Monday, August 25, 2008

मैथि‍ली उपन्यास साहि‍त्यमे ग्रामीण चि‍त्रण- जगदीश प्रसाद मण्डल

मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे ग्रामीण चि‍त्रण
साहि‍त्‍यक आधार मनुष्‍यक जि‍नगी होइछ। मनुष्‍येक जि‍नगीक ‍नींवपर भाषा साहि‍त्‍य ठाढ़ आ सुदृढ़ बनैत अछि‍। जे मनुष्‍यकेँ जीबैक कला सि‍खबैत अछि‍। गद्य-साहि‍त्‍यक वि‍धामे उपन्‍यासो छी। जइ‍ नींवपर साहि‍त्‍यक भवन ठाढ़ रहैत अछि‍ ओ माटि‍क नि‍च्‍चाँ दाबल रहैत अछि‍। जीवन परमात्‍माक सृष्‍टि‍ छी तँए अनन्‍त-अगम्‍य अछि‍। जहन कि‍ साहि‍त्‍य मनुष्‍यक सृष्‍टि‍ होइत तँए सुबोध-सुगम आ मर्यादि‍त होइत अछि‍। ऐ ‍जगतमे मनुष्‍य जे कि‍छु सत्‍य आ सुन्‍दर पौलक आ पाबि‍यो रहल अछि‍ वहए साहि‍त्‍य छी। ओना साहि‍त्‍य समाजक दर्पण कहल जाइत अछि‍ मुदा मनुष्‍यक अएना आ प्राकृति‍क अएनामे अन्‍तर अछि‍। प्राकृति‍क अएना वस्‍तुक बाहरी रूप देखबैत जहन कि‍ मनुष्‍यक अएनाकेँ दोहरी रूप होइत अछि‍। जइ‍सँ बाहरी आ भीतरी दुनू रूप देखैत अछि‍। ऐठामक (मि‍थि‍लाक) चि‍न्‍तनधारामे, प्रचलि‍त दार्शनि‍क चि‍न्‍तनधारासँ भि‍न्न कि‍छु एहेन वि‍शेषता सन्नि‍हि‍त अछि‍ जे अपन अलग पहचान बनौने अछि‍। जइ‍ आधारपर साहि‍त्‍यक दीप (ज्‍योति‍) कहब अधि‍क उपयुक्‍त हएत।
उच्‍च कोटि‍क साहि‍त्‍यि‍क सृजन लेल यथार्थ आ आदर्शक समावेश आवश्‍यक अछि‍। जकरा आदर्शोन्‍मुख-यथार्थवाद कहल जा सकैछ। अगर यथार्थवाद आँखि‍ खोलैत अछि‍ तँ आदर्शवाद उठा कऽ मनोरम स्‍थानपर पहुँचबैत अछि‍। चरि‍त्रकेँ उत्‍कृष्‍ट आ आदर्श बनेबा लेल जरूरी नै‍‍ जे ओ नि‍र्दोषे हुअए। ऐ‍ जटि‍ल संसारमे, जइ‍मे छोट-सँ-छोट आ पैघ-सँ-पैघ समस्‍या लधलो अछि‍ आ दि‍न-प्रति-दि‍न जन्‍मो लैत अछि‍, तइ‍ठाम नि‍र्दो चि‍त्रणक नि‍र्माण कठि‍न अछि‍। महानसँ महान पुरुषमे कि‍छु-ने-कि‍छु कमजोरी रहि‍ते‍ छन्‍हि‍, जेकरा नि‍खारब आगूक लेल महत्‍वपूर्ण अछि‍, तँए अनुचि‍त नै‍‍। वएह कमजोरीक सुधार मनुष्‍य बनबैत अछि जे उपन्‍यासक मुख्‍य बन्‍दु छी। साहि‍त्‍यक मुख्‍य अंग आदर्श छी जइ‍सँ रचना कलाक पूर्ति होइत अछि‍।
आदि‍कालेसँ आदि‍वासी‍क रूपमे पनपैत मि‍थि‍लाक समाज आइक वि‍कसि‍त समाजक सीढ़ी धरि‍ पहुँचल अछि‍। जंगली जीवनसँ लऽ कऽ सुसभ्‍य जि‍नगी धरि‍क इति‍हास मि‍थि‍लाक भूमि‍मे चंदनक गाछ सदृश दुनि‍याँक वातावरणमे अपन महमही बि‍लहैत रहल आ अखनो बि‍लहैक सामर्थ रखैत अछि‍। जे हमरा सबहक धरोहर छी तँए बचा कऽ राखब सभसँ पैघ दायि‍त्‍व बनैत अछि‍। जि‍नगीक आवश्‍यकता आ उत्‍पादन करैक जते शक्‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल जि‍नगी बना सामंजस्‍यसँ सभ मिल‍-जुलि‍ अखन धरि‍ रहला अछि‍। आगू बढ़ाएब आइक आवश्‍यकता छी। जइ‍ समाजमे अखनो बरहबरना (बारह-वर्ण) भोज, बरहबरना बरियाती (बि‍आहमे) बरहबरना कठि‍आरीक (जि‍नगीक अंति‍म क्रि‍या) चलैन अछि‍, की‍ आेइ‍ समाजकेँ तोड़ि‍ सासु-पुतोहू, पि‍ता-पुत्रक संबंधकेँ माटि‍क बरतन जकाँ फोड़ि‍-फाड़ि‍ ि‍द। जइ‍ समाजक बीच सभ संग मिलि‍ पावनि‍-ति‍हार, धार्मिक स्‍थानक नि‍र्माण केलनि‍, की ओकरा नस्‍त-नाबूद कऽ दि?
