल। एहि घटनाक पैंतीस वर्ष भेलैक। हमरा दोसर संस्करण करएबाक चाहै छल। से नहि भेलैक। मैथिली पुस्तकक हेतु कोनो नीक पुस्तकालय नहि छैक। जखन पोथी नहि उपलब्ध होएतैक, तखन कोन आधारपर चर्चा लोक करतैक? तथापि जे नीक समालोचक होइत छथि से अंवेषण करैत छथि, पोथी उपलब्ध करैत छथि आ तखन मूल्याकंन करैत छथि। से कयलनि मैथिलीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. रामदेव झा, पटना विश्वविद्यालय द्वारा यू.जी.सी.क सौजन्यसँ आयोजित सेमिनारमे। अपन आलेखमे क्षणिकाक सम्बन्धमे स्पष्ट विचार रखलनि। मुदा मैथिलीमे कतेक रामदेव झा छथि।

मुन्नाजी: अहाँक प्रारम्भिक रचनाकालमे मूलतः कथा कविता लेखन पर ध्यान देल जाइत छल। अहाँक ओइसँ इतर लघुकथा लेखनक प्रति उत्सुकता आ रचनाशीलता कोना आएल।
अमरनाथ: हम १९७३ ई.क गर्मीमे एक मास औद्योगिक नगरी बोकारो रहि बितौने रही। ओतए हम पहिल बेर लगसँ मशीनक घरघड़ाहटिकेँ सुनने रहियैक, लोककेँ दोगैत देखने रहियैक। हमरा लागल रहए जे आब जे समय आबि रहल अछि, ताहिमे मनुष्यकेँ समयक प्रबन्धन करए पड़तैक। कहि सकैत छी जे समयलोकक वैह अत्यंत महत्वपूर्ण भऽ जयतैक। एहन स्थितिमे महाकाव्य अथवा दीर्घ कथा/ उपन्यास पढ़ऽ लेल समय नहि रहतैक। मुदा तथापि लोक साहित्य पढ़ऽ चाहत। आ तैँ पैघसँ पैघ बात कहबा लेल हम छोट-छोट कथा लिखय लगलहुँ। पछाति सकल क्षणिका’ ‘लघु कथासंग्रहक रूपमे प्रकाशित भेल।

मुन्नाजी: अहाँ चारि दशक पहिने लघुकथाक प्रति एतेक क्रियाशील रहिऐ, आइयो ई निरंतरता बनौने छी। तहन अहाँक अकादमीमे स्थान पौलाक पछाति लघुकथापर कोनो काज किएक नञि भेल, अकादमीक स्तर पर उदासीनता किए? आगामी समयमे लघुकथाक लेल अकादमी द्वारा कोनो स्वतंत्र क्रियाकलापक (यथा-लघुकथा संग्रहक प्रकाशन/कोनो कार्यशालाक आयोजन) योजना अछि आ समायोजन करबाक विचार अछि?    
अमरनाथ: एकरा उदासीनता नहि, प्राथमिकता कहबाक चाही। अकादमी द्वारा कतेक कार्य भेल अछि, भऽ रहल अछि। अगिला परामर्शदातृ समितिक बैसकमे लघुकथापर विशेष ध्यान देल जाएत। लघुकथाक सन्दर्भमे विमर्श, पुस्तक आदिक प्रकाशनपर विचार होएत, आ से एहि द्वारे नहि जे हम स्वयं लघुकथा लिखैत छी। ई आवश्यक एहि हेतु अछि जे एहिपर एखन धरि विचार नहि भेल अछि।


मुन्नाजी: मैथिलीक क्षेत्र छोट छै। तैयो रचनाकारक समूहबाजी एकरा गरोसने जा रहल अछि। ई एखनो सार्वभौमिक नञि अछि। आ से चीज पुरस्कारक हेतु चयन आ वितरणमे सेहो देखार होइत अछि। अहाँ एहिसँ कतेक धरि सहमत वा असहमत छी? 
अमरनाथ: मुन्ना जी, हमहुँ अहीँ जकाँ लेखक छी। जे केओ समूहमे नहि छी, स्वतंत्र लेखक छी, स्वाभिमानक संगे लिखि रहल छी, एहि यंत्रणाक दंशकेँ सहि रहल छी। मुदा मैथिलीक संसार आब छोट नहि। श्री गजेन्द्र ठाकुरजी मैथिलीकेँ विदेहपत्रिका द्वारा सम्पूर्ण संसारमे पहुँचा देलनि। मिथिला दर्शनमैथिलीक भविष्य बाँचि रहल अछि, आ अहाँ सन संघर्षशील युवा रचनाकारक हाथमे मशाल अछि। आब अहीँ कहूँ, ‘कूप-मंडुकक आवाज कते दूर धरि जाएत?

मुन्नाजी: साहित्य अकादमी द्वारा बड्ड रास पुरस्कार (विभिन्न विधा पर) देबाक घोषणा कएल गेल अछि, मुदा ओहि सभ विधा आ स्तरपर उत्कृष्ट रचना आ रचनाकारक अभाव सन अछि तथापि पुरस्कार दऽ देल जाइत अछि। तकर पछाति एहि निर्णयपर पक्षपातक आरोप लगैत रहल अछि किएक? 
अमरनाथ: अहाँक पीड़ा हम बुझैत छी। वैह पीड़ा हमरो मनमे अछि। एहन-एहन पुरस्कृत पोथी जँ आन-आन भाषामे अनूदित होएत तँ लोक हँसत हमरा सभपर, मैथिली साहित्यपर। तेँ हमर स्पष्ट मंतव्य अछि जे उत्कृष्ट पोथी नहि रहैक तँ उचित थिक जे ओहि वर्ष मैथिलीकेँ पुरस्कार नहि भेटैक।

मुन्नाजी: साहित्य अकादमी पुरस्कारक चयनक आधार की अछि, व्यक्तित्व आ कृतित्व आकि भाय-भैय्यारीमे लिप्त भऽ एकरा परोसि/ बाँटि देल जाइत अछि।
अमरनाथ: बहुलांशमे जे होइत रहलैक अछि, सैह अहाँ कहलहुँ अछि। परंतु से ने उचित अछि आ ने मैथिलीक हितमे अछि। निश्चित रूपसँ लेखकक कृतिपर पुरस्कार भेटबाक चाही। ई ध्यान राखब आवश्यक अछि जे अकादमीक पुरस्कार पुस्तकपर भेटैत छैक। अकादमी ने तँ लाइफ टाइम एचीवमेंटपुरस्कार दैत छै आ ने सांत्वना पुरस्कार। एहि सम्बन्धमे साहित्य अकादमीमे मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा विदितकेँ विशेष साकांक्ष रहबाक चाहियनि।

