Friday, January 9, 2009

पछताबा - जगदीश प्रसाद मण्डल



इंजीनियरिंगक रिजल्ट निकलितहि रघुनाथ संगी-साथीक संग नोकरी करए अमेरिका जेबाक तैयारी कऽ नेने छल। सासुरसँ गाम आबि पिताकेँ कहलनि- ‘‘बाबू, आइये रौतुका गाड़ी पकड़ि चलि जाएब। परसू दस बजे, सुभाषचन्द्र एयरपोर्टसँ जहाज फ्लाइ करत।’’
  जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछपर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। अचंभित होइत कहलखिन- ‘‘किए? तोरा जोकर काज अपना ऐठाम नहि छै?’’
  पिताक बात सुनि कनेकाल गुम्म भऽ रघुनाथ बाजल- ‘‘ओहिठाम अधिक दरमाहा दैत अछि। संगहि अपना ऐठामक रुपैआसँ ओतुका रुपैइयो महग छैक।’’
  अमेरिकाक संबंधमे शिवनाथ किछु नहि जनैत खाली एतबे जनैत जे ओहो एकटा देश छी। किछु काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘‘तइसँ की? हम ओहि वंशक छी जे देशक गुलामी मेटबए लेल गोली खाए स्वतंत्र देशक उपहार-भार देलनि। तोरा सन-सन पढ़ल-लिखल जँ देशसँ चलि जाएत तँ तोहर सनक काज के करत, कोना हएत?’’
  पिताक बातकेँ अनसून करैत गोर लागि, बैग लऽ ओ चुपचाप विदा भऽ गेल। शिवनाथ दुनू परानीक नजरि ताधरि रघुनाथक पीठपर रहलनि जाधरि ओ गाछीक अढ़ नहि भऽ गेल। अढ़ होइतहि दुनूक मन एहि रुपे चूर-चूर भऽ गेलनि जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। अखन धरि दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फुटल बैलूनक हवा जेकाँ वायुमंडलमे मिलि गेलनि। बाढ़िक पानिमे डूबल खेतमे जहिना पानि सुखितहि नव-नव पौधाक अंकुर उगए लगैत अछि  तहिना शिवनाथोक मनमे नव-नव विचार उगए लगलनि। अखन दुनियाँ भलेहीं गामे-घरक रुपमे कि‍एक नहि बुझि पडै़त हुअए मुदा बापो बेटाक दूरी हजारो कोस हटि रहल अछि। की हम सभ फेर गुलामीक रस्ता पकड़ि रहल छी आकि आजादीक रस्ता धऽ चलि रहल छी। एक दिशि‍ मातृभूमिक लेल पिताक तियाग आ दोसर दिसि बेटाक भटकल रस्ता अछि। भलहीं बेटाक आशा हुअए मुदा एहनो लोक तँ छथि जनिका बेटा नहि छन्हि। मन पड़लनि पिताक ओ बात जे मृत्युसँ चौबीस घंटा पहिने मृत्यु-सय्यापर कहने रहथिन - ‘‘बाउ, हमर खून वीरक खून छी जे भारतमाताकेँ चढ़ौलिएनि। भलेहीं अखन लड़ाइक दौड़ अछि मुदा ओ खून स्वतंत्रता लइएकेँ छोड़त। तोँ सभ स्वतंत्र देशक स्वतंत्र मनुष्य हेबह। तेँ अपन देशकेँ परिवार बुझि सभकेँ भाए-बहीनि जेकाँ इमानदारीसँ सेवा करैत रहिहऽ। जाहिसँ हमर आत्मा अनबरत प्रसन्न रहत। सेवाक मतलब खाली एतबे नहि होइत जे देशक सीमाक रक्षा करैत अछि बल्कि ईहो होइत जे माथपर ईंटा उघि सड़क बनबैत आ हर-कोदारिसँ अन्न उपजबैत अछि।’’
  पिताक बात मन पड़ितहि शिवनाथक हृदय तरल पानिसँ ठोस पाथर बनए लगलनि। नव-नव विचार मनमे जागए लगलनि। पत्नीक खसल मन देखि कहलखिन- ‘‘अहाँ, एते सोगाएल किए छी?’’
  आँचरक खूँटसँ दुनू आँखिक नोर पोछि रुक्मिणी कपैत अबाजमे बजलीह- ‘‘की सपना मनमे रहए आकि देखि रहल छी। जँ से बुझितिऐक तँ एत्ते देहकेँ किए धौजनि करितहुँ। नढ़िया-कुकुड़ जेकाँ अनेर छोड़ि दैतिऐक।’’
  पत्नीक व्यथा सुनि शिवनाथक हृदय पसीज गेलनि। मुदा अपन व्यथाकेँ मनमे दबैत मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ कर्तव्यनिष्ठ रहल। अपन कर्तव्य इमानदारीसँ निमाहलहुँ। सभकेँ अपना-अपना आशापर अपन जिनगी ठाढ़ कऽ जीबाक चाही। जहिना बरखाक एक-एक बुन्न रस्ता धए चलैत-चलैत अथाह समुद्रमे पहुँच जाइत अछि तहिना अपनो सभ अपन काजकेँ परिवारसँ आगू बढ़ा समाज रुपी समुद्रमे फेटि दी। बेटा अछि तेँ बेटापर अपन भार देमए चाहैत छलहुँ  मुदा जनिका अपना बेटा नहि छन्हि ओ ककरापर अपन भार देथिन। तेँ अपनो सभ वएह बुझू! बाबूजी एते अरजि कऽ दऽ गेलथि जे इज्जतक संग हँसैत-खेलैत जिनगी जीबैत रहब।’’