ओना मि‍थि‍लाक दुर्भाग्‍य कही आकि‍ देशक दुर्भाग्‍य, साठि‍ बर्ख पूर्वसँ लऽ कऽ हजारो बर्ख पूर्व धरि‍ परतंत्र रहल। परतंत्रताक जि‍नगी केहन होइ छै, कहब जरूरी नै‍‍। ओना जइ‍ रूपक वि‍देशी प्रभाव आन-आन क्षेत्रमे पड़ल आेइ‍सँ भि‍न्न मि‍थि‍लांचल प्रभावि‍त भेल। अदौसँ अबैत वैदि‍क ढाँचामे सजल समाज अखनो धरि‍, एते दि‍नक गुलामीक उपरान्‍तो सजल अछि‍। मुदा भूमण्‍डलीकरणक प्रभाव जते तेजीसँ प्रभावि‍त कऽ रहल अछि‍ आेइ‍सँ बचैक लेल गंभीर सोचक जरूरत अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ मि‍थि‍लाक सूरत दृश्‍य सामने नाचए लगत। मि‍थि‍लाक संबंध जते पूर्वी प्रान्‍त बंगाल (पछि‍म बंगाल सहि‍त बंगलादेश) आसाम (मेघालय सहि‍त आसाम) आ नेपालक तराइ इलाकासँ रहल ओते पछि‍मी आ दछि‍नी प्रान्‍तसँ नै‍‍ रहल। घनगर अबादी होइबला इलाका रहने मि‍थि‍लाक बोनि‍हार (श्रमि‍क) बोि‍न करए नेपाल, आसाम आ बंगाल जाइत रहल अछि‍। पटुआ काटब, धोअब आ धान रोपब-काटब मुख्‍य काज रहल। जइ‍सँ संग-संग रहैक, खाइ-पीबैक, नचै-गबैक अवसर भेटल। कला-संस्‍कृति‍मे मि‍श्रण भेल। जइ‍सँ एक-दोसराक जि‍नगी मि‍लैत-जुलैत रहल अछि‍।
आजुक संस्‍थागत शि‍क्षण बेवस्‍थाक सदृश तँ संस्‍था कम छल मुदा पूर्वहि‍सँ गुरुकूल शि‍क्षण बेवस्‍थाक चलैन आबि‍ रहल छल। वि‍देशी शासकक संग भाषा-साहि‍त्‍य सेहो आएल। सामाजि‍क बेवस्‍थाक मजबूतीक चलैत ओ ओते तेजीसँ आगू नै‍‍ बढ़ि‍ सकल जते तेजीसँ बढ़क चाहि‍ऐक। ओना राज-काजमे अपन स्‍थान बना लेलक। जनसंख्‍याक (मि‍थि‍लाक) अनुपातमे पढ़ै-लि‍खैक बेवस्‍था नगण्‍य छल। कारण छल अखुनका जकाँ ने पढ़ै-लि‍खैक एते साधन छल आ ने पढ़ैक आवश्‍यकता बुझैत छल, जीबैक लूरि‍ सी ‍ लेब प्रमुख छल, जे परि‍वार (माए-बाप) सँ भेट जाइ छलै। कि‍छु एहनो काज (लूरि‍) छलै जे समाजोसँ भेटै छलै, जइ‍सँ स्‍पष्‍ट रूपे दू भागमे वि‍भाजि‍त छल। पढ़ल-लि‍खल लोकक समाज आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल उत्‍पादक समाज। मुदा समाज हुनके (पढ़ल-लि‍खल) सबहक देखाओल रास्‍तासँ चलैत रहल। पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच संस्‍कृत आ बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोकक बीच अपन बोली (जे बादमे भाषा बनल) चलैत छल। नव-नव शब्‍दक जन्‍म सेहो होइत छल। वैदि‍क संस्‍कृत सेहो जनभाषाक नगीचे छल मुदा धीरे-धीरे परि‍नि‍ष्‍ठि‍त बनैत-बनैत दूर हटैत गेल। जइ‍सँ वि‍शाल जन-समूह संस्‍कृतसँ दूर भऽ गेल। जेकर प्रभाव जन-मानसक जीवनक अानो-आनो अंगपर पड़ल, कला-संस्‍कृतिपर सेहो पड़ल। जइ‍सँ लोक संस्‍कृति सेहो पनपल। संस्‍कृत समाजोन्‍मुखी नै‍‍ भऽ परि‍वारोन्‍मुखी हुअए लगल। समाजक बीच पालि-प्राकृत भाषाक जन्‍म भेल। समाज-सुधारक आ धार्मिक सम्‍प्रदायि‍क जनमानसक बीच पालि‍ भाषाक प्रयोग केलनि‍। ऐ रूपे संस्‍कृतसँ पाि‍ल, अपभ्रंश होइत आगू मुँहे ससरल। अपभ्रंशसँ मागधी आ मागधीसँ बि‍हारी, उड़ि‍या, बंग्‍ला आ असमि‍या भाषाक वि‍कास भेल।
बि‍हारी भाषाक अन्‍तर्गत भोजपुरी, मगही आ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। बि‍हारक मैिथली भाषा क्षेत्रसँ पछि‍म उत्तर-प्रदेशक पुबरि‍या भाग धरि‍ भोजपुरी भाषा बढ़ल। दछि‍न बि‍हार (गंगासँ दछि‍न) मगही आ गंगासँ उत्तर नेपालक तराइ धरि‍ मैथि‍लीक वि‍कास भेल। ओना भाषाक संबंधमे कहल गेल अछि‍ जे- चारि‍ कोसपर पानी बदले आठ कोसपर वाणी।‍ बि‍हारक तीनू भाषा क्षेत्रक अन्‍तर्गत क्षेत्रीय बोली सेहो पनपैत रहल अछि‍।
गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल ि‍बहार, बंगाल आ आसामक बीच माटि‍-पानि‍ आ जलवायुक (कि‍छु वि‍षमता छोड़ि‍) समता सेहो अछि‍। समतल भूमि‍ आ एकरंगाह जलवायु रहने खेती-पथारी, उपजा-बाड़ीमे सेहो समता अछि‍। धान सन प्रमुख अन्न तीनू राज्‍यक मुख्‍य उपज छी। एक रंगाह उपजा-बाड़ी आ खेतीक लूरि‍सँ खेति‍हरक एकरंगाह जि‍नगी बनल। खान-पान, आचार-वि‍चार, चालि‍-ढालि‍, कला-संस्‍कृतिमे एकरूपता आएल। मुदा प्राकृति‍क प्रकोप आ व्‍यापारि‍क अनुकूल भेने बंगाल आ मि‍थि‍लाक दूरी बढ़ौलक। जइ‍ठाम मि‍थि‍ला क्षेत्र पोखरि‍क पानि‍ जकाँ स्थि‍र (कहि‍यो काल पैघ भूमकम आ अन्‍हर-तुफान होइत) बनल रहल तइ‍ठाम बंगाल प्राकृति‍क प्रकोपसँ अधि‍क प्रभावि‍त होइत रहल अछि‍। व्‍यापारि‍क अनुकूलता (समुद्री मार्गसँ) सँ विदेशीक प्रभाव सेहो बढ़ल। कोनो भाषा-साहि‍त्‍य आेइ‍ठामक जि‍नगीसँ प्रभावि‍त होइत। ऐ‍ दृष्‍टि‍सँ जेहन उर्वर भूमि‍ बंगला साहि‍त्‍यकेँ भेटल ओ मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेटल। वि‍देशी कला-संस्‍कृतिक प्रभाव जते बंगालपर पड़ल ओते बि‍हारपर नै‍‍ पड़ल।