मुन्नाजी: आ अमरनाथ बाबू अंतमे अपने सँ साहित्य आ अकादमी दुनू अनुभवक आधार पर नवरचनाकारक वास्ते कोनो संदेश चाहब जाहिसँ आगू निश्शन रचना आ रचनाकारे मैथिलीमे उपलब्ध हुअए।
अमरनाथ: अकादमीक अनुभव कोनो नीक नहि अछि। मैथिलीक विकासक सुनियोजित योजनाक प्रारूप नहि बनि सकलैक। तखन संघर्ष करैत छी, ठठै छी, मान-अपमानपर ध्यान नहि दैत छी। तकर परिणाम अछि जे मैथिलीक व्यापक हितमे किछु काज भेल अछि आ किछु काज भविष्यमे होएत। मैथिलीक प्रतिनिधि डॉ. विद्यानाथ झा विदितक नेतृत्वमे एतबा भेल अछि जे ई आब मुट्ठी भरि लोकक परिक्रमा नहि कऽ विशाल जनसमुदाय आ लेखक बीच ई पहुँचल अछि।
साहित्यिक जीवनक अनुभवसँ हम उत्साहित होइत रहलहुँ अछि। तकर कारण अछि जे पाठकक स्नेह हमर मनकेँ लिखबा लेल प्रेरित करैत रहल अछि। तखन सन्देश! युवा लेखकक प्रति हम आस्थावान छी। आलोचककेँ ध्यानमे राखि कऽ साहित्य नहि लिखबाक चाही आ ने आन भाषा-साहित्यक अनुकरण होएबाक चाही।
युवा लेखककेँ विभिन्न भाषाक महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़बाक चाहियनि, विश्वमे आबि रहल साहित्यक विभिन्न धारासँ परिचित होइत रहबाक चाहियनि आ बीच-बीचमे पर्यटन-परिभ्रमण करैत रहबाक चाहियनि। मुन्ना जी, जे किछु लिखैत छी तकरा आत्मसात कऽ लिखबाक चाही। कथा, कविता, उपन्यास, नाटक अथवा कोनो आन विधाक रचना कल्पित नहि होइत छैक आ ने गढ़ले जाइत छैक। लेखन सेहो ईमानदारी मंगैत छै। क्षमा करब मुन्ना जी, हम उपदेशक नहि बनय चाहै छी, मुदा अहाँक प्रश्ने तेहन छल! 

(साभार विदेह www.videha.co.in )

कुमार शैलेन्द्रसँ प्रतिनिधि युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजीक भेल गपशप


बहुआयामी व्यक्तित्वक व्यक्ति एवं सौभाग्य मिथिला चैनलक कार्यक्रम प्रभारी कुमार शैलेन्द्रसँ प्रतिनिधि युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुन्नाजीसँ भेल गपशपक अंश अहाँक सोझाँ राखल जा रहल अछि।