सन् १९४२क असहयोग आन्दोलनसँ सुनगति-सुनगति सौँसे देश पजरि गेल। जइमे मिथिलांचलोक योगदान ककरोसँ कम नहि अछि। दसकोसी लोकक मन एत्ते उत्साहित भऽ गेलनि जे चान-सूर्जमे आजादीक झंडा फहराइत देखथि। सुतली रातिमे ओछाइनपर सँ चहा कऽ उठि नारा लगबैत सड़कपर आबि जाइत छलाह। जे मिथिला याज्ञवल्क्य, गौतम, नारद सन-सन ऋषि पैदा केलक ओ पंचानन झा आ पुरन मंडल सन वीर अभिमन्यु सेहो पैदा केने अछि। दसकोसीक वीर सिपाही माथमे कफन बान्हि, लाठीमे झंडा फहरा झंझारपुर सर्कल, रेलवे स्टेशन आ पोस्ट आफिसमे आगि लगबैक संग-संग रेल-लाइन तौड़ै लेल सर्कलक मैदानमे एकत्रित भेलाह। अंग्रेज पलटनक केन्द्र सर्कल छलैक। आन्दोलनकारीकेँ एकत्रित होइत देखि ओहो सभ अपन बन्दूकमे गोली भरि-भरि तैयार भऽ गेल। आन्दोलनकारी भारत माताक नारा जगबैत आगू बढ़ल। अनधुन गोली पलटन सभ चलौलक। एक नहि अनेक गोली पंचानन आ पुरनक छातीमे लगलनि। दुनू गोटे नारा लगबैत दम तोड़ि देलनि। सिर्फ दुइये टा गोटेकेँ गोली नहि लागल छलनि, अनेको गोटे गोलीसँ घाएल भेलाह। ओहि घाएलमे शिवनाथक पिता देवनाथो छलाह। दहिना जाँघमे गोली लागल छलनि। गोली तँ जांघक माँस, चमराकेँ कटैत हड्डी तोड़ैत निकलि गेलनि। मुदा घाइल भऽ ओहो खसि पड़लाह। पितिऔत भाए हुनकर लटकल जांघक माँसकेँ तौनीसँ बान्हि, पीठपर उठा घरपर अनलकनि। चिकित्साक समुचित व्यवस्था नहि, ताहिपर गामे-गाम सिपाही दमन शुरु केलक। गामक-गाम आगि लगौलक। मर्द-औरतकेँ पकड़ि-पकड़ि बन्दूकक कुन्दा आ पएरक बूटसँ मारि-मारि बेहोश केलकनि। ओछाइनपर पड़ल देवनाथक हृदयमे आगि धधकैत रहनि मुदा किछु करैक तँ शक्ति नहि रहि गेलनि। जीवन-मृत्युक बीच लटकल रहथि। तीसम दिन प्राण छूटि गेलनि।
दस बर्खक शिवनाथ १५ अगस्त १९४७ ई. केँ आजादीक समए पनरह बर्खक भऽ गेल। पतिक मुइने शिवनाथक माए राधाक मन टुटलनि नहि बल्कि आगिमे तपल सोना जेकाँ आरो चमकए लगलनि। पाकल आमक आंठी जेकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलनि। गुलामीसँ मिझाइल दीपकेँ आजादीक नव तेल-बत्ती भेटलैक, जाहिसँ नव-ज्योति प्रज्वलित भेल। अखन धरिक अव्यवस्थित परिवारकेँ दुनू माए-बेटा मिलि सुढ़िअबए लगलथि, व्यवस्थित बनबए लगलथि। अढ़ाइ बीघा खेतकेँ अपन दुनियाँ आ कर्मक्षेत्र बुझि दुनू माए-बेटा जी-जानसँ मेहनत करए लगलथि, जहिपर परिवार नीक नहाँति ठाढ़ भऽ गेलनि। ओना शिवनाथक बिआह बच्चेमे भऽ गेल छलैक मुदा दुरागमन पछुआएल रहैक। परिवारक बढ़ैत काज देखि बेटाक दुरागमन माए करा लेलनि।
देश आजाद होइतहि गामे-गाम स्कूल बनए लगल। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम छलाह मुदा जतबे छलाह ओ ओहि रुपे विद्या-दानमे भीड़ि गेलाह, जाहिसँ सभ गाममे तँ नहि मुदा अधिकांश गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल ठाढ़ भऽ गेल। कतौ-कतौ मिड्लो स्कूल आ हाइयो स्कूल बनल। कतौ-कतौ कओलेजो ठाढ़ भऽ गेल। अखन धरि जे स्कूल ठाढ़ भेल ओ सामाजिके स्तरपर, सरकारी स्तरपर  बहुत कम बनल। स्कूल खोलैक पाछू लोकक मनमे धर्मस्थानक बुझब छलैक। गुरुओजी ओहने रहथि जे मात्र भोजनपर सेवा करैत रहथि। शनीचरा मात्र जीविकाक आधार छलनि। पाइ लऽ कऽ पढ़ाएब पाप बुझल जाइत छलैक। ओना मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल आ कओलेजमे महिनवारी फीस लगैत छल, जे संस्थागत सहयोग छल। स्कूल-कओलेज खुजने विद्याक ज्योति प्रज्वलित भेल मुदा अंडी तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ, जखनकि जरुरी अछि हजार वोल्ट बौलक इजोत जेकाँ। ओना ठाम-ठीम संस्कृत विद्यालय सेहो अछि, मुदा.....।
दुरागमनक तीन साल बाद शिवनाथकेँ बेटा भेलनि। रघुनाथक जन्म होइतहि राधाक हृदय खुशीसँ सूप सन भऽ गेलनि। मनमे नचए लगलनि बाँसक ओ बीट जाहिमे दिनानुदिन बेसी बाँसोक जन्म होइत आ नमगर, मोटगर सुन्दर-सुडौलौ होइत। मनक खुशीसँ दुनियाँ फुलवारी सदृश्य  बुझि पड़ए लगलनि। बाधक-बाध धानक फूल, गाछीक-गाछी आमक मंजर, जामुन, लताम इत्यादिक फूलसँ सजल ई दुनियाँ सोहनगर लगए लगलनि। मुदा जहिना आसिन मास अकाशकेँ करिया मेघ झँपने रहैत अछि आ कतौ-कतौ मेघक फाटसँ सूर्यक इजोत निकलैत अछि आ सेहो गाछे-बिरीछपर अटकि जाइत अछि, तहिना। धरती-जमीन ओहिनाक ओहिना अन्हार रहि जाइत अछि।