ओना मि‍थि‍लांचल प्राकृति‍क प्रकोप आ वि‍देशी शासनसँ ओते प्रभावि‍त नै‍‍ भेल जते बंगाल भेल। मुदा अनुकूल जलवायु रहने मि‍थि‍लांचलमे मनुष्‍यक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल। जइ‍सँ जनसंख्‍याक भार सभ दि‍न रहल। सामंतीक कुबेवस्‍था आ जनसंख्‍याक भारसँ मि‍थि‍लांचल गरीबीक जालमे सभ दि‍न फँसल रहल। जइ‍मे कला साहि‍त्‍य, संस्‍कृति‍ सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत रहल। समाजक स्‍थि‍ति‍केँ आरो भयावह बनबैमे जातीय आ साम्‍प्रदायि‍क योगदान भरपूर रहल। टुकड़ी-टुकड़ीमे समाज वि‍भाजि‍त भऽ गेल। जेकर प्रभाव कला-संस्‍कृतपर सेहो नीक-नहाँति‍ पड़ल अछि‍।
अर्द्ध-मागधीसँ नि‍कलल मैथि‍ली तेरहम-चौदहम शताब्‍दीमे ज्‍योति‍रीश्वरसँ पूर्व‍ वि‍द्यापति‍क रचनासँ प्रारंभ भेल। लोकक कंठ-कंठमे वि‍द्यापति‍ समाए अखनो गाबि‍ रहला अछि‍। एकटा ज्योतिरीश्वरक परवर्ती वि‍द्यापति‍ संस्‍कृत भाषाक राजपंडि‍त छलाह मुदा ज्योतिरीश्वरक पूर्ववर्ती विद्यापति समाजक जनभाषामे लिखलनि। जइ‍‍सँ संस्‍कृत-मैथि‍लीक संग अवहट्ठ (जनभाषा)मे कीर्तिलता आ कीर्तिपताका’ मे परवर्ती विद्यापति सेहो कहलनि‍- सक्कय वाणी बहुअन भावय‍.. उन्नैसम शताब्‍दीसँ पूर्व धरि‍ साहि‍त्‍य सृजन कवि‍तेमे होइत आबि रहल छल। आने-आने भाषा जकाँ मैथि‍ली गद्यक वि‍कास सेहो पछाति‍ भेल। साहि‍त्‍य सृजन मूलत: गद्य आ पद्यमे होइत। गद्यक चरम उपन्‍यास छी तहि‍ना पद्यक महाकाव्‍य।
साहि‍त्‍यक आने वि‍धा जकाँ उपन्‍यासो छी। सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍क दृष्‍टि‍सँ मैथि‍ली उपन्‍यासकेँ १९६०ई.सँ पूर्व आ साठि‍क पछाति‍केँ दू भागमे वि‍भाजि‍त कए आगू बढ़ैत छी। साठि‍क वि‍भाजन रेखाक पाछू देशक आजादी, ढहैत राजा-रजवाड़ आ भूमि‍-आन्‍दोलन प्रमुख कारण रहल अछि‍। साठि‍ ईस्‍वीसँ पूर्व मैथि‍लीमे नि‍म्नलि‍खि‍त उपन्‍यासक सृजन भऽ चुकल छल। ि‍नर्दयी सासु (१९१४), शशि‍कला (१९१५), पूर्ण वि‍वाह (१९२६) दुरागमन रहस्‍य (१९४६), कलयुगी सन्‍यासी (१९२१) रामेश्वर (१९१५), सुमति‍ (१९१८), मनुष्‍यक मोल (१९२४) चन्‍द्रग्रहन (१९३३) कन्‍यादान (१९३३), सोन्‍दर्योपासनक पुरस्‍कार (१९३८), सुशीला (१९४३) असहाया जाया (१९४५), जैबार (१९४६) पारो (१९४६) नवतुरि‍या (१९५६), कुमार (१९४६), भलमानुस (१९४७), कला (१९४६), वि‍कास (१९४६), चन्‍द्रकला (१९५०), प्रति‍मा (१९५०), मधुश्रावनी (१९५६) वीरकन्‍या (१९५०), वि‍दागरी (१९५०), अनलपथ (१९५४), वि‍द्यापति‍ (१९६०), कृष्‍णहत्‍या (१९५७), रत्‍नहार (१९५७), आन्‍दोलन (१९५८), दुर्वाक्षत (१९५८), आदि‍कथा (१९५८), चानोदय (१९५९), बि‍हाड़ि‍ पात-पाथर (१९६०), दुरागमन (१९४५), चामुन्‍डा (१९३३), मालती-माधव (१९३५)आजुक उपन्‍यास कलाक दृष्‍टि‍सँ भलेहि‍ं ऊपर लि‍खि‍त सभ उपन्‍यासकेँ सफले नै‍‍ कहब मुदा ऐ‍‍ बातसँ इनकारो करब जे आेइ‍ उपन्‍यासकार सबहक संगे जेहन सामाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍ छलनि‍ आेइ‍ अनुकूल नै‍‍ अछि‍। हमरा सभकेँ ऐ‍‍ बातक सदति‍ धि‍यान राखए पड़त जे मैथि‍ली भाषा मि‍थि‍ला भूमि‍सँ जन्‍म नेने अछि‍ आ अखनो जीवि‍त अछि‍। पुरान भाषा मैथि‍ली रहि‍तो आइ धरि‍ राजभाषाक रूपमे राज-दरबार नै‍‍ पहुँचल, जे अवसर आइ भेटल, ओ प्रमाणि‍त करैत अछि‍ जे हम जीवि‍त भाषा छी। दुनि‍याँ अनेको एहेन राजभाषा अछि‍ जे मि‍थि‍ला क्षेत्र आ मैथि‍ली भाषासँ छोट अछि‍।
बीसम शताब्‍दीक पूर्वाद्धसँ आरंभ भेल उपन्‍यास साहि‍त्‍य कखनो कुदैत तँ कखनो ठमकि‍-ठमकि‍ चलि‍ अखनो चलि‍ रहल अछि‍। जे माटि‍-पानि‍ बंगला, असामी आ उड़ि‍या भाषा-साहि‍त्‍यकेँ भेट‍लै से मैथि‍लीकेँ नै‍‍ भेट सकलै तँए जँ आेइ‍ सभ साहि‍त्‍यसँ पछुआएल तँ ऐ‍‍मे आश्चर्य की? ओना साठि‍क दशकमे मि‍थि‍लो समाजमे मोड़ आएल मुदा साहि‍त्‍य ठमकले रहि‍ गेल। उपन्‍यास साहि‍त्‍यक वि‍षए-वस्‍तुमे बढ़ाेत्तरी अवश्‍य भेल मुदा जइ‍‍ रूपे हेबाक चाही से नै‍‍ भेल। जि‍नगीक मुख्‍य समस्‍या साहि‍त्‍यक गौण रूपमे आ गौण समस्‍या मुख्‍य रूपमे बनल रहल। मुदा सौभाग्‍यक बात छी जे नव-नव उपन्‍यासकार मि‍थि‍लाक सर्वांगीण रूपकेँ दृष्‍टि‍मे राखि‍ लि‍खि रहलाह अछि‍। ओना मि‍थि‍लाक जे वास्‍तवि‍क रूप अछि‍ ओ अत्‍यन्‍त दयनीय अछि‍। जइ‍‍ बीच रहि‍ साहि‍त्‍य सृजन अत्‍यन्‍त कष्‍टकर अछि‍। मुदा मि‍थि‍ला तँ वएह धरती छी जइ‍‍ठाम एक-सँ-एक ऋृषि‍-मुनि‍ साधना कए अपन दृष्‍टि‍ देलनि‍ जे दुनि‍याँक सभसँ ऊपर अछि‍।
ग्रामीण चि‍त्रण- ग्रामीण शब्‍दक दू अर्थ दू जगहपर होइत अछि‍। समग्र दृष्‍टि‍सँ ग्रामीण शब्‍दक अर्थ क्षेत्र-वि‍शेषक सभ कि‍छुसँ होइछ आ ग्रामीण परि‍धि‍मे (गामक सीमाक भीतर) ग्रामीण शब्‍द सि‍र्फ ग्राममे रहनि‍हार मनुष्‍यसँ होइछ। प्रश्न उठैत ग्राम संग ग्रामीण आकि‍ अगबे ग्रामीण?