मुन्नाजी: पहिल बेर मैथिलीमे कोन विधासँ वा कोना प्रवेश भेल आ ओकर की कारण छल?
कुमार शैलेन्द्र: सन १९६४ ई. मे राजेन्द्र नगर पटनामे हमर जन्म भेल। हमर पिता शिवकान्त झा ओइ समए हिन्दी दैनिक आर्यावर्तमे समाचार सम्पादक रहथि। घरमे कएकटा अखबार, मैथिली पत्रिका शुरूहेसँ पढ़बा लेल भेटल। ओइ समएमे पटनामे ठाम ठीम विद्यापति पर्व समारोह हुअए, मैथिलीक रुचि हमरा ओतएसँ जागल। तकर बाद जखन हम कॉलेजमे पहुँचलहुँ तँ हरिमोहन झाक साहित्य पढ़ि हमरा आभास भेल जे मैथिली साहित्य बड्ड समृद्ध अछि। तकर परिणाम भेल जे हम इण्टरमीडिएटमे अनिवार्य भाषा (१०० अंकक) हिन्दीक बदलबा कऽ मैथिली राखि लेलौं। तकर पछाति हम मैथिलीयेमे ऑनर्स आ एम.ए. केलहुँ। हम कॉलेजमे रही तखने उत्सुकता रंगमंच दिस भेल। हमरा मोन पड़ैछ रवीन्द्रनाथ ठाकुर, जिनका द्वारा पटनामे मैथिलीक पहिल रंगमंचक गठन भेल, “रंगलोकजे ओहि समएमे एकटा नाटक मंचन केलक जकर समीक्षा लिखि हम आयावर्तमे देलिऐ। ओहि समय गोकुलनाथ झा आ भीमनाथ झा कहलनि, समीक्षा हमर रिपोर्टर लिखत, अहाँक समीक्षा नै हएत। फेर गोकुल बाबू कहलनि, समीक्षा नीक अछि, लिखैत रहू। ओ हमर पहिल समीक्षा छल, नै छपल मुदा तकर बाद समीक्षा लिखैत रहलौं आ छपैत रहलौं।
हमरा पता चलल जे कौशल किशोर दास पटनामे एहेन युवक सभकेँ ताकि रहल छथि जिनका रंगमंचमे रुचि होइन। कौशलजी आइसँ पहिने कलकत्तामे रंगमंचसँ जुड़ि सफल रहल छलाह आ आब पटना आबि गेल रहथि। हम हुनकासँ भेंट केलौं आ तकर पछाति सबहक विचारे १८ फरबरी १९८२ ई. केँ एकटा मीटिंग राखल गेलै जाहिमे हम, कौशल किशोर दास, प्रमोद भाइजी, अरुण कुमार झा आ गोकुलनाथ दास कुल पाँच गोटे, ओइ मीटिंगमे उपस्थित भेल रही। हमरा प्रस्तावे अरिपननामक संस्थापर सहमति बनल २८ फरबरी १९८२ केँ। मैथिलीक प्रतीक अरिपनक रूपमे एकर प्रस्ताव रखलौं। कौशलजी एकर समर्थन केलनि। तकर बाद विचार भेलै नाटक मंचनक। बहुत रास मैथिली नाटकक किताब जमा भेल जैपर कौशलदास सहमत नै भेला। हमरा कहलनि- पु.ल. देशपाण्डे लिखित मराठी नाटक- बेचारा भगवान चर्चित आ पुरस्कृत एवं लोकप्रिय अछि। अहाँ मैथिली जनै छी ओकरा हिन्दीसँ मैथिलीमे अनुवाद करू। ईएह मैथिली अनुवाद ओही नामे अरिपनमे पहिल बेर मंचित भेल।
तकर पछाति हमर भातिज अरुण कुमार झा कहलनि जे अशोकनाथ अश्कमैथिलीमे नाटक लिखने छथि। ओ ओहि समएमे छात्र रहथि आ हुनक लिखल नाटक विद्रोहहमरा सभकेँ पसिन्न पड़ल, अरिपनक दोसर पुष्प छल। हम सभ अरिपनक अध्यक्षक लेल बहुत वरिष्ठ गोटे लग गेलौं, कियो अध्यक्षता लेल तैयार तँ नहिये भेला जे कहलनि- अहाँ सभ बेकार फिरिसान होइ छी, मैथिली रंगमंच कहियो अस्तित्वमे नै आबि पाओत। ओही क्रममे हम सभ जटाशंकर दासजी सँ भेंट कएल, ओ एकमात्र व्यक्ति हमरा सभकेँ सभ तरहेँ संग देलनि, अध्यक्षता केला। शेष बुजुर्ग सभ बादमे अरिपनक छोट-छोट पदाधिकारी धरि भेला, हम आब नाम नै लेबऽ चाहब, हुनका सभकेँ अपमान बुझेतनि। दू वर्षक क्रियाकलापकेँ सभ कियो सराहऽ लगलाह आ शेष सभ गोटेकेँ मैथिली रंगमंचक भविष्य देखाए लगलनि। तेसर वर्ष ओही संस्थाक अध्यक्ष भेलाह श्री मंत्रेश्वर झाजी आ क्रमे हमरा सभकेँ विलगा देल गेल।
मुन्नाजी: अहाँ प्रारम्भमे मैथिलीमे नाटकक योगदाने आगाँ एलौं मुदा फेर पत्रकारिता दिस उन्मुख भऽ गेलौं, नाटकसँ कोनो असोकर्ज तँ नै बुझना गेल?
कुमार शैलेन्द्र: पत्रकारितामे- अहाँकेँ कहलौं जे पिताजी पहिनेसँ ऐ काजमे लागल छलाह। तँ हमरो रुचि छले। उदयचन्द्र झा विनोदआ विभूति आनन्द दुनू गोटे माटि-पानि नामक पत्रिका बहार करैत छलाह। विनोदजी तँ जॉबमे छलाहे समयाभाव छलनि, विभूतिजीकेँ सेहो मिथिला मिहिरमे नोकरी लागि गेलनि। तखन माटिपानिक ८० प्रतिशत काज -यथा मुरलीधर प्रेसमे जा टाइप सेटिंग कराबी, प्रूफरीडिंग कॉपी एडिट आदि-आदि काज करी- फाइनल टच विभूतिजी आबि कऽ दैथि। हमर नाम नै रहै छल, हँ अन्तिम दू अंकमे सहयोगी शैलेन्द्र कुमार झा जोड़ल गेल। तकर पछाति ओ बन्न भऽ गेलै, जेना आन मैथिली पत्रिकाक दशा होइत छैक। पत्रकारिता तँ हमर पारिवारिक कारोबार वा रोजगार बनि गेल छल। हमर पिताजी सेवानिवृत्त भऽ गेल रहथि। हमरा आर्यावर्तमे प्रशिक्षु संवाददाताक रूपमे नोकरी भेल। हम सभ कोनो डिप्लोमा डिग्री लेनाइ तँ दूर सुननेहो नै रही, विशेष कऽ पटनामे जे पत्रकारितामे कोनो डिप्लोमा डिग्री होइत छैक। हँ, जँ हमरा पहिने बुझल रहैत जे नाटकक लेल एन.एस.डी. (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) प्रशिक्षण दैत अछि तँ हम जरूर प्रयास करितौं, मुदा पटनामे ऐ तरहक कोनो माहौल नै छलै। हमर पिताजी आर्यावर्त ज्वाइन करबासँ पहिने पुणेमे पेशेवर रंगकर्मीक रूपेँ जुड़ल रहथि। १९५५ मे आकाशवाणी पटनासँ जुड़लाह आ तहियेसँ मैथिली नाटकमे अपन स्वर दैत रहलाह। ई क्रम १९८५ धरि चलल। हमरा जनैत ओ पहिल व्यक्ति छथि जे अनवरत एतेक दिन धरि मैथिली नाटकसँ जुड़ल रहलाह। १९७०-७२ क बाद प्रेमलता मिश्र प्रेम”, बटुक भाइ सभ जुड़लाह, नीक योगदान देलनि, मुदा हमर पिता शिवकान्त झाजी, आनन्द मिश्र, मायानन्द मिश्रक समकक्ष रहलाह। नाटकमे हमरा रुचि ओतैसँ जागल। ओइ इलाकामे (हनुमाननगर, मधुबनी)मे हुनकर मंचीय काजकेँ एकटा किंवदन्तीक रूपमे जानल जाइए।

मुन्नाजी: अहाँक अन्तिम नाटक उगना हॉल्टक मंचन मिथिलांगन (दिल्ली) द्वारा २००९ मे भेल, जे पूर्णतः आजुक परिप्रेक्ष्यमे प्रासंगिक आ मनोरंजक छल। एहिसँ पूर्व अहाँक कोन-कोन आ कोन तरहक नाटक सोझाँ आबि गेल अछि? लेखन आ मंचन दुनू दृष्टिएँ?
कुमार शैलेन्द्र: पहिल बेर हम मंचपर एलौं मराठीक अनूदित नाटक- बेचारा भगवान लऽ कऽ। तकर बाद बहुत रास नीक नाटकक अनुवाद केलौं। हमर पहिल मैथिली नाटक अछि- मोर मन मोर मन नै पतिआइ-ए। दोसर ३१-१२-१९९६ केँ उत्तरायण हास्य व्यंग्यपरक नाटक अछि, एकर बाद लोरिकायन, अग्निपथक सामा (चेतना समितिसँ प्रकाशित), ई मैथिलीक पहिल नाटक छल जकरा बिहारक सभसँ पैघ श्री कृष्ण मेमोरियल हॉलमे मंचित कएल गेल ०४.०८.२००१ केँ। गीतात्मक देसिल बयना २००७ मे, मिथिलांगन (दिल्ली)क आग्रहपर नैकाबनिजाराक गीतात्मक नाट्यरूपान्तरण केलौं जाहिमे १०टा गीत छै, जकर मंचन २००७ ई. मे व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्मजयन्तीपर मिथिलांगन द्वारा संजय चौधरीक निर्देशनमे मंचित कएल गेल। २००८ ई. मे मिथिलांगन द्वारा आजुक प्रसंगमे लिखल हास्य व्यंग्य नाटक उगना हॉल्टक मंचन भेल।