  छबे मासक रघुनाथकेँ राधा अपन मुँह चमका-चमका दा-दा-दा सिखबए लगलीह। दादामे देवनाथक ओ रुप देखैत छलीह जे माथपर वीरक मुरेठा बान्हि, हरोथिया लाठीमे लाल झंडा टांगि, हँसैत गोली खेने रहथि।
चारि बर्ख टपितहि शिवनाथ रघुनाथक नाओ गामक स्कूलमे लिखा देलखिन साले-साल टपैत रघुनाथ गामक स्कूल टपि गेल। मिड्ल स्कूल टपि साइंस राखि रघुनाथ केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे नाओ लिखौलक। जहिना विज्ञान विषए पढ़ैमे नीक लगै तहिना अंग्रेजिओ। जाहिसँ ठाकुर बाबू आ लत्ती बाबू बेसी मानथिन। चारि बर्खक बाद प्रथम श्रेणीमे मेट्रिक पास केलक। बाढ़ि-रौदिक द्वारे उपजो-बाड़ी नीक नहि होइ जाहिसँ परिवारो लड़खड़ाइते चलैत। बाहर जा कऽ आगू पढ़ब असंभव जेकाँ रहैक। मुदा संजोग नीक रहलैक जे जनतो कओलेजमे साइंसक पढ़ाइ शुरु भेलैक। रघुनाथो कओलेजमे नाओ लिखौलक।
  रघुनाथकेँ कओलेजमे नाओ लिखेलाक सालभरि उत्तर राधा -दादी- मरि गेलीह। पिताक श्राद्ध तँ शिवनाथ केनहि नहि रहथि मुदा माएक श्राद्ध नीक जेकाँ केलनि। जाहिसँ पाँच कट्ठा खेतो बिका गेलनि। ताहि लेल मन मलिन नहि भेलनि। किएक तँ भोजमे खूब जस भेलनि। दू सालक बाद रघुनाथ फस्ट डिविजनसँ आइ.एस.सी. पास केलक। सत्तरि प्रतिशतसँ उपरे नम्बर रहैक। आइ.एस.सी.क रिजल्ट सुनि शिवनाथकेँ बेटाक पढ़बैक उत्साह बढ़लनि। खेत बेचब अधलाह नहि बुझेलनि। मनमे अएलनि जे रघुनाथ पढ़ि कऽ नोकरी करत आकि खेती करत। तखन खेतक जरुरते की रहतैक। संगहि हमहूँ समाजकेँ एकटा सक्षम मनुष्य देबैक।
  इंजीनियरिंग, डॉक्टरी पढ़बैमे केहेन खर्च होइत छैक से तँ नीक जेकाँ बुझथि नहि। मनमे होइन जे पाँच-दस कट्ठा जमीन बेचि बेटाकेँ पढ़ा देबैक। मनमे उत्साह रहबे करनि तेँ महग बुझि घरारियेमे सँ दू कट्ठा बेचि इंजीनियरिंग कओलेजमे बेटाक नाओ लिखा देलनि। नाओ लिखौलाक डेढ़ बर्ख बीतैत-बीतैत अदहा जमीन बिका गेलनि। आगूक अढ़ाइ बर्ख बाकी देखि चिन्ता घेरए लगलनि। मन मानि गेलनि जे सभ खेत बेचनहुँ पार नहि लागत। सोचैत-बिचारैत तँइ केलनि जे पढ़ैक खर्चपर रघुनाथक बिआह करा देबै। बिआह भेनहुँ ओकरा पढ़ैमे बाधा थोड़े हेतैक, पाँच बर्खक बादे दुरागमन कराएब। समस्याक समाधान होइत देखि मनमे खुशी अएलनि। फेर मोनमे उठलनि जे समयो बदलि रहल अछि। पहिने माए-बाप बेटा-बेटीक बिआहकेँ अपन कर्तव्य बुझैत छलाह तेँ पुछब जरुरी नहि बुझैत छलाह। मुदा आब पूछब जरुरी भऽ गेल अछि। परिस्थिति देखि रघुनाथो बिआह करब मानि लेलक मुदा शर्त एकटा लगौलकनि जे लड़की रंग-रुपमे सुन्दर हुअए। जँ गुणवानक शर्त रहितनि तहन तँ ओझरा जएतथि। मुदा से नहि भेलनि। बिआहक चर्चा शिवनाथ चला देलखिन।
  इंजीनियर वर तेँ कथकियाक ढबाहि लागि गेलनि। मुदा कोनो गाम अधलाह बुझि पड़नि तँ कोनो परिवारक कुल-गोत्र। कतहु लड़की दब तँ कतौ उमरगर लड़की भाँज लगनि। होइत-हबाइत एकठाम कथा पटि गेलनि। गाम तँ नीक नहि मुदा लड़कीयो गोर आ पढ़ैक खर्चो गछि लेलकनि। विआह भऽ गेलैक। विआहक बाद दुनू समधि बिचारि लेलनि जे सालो भरि जे भार-दौरक फेरीमे पड़ब से नीक नहि। तेँ भार-दौरक बेबहार छोड़िए दियौक। दुनू गोटे सएह केलनि।
इंजीनियरिंगक अंतिम परीक्षा दऽ रघुनाथ सभ सामान लऽ सासुर आबि गेल। ओना दुरागमन बाकिये मुदा सासुर तँ सासुरे छी, तेँ चलि आएल। रिजल्ट निकलैमे तीन मास लागत। काजो तँ अखन किछु नहिए अछि, तेँ निश्चिन्तसँ सासुरमे रहैक विचार रघुनाथ कऽ लेलक। दसे दिनक बाद विदेशमे इंजीनियरक भेकेन्सी खूब भेलैक। सभसँ बेसी अमेरिकामे भेलैक। नव टेकनोलौजी अएने नव युगक आगमन भेल। नव मशीन नव इंजीनियरकेँ जन्म देलक। मुदा पुरना तकनीको आ इंजीनियरो, अछैते औरदे, फाँसीपर लटकए लगलाह। जहिना गामक-गाम हैजासँ मरैत अछि तहिना इंजीनियरक जमात पटपटाए लगलाह। मुदा दवाइक करखन्ने नहि जे दवाइ बनाओत।