ग्राम संग ग्रामीणक संबंध ओतबे नै‍‍ होइत जे हम अमुख ग्राम रहै छी। ग्राम आेइ‍ रूपे ससरैत आगू बढ़ए जइ‍‍ रूपे दुनि‍याँ ससरि‍ रहल अछि‍। जँ से नै‍‍ हएत तँ लोक भागि‍-पड़ा आेइ‍ठाम पहुँचत जइ‍‍ठाम सुगमतासँ सुभ्‍यस्‍त जि‍नगी भेटतै। ग्रामक उत्‍पादि‍त पूँजी माटि‍-पानि‍, गाछ-वि‍रीछ, नदी-नाला इत्‍यादि‍ मनुष्‍यक संग पूरैबला आर्थिक आधार छी। कोनो जुग अबौ आ जाओ, मनुष्‍यक जे मूल-समस्‍या अछि‍ ओ अनवरत रहबे करत। भलेहि‍ं उन्नति‍ भेलापर सुगमता आओत, नै‍‍ भेलापर जटि‍लता आओत। आजुक समैक मांग अछि‍ जे हमरा सबहक आर्थिक आधार ओहन बनए जे एक्कैसम शताब्‍दीक मनुष्‍य कहबैक अधि‍कारी बनी।
अंतमे, जहि‍ना पैघ गहवरमे सैकड़ो जगह पूजा ढारि‍ गोसाँइ खेलल जाइत तहि‍ना आइक समाजक मांग साहि‍त्‍यक अछि‍।

Wednesday, July 30, 2008

जगदीश प्रसाद मण्डल- अवतारवाद

अवतारवाद
जीव आ ईश्वर- जे कि‍यो शरीर धारण करैत आ छोड़ैत, जन्‍म लैत आ मरैत, ओ संसारी जीव होइत अछि‍। मुदा जे सर्वत्र व्‍याप्‍त, सर्वशक्‍ति‍मान, सर्वरक्षक गुणसँ मंडि‍त होइत ओ ईश्वर होइत। शास्‍त्रमे जे लक्षण ईश्वरक देल गेल अछि‍ आेइ‍ अनुसार ओ सबहक प्रति‍पालक सेहो होइत छथि‍। हुनक स्‍वभाव क्रुर भइये ने सकैत छन्‍हि‍। ि‍क तँ ओ महादयालु होइ छथि‍। संगहि‍ ओ सर्वत्र व्याप्‍त छथि‍ तँए कतौ अबै-जाइक जरूरते केना हेतनि‍।
प्रश्न उठैत अछि‍ जे ओ माछ आ काछुक रूप ि‍कअए धारण केलनि‍? ऐ‍ रूपमे एबाक की प्रयोजन भेलनि‍। मत्‍स्‍यावतार लऽ कऽ ि‍कअए शंखासुरक हत्‍या केलनि‍? जे स्‍वयं सर्वपालक सर्वव्‍यापी आ महादयालु छथि‍। हुनका ि‍कअए ककरोसँ द्वेष भेलनि‍? ि‍कअए ओ सुअर बनि‍ ि‍हरण्‍याक्षसँ पृथ्‍वी छीन अपना मुँहमे रखि‍ लेलनि‍। की पृथ्‍वी धीया-पूता खेलैक गेन्‍द सदृश अछि‍ जे ओ मुँहमे रखि‍ इतर पृथ्‍वीपर ठाढ़ भऽ हुनकासँ लड़ैत रहलाह आ अंतमे हत्‍या कऽ देलखि‍न। एतबे नै‍, नरसि‍ंह अवतार लऽ लोहाक खंभा फाड़ि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पेट फाड़ि‍ हत्‍या केलनि‍। की ईश्वर सभसँ पैघ हत्‍यारा छथि‍? वामन रूप धारण कऽ राजा बलि‍सँ तीन‍ डेग जमीन मांगि‍ सौंसे राज्‍य हड़ैप लेलनि‍, की दुनि‍याँमे सभसँ पैघ धोखाबाज वएह छलाह? हन धोखाबाजक आराधना कएलासँ  केहन फल भेटत अपनो वि‍चारि‍ सकै छी। भीख मांगब मायावी, असमर्थ जीबक (मनुष्‍यक) काज छी नै‍ की कर्मठ, ऐश्वर्यवान पुरुषक। ऐ‍ रूपे देखलापर झि‍‍ पड़ैत जे मनक माया, कल्‍पना ओर अज्ञानता सभकेँ भरमा देने अछि‍। ततबे नै‍, परशुराम बनि‍ हैहय-वंशीय क्षत्रिकेँ एक्कैस बेर‍‍ सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍। जहन एकबेर‍ वंश नाश कऽ देलखि‍न तहन दोहरा कऽ कतएसँ फेर क्षत्रि‍ए आबि‍ गेलाह जे दोहरबैत, तेहरबैत एक्‍कैस बेर‍‍ पहुँचि‍ गेलाह। अनन्‍त वि‍श्व- ब्रह्माण्‍डक रचैता ईश्वर दशरथक बेटा राम बनि‍ सीतासँ बियाहो कऽ लेलनि‍ आ हरण भेलापर गाछो-वृक्षसँ कानि‍-कानि‍ पता पुछलथि‍न। बि‍ना ओर-छोड़क समुद्रमे पाथरक पुलो बनबा देलखि‍न। इत्‍यादि‍-इत्‍यादि‍, अनेको प्रश्न वि‍चारणीय अछि‍। हम सभ एक्‍कैसम शताब्‍दीक समर्थ चेतना छी नै‍‍ कि‍ सोलहम शताब्‍दीक बाल चेतना।
जड़-चेतनात्‍मक वि‍श्वसन्‍ताक वास्‍तवि‍क बोध नै‍‍ रहने पहि‍ने ि‍कछु गोटे जगतकर्त्ता ईश्वरक जाल ठाढ़ केलनि‍ आ पछाति‍ अपन स्‍वार्थ सि‍द्ध करए लेल नाना अवतारक कल्‍पना केलनि‍। छल करब, जोर-जबरदस्‍ती करब, यती-सतीक चरि‍त्र भ्रष्‍ट करब, की ईश्वरक काज थि‍क। ई सभ जाल-फरेबी मनुक्‍खक छी। एतबे नै‍‍ ईश्वरक नाओंपर मनुष्‍यक खून सेहो बहाओल गेल अछि‍। सेहो खून सि‍र्फ मानवेत्तर जीवेक नै‍‍ बल्‍कि‍ मूक, मासूम मनुष्‍यक सेहो। धनबल, शरीरबल, वि‍द्याबलादि‍सँ सेहो सदैव गरीब आदमी अत्‍याचारीक शि‍कार बनैत रहल अछि‍। जे अखनो आँखि‍क सोझमे दि‍न राति‍ भऽ रहल अछि‍।
श्रीमद्भागवतक स्‍कन्‍ध-१, अध्‍याय-३, श्‍लोक-५ सँ लऽ कऽ २५म श्‍लोक धरि‍ अवतारवादक व्‍याख्‍या अछि‍। जइमे नि‍म्न प्रकारक चर्चा अछि‍- (१) सनक- सन्नदन, सनातन, सनत्‍कुमार-ब्रह्मचर्य पालनक लेल, (२) सुअर- पृथ्‍वीकेँ रसातलसँ आनबाक लेल, (३) नारद- उपदेशकक लेल, (४) नर-नारायण- तपक लेल, (५) कपि‍ल- सांख्‍य शास्‍त्रक उपदेश देबा लेल, (६) दत्तात्रेय- उपदेश देबा लेल, (७) यज्ञ- रूचि‍प्रजापति‍क पत्नी आकूति‍सँ उत्‍पन्न भेल स्‍वायम्‍भुक मन्‍वन्‍तरक रक्षाक लेल, (८) ऋृषभदेव- परमहंसक आदर्श देखेबा लेल, (९) पृथु- पृथ्‍वीसँ औषधि‍ दोहनक लेल, (१०) मत्‍स्‍य- डूमल पृथ्‍वीकेँ नि‍कालबाक लेल जे शंखासुर वेदकेँ चोरा नेने रहए। जेकरा