मुन्नाजी: अहाँक नाट्य मंचन मूलतः गमैया नाटकसँ प्रारम्भ भेल छल, आजुक परिप्रेक्ष्यमे गमैया नाटक कतऽ अछि। गमैया आ थियेटरमे मंचित नाटकक तुलनात्मक स्थिति की अछि?
कुमार शैलेन्द्र: गमैया नाटक जतऽसँ शुरू भेल छल आइयो ओतै अछि आ ऐसँ ऊपर उठबाक आशा सेहो नै देखा पड़ैत अछि। थियेटर नाटक आधुनिक साज-सज्जा ओ प्रकाश व्यवस्थासँ संतुलित रहैत अछि। मुदा गमैया नाटक जेना अछि ओहिसँ सुधरि नै सकैत अछि जकर मूल कमी अछि बिजली वितरणक अभाव। गाममे एखनो नाटक पेट्रोमेक्सक इजोतमे होइत अछि, जतऽ जेनेरेटरक व्यवस्था होइत छै, ओहो समुचित नै कहल जा सकैछ, किएक तँ ओतौ डिमरक प्रयोग नै भऽ सकैत अछि। थियेटरमे आयोजित नाटक प्रारम्भसँ अंत धरि नाटकक क्रमिक दृश्य देखाइछ। मुदा गमैया मंचपर एखनो दृश्य परिवर्तनक बीच कॉमिक वा नाच देख सकैत छी। गाममे ताधरि स्थिति खराब रहत जाधरि दृश्य परिवर्तन उठौआ परदासँ हेतै। गामक मेकपमे एखनो मुर्दा शंखक उपयोग होइत छै। गामक नाटक कहियो ऊपर नै उठि सकैत अछि। कहियो थियेटक नाटकक बरोबरि नै भऽ सकैए, किन्नो नै भऽ सकैए।

मुन्नाजी: हमरा जनतबे आइयो नाटकक लेल दर्शकक अभाव नै छै, हँ समयाभाव जरूर भऽ गेलैए, ताहि हेतु एकांकी सभकेँ मंचित करब शुरू भेल अछि। अहाँक नजरिये एकांकीक रुखि केहेन अछि, एकर भविष्य केहेन बुझना जाइत अछि।
कुमार शैलेन्द्र: आधुनिक रंगमंचपर भलहिं एकांकीक प्रचलन बढ़लैए मुदा एकांकीक आधावा सम्भावना नै छैक से मैथिलीये नै अन्यान्य भाषाक एकांकी संग सेहो छैक। अखन जे नाटक लेखन भऽ रहल अछि ओइमे साहित्यिक नाटक कम अछि। नाटक ऐ रूपक प्रारम्भ सुधांशु शेखर चौधरीक नाटक सभसँ भेल। नाटक अपन परम्परामे आबि अलग अलग शिल्पक प्रयोगे लिखल जा रहल अछि। प्राचीन जे प्रदर्शन कला छलै तकरासँ जोड़ि कऽ आधुनिक प्रदर्शन कलाक प्रस्तुति कएल जा रहल अछि। मुन्नाजी, एकांकीक अस्तित्व मैथिली सहित सभ भाषामे खसि गेलैक अछि। भविष्य कोनो नीक नै बुझना जाइछ।

मुन्नाजी: वर्तमानमे किछु बीछल कथाकेँ एकांकी रूपेँ प्रस्तुत कएल जाए लागल अछि, की कथाक मूल एकांकीमे समाहित भऽ पबैए वा नै? कथाक एकांकी रूपान्तरण कतेक उचित वा अनुचित अछि?
कुमार शैलेन्द्र: कथाक नाट्य रूपान्तरणक प्रारम्भ केलनि हिन्दीमे देवेन्द्रराज अंकुर। कथा मंचनक सभ भाषामे अयोजन कएल जा रहल अछि। कथाकेँ नाट्य रूप दिऐ तखने ओ सार्थक भऽ सकैछ, मुदा से अछि कठिन। हम धूमकेतुक कथा अगुरवानक नाट्यरूपान्तरण कएने रही तँ ओइमे कथाक मूल स्वरूपकेँ यथावत रखने रही। ओना तँ ताहि हेतु कठिन परिश्रम करऽ पड़ल छल। आगू म. मनुज ओइ अगुरवानक रूपान्तरण काफी लिफ्ट लैत केलनि तँ ओकर मूल आत्मे मरि सन गेलै। किएक तँ ओइ नाटकमे बहुत रास दृश्य एहेन जोड़ल गेल छैक जे कथामे छहिये नै। कथा मंचन हेबाक चाही, ओकर प्रतिरूप नै जेना हमर नैका बनिजारा छल। ओतेकटा पोथीकेँ डेढ़ घंटाक कलेवरमे समेटि देनाइ बड कठिन छल। मुदा हम ओइमे सफल भेलौं। कथाक मंचन तँ सही छैक मुदा जखन नव आयाम जोड़ल जाइ छै तखन कथाक आत्मा आहत होइत छैक। देवेन्द्रराज अंकुर जेना कथाक नाट्यरूपान्तरणमे कथाक मूल रूपकेँ प्रस्तुत कऽ पबै छथि तहिना मैथिलीयोमे कएल जाए तँ नीक बात अन्यथा लौल करब व्यर्थ अछि।

मुन्नाजी: अहाँ लेखनक अतिरिक्त अभिनयसँ सेहो जुड़ल रहलौं। हम सभ फिल्म सिन्दुरदानमे अहाँक सुन्दर अभिनय देखने छी। ऐसँ पूर्व अहाँ कोन-कोन फिल्म वा धारावाहिकमे अभिनय केने छी आ एकर केहेन अनुभव केलहुँ?
कुमार शैलेन्द्र: जँ अहाँ कही छोटकी परदा हम ओकरा कहै छी- नन्हकी परदा आ सिनेमाकेँ कहै छी बड़की परदा। बड़की परदाक बात करी तँ सिन्दुरदानहमर दोसर फिल्म अछि। पहिल फिल्म अछि रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा निर्मित आ निर्देशित हिन्दी फिल्म आयुर्वेद की अमर कहानी”- ऐमे हम अभिनय केने रही, ललितेश ऐमे हीरो रहथि आ संगमे रहथि दिलीप झा। राँटी, मधुबनीमे एकर सूटिंग भेल रहै। हमरे सन चारि-पाँच गोटे आरो प्रतिभावान कलाकार रहथि। सिन्दुरदानमे १६-१७ बर्खक पछाति चरित्र अभिनेताक रूपमे आएल रही, आब तँ हमर चेहरो बदलि गेलहेँ। ऐमे हमर भूमिका नायिकाक पिताक रूपमे छल। एकर बाद सौभाग्य मिथिला मैथिली चैनलक लेल बनाओल मुख्य धारावाहिक दियर-भाउजक डेढ़ सए कड़ीसँ बेसीमे षडयंत्री ककाक भूमिकामे काज कएलौं। तकर अतिरिक्त रविन्द्रनाथ ठाकुर नन्हकी परदापर एकटा काउन्टडाउन शो केने रहथि, जैमे कविक भूमिकामे एकटा प्रस्तोताक रूपमे हम अभिनय केने रही। ईएह हमर नन्हकी-बड़की परदाक अभिनय यात्रा अछि जे एकटा प्रसन्न करैबला अनुभव रहल।