परीक्षाक पेपर रघुनाथक नीक भेल तेँ फेल करैक अन्देशे नहि रहैक। हाइये स्कूलसँ अमेरिकाक उन्नतिक, सुख-मौजक संबंधमे किताबो-पत्रिकामे पढ़ने आ लोकोक मुँहे सुनने रहए। तेँ मनमे गुदगुदी लगैत रहै। ई भिन्न बात जे आठ मासमे अस्सीटा बैंक अमेरिकामे दिवालिया भेल।
  रघुनाथ फस्ट डिवीजनसँ पास केलक। एक तँ फस्ट डिवीजन रिजल्ट, ताहिपर अमेरिकाक नौकरी। खुशीसँ रघुनाथक मन उड़िया गेलै। आवेदन केलाक आठे दिन पछाति चिट्ठी भेटलैक। स्त्रीक गहना बेचि ओ दुनू परानीक टिकट बनबौलक। ससुर पढै़ धरिक खर्चा गछने रहनि तेँ टिकटक खर्च दैसँ इन्कार केलकनि।
  मिशिगन राज्यक राजधानीक शहर लानसिंग। ठंढ़ इलाका। ने अपना सभ जेकाँ छह ऋतुक मौसम बनैत आ ने ओकर हास-परिहास होइत। ने रंग-बिरंगक गाछ-बिरीछ अपना सभ जेकाँ होइत। लानसिंगक सत्तरह तल्लाक छोट-छोट तीन कोठरीक आंगन। जहिमे ने सभ दिन सूर्यक रोशनी अबैत अछि आ ने भोरे कौआ आबि ओसारपर बैसि सारि-सरहोजिक समाचार सुनबैत अछि। रहैत-रहैत दुनू परानी रघुनाथकेँ पनरह बर्ख बीति गेलनि। जवानीक सभ सपना मने-मन गुमसड़ि रहल छलनि।
रघुनाथकेँ अमेरिका गेने शिवनाथक जिनगीक गाछ मौलायल नहि, चतरि कऽ पाखरिक गाछ जेकाँ झमटगर भऽ गेलनि। दुनू बेकतियोक विचार सुधरलनि। वंशगत संबंध क्षीण होइत-होइत सुखि गेलनि,  सामाजिक संबंध मोटा कऽ जुआएल गाछक सील जेकाँ बनि गेलनि। जहिना कोनो समांगकेँ मुइलापर परिवारक लोक आस्ते-आस्ते बिसरि जाइत अछि, तहिना रघुनाथोकेँ दुनू प्राणी शिवनाथ सोलहन्नी बिसरि गेलाह। साल भरिक छाया आ सैएक-सए बरिसक बरखी करैक खगते नहि रहलनि। वंश अंत हएत सदः आँखिसँ शिवनाथ देखैत छलाह। स्वतंत्र देशक गुलाम बुद्धि । कोना नहि बिसरितथि? ने कहियो एक्कोटा पत्र लिखि मन राखए चाहलनि आ ने कोनो मनोरथ मनमे संयोगि कऽ रखने रहथि। पढ़ल-लिखल तँ शिवनाथ नहि मुदा ‘हरिवंश पुराण’क कथा, गप-सप्‍पक क्रममे बेसी काल दोसराक मुँहे सुनैत छलाह।
स्वतंत्रताक उपरान्त विकासपुरक लोकोक विचार सुधरलनि। कोना नहि सुधरितनि? बूढ़-बच्चा छोड़ि गामक सभ लाठी-झंडा लऽ झंझारपुर सर्कल आगि लगबए जे गेल रहथि। आँखिसँ सभ किछु देखने रहथि। ओना हजार बीघा रकबाक गाम विकासपुर, जाहिमे साढ़े चारि सए परिवार हँसी-खुशीसँ कताक पुस्तसँ एकठाम रहैत आएल छलाह। स्वतंत्राक पूर्व मलिकाना -जमीनदारक- गाम रहए। मालगुजारीक लेन-देनमे सबहक जमीन निलाम भऽ जमीनदारक हाथमे चलि गेल छलैक। कियो अपन खेतक दखल तँ हुनका नहि देलकनि मुदा बटेदार बनि उपजा बाँटि-बाँटि दिअए लगलनि। जागल गामक लोक देखि जतबे-तेतबे दाम लए मालिक खेत घुमा देलकनि। अपन खेतकेँ स्थायी पूँजी बुझि श्रमक पूँजी जोड़ि जिनगीकेँ ठाढ़ करए लगलथि। बाढ़ि-रौदीक प्रकोप सालो-साल होइतहि रहैत छलैक मुदा विचार आ कर्म बदलने ओहो अभिशाप नहि वरदान बनि गेलैक। बाढ़ि देखि माथपर हाथ लऽ नहि बैसि, ओकर प्रतिकार करैक रस्ता अपनौलनि। तहिना रौदियोक प्रति केलनि। जाहिसँ बाढ़ि-रौदीसँ बचैक उपाए कऽ लेलनि। सबहक एहन धारणा बनि गेलनि। जे बाढ़िक उपद्रव मात्र साओनसँ कातिक चारि मास होइत अछि बाकी बारह मासक सालमे आठ मास तँ बचैत अछि। जे आठ मास जमि कऽ मेहनत कएल जाए तँ बारहो मास हँसी-खुशीसँ गुजर चलि सकैत अछि। ततबे नहि, पानियो तँ आगि नहि छी जे सभ किछुकेँ जरा देत। पानियो तँ उत्पादित पूँजी छी, तेँ जरुरत अछि ओकर उपयोग करैक। तहिना रौदियोक संबंधमे धारणा बनौने रहथि। खेतमे रंग-बिरंगक अन्न, फल, तरकारी अछि। ने सभ अन्नेक लेल एक रंग पानिक जरुरत होइत अछि आ ने फले-तरकारीक लेल। अधिक वर्षा भेने अधिक पनिसहू फसल होइत अछि आ कम वर्षा भेने कम पनिसहू हएत। ताहिपर थोड़ेक सुविधा सरकारो देलक। नब्बे प्रतिशत अनुदानमे बोरिंग आ पचास प्रतिशत अनुदानमे पम्पसेट देलक। जाहिसँ पर्याप्त बोरिंग-पम्पसेट गाममे भऽ गेलैक। किसानक हाथमे पानि चलि आएल। समाजक किसानक कान्हमे कान्ह मिला शिवनाथो चलए लगलाह। कम खेत रहितहुँ हुनका अन्न-पानि उगरिये जाइत छन्हि।