मारि‍ कऽ मत्‍स्‍य वेदक उद्धार केलक, (११) कच्‍छप- समुद्र मथैमे सहयोगक लेल, (१२) धन्‍वन्‍तरि‍- समुद्रसँ अमृतक घैल लऽ प्रकट भेला, (१३) मोहि‍नी- देवता-दानवक झगड़ा फड़ि‍छबैक लेल, (१४) नृसि‍ंह- हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारए लेल, (१५) वामन- बलि‍केँ ठकैक लेल, (१६) परशुराम-क्षत्रि‍क सामूिहक हत्‍याक लेल, (१७) व्‍यास- वेदक ि‍वभाजन करए लेल, (१८) श्रीराम- रावणकेँ मारए लेल, (१९-२०) बलराम-कृष्‍ण- पृथ्‍वीक भार उताड़ै लेल, (२१) कल्‍कि‍- पृथ्‍वीक भार उताड़ए लेल। ऊपर वर्णित बाइस अवतार संग-संग आन-आन शास्‍त्रमे हंस आ हयग्रीवक चर्चा सेहो अछि‍। सनकादि‍केँ उत्तर देबा लेल हंस आ मधुकैटभक हत्‍याक लेल हयग्रीवक चर्च अछि‍।
सभसँ पहि‍ने अवतारवादक भावना शतपथ ब्राह्मणमे भेटैत अछि‍। जेना ि‍क एच.याकोवी- इनकारनेशन, इन्‍साइक्‍लोपीडि‍या ऑफ रि‍लीजन एण्‍ड इथि‍क्‍स भाग ७१मे लि‍खने छथि‍। संग-संग एम. माेनि‍एर वि‍लि‍यम्‍स- द. वि‍जडम पृष्‍ट ३८१मे सेहो लि‍खने छथि‍। एच.राय चौधरी- अर्लि हि‍स्‍ट्री ऑफ बैष्‍णव सेक्‍टमे पृष्‍ट ९६मे सेहो लि‍खने छथि‍।
शुरूमे वि‍ष्‍णुक अपेक्षा प्रजापति‍क ि‍वशेष महत्‍व छलनि‍। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार प्रजापति‍ए मत्‍स्‍य (१/८/१/१) कूर्म (कौछु) (७/५/१/५) ओर वराहक (१४/१/२/११) अवतार लेलनि‍। प्रजापति‍क बराह रूपक कथाक चर्च तैत्तीरीय संहि‍ता (७/१/५/१) तैत्तरीय ब्राह्मण (१/१/३/६) तैत्तरीय आरण्‍यक (१०/१/८) ओर काठक संहि‍ता (८/१)मे प्रारंभि‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। जेकर चर्च डॉ. कामि‍ल बुल्‍के रामकथा अनुच्‍छेद १४०मे केने छथि‍।
ऐ‍ रूपे देखैत छी जे मत्‍स्‍य, कूर्म वराहक अवतार शुरूमे प्रजापति‍सँ छलनि‍। ि‍कन्‍तु पछाति‍ आबि‍ िवष्‍णुक महत्‍व बढ़लापर तीनूक संबंध ि‍वष्‍णुसँ भऽ गेलनि‍। महाभारतक नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७२) आ (१२/३३७) आ हरि‍वंश पुराण (४/४१)मे बराह आ वि‍ष्‍णुक संबंध मानि‍ लेल गेल। आगू आबि‍ तीनूक नाओंसँ एक एकटा महापुराण सेहो लि‍खल गेल। जइ‍मे तीनूक संबंध वि‍ष्‍णुसँ कए देल गेल अछि‍।
वामनावतार आ नृसि‍ंह अवतार शुरूहेसँ ि‍वष्‍णुसँ संबंधि‍त अछि‍। वामनावतारक चर्चा तैत्तीरीय संहि‍ता (२/२/३/१) शतपथ ब्राह्मण (१/२/५/५) तैत्तीरीय ब्राह्मण (१/७/१७) ओर ऐतरेय ब्राह्मण (६/३/७) मे भेल अछि‍। नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७३) ओर हरि‍वंशपुराण (१/४१) मे सेहो उल्‍लेख अछि‍। ि‍वष्‍णु पुराणमे (१/१६) नृसिहक कथाक वर्णन सेहो अछि‍।
शुरूमे परशुरामक अवतार वि‍षयक कथाक चर्च नै‍‍ भेटल अछि‍। मुदा नारायणी उपाख्‍यान (१२/३२६/७७) हरि‍वंश पुराण (१/४१/११२/१२०) आ वि‍ष्‍णु पुराण (१/९/१४३) मे वि‍ष्‍णुक अवतार मानल गेल अछि‍।
ऐ‍ रूपे प्राचीन साहि‍त्‍यमे अवतारवादक चर्चा होइतो वि‍शेष पूजाक चलनि‍ नै‍‍ भेल आ ने वि‍ष्‍णुक प्रधानते भेल रहए। कृष्‍णावतारक संग अवतारवादक ि‍वकासमे महत्‍वपूर्ण परि‍वर्तन प्रारंभ भेल। आेइ‍ समैसँ अवतारवाद भक्‍ति‍भावसँ जुड़ि‍ फुलैत-फड़ैत आजुक रूप धेने अछि‍।
वासुदेव कृष्‍ण भागवतक इष्‍टदेव छलाह। शुरूमे ि‍वष्‍णुक संग हुनक संबंध नै‍‍ छलनि‍। हेमचन्‍द राय चौधरीक अनुसार तेसर शताब्‍दी ई.पू. वासुदेव कृष्‍ण आ वि‍ष्‍णुक अभि‍न्नताक भावना उत्‍पन्न भेल।
अवतारवादक प्रक्रि‍यामे बौद्धधर्म जुड़ि‍ गेल। बौद्धधर्म आ भागवत सम्‍प्रदायक भक्‍ति‍मार्ग समान रूपसँ ब्राह्मण साहि‍त्‍यक कर्मकांड आ यज्ञ प्रधान धर्मक प्रति‍क्रि‍याक रूपमे उत्‍पन्न भेल आ वि‍कास केलक। जइ‍ कारणे धर्मक क्षेत्रमे ब्राह्मणक एकाधि‍कार ढील भेल। बौद्ध धर्मक अधि‍काधि‍क प्रचार-प्रसार देखि‍ भागवत समर्थक अपना दि‍सि‍‍ आकर्षित करए लेल भागवतक इष्‍टदेव वासुदेव कृष्‍णकेँ ि‍वष्‍णु-नारायणक अवतार मानि‍ लेलनि‍। तैत्तीरीय आरण्‍यक (१०/१/६)मे वासुदेव आ ि‍वष्‍णुक अभि‍न्नताक चर्च सभसँ पहि‍ने भेल अछि‍।
ऐ‍सँ अवतारवादककेँ भरपुर बल भेटल। संग-संग ि‍वष्‍णुक महत्‍व  सेहो बढ़ए लगल। जइसँ अवतारवादक पूर्ण भावना रसे-रसे ि‍वष्‍णु-नारायणमे केन्द्रि‍त हुअए लगल। आ वैदि‍क साहि‍त्‍यक आन-आन अवतारक क्रि‍या-कलाप वि‍ष्‍णुमे आरोपि‍त भऽ गेल।