मुन्नाजी: अहाँ बहुत दिन धरि मैथिली पत्रकारिता विशेषकऽ आकाशवाणीसँ जुड़ल रहलौं, की भविष्य छै एकर? एकरा छोड़ि अहाँ दूरदर्शनसँ किएक जुड़लहुँ?
कुमार शैलेन्द्र: हमर रोजगार यात्रा पत्रकारितेसँ शुरू भेल, विशेष कऽ प्रिन्ट मीडिअमसँ। ओइ संग आकाशवाणीसँ सेहो जुड़ल रहलौं। आकाशवाणी पटनासँ प्रसारित किछु नाटकमे काज केलौं। आ एतऽसँ प्रसारित चौपालमे बम-बमभाइक भूमिकाक निबहता करैत रहलौं। तकरा संग-संग नौ साल धरि आकाशवाणी पटनासँ शैलेन्द्र कुमार झाक नामे समाचार वाचन करैत रहलौं। एकर अतिरिक्त नै जानि कतेको रेडियो नाटिकामे अपन स्वर देलौं। एकटा महत्वपूर्ण काज छल ओतऽसँ प्रसारित सिंहासन बत्तीसीधारावाहिकक- चौंतीसम कड़ी धरि राजा भोजक भूमिकामे रही जे महत्वपूर्ण काज छल। तकर बाद ई.टी.वी. हैदराबादमे छः घण्टाक लिखित आ दू घंटाक मौखिक परीक्षाक पछाति हमर चयन भेल। हम ओतऽ एक सप्ताह मात्र काज केलौं। ओहीमे हमर वरिष्ठ रहथि गुंजन सिन्हाजी जे एखन मौर्या टी.वी. पटनामे वरिष्ठ पदाधिकारी छथि। हमरा ओतऽ मोन नै लागल वा मोन नै मानलक। हाम आपस चल एलौं। तकर बहुत पछाति सौभाग्य मिथिलामैथिली चैनलसँ जुड़लौं, जैमे समस्त कार्यक्रमक निर्माण देखैत रहलौं। छोड़बासँ पहिने समाचार संपादक रूपमे कार्यरत रही। सौभाग्यसँ जहिया जुड़लौं तँ हम पहिल मैथिल व्यक्ति रही ओ सौभाग्य नामक एकटा डिवोशनल चैनल छल आ ओइमे सभ हिन्दीभाषी कार्यरत छलाह।