छह बजे भोरे रघुनाथ धीपल-सराएल पानि मिला अधा-छिधा नहा, कपड़ा पहीरि, चाह-बिस्कुट खा ड्यूटी चलि जाथि। असकरे श्यामा डेरामे रहि जाइत छलीह। ने अंग्रेजी भाषाक बोध छन्हि जे दोकानो-दौरीक काज कऽ सकितथि आ दोसरोसँ गप-सप्‍प करैत समए बितबितथि। ओना बगलेक फ्लेटमे आरो-ओरो भारतीय -इंडियन- सभ रहैत अछि। मुदा ओहो कियो केरलक तँ कियो मद्रासक छथि। भाषाक दूरी देखि श्यामा मने-मन सोचए लगलीह जे मनुष्यसँ नीक पशु होइत अछि जे अपन स्वभावसँ एक-दोसरासँ मेलो रखैत अछि। मनुक्ख तँ मनुक्खे छी जे बोलेसँ राजा बनि जाइत अछि। जहिना पिजराक सुग्गा अकासमे उड़ैत सुग्गा देखि कनैत अछि तहिना कोठरीमे बैसलि श्यामा मने-मन कुही होइत छलीह। मनमे होइत छलनि कोन जनमक पाप कएल अछि जे एहन गति भऽ गेल अछि। नैहरसँ सासुर धरिक सभ किछु हेरा गेल।
  भिनसरे डेरासँ निकलि रघुनाथ कार्यालय पहुँचि जाइत छथि। कार्यालयेमे खाइ-पीबैक व्यवस्था सेहो छैक। मशीनेक संग-संग रघुनाथ बारह घंटा बितबैत छथि। बुद्धिसँ लऽ कऽ हाथ धरि मशीनेक संग भरि दिन रहैत-रहैत मशीन बनि गेलनि। संवेदनशून्य मनुष्य। जाहिमे दया, श्रद्धा, प्रेमक कतौ जगह नहि। मुदा आइ रघुनाथकेँ कार्यालय पहुँचतहि मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेलनि। काजक दिसि एको-मिसिया ध्याने नहि जाइत छलनि। छुट्टीक दरखास्त दऽ कार्यालयसँ डेरा बिदा भेलाह। डेरा आबि, देहक कपड़ा आ जुत्ता बिनु खोलनहि पलंगपर, चारु नाल चीत भऽ ओंघरा गेला। जहिना जेठ मासक तबल धरतीपर बिहरिया बरखाक बुन्न खसितहि गरमी-सरदीक बीच घनघोर लड़ाइ शुरु भऽ जाइत अछि तहिना रघुनाथक मनमे वैचारिक संघर्ष हुअए लगलनि। एहन जोर वैचारिक बिहारि मनमे उठि गेलनि जे बुद्धि चहकए लगलनि। चहकैत बुद्धिसँ अनायास निकलए लगलनि- ‘‘हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि जे अपना माथपर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवारीक फूलक गाछ सींचि रहल छथि। अपन माए-बाप, समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रुप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अंतिम पड़ावमे पहुँचि आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुद्धि भेल आ ने गाम-समाजक। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबि गालपर होइत पलंगपर खसए लगलनि।
शिवनाथ हँसैत ओछाइनपर सँ उठि पत्नीकेँ सोर केलखिन- ‘‘कत्तऽ छी, कने एम्हर आउ?’’
  मुस्की दैत लग आबि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘भोरे-भोरे की रखने छी जे सोर पाड़लहुँ।’’
  ‘‘मनमे आबि रहल अछि जे अपन दुनू प्राणीक श्राद्ध कइये लइतहुँ। जँ हम पहिने मरि जाएब तँ अहाँक श्राद्ध हएत की नहि। नहि जँ पहिने अहीं मरि जाएब तँ हमर श्राद्ध हएत की नहि।’’
  ‘अखन हम थोड़े मरैबाली भेलहुँहेँ, जे मरब।’’
  ‘‘अपन बिआह बिसरि गेलिऐक? जखन अहाँ छह बर्खक रही आ हम सात बर्खक रही तहिये ने बिआह भेल रहए। मन अछि आकि नहि जे खरहीसँ नापि कऽ जोड़ा लगौल गेल रहए।’’
  किछु काल गुम्म रहि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘अपन बिआह-दुरागमन आ माए-बाप जँ लोक बिसरि जाएत तँ ओहो कोनो लोके छी।’’
  मुस्की दैत शिवनाथ कहलखिन- ‘‘हमरा आँखिमे अहाँ वएह छी जे दुरागमन दिन झाँपल पालकीमे बैसि नैहरसँ सासुर आएल रही। अहीं कहू जे हमरा किए ने अहाँक चूड़ीक खनखनीक अबाजमे स्वर लहरी आ माथक सेन्नुरमे जिनगीक मधुर फल देखि पड़त। पचहत्तरि पार कऽ अस्सीक बर्खक बीच दुनू गोटे पहुँच चुकल छी तेँ खुशी अछि। आँखिक सोझमे देखैत छी जे विआहक पाँचे दिनक बाद चूड़ियो फूटि जाइत छैक आ माथो धुआ जाइत छैक। ताहि ठाम हम-अहाँ भाग्यशाली छी की नहि?’’
  पतिक बात सुनि रुक्मिणी मुस्कुराइत पतिक आँखिमे अपन आँखि गाड़ि पाछुसँ आगू धरिक जिनगी देखए लगलीह।