एक दिसि‍ अवतारवाद बढ़ि‍ रहल छल तँ दोसर दिसि‍ रामक आदर्श चरि‍त्र जनमानसक बीच प्रबल भऽ रहल छल। रामायणक संग-संग रामक महत्‍व सेहो तेजीसँ बढ़ि‍ रहल छल। रामक वीरताक वर्णनमे अलौकि‍कताक मात्रा सेहो बढ़ए लगल। एक दिसि‍ रावण पाप आ दुष्‍टताक प्रतीक बनि‍ जनमानसक बीच आएल तँ दोसर दिसि‍ पुण्‍य आ सदाचारक प्रतीक राम बनलाह। जेकर फल भेल जे कृष्‍णे जकाँ रामो ि‍वष्‍णुक अवतारक श्रेणीमे आबि गेलाह। भरि‍सक पहि‍ल शताब्‍दी ई. पूर्वेसँ राम ि‍वष्‍णुक अवतार मान जा लगलाह। महाभारतक संग-संग वायु, ब्रह्माण्‍ड, वि‍ष्‍णु, मत्‍स्‍य, हरि‍वंश इत्‍यादि‍ पुराणमे अवतारक तालि‍कामे राम सेहो छथि‍।
अवतारवादक पहि‍ल कल्‍पना शतपथ ब्राह्मणमे अछि‍। जे ईसासँ एक हजार वर्ष पूर्वक रचना मानल जाइत अछि‍। शतपथ ब्राह्मणमे कहल गेल अछि‍ जे प्रजापति‍ये माछ, कछुआ आ सूअरक अवतार धारण केलनि‍। जे शुद्ध कल्‍पनाश्रि‍त झि‍‍ पड़ैत अछि‍।
वामन अवतारक कल्‍पना तैत्तीरीय संहितामे अछि‍। हजार वर्ष पूर्व एकरो रचना मानल जाइत अछि‍। ओना वामन अवतारक कल्‍पना ऋृग्‍वेदक प्रथम मंडलक बाइसम सूक्‍तक अंति‍म (१६/२१) छह मंत्रसँ सेहो उद्भुत मानल जाइत अछि‍। इदं वि‍ष्‍णुवि‍चि‍क्रमे त्रेधा ि‍नदधे पदम। समूलमस्‍य पांसुरे। त्रीणि‍ पदा वि‍चक्रमे वि‍ष्‍णुर्गोपा अदाभ्‍य: अतो धर्माणि‍ धारयन्। (ऋृग्‍वेद- १/१२/१७-१८) टीका रामगोवि‍न्‍द ि‍त्रवेदी। वि‍ष्‍णु सूर्यक प्रतीक छथि‍। हुनक ि‍करण पएर ि‍छयनि‍। पृथ्‍वी, अंतरि‍क्ष आ द्युलोकमे कि‍रण माने रोशनी पड़ब तीन पएर पड़ब छि‍यनि‍। जे प्राय: सभ वैदि‍क जनै छथि‍। मुदा पाछू आबि‍ ऐ‍ सूत्रकेँ कथा गढ़ि‍ ि‍वष्‍णु वामनक कथा बनि‍ गेल अछि‍। कथा अछि‍ ि‍वष्‍णु वामन बनि‍ राजा बलि‍केँ ठकि‍ कऽ तीन डेग भूमि‍ मांगि‍ सौंसे राज्‍ये नापि‍ लेलनि‍। प्रश्न उठैत जे एहेन-एहेन ठककेँ जनमानस केना ईश्वर मानि‍ लेलक‍? पुराणक अनुसार ि‍वष्‍णुु इन्‍द्रक छोट भाए कहल गेल छथि‍। जे अपन जेठ भाय इन्‍द्रक गद्दी स्‍थापि‍त करए लेल बलि‍केँ धोखा देलनि‍।
मत्‍स्‍य, कच्‍छप, वराह, नृसि‍ंह, वामन, परशुराम इत्‍यादि‍ जे कि‍यो अवतारक श्रेणीमे एलाह, ि‍कयो पूजनीय नै‍‍ भऽ सकलाह। अवतारक अंति‍म छोरपर उदि‍त रामे आ कृष्‍णेटा पूजनीय भेलाह।
वस्‍तुत: श्रमणक (बौद्ध-जैन) उत्तारवादक प्रति‍क्रि‍यामे अवतारवादक कल्‍पना भेल। महावीर आ बुद्धदेव महापुरुष छलाह। (उत्तारक अर्थ-सामान्‍य जीवकेँ दोसरसँ ऊपर उठब होइत अछि‍ जखन कि‍ अवतारक अर्थ महान सत्ताकेँ ऊपरसँ नि‍च्‍चाँ उतरब होइत अछि‍)। अवतारवादक परम्‍पराक अनुसार परमात्‍मा उतरि‍‍ कऽ साधारण मनुष्‍य बनि‍ गेलाह। पहि‍ने कृष्‍णकेँ अवतार मानल गेलनि‍। जि‍न‍कर पूर्ण वि‍कास गीताक कृष्‍णवतारमे भेलनि‍। ताधरि‍ राम अवतारक श्रेणीमे नै‍‍ आएल छलाह। केवल धनुर्धारी वीर मानल जाइत छलाह। गीताकार कृष्‍णक मुँहसँ रामक संबंधमे कहबौलनि‍- राम: शस्‍त्रभृतामहम।
साक सौ वर्ष पूर्व धरि‍ चारू भाँइ रामकेँ वि‍‍ष्‍णुक अंशावतारे मानल जाइत छल‍ि‍न। रामक पूर्ण परब्रह्म ईसाक बाद अध्‍यात्‍म रामायणसँ शुरू भेल। ऐ‍ रूपे अवतारवादक गुन्‍जाइस माने अँटावेश वेदमे नै‍‍ पछाति‍ भेल।
प्रश्न उठैत जे अवतारवाद की थि‍क?
वि‍श्व अनंत देश आ काल-व्‍यापी अछि‍। वि‍श्वक मुख्‍य दू घटक-जड़ आ चेतन अछि‍। ओइमे अपन-अपन गुण-धर्म नि‍हि‍त अछि‍। ज‍सँ जगतक बेवस्‍था अनादि‍कालसँ अबाध गति‍ए चलि‍ रहल अछि‍। ऐ‍सँ  हटि‍ दोसर ईश्वरक कल्‍पना तथ्‍यसँ अलग हएब अछि‍। कहल गेल अछि‍ जे शंखासुर नामक राक्षस छलाह। ओ ब्रह्मा अोइ‍ठाम पहुँचि‍ वेद चोरा कऽ समुुद्रमे नुका कऽ रखि‍ लेलक। जेकरा पुन: प्राप्‍त  करए लेल वि‍ष्‍णु मत्‍स्‍यावतार धारण कए समुद्रमे शंखासुरकेँ मारि‍ वेद लऽ अनलनि‍। प्रश्न उठैछ- कि‍ ईश्वरक काज हत्‍या करब थि‍क? जे सर्वज्ञ, दयालु छथि‍ हुनकर हने कि‍रदानी हेतनि‍। ओ तँ अपना सत्‍प्रेरणासँ ककरो बदलैत छथि‍। एहि‍ना हि‍रण्‍याक्षक संबंधमे सेहो अछि‍। हि‍रण्‍याक्ष पृथ्‍वीकेँ चोरा कऽ टट्टीमे नुका रखलक। जेकरा वि‍ष्‍णु सुअरक अवतार लऽ थुथुनसँ पृथ्‍वीकेँ टट्टीसँ नि‍कालि‍, ि‍हरण्‍याक्षकेँ माि‍र ऊपर अनलनि‍। जइसँ पृथ्‍वीक उद्धार भेल। प्रश्न उठैछ- जखन पृथवीक चोरि भऽ गेल तँ ओकरा राखल कतए गेल। अपन गुरुत्‍वाशक्‍ति‍सँ पृथवी स्‍वयं धारि‍त अछि‍।
हने कथा हि‍रण्‍यकश्‍यपु आ प्रह्लादक सेहो अछि‍। प्रह्लाद वि‍ष्‍णुक भक्‍त रहथि‍ जे हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ पसि‍न नै‍‍ रहनि‍। जइसँ बान्‍हि‍ देलखि‍न। प्रह्लादक दुख देखि‍ ईश्वर (वि‍ष्‍णु) नर आ नारायणक ि‍मश्रि‍त रूप बना खूटा फाड़ि‍ कऽ नि‍कलि‍ हि‍रण्‍यकश्‍यपुकेँ मारलनि‍। प्रश्न उठैछ- एक प्रह्लादक लेल ईश्वर खूँटा फाड़ि‍ नि‍कललाह मुदा, चंगेज खाँ, नादि‍रशाह, ि‍मलाबटखोर, जमाखोर, घूसखोर शोषकक लेल नि‍न्न नै‍‍ टुटैत छन्‍हि‍?