मुन्नाजी: अहाँक नाटक पत्रकारिताक अतिरिक्त एकटा सकल मंच संचालकक रूप सेहो सोझाँ आएल। अहाँ ओहूमे खूब जमलौं।की मैथिलीमे स्वतंत्र संचालकक अस्तित्व आ भविष्य देखा पड़ि रहल अछि?
कुमार शैलेन्द्र: मंच संचालन हमर महत्वपूर्ण लोकप्रिय विधा रहल अछि। पटनाक चेतना समितिक मंचसँ विद्यापति समारोहमे बहुत दिन धरि मंच संचालन करैत रहलौं। सत्य पूछी तँ ओइमे आनन्द अबैत छल, किएक तँ ओ जे भीड़ होइ छलै एक लाख डेढ़ लाख लोकक आ शालीनतापूर्वक सभ सुनैत रहै छल। तकर पछाति कतेको मंचपर बजाएल जाए लगलौं। मैथिलीमे मंच संचालकक वा उद्घोषकक कोनो पेशेवर रूप टिकाऊ नै भऽ सकैछ। एखन एकर कोनो सम्भावना नै छैक। हँ हमर जे समिति सबहक उद्घोषक भेलाह हुनक रूप बदलि गेल छनि, माने ओ आब एकटा कन्ट्रैक्टर वा एरेन्जरक रूपमे छथि। समस्त कलाकारक व्यवस्था ओ करथि आ ओही व्यवस्थापर कार्यक्रम आयोजित होइत अछि। ओना एहेन जे उद्घोषक सेहो सिजनल भऽ सकैत छथि। हम जखन उद्घोषक रही तँ ई बात पहिने सोझाँ आबए जे जँ विद्यापति पर्व समारोह अछि तँ ओइमे विद्यापति आ मिथिलाक सांस्कृतिक आधारकेँ केन्द्रित कऽ कार्य कएल जाए। आब गीत-संगीतमे फूहड़ता एलैए तँ कैक ठाम संचालकक स्तर खसि रहल छैक।
मुन्नाजी: मैथिलीक पहिल चैनल सौभाग्य मिथिलासँ पूर्ण रूपेँ जुड़ि अपन सर्वस्व ऊर्जा ऐमे खर्च कऽ रहल छलौं। मुदा एखनो बहुत रास कमी अछि जेना डी.टी.एच.पर ऐ चैनलक प्रसारण नै हएब? ठोस वा मनोरंजक कार्यक्रमक अभाव किएक?
कुमार शैलेन्द्र: निश्चित रूपे मुन्नाजी अहाँक जे सवाल अछि तैसँ हम सहमत छी। हम जहिया जुड़लौं ऐसँ तँ असगर मैथिल छलौं। एकर सभ कार्यक्रम चैनल आइ.डी.सँ लऽ समस्त कार्यक्रमक आधारभूत संरचना तैयार केलौं। हमर बाद जे किछु लोक जुड़ल से सभ चैनल माध्यमे चिन्हल गेल मुदा हम पहिनेसँ मिथिलाक सभ क्रियाकलाप कला संस्कुति आदि सँ सर्वथा जुड़ल रहलौं। हमरा प्रारम्भमे कहल गेल जे ऐमे दू घंटाक मैथिली कार्यक्रम हएत मुदा कालक्रमे २४*७ क प्रसारण -यानी चौबीसो घंटा आ सातो दिन- होमऽ लागल। हम एकरा कहल बुद्धिवाद, जे ई जोगाड़ डॉट कॉम पर टिकल रहल, किएक तँ एकरा फाइनेन्सरक पूर्णतः अभाव रहलै।
मुन्नाजी: ऐ चैनलक बहुत रास कमी एहेन अन्यान्य भाषाक चैनलक समक्ष एकरा ठाढ़ नै होमऽ दऽ रहल छै। एनामे एकर अस्तित्व समाप्त तँ नै भऽ जाएत।
कुमार शैलेन्द्र: एकरा लग प्रतिभा, लोक, अभिनेता, गीत-संगीत गौनिहारक कमी नै छै। साहित्य-संस्कृतिक कमी नै छै। योग्यताक अभाव नै छै। कमी छै तँ धनक, चैनलक मार्केटिंग केनिहार लोकक। अभाव छै तँ जे सभ मालिक वा पार्टनर छथि हुनकामे, जे कोना बजारसँ धन उगाहिकेँ आनल जाए। से सभ जहिया भऽ जाएत तहिया ऐ चैनलसँ स्तरीय कार्यक्रम सभ प्रस्तुत होमऽ लागत आ ई सभ तरहेँ आन भाषाक चैनलक समक्ष ठाढ़ भऽ जाएत। चैनलसँ आब जे जुड़ल छथि, जहिया हमहूँ सभ जुड़ल रही प्रोग्रामसँ, जे जुड़ल लोक अछि तकरा प्रोग्रामक भार रहै आ मालिक लोकनि एकर व्यापार प्रभागक संचालन करथि। ई भेद कऽ के काज हेतै तखन ई जरूर सफल हएत। नै मालिके सभटा काज करता तखन स्थिति दुःस्थितिये बनल अहत।
मुन्नाजी: ऐ सभक अतिरिक्त मैथिली गजलक उपयोग अहाँ सेहो करैत रहलौं अछि। मैथिलीमे गजलक की स्थिति छैक आ एकर केहेन सम्भावना देखा पड़ैत छैक?
कुमार शैलेन्द्र: मैथिली गजल अपन लोकप्रियता बहुत पहिने हासिल कऽ लेने अछि, कलानन्द भट्ट, बुद्धिनाथ मिश्र, रविन्द्रनाथ ठाकुर आदि श्रेष्ठ गजलकार छथि। मायानन्द मिश्र सेहो अही श्रेणीमे गानल जाइत छथि। हुनकर रूप एक रंग अनेकनामक संग्रह चर्चित रहल छनि। ओ ऐ सभ गजलकेँ गीतल कहै छथि। एम्हर आबि कऽ पत्रिका सभमे गजलक अभाव पाओल जाइत अछि। देखियौ मुन्नाजी, एकटा खास बात छै जे गजल एहेन विधा छै जे कोनो भाषामे लिखल जाए अपन जमीन तैयार कऽ लैत अछि। मैथिलीयोमे राम चैतन्य धीरज, तारानन्द वियोगी, रमेश आदि आ सरसजी गीत आ गजलमे नव-प्रयोग केलनि। कविताक जे प्रकार छै तैमे मैथिली गजलक सेहो अस्तित्व छैक आ भविष्य सेहो। गजल जतऽ जै भाषामे जाइ छै ओहीमे समाहित भऽ जाइ छै। गजलमे गेय तत्व छै जे ओकरा लोकप्रिय बना देने छै।
मुन्नाजी: शैलेन्द्रजी, एकटा सवाल व्यक्तिगत जिनगीसँ जुड़ल। अहाँ अपन एकल जिनगी जीबाक प्रयास कऽ रहलौं अछि- माने अविवाहित रहि- एकर कारण रोजगारपरक व्यावसायिक अवरुद्धता अछि वा कोनो व्यक्तिगत विशेष कारण। अहाँकेँ नै लगैछ जे एहन जीवन अधूरा वा व्यर्थ भऽ जाइत अछि?
कुमार शैलेन्द्र: देखियौ, ई अहाँक हमरासँ जुड़ल वैयक्तिक, पूर्ण व्यक्तिगत प्रश्न अछि। मुदा हम एकर उतारा देबासँ परहेज नै करब। वरन एगदम सहज आ स्वाभाविक उतारा देब। हम जखन यंग रही तखन पिताजी चाहैत रहथि जे हम बियाह कऽ ली, मुदा हम आर्थिक रूपेँ सक्षम नै बुझी अपनाकेँ। किएक तँ आर्यावर्तमे काज करैत रही, ओ ओही समएमे बन्न भऽ गेलै। हम बेरोजगार भऽ गेलौं आ बियाह नै करबाक मूल कारण छल हमर अर्थ विपन्नता। हम परिवार चलेबा लेल जतेक अर्थक प्रयोजन बुझलौं ततेक हम कहियो नै कऽ सकलौं। लोकक अपन-अपन रहबीपर निर्भर छै। ककरो लगै छै जे हम पाँच हजारमे गुजारा कऽ ली। हमरा लगैछ जे बीस हजार खर्च भऽ सकैछ। हम आइयो ओहिना छी जे अपना अर्थे विपन्न बुझै छी। हमरा मैक्सिम गोर्कीसँ जीवन्त प्रेरणा भेटैत रहल अछि। ओना हम मानै छी जे गोर्कीकेँ जीवनमे जतेक कष्ट सहऽ पड़लनि ऐसँ बहुत कम कष्ट हम उठेलहुँ अछि। हम जखन संकटमे अबै छी तँ हमरा गोर्की मोन पड़ै छथि आ हुनके प्रेरणासँ हम अपनाकेँ सम्हारि लैत छी। हँ, हम ईमानदारीपूर्वक कहब जे एतेक साहस कहियो नै आएल वा हमरा कियो भेटबो नै कएल। जे अपना ओइठाम जे पारम्परिक विवाह छै तैमे हमरा विश्वास नै रहल अछि। जँ हम ओना बियाह कऽ ली आ तेहेन कोनो जोड़ीदार आबि जाए जे अहाँक जीवनकेँ नर्क बना दिअए तँ हमरा कोनो शिकाइत नै अछि जे हम एकसर छी। हम विवाह नै केलौं तैं हेतु कतौ कोनो लोक, एम्प्लॉयरसँ कहियो कोनो कम्प्रोमाइज नै करऽ पड़ल। हमरा जतऽ जहिया जेना मोन भेल काज करैत रहलौं। हमर जे संगी नोकरिहारा, तकरा लेल लड़ैत रहलौं। आ तैँ हमर एम्प्लायर डरैत रहल अछि। ओ मानैए जे हम यूनियनबाजी करै छी, जखनकि सत्य अछि आइ धरि कोनो यूनियनसँ कोनो सम्बद्धता नै रहल अछि। असगरूआ रहब हमर सम्बल रहल अछि। काल्हि की हेतै एकरो गारंटी हम नै दऽ रहलौंहेँ। कतेको गोटे कहैए, आब अहाँ बूढ़ भऽ गेलौं, आब बियाह कऽ की हएत? मुदा हमरा अखनो वा आगूओ जँ अपन सोचक कियो भेटि जेती तँ हम बियाह कऽ सकैत छी। 
मुन्नाजी: भाइ, एतबा बहुमूल्य समए दऽ अपन विचार देबा लेल धन्यवाद।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

राजदेव मंडलजी सँ हुनक लेखनीपर गहींर रूपे मैथि‍लीक सशक्‍त युवा लघुकथाकार आ समालोचक मुन्नाजीक बीच भेल गप-सप्‍प


मैथि‍ली आ हि‍न्‍दीमे सझि‍या आ धुरझार लेखनसँ परिपक्‍व। मैथि‍लीमे एकटा ठोस वि‍चार आ   दुर दृष्‍टि‍ लऽ स्‍थाि‍पत होइत कवि‍ श्री राजदेव मंडलजी सँ हुनक लेखनीपर गहींर रूपे मैथि‍लीक सशक्‍त युवा लघुकथाकार आ समालोचक मुन्नाजीक बीच भेल गप-सप्‍पक अंश प्रस्‍तुत ऐछ-


मुन्नाजी- अहाँ खाँटी मि‍थि‍लाभुमि‍क पानि‍ माटि‍मे रचल बसल रहि‍ हि‍न्‍दीमे उन्‍मुख रहलौं। मैथि‍लीमे कि‍एक नै?