Wednesday, January 7, 2009

जितेन्द्र झा अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला

जितेन्द्र झा
अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला



मिथिलाञ्चलक घरक भितमे बनाओल जाएबला मिथिला लोकचित्रकला विश्वभरि ख्याति कमओने अछि । मुदा एखत अपने भूमिमे एकरा पहिचान खोजबाक स्थिति छैक । मिथिला चित्रकलाके सरकार बेवास्ता कएने अछि, तें ई व्यवसायिक रुप नहि लऽ सकल अछि । एकर व्यावसायिक प्रबद्र्धन नहि भऽ सकल अछि ।
ग्रामीण क्षेत्रक महिलाके जीवनस्तर सुधार करबाक लेल बडका साधन भऽ सकैत अछि ई चित्रकला । कियाक त खासकऽ मैथिल ललनेक हाथमे नुकाएल रहैत अछि ई चित्रकलाक जादुगरी । आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक समृद्धिक अथाह सम्भावना अछि मिथिला चित्रकलामे । लोकचित्रकलाके व्यवसायिक स्वरुप देलासं आर्थिक आ सांस्कृतिक दुनू लाभ उठाओल जा सकैत अछि । परम्परागत मिथिला चित्रकला जीवनक अंग अछि मिथिलामे । लोकचित्रकला संस्कारक द्योतक सेहो अछि ।


मुदा बढैत आधुनिकताक कारणे विस्तार प्रभावित भेल छैक । राज्य मिथिला चित्रकलाके एखनधरि चिन्ह नई सकल आरोप चित्रकारसभक छन्हि । नेपाल सरकार कलाके बढावा देबालेल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठान खोलने अछि । जत्तऽके प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास सम्बद्ध एक्कहु गोटे नहि अछि । ई एकटा प्रमाण मात्र अछि, आन बहुतो ठाम मिथिला चित्रकलासंग सौतिनिञा व्यवहार होइत आएल छैक । एना ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक कुलपति किरण मानन्धर कहैत छथि जे मिथिला चित्रकलाके विशेष स्थान देने छी । मिथिला चित्रकलामे विशेष दखल भेनिहारि महिलाके स्थान देल जाएत से कुलपतिक कहब छन्हि । हिनक कथनी आ करनीमे कतेक समानता अछि, आबऽ बला दिने बताओत ।
जत्तऽ समग्र कलाक उन्नतिक बात होइक ओत्तऽ मिथिला पेन्टिङक चित्रकार नईं अछि, एकरा विडम्बने कहबाक चाही ।

मिथिला चित्रकलासं सम्बद्ध चित्रकारके उचित अवसर भेटबाक चाही । नेपाल पर्यटन वर्ष २०११ मना रहल अछि, एहनमे मिथिला चित्रकलाक मादे सेहो पर्यटकके आकर्षक कएल जा सकैत अछि । एहिबीच काठमाण्डूक बबरमहलस्थित सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे एस. सी. सुमनक मिथिला चित्रकला प्रदर्शनी मिथिला कसमस हालहि सम्पन्न भेल अछि । एहि प्रदर्शनीमे कलाप्रेमी मिथिला चित्रकलाक आधुनिक आयामसभसं परिचित भेलथि । सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे हुनक ११ म् प्रदर्शनी छल ई । मिथिला क्षेत्रक जीवनशैलीक झल्काबऽ बला चित्रकलासभ देखलासं ग्यालरी मिथिलामय भऽ गेल छल । एस. सी. सुमन मिथिला चित्रकला क्षेत्रमे परिचित नाम छथि । हिनक चित्रकलासभ बेस प्रशंसा पओलक । मिथिला चित्रकला सम्बन्धमे अध्ययन अनुसन्धानक सेहो बहुत खगता छैक । मिथिला लोक चित्रकलाक कुनो खास नियम वा सिद्धान्त नहि होइत अछि । तें ई स्वच्छन्दताक पर्याय सेहो अछि । मिथिलाक समृद्ध संस्कृतिक परिचायक सेहो अछि ।

सरकार कएलक सौतिनिञा व्यवहार
एस.सी सुमन
चित्रकार, मिथिला चित्रकला

मिथिला पेन्टिङ परम्परागत कला अछि, ई कला कोनो पाठशालामे नहि सिखाओल जाइत अछि । पीढीदर पीढी ई अपने आप सिखबाक काज होइत छैक । हमहु“ अपन दाइस“ सिखल“हु । कतउ सासुस“ पुतोहु सिखैत अछि त कखनो मायस“ बेटी । ताहि परिवेशमे हमहुं अपन दाइस“ मिथिला चित्रकला सिखल“हु ।
मिथिला पेन्टिङके अन्तर्राष्ट्रिय बजारमे बहुत माग अछि । ई त हट केक अछि । कलाकारके कलाकारितामे निर्भर करैत छैक ओकर मोल । जेना हमर पेन्टिङ १७ हजारस“ लऽकऽ ८० हजारधरिक अछि । जे सहजे बिका जाइत अछि ।
मिथिला पेन्टिङ व्यावसायिक रुप लेबा दिस उन्मुख अछि । कमर्सियल मार्केटमे देखी त सेरामिकमे, ब्यागमे कपडा आदिमे एकर प्रयोग भऽ रहल अछि । तें नीक बजार छैक एकर । ज“ अपन बात करी त जहन हम बजारमे अबैत छी त प्रदर्शनी लऽ कऽ हमरा कोनो दिक्कति नई होइत अछि ।
मिथिला चित्रकलाक विकासके जे आधारसभ अछि से किछु कमजोर भऽ रहल अछि जेना पहिने माटिक घर होइत छलै । भितके घरमे मिथिला चित्रकलाके नीक अभ्यास होइत छलै । माटिक घरक ठाममे आब क्रंक्रिटके जंगल अछि भऽ गेल । सामाजिक संस्कार आदिमे सेहो भितमे लिखबाक चलन छलै । मुदा आब बच्चा ज“ पेन्सिलस“ देबाल पर किछु लिखि दैत छैक त मायबाप डांटिदैत छैक । तें भितमे लिखबाक चलन प्रभावित भेल अछि । तैइयो तराईक मुसहर वस्ती, थारु आ झांगड जातिक वस्तीमे माटिक घरमे मिथिला चित्रकला देखल जा सकैत छैक ।
नेपाल सरकार एखनधरि किछु नई कऽ सकल अछि, मिथिला पेन्टिङके लेल । मिथिला पेन्टिङ जत्तऽ अछि अपने बुतापर, अपन स्थान अपने बनौने अछि । मिथिला चित्रकलामे लागल कलाकारसभ अपने मेहनतिस“ आगु बढल अछि । ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानके गठन करैत काल प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास“ सम्बद्ध एक्कहु गोटेके नहि राखल गेल । नामके लेल सभामे मिथिला पेन्टिङसं जुडल एकगोटेके जगह देल गेलै, बादमे विवाद भेलै आ ओहो पद छोडि देलनि । व्यक्तिगत रुपमे हमरा पुछी त राज्य मिथिला चित्रकलाक लेल ने किछु कएने अछि आ ने किछु कऽ सकैया । (सुमनकसंग कएल गेल बातचीतमे आधारित)