वामन रूप बनि‍ बलि‍सँ भीख मंगलनि‍। भीख मांगब, छल करब मायावी मनुक्‍खक काज छी ने कि‍ ईश्वरक। जखन परशुराम हैहय क्षत्रि‍ए वंशक सामूहि‍क हत्‍या केलनि‍ तँ फेर दोहरा-तेहरा, एते तक ि‍क एक्‍कैस बेर‍‍ कऽ केकर हत्‍या केलनि‍। जँ एहेन-एहेन हत्‍यारा ईश्वर होथि‍ तँ अपराधी ककरा कहबै?
अनंत वि‍श्वव्‍यापी जगत स्रष्‍टा ईश्वर (राम) दशरथक बेटा बनि‍ सीतासँ बि‍आह करए औताह। ततबे नै‍‍ हरण भेलापर कानि‍-कानि‍ गाछ-वृक्ष सभकेँ पता पुछथि‍न। गाए-चरबए लेल कृष्‍ण वृन्‍दावन आबि‍ नारी संग रास करए औताह। की यएह लक्षण ईश्वरक वेद कहैत अछि‍?
वि‍श्वमे मुख्‍य दू तत्‍व-जड़ आ चेतन अछि‍। जेकरा पुराकालसँ सांख्‍य दर्शन प्रकृति‍ आ पुरुष कहैत आएल अछि‍। जड़ प्रकृति‍मे अनेक तत्‍व अछि‍। जे सभ अनादि‍-अनंत अछि‍। ओइमे अपन-अपन स्‍वभाव सि‍द्ध गुण-धर्मक क्रि‍या, ओकर सम्‍पत्ति‍ छि‍ऐ। जइ‍सँ सृष्‍टि‍ नि‍रंतर वि‍द्यमान रहैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ पुरबा आकि‍ पछबा हवा जे बहैत अछि‍, ओकरा ि‍कयो पू आकि‍ पछि‍म जा कऽ ठेलैत अछि‍ आकि‍ अपन दबाबक नि‍मक अनुसार हवा स्‍वयं चलैत अछि‍। तहि‍ना बरखो होइत अछि‍। पानि‍ बरि‍सैक जे प्राकृति‍क नि‍अम छै, अनुकूल भेलापर बरखा होइत अछि‍। प्रकृति‍ जड़ छी। ओ ई नै बुझैए जे रौदी, कम बरखा आकि‍ बेसी बरखा ककरो नोकसान करत आकि‍ लाभ पहुँचाओत।
एक दिसि‍ १९८७ ईं.क पानि‍ (बरखा) मि‍थि‍लांचलकेँ दहा देलक तँ दोसर दिसि‍ राजस्‍थान, गुजरात, उड़ीसा इत्‍यादि‍ राज्‍यमे रौदी भऽ गेल। की एहने काज सर्वज्ञ, दयालु आ सर्वशक्‍ति‍मान ईश्वरक छि‍यनि‍?
झरनासँ पानि‍ नि‍कलब, धार बहब कि‍ ईश्वरेक प्रेरणासँ होइत अछि‍। चान, सुरूज, तरेगण हुनके माने ईश्वरेक कृपासँ चमकैत अछि‍। फूल वएह फुलबैत छथि‍। अजी-अजी अंधवि‍श्‍वासू कल्‍पना ठाढ़ कऽ अज्ञानी मनुष्‍यकेँ अदौसँ चालबाज सभ लुटैत आएल अछि‍!
जे मनुष्‍य ज्ञान अर्जन कऽ पवित्र आचरण बना स्‍वरूप स्‍थि‍ति‍ प्राप्‍त कऽ लैत वएह ऐ‍ जीवनकेँ सार्थक बना मुक्‍ति‍क अधि‍कारी बनैत छथि‍। जनि‍का लेल अलगसँ कोनो कल्‍पि‍त ईश्वरक प्रयोजन नै‍‍ छन्‍हि‍।
बीजकमे कबीर कहै छथि‍- ज्ञान हीन कर्ताकेँ भरमें, माये जग भरमाया।
छल करब, बलपूर्वक ककरो धन-इज्‍जत लुटब, ई सभ संसारी मनुष्‍यक काज छी नै कि‍ ईश्वरक। यती, सती-पति‍व्रता एवं सत्‍य बजनि‍हार आ सत्‍य बाटपर चलनि‍हारकेँ पथ-भ्रष्‍ट करब, पति‍त बनाएब, की‍ ई सभ वि‍वेकवान मनुष्‍यक काज छी? अवतारक संबंधमे कबीर कहने छथि‍- ‘दश अवतार ईश्वरी माया, कर्ता कै जि‍न पूजा। कहहि‍ं कबीर सुनो हो सन्‍तो, उपजै खपै सो दूजा।’ अर्थात् दस या चौबीस अवतारक कल्‍पना ईश्वरीए माया छी। आेइ‍ कल्‍पि‍त अवतारक पूजा करब, सत्‍यज्ञानसँ रहि‍त मनुष्‍यक काज छी। जहि‍ना अवतार तहि‍ना अवतारी माने ईश्वर, दुनू लोकक मनक कल्‍पना छी। ि‍कएक तँ जन्‍म आ मृत्‍य जगतक कर्ताकेँ केना भऽ सकैत अछि‍।
चौबीस अवतारमे श्रीराम, कृष्‍ण, महात्‍मा बुद्ध इत्‍यादि‍ ऐति‍हासि‍क महापुरुष छथि‍। बाकी सभ काल्‍पनि‍क थि‍क। ओना अवतार तँ उतरब आ जन्‍म लेबकेँ कहल जाइत अछि‍, जे प्राय: कर्मी जीवके होइत अछि‍।
अवतारवाद मनुष्‍यमे हीनभावनाक जन्‍म दैत अछि‍। जँ से नै‍‍ तँ देश आ धर्मपर संकट एलापर अवतारी ि‍कए ने नि‍वारण करैत अछि‍।  जखन वि‍धर्मी सोमनाथक मंदि‍र लूटि‍ लेलक तखन पुजेगरी सभ ि‍कए मुँह तकैत रहि‍ गेल। ि‍कए ने ईश्वरकेँ पुकारि‍ बचौलक।
ताधरि‍ मनुष्‍य उन्‍नति‍ नै‍‍ कऽ सकैत अछि‍ जाधरि‍ ओ ई नै‍‍ बुझत जे धरतीपर मनुष्‍य सभसँ बलशाली अछि‍। ईश्वर, देवी-देवता, अवतारक कल्‍पना मनुष्‍यक आेइ‍ अंधकार मस्‍ति‍ष्‍कमे जन्‍म लैत अछि‍ जइमे ओ अपन दुर्बलताकेँ संयोगि‍ अवकाशक सास लैत अछि‍। वस्‍तुत: आत्‍मा जखन महात्‍माक रूपमे वि‍कसि‍त होइत तखन परमात्‍मा स्‍वयं बनि‍ जाइत अछि‍। काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्‍यादि‍ दुर्गुणपर जखन मनुष्‍य वि‍जय पाबि‍ जाइत अछि‍ तखन अपने-आपमे ईश्वर, परमात्‍मा, दैव आ ब्रह्मक रूप देखए लगैत अछि‍।
श्रीमद्भागवत-
दरि‍द्रो यस्‍त्‍वसन्‍तुष्‍ट: कृपणो योऽ जि‍तेन्‍द्रि‍य:।
गुणेष्‍वसक्‍तधीरीशो गुणसंगे वि‍पर्यय: /११/१९/४४
जेकरा चि‍त्तमे असन्‍तोष अछि‍ वएह दरि‍द्र छी। जे ि‍जतेन्‍द्रि‍य नै‍‍ अछि‍ वएह कृपण छी। समर्थ, स्‍वतंत्र आर ईश्वर वएह छथि‍ जि‍नकर चि‍त्त-वृत्ति‍ ि‍वषए-भोगमे आसक्‍त नै‍‍ छन्‍हि‍। अहीक वि‍परीत जे वि‍षयमे आसक्‍त अछि‍ वएह सोलहन्‍नी पापी छी।