राजदेव मं. -  देश-दुनि‍याँ/ चाहे जतेक बदलि‍ जाए/ अपन भाषा अपन माए/ कहुँ बि‍सरल जाए/। माएक द्वारा सि‍खाओल भाषा के बि‍सरत? रचनाक प्रारम्‍भ मैथि‍लीमे कएलहुँ। कि‍न्‍तु प्रकाशनक अभाव आ प्रकाशक, सम्‍पादक लग कोनो पहुँच नै। अर्थसँ की नै होइत छै। हम अर्थाभावमे रही। मैथि‍लीक कोनो रचना प्रकाशि‍त नै भेल। फुलाइत मन मुरझा गेल। ओइ‍‍ समएमे हि‍न्‍दीसँ एम.ए.क तैयारीमे जुटल छलहुँ। हि‍न्‍दीमे लि‍खनाइ सुवि‍धाजनक सन लगल। लि‍खब आ छपेबाक उत्‍कट इच्‍छााक कारणे हि‍न्‍दी दि‍स कनछी काटए पड़ल। 

मुन्नाजी- मैथि‍ली लेखनीक प्रारम्‍भ कहि‍या कोनो कएलहुँ? एखन धरि‍ मैथि‍लीमे हेराएल वा वेराएल सन रहवाक की कारण?

राजदेव मं. -  मैथि‍लीसँ एम.ए. केलाक उपरान्‍त १९८६ई.क कोनो राति‍, नीक जकाँ स्‍मरण नै ऐछ- ओ तारीख। ओइ‍ राति‍ मानसि‍क स्‍तरसँ बड्ड दुखी रही। एतेक दुखी जे सुतएकालसँ पूर्व कतेको बेर मुँहसँ नि‍कलल रहए- हे भगवान हमरा धरसीसँ उठा लि‍अ। हमरा मृत्‍यु चाही। हम मरऽ चाहै छी।
ई वाक्‍य सभकेँ दोहराबैत निन्नमे डूबि‍ गेल रही। अधरति‍यामे जखन नि‍न्न टूटल तँ मन कि‍छु हल्‍लुक सन बुझाएल। ओसारपर मि‍झाइत दीयाकेँ बड़ी काल धरि‍ एकटक देखैत रहलहुँ। कतेक काल धरि‍ से स्‍मरण नै ऐछ। कि‍न्‍तु ओ मि‍झाइत दीया प्रथम मैथि‍ली कवि‍ता बनि‍ गेल। जे संग्रह अम्‍बरा'मे संकलि‍त ऐछ। भऽ सकैत ऐछ ऐ‍‍सँ पूर्व मैथि‍लीमे अपूर्ण रचना सभ हएत।
आब सवाल हेराएल आ बेराएल ऐछ। हेराएल ओ रहैत ऐछ जे अनचि‍न्‍हारक बीच रहैत ऐछ आ अनजान स्‍थानपर रहैत ऐछ। हम तँ अपनहि‍ जन्‍म स्‍थानपर छी आर चि‍न्‍हार लोकक बीच छी। ओकरा की कहबै जे चि‍न्‍हार लोकक बीच अनचि‍न्‍हार बनल हेराएल ऐछ।
ओ बेराएल जाइत ऐछ जेकरा द्वारा अधलाह काज भेल हुअए। हम अपना जनैत नीक काज करैत अहाँक लगमे ठाढ़ छी। तइयो बेराएल सन। तँ एकर कारण की कहब?

मुन्नाजी- अहाँक कवि‍ता गाम समाजक लोकक प्रति‍ अहाँक वि‍चार मि‍थि‍लाक पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने बुझाइत ऐछ। जखन कि‍ वर्त्तमानमे तकनीकी वि‍कासे लोकक जीवन आधुनि‍क सोचमे डुबि‍ रहल ऐछ। अहाँ अपनाकेँ सँ दूर कोना रखने छी?

राजदेव मं. -  हम कोनहुँ पारम्‍परि‍कताकेँ संजोगने नै छी आ नै आधुनि‍क जीवन सोचसँ अपनाकेँ दूर रखने छी। हँ कि‍छु सरस शब्‍दकेँ जोड़बाक प्रयास कएलहुँ जाहि‍सँ रमणीय अर्थ नि‍कलि‍ सकए। की छुटल आ की जुड़ल ऐछ। नीक वा अधलाह भेल तेकर ि‍नर्णए तँ अहीं सभ करब।

मुन्नाजी- एखन धरि‍ अहाँक मैथि‍ली लेखनीमे कवि‍ते टा जगजि‍यार भेल ऐछ की, अहाँ कोनाे आनो वि‍धामे लि‍खैत छी?

राजदेव मं. -  कि‍छु कथा लि‍खने छी। एकटा उपन्‍यास लि‍ख रहल छी।


मुन्नाजी- अहाँ हि‍न्‍दी भाषामे कतेको पोथीक सर्जक छी, जे छपि‍ कऽ सोझाँ आबि‍ चूकल ऐछ। मैथि‍लीमे एतेक पाछाँ कि‍एक छी कि‍एक छी एकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै ऐछ?