प्रगतिक पथपर मिथिला चित्रकला
धीरेन्द्र प्रेमर्षि
साहित्यकार

गुणँत्मक दृष्टिकोणसं सेहो मिथिला पेन्टिङमे बहुत काज भऽ रहल अछि । परम्परा आ आधुनिकता दुनूके जोडिकऽ एच.सी सुमन मिथिला पेन्टिङके आगू बढा रहल छथि । मदनकला देवी कर्ण, श्यामसुन्दर यादवसहितके व्यक्तिसभ परिमाणात्मक आ गुणात्मक दुनू तरहें मिथिला पेन्टिंगके आगू बढा रहल छथि । सुमनक पेन्टिङ आधुनिकताक आकाशमे सेहो भरपुर उडान भरने अछि मुदा धर्ती बिन छोडने, जे एकदम महत्वपूर्ण बात अछि । मिथिला पेन्टिंगके साधनाके रुपमे लऽ कऽ आगु बढनिहार सभ अपने आप आगु बढि रहल छथि ।

राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके लेल कोनो खास काज नहि भऽ सकल अछि । राष्ट्रिय स्तरमे चित्रकारसभके मूल्यांकन करैत काल मिथिला पेन्टिङस“ जुडल व्यक्तित्वके जे स्थान आ सम्मान देल जएबाक चाही, से नहि भऽ सकल अछि । जनस्तर आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरमे मिथिला पेन्टिङ नीक सम्मान पओने अछि ।
देशमे मिथिला पेन्टिङके स्थापित कएल जाए । खास कऽ महिला सभ एकरा जोगाकऽ रखने अछि । मैथिल महिलासभ किशोर अवस्थेसं अरिपन लिखब शुरु करैत अछि । तुसारी पावनि आदि सभ सेहो मिथिला पेन्टिङ सिखएबाक अवसर अछि । विविध पूजा–आजाक माध्यमे ओ सभ चित्रकलामे प्रवेश करैत छथि । राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके स्वीकार्यता बढाएब, व्यावसायीक सम्भावनाके खुला करब, एहिमे लगनिहारसभके सम्मानके वातावरण बनएबाक काज करबाक चाही । तहन ई राष्ट्रिय स्तरमे स्थापित भऽ सकत । एहिमे अन्तरनिहीत वैशिष्टय जे अछि ताहिस“ ई अपने अन्तर्राष्ट्रिय रुपमे स्थापित भ जाएत, व्यापक भऽ जाएत । ं(बातचीतमे आधारित)(www.videha.co.in साभार विदेह)

घरदेखिया - जगदीश प्रसाद मण्डल



नीन्न टुटितहि लुखियाक नजरि दिन भरिक काजपर पड़लनि। काज देखि मनमे अबूह लागए लगलनि। असकता गेलीह। मुदा तैयो हूबा कऽ कऽ उठए चाहलनि आकि आँखि पुबरिया घरक छप्परपर गेलनि। बिहाड़िमे मठौठ परक खढ़ उड़िया गेल छलैक। हड्डी जेकाँ बाती झक-झक करैत। मनमे अएलनि जे ‘‘की कहत बड़तुहार?’’ कहत जे मसोमातक घर छिऐ तेँ मठौठ उजड़ल छैक। खौंझ उठलनि। ठोर पटपटबैत- ‘‘जेहने नाशी डकूबा बिहाड़ि तेहने झड़कलहा कारकौआ। जुट बान्हि-बान्हि आओत आ लोलसँ खढ़ उजाड़ि-उजाड़ि छिड़िऔत।’’ नजरि निच्चाँ होइतहि दछिनबरिया टाटपर पड़लनि। बरसातमे टाटक आलन गलि कऽ झड़ि गेल छलैक। मात्र कड़ची-बत्ती टा झक-झक करैत। जाहिसँ ओहिना दछिनबरिया बँसबिट्टी देखि पड़ैत। बेपर्द आंगन। मन खिन्न हुअए लगलनि। मनमे अएलनि जे पुरना साड़ी टाटमे टांगि देबै। मुदा बड़तुहारक आँखिमे की कोनो गेजर भेल रहतै जे नहि देखत। तहूमे साड़ीसँ कते अन्हराएत। ओहिना सभ किछु देखत। आरो मन निच्चा खसैत जाइत। बाप रे की कहत बड़तुहार? नागेसर दिओरपर तामस उठै लगलनि। कोन जरुरी छलनि जे कौल्हुके दिन दऽ देलखिन। घर-अंगना चिक्कन कऽ लैतहुँ तहन अबैक दिन दैतऽथिन। कोनो की हमर बेटा बाढ़िमे दहाइल जाइत छलए। पाँच दिन आगुएक दिन भेने की होइतै? तामस बढ़लनि। तहि बीच आँखि टाट परसँ निच्चा उतड़लनि। नजरि पड़लनि अंगनाक पनिबटपर। झक-झक करैत झुटका। उबड़-खाबड़ सौँसे आंगन। तहूमे जे झुटका सरिआममे अछि ओ तँ नहि मुदा जे अलगल अछि ओ तँ चुभ-चुभ गरैत अछि। सौँसे अंगना सरिअबैमे कमसँ कम, दस छिट्टा माटि लागत। दस छिट्टा माटि उघि, ढ़ेपा फोड़ि, सरिया कऽ पटबैमे तँ भरि दिन लगि जाएत। तखन आन काज कोना हएत ? काजक तरमे दबाए लगलीह। तामस आरो लहरै लगलनि। अबूहो लगनि। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल भारसँ दबैत जाएत। दुइये माए-पूत की सभ करब ? तहूमे आइ अइ छौड़ाकेँ कोना किछु करैले कहबै। ओकरे देखैले ने घरदेखिया आओत। छौँड़ाकेँ तँ अपने मारिते रास काज हेतै। कानी छटौत। अंगा-घोती खीचत। आइरन करबैले गंजपर जाएत। गमकौआ साबुनसँ नहाएत। तेल लेत। बाबरी सीटत। तेहेन ठाम कोदारि-खुरपी चलबैले कोना कहबै। लोहे छिऐ जँ किनसाइत लागिये जाए। तखन तँ आरो पहपटि हएत। कथकिया जे हाथ-पाएरमे पट्टी बान्हल देखतै तँ की कहत? मनक तामस निच्चाँ मुँहे ससरए लगलनि। तामस उतड़ितहि नजरि घरदेखियाक खेनाइ-पीनाइपर पहुँचलनि। आन काज तँ रहियो-सहि कऽ भऽ सकैत अछि मुदा दूध तँ एक दिन पहिने पौड़ल जाएत। जँ से नहि पौड़ब तँ दही कोना हएत। शुभ काजमे जँ दहिये नहि होएत तँ काजक कोन भरोस। एक तँ महीसबला सभ तेहेन अछि जे दूधसँ बेसी पानिये मिला दैत छैक। नबका मटकुरियो ने अछि, जे पानियो सोखि लइतैक। मनमे खौंझ उठए लगलनि। मुदा नजरि चाउर-दालि दिशि बढितहि तामस दबलनि। बेटाक घरदेखिया आओत, हुनका कोना खेसारी दालि आ मोटका चाउरक भात खाइले देबनि। लोको दुसत आ अपनो मन की कहत। कियो किछु कहऽ वा नहि मुदा कुल-खानदानक तँ नाक नहि ने कटा लेब। जँ इज्जतिए नहि तँ जिनगिये की? मन पड़लनि घैलमे राखल कनकजीर चाउर। कनकजीर चाउरक भात आ नवका कुटुम मनमे अबितहि लुखियाक हृदए पघिलल केरा जेकाँ पलड़ए लगलनि। मने-मन भातक प्रेमी दालिक मिलान करए लगलीह। मेही भातमे मेही दालिक मिलान नीक हएत। मुदा खेरही-मसुरी दालि तँ भोज-काजमे नहि होइत। होइत तँ बदाम-राहड़िक। मुदा राहड़ि तँ घरमे अछि नहि। बोङमरना बाढ़ियो तेना दू सालसँ अबैत अछि जे एक्को डाँॅट राहड़ि नहि होइत अछि। तत्-मत् करैत फेर मन झुझुआ गेलनि। बिना आमिले राहड़िक दालि केहेन हएत? आमक मास रहैत तँ चारि फाँक कँचके आम दऽ दितिऐ। सेहो नहि अछि। फेर मन आगू बढ़लनि, पहिल-पहिल समैध-समधीन बनब आ एगारहो टा तरकारी खाइले नहि देबनि से केहेन हएत। गुन-धुन करए लागलीह। गुन-धुन करितहि बर-बरी-अदौरी मन पड़लनि‍। एक्के दिनमे कोना ओरियान हएत? घाटिये-बेसन बनबैमे तँ तीन दिन लागत। तखन कोना होएत? फेर तामस पजरए लगलनि। मन फेर खौंझा गेलनि। बजै लागलीह-‘‘ई सभटा आगि लगौल नगेसराक छी। जाबे ओकरा छितनीसँ चानि नहि तोड़ब ताबे ओकरा बुद्धि नहि हेतै। तमसाइले नागेसरक आंगन दिशि बजैत बढ़लीह। पुरुख छी आकि पुरुखक झड़। जहि पुरुखकेँ काजक हिसाबे नहि जोड़ए आओत ओहो कोनो पुरुखे छी। ओहिसँ नीक तँ मौगी।
नागेसर नदी दिशि गेल छलाह। नागेसरकेँ नहि देखि लुखिया डेढ़िये पर अनधुन बजए लागलि। मुदा नागेसरक पत्नी भुरकुरिया चुप-चाप सुनैत। किछु बजैत नहि। किएक तँ मने-मन सोचैत जे दिओर-भौजाइ बीचक बात छी, तहि बीच हम किएक मुँह लगबी। बजैत-बजैत लुखियाक पेटक बात सठलनि। बात सठितहि तामसो उतड़लनि। बोलीक गरमीकेँ कमैत देखि भुरकुरिया बाजलि- ‘‘अंगना चलथु दीदी। बीड़ी पीबि लेथु, तखन जइहथि।’’
घरसँ बीड़ी-सलाइ निकालि दुनू गोटे ओसारपर बैसि गप-सप्‍प करए लागलि। सलाइ खरड़ैत भुरकुरिया बाजलि- ‘‘दीदी, आब पीहुओकेँ जुआन होइमे देरी नञि लगतनि। कंठ फुटि गेलै।’’
भुरकुरियाक बात सुनि लुखिया हरा गेलीह। जुआन बेटाक सुख मनमे नचए लगलनि