Monday, August 9, 2004

समदिया पूनम मंडल आ प्रियंका झाक मैथिली न्यूज पोर्टल।

समदिया

पूनम मंडल आ प्रियंका झाक मैथिली न्यूज पोर्टल।




1

१९९० ई. मे सी.एन.एन. टेलीविजन इराकपर हमलाक रिपोर्टक देमऽ लागल, इराकक कुवैतपर हमलाक रिपोर्ट। फोन बूथ जकाँ टी.वी. चैनल भऽ गेलै आ सभकेँ प्रचार भेटै छै।
2
हिजली कैम्प जेल खड़गपुर खाली पड़ल छल, ओतै आइ.आइ.टी. खुजल १९५० ई. मे। १९६१ ई. मे कोलकातामे पहिल आइ.आइ.एम., विश्वविद्यालयसँ बाहर नीक पढ़ाइक आरम्भ।
3
सरकारी कम्पनी सभ प्राइवेट हेबऽ लागल। सरकारी कम्पनीमे दरमाहा बन्द, टाटा सीमेन्टकेँ लाफार्ज द्वारा किनलासँ सभ बमबम भऽ गेल। डालमियानगर महावीर डल्डाबलाक बेटी जमाए साहित्यिक पुरस्कार खोललक, मुदा ओ दोसर बियाह 4
केरलक ६८ बर्खक बूढ़ी आयशा साक्षर भेली आ केरल पूर्ण साक्षर भऽ गेल १९९१ ई. मे।
4
टाटा- पारम्परिक बिजनेस परिवारमे गनल जाइ छल। मुदा आब अपनासँ चारि गुणा पैघ स्टील फैक्ट्री कोरसकेँ टाटा स्टील किनलक।
5
२००१ ई. मे कलकत्तामे बिगबजार मॉल पहिल एहेन प्रयोग छल।
6
सरकारी बैंक हिन्दू विकास दर ४ प्रतिशत। मुदा फेर गाछबला फाइनेन्स आ आन फाइनेन्स कम्पनी सभ सभटा पाइ लऽ कऽ भागल।
7
बोफोर्स १९८७ ई.। स्वेडिश रेडियो, चित्रा सुब्रह्मण्यम आ एन.रामक द हिन्दूक रिपोर्ट।
8
जेनरल टिक्का खानक अत्याचार पू. पाकिस्तानमे आ अमेरिकन डिप्लोमेट आर्चर ब्लडक अपन देशकेँ झारब। मानेकशाँ – कराची- पी.एन.एस. खिबेर आ आर चारिटा पाकिस्तानी जहाजकेँ डुमेलक; बंगालक खाड़ीमे पी.एन.एस. गाजीकेँ डुमेलक। मुदा मुजीबुर्रहमान चकमा हिन्दूकेँ सतेलक, पाकिस्तान दुश्मन भऽ गेल। कश्मीर समस्या तकर बादे बढ़ल।
9
१९६२ मे मात्र २६०० लोक मरल, युद्धमे ३००० सँ ऊपर तँ मरबाके चाही। लद्दाख पश्चिममे आ तवांग पूबमे भारतपर आक्रमण।
10
आपातकाल- ट्रेन टाइमसँ अबै छल, हम सत्ता छिनेलाक बाद सेक्यूलर नै बनै छी, २१ मास आपातकाल।
11
नक्सलबारी गाम (उत्तर बंगाल, दार्जिलिंग)- गाम बला सभ एकटा जमीन्दार आ पुलिस निरीक्षककेँ मारि देलक, पुलिस ९ टा युवाकेँ मारलक आ दूटा बच्चाकेँ सेहो। कास्तकारकेँ जमीन देबाक मांग छल ई।
12
बाबरी मस्जिद १९९२ दिसम्बर।
13
१९९९- गीता हरिहरन लेखिका केस जितलन्हि आ अपन बच्चाकेँ अपन उपाधि देलनि। १९८६- शाहबानो।
14
१९९८ मे १३ मास आ फेर कारगिलक बाद १९९९ मे बी.जे.पी. पाँच साल।
15
अन्नादुरै- १९६७ मे डी.एम.के. तमिलनाडुमे जीतल, पेरियारसँ टूटि कऽ द्रविड़ कजगमसँ अलग भेलाह। पेरियार स्वतंत्रताकेँ ब्राह्मण आ उत्तर भारतक परतंत्रतासँ जोड़ै छलाह। १९६५ ई.- हिन्दी विरोधी आन्दोलन।
16
आतंकवाद- १९९१ राजीव गाँधी, श्री पेरम्बदूर, डरि गेलहुँ हम जे फेरसँ सिखक विरुद्ध ने आक्रमण होमए लागए। एल.टी.टी.ई. थेनमोझी राजारत्नम प्रसिद्ध धानु छल आत्मघाती हमला करैबला, कारण ई सभ कैमरामे रेकॉर्ड भऽ गेल, कैमरामेन मरि गेल। १९८४- इन्दिरा गाँधी २५ बुलेट स्टेनगनसँ सतनाम आ ५ बुलेट बेअंत।
17
मण्डल कमीशन, ११ टा आधार, सामाजिक ३ अंक, शैक्षिक २ अंक आर्थिक १ अंक।
५० प्रतिशत वा अधिकबला जाति बैकवर्ड।
18
क्रिकेट कमेन्टरी १९८३- आइ.सी.एल., आइ.पी.एल.
19
भोपाल २ दिसम्बर १९८४ क राति- २५००० लोक मुइल।
20
वाइ.टू.के. सभटा कम्प्यूटर बन्न भऽ जाएत। विप्रो, इन्फोसिस, टी.सी.एस. बढ़ल। २०००=००=१९००; काज बाहरसँ आएल।
21
अन्तर्जाल भारतमे वी.एस.एन.एल. १५ अगस्त १९९५
22
ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम
23
अमूल प्रयोग कॉपरेटिव आन्दोलनक सफलता।
24
न्यू योर्कर पत्रिका- १९९७- भारतक अंग्रेजी- सलमान रस्दी, अमिताव घोष, अब्राहम वर्गीस, गी.वी.देसानी, रुथ प्रावर झाबवाला।
25
महेश योगी आ बीटल्स- ट्रांसेन्डेन्टल मेडीटेशन, ऋषिकेष। रजनीश- १९७० दशक पुणे। प्रभुपाद- इस्कोन- लॉर्ड कृष्ण।
26
सचिन तेन्दुलकर- क्रिकेट आइकॉन।
27
एशियाड- अप्पू, अप्पू परफॉर्म नै करत।
28
ए.आर.रहमान- (धर्म परिवर्तनसँ पहिने दिलीप) संगीत क्रान्ति।
29
राजश्री प्रोडक्शन, लो बजट पारिवारिक फिल्म।
30
एम.एफ. हुसैन, तीजन बाइ, “अपना उत्सव”
31
“नवोदय विद्यालय”राजीव गाँधी- सभ जिला मे। तमिलनाडु मना केलक, कारण ओतए एकरा हिन्दीकेँ बढ़ावा दै बला कदमक रूपमे देखल गेल, तकर बदला ओतए दोसर स्कूल राज्य स्तरपर सभ जिलामे खोलल गेल।

(साभार गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक विदेह www.videha.com)




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