राजदेव मं. -  हि‍न्‍दीमे तीनटा उपन्‍यास प्रकाशि‍त भऽ चूकल ऐछ। जि‍न्‍दगी और नाव, पि‍ंजरे के पंछी, दरका हुआ दरपन। मैथि‍लीमे लि‍खैत छलहुँ कि‍न्‍तु प्रकाशि‍त नै भेलाक कारणे पाछाँ छलहुँ। उमेश मंडल आ गजेन्‍द्र ठाकुर जीसँ सम्‍पर्क भेलाक उपरान्‍त मैथि‍ली ई पत्रि‍का वि‍देहमे प्रकाशि‍त हुअए लगल। श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा वि‍देह मैथि‍ली पद्य २००९-१०मे सेहो प्रकाशि‍त भेल।
वास्‍तवमे ओ सभ धन्‍यवादक पात्र छथि‍। एकर उपरान्‍त अंति‍का आ मि‍थि‍ला दर्शनमे सेहो कि‍छु कवि‍ता सभ अाएल।

मुन्नाजी- मैथि‍ली भाषाकेँ अप्‍पन कि‍छु मैथि‍ल सभ बाभन मात्रक भाषा कहि‍ गैर बाभन लोक सर्जक वि‍चार वा भाव रखि‍तो अपनाकेँ कति‍या लैत छथि‍। अहाँ एकरा कै परि‍पेक्ष्‍यमे देखै छी?

राजदेव मं. -  भाषाकेँ कोनो बन्‍धनमे बान्‍हि‍ कऽ नै राखल जा सकैत ऐछ। जाति‍क बन्‍धन तँ आओर खराब। भाषा तँ सबहक होइत ऐछ। तँए सभ जाति‍ आ वर्गक लोककेँ अपना भाषा उत्‍थानक लेल प्रयास करबाक चाही। सहयोगक भावना सेहो हेबाक चाही। प्रारम्‍भमे कि‍छु बाधा होइते ऐछ। तै कारणे कति‍या जाएब से नीक नै।

मुन्नाजी- बाभनसँ इतर अहाँक समकक्ष सर्जक श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी जे अपन लेखनीए कतेको स्‍थापि‍त रचनाकारकेँ पाछाँ छोड़ि‍ अल्‍प समएमे शीर्षपर अबैत देखाइत छथि‍। ऐ माध्‍यमे छोटका-बड़का जाति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोना परि‍भाषि‍त करब?

राजदेव मं. -  ऐ‍‍मे छोटका आ बड़का जाति‍क फाँट की कएल जाए। कि‍छु रचनाकार द्रुतगति‍सँ लि‍खैत छथि‍। जेना श्री जगदीश प्रसाद मंडल। स्‍वभावि‍क ऐछ जे ओ अल्‍पकालहि‍मे बेसी लि‍खताह। कि‍यो मन्‍थर गति‍सँ रचना करै छथि‍। लि‍खबाक अपन-अपन शैली आ गति‍ होइत ऐछ। ओहि‍ना शीर्ष दि‍स बढ़बाक गति‍ होइत ऐछ।

मुन्नाजी- अपन मैथि‍ली लेखनयात्राक क्रममे कहि‍याे अपनाकेँ गैर बाभन हेवाक कारणेँ अनसोहाँत वा उपेक्षि‍तक अनुभव तँ नै पौलहुँ?

राजदेव मं. - सवेंदनशीलकेँ तँ उपेक्षाक अनुभव होएबे करतैक। समाज आ परि‍वारकेँ प्रत्‍यक्ष रूपेँ कि‍छु नै दैत छि‍ए। ओ सभ उपेक्षाक भाव राखबे करता। अपनासँ आगू कोनो जाति‍केँ देख‍ इर्ष्‍या होएबे करत। ई तँ मनुक्‍खक गुण ऐछ। भऽ सकैत ऐछ जे हमरोसँ पाछाँबलाकेँ कि‍छु एहने अनुभव होइत हेतै। ऐ‍‍ गप्‍पपर अपने लि‍खल पॉति‍ यादि‍ अबैत ऐछ- उपेक्षाक दंश/ हमरहि‍ अंश/ नै ऐछ चि‍न्‍ता/ नै छी त्रस्‍त/ भेल छी अभ्‍यस्‍त.../‍

मुन्नाजी- मैथि‍ली समीक्षक लोकनि‍ रचनाकारक कोन मन:स्‍थि‍ति‍केँ समीक्षाक रूपेँ परि‍भाषि‍त करैत छथि‍? की ओइमे जाति‍वादि‍ताक नजरि‍या सेहो परि‍लक्षि‍त होइत ऐछ?

राजदेव मं. - समीक्षाक बहुत अधि‍क पुस्‍तक हम नै पढ़ने छी। ऐ‍ तरहक गप्‍प सोक्षा नै अाएल ऐछ। ओना समीक्षाक कार्य बहुत दायि‍त्‍वपूर्ण होइते ऐछ। रचनाकार आ पाठकक मध्‍य मि‍लनबि‍न्‍दूपर समीक्षक रहैत छथि‍। ओ कोनो रचनाकेँ दोष-गुणक अन्‍वेषण करैत छथि‍। जँ हुनक नजरि‍या जाति‍वादी हेतैक। तँ ऐ‍‍सँ भाषाक क्षति‍ हेतैक।

मुन्नाजी- अहाँ समीक्षा सेहो करै छी अपन समीक्षाक माध्‍यमे अहाँ रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍वकेँ परि‍लक्षि‍त करैत छी, वा रचनाकारक कृति‍त्‍वकेँ सोझाँ अनवाक प्रयास करै छी की जाति‍क फाँटकेँ भरि‍ रचनाकारक देखार करब उचि‍त बुझै छी?

राजदेव मं. -  समीक्षा तँ होइत ऐछ रचनाकेँ। तँए व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍वकेँ अलग-अलग राखल जएबाक चाही। समीक्षाक कार्यमे तँ तटस्‍थ भऽ रचनाक दोष गुणक चर्चा न्‍याय-संगत ढंगसँ हेबाक चाही। हँ, कि‍छु साहि‍त्‍यकारक सर्वोत्‍कृष्‍ट कार्य देख धन्‍यवाद देबाक लेल बेवश होमए पड़ैत ऐछ। ऐ‍‍ कार्यमे जाति‍क फाँट केनाइ नि‍तान्‍त अनुचि‍त गप्‍प थि‍क।


मुन्नाजी- अन्‍तमे अहाँ गैर बाभनक मैथि‍लीमे अनुपस्‍थि‍ति‍केँ कोन तरहेँ अनुभव करै छी। ऐ‍‍मे गैर बाभन वर्गक सर्जककेँ वेशीसँ बेशी उपस्‍थि‍ति‍क लेल कोन संदेश वा वि‍चार देब।

राजदेव मं-  पूर्णरूपेण भाषाक वि‍कासक लेल सभ जाति‍ आ वर्गक रचनासँ भाषाकेँ परि‍पूर्ण होएबाक चाही। तँए जे पाछाँ छथि‍ हुनका सभकेँ अध्‍ययन, मनन आ अभ्‍यास करबाक चाही। बेसीसँ बेसी रचना करबाक चाही। सहयोगक भावना रहक चाही। अधि‍कार प्राप्‍त करबाक लेल तँ आगू बढ़ै पड़त। 

(साभार विदेह www.videha.co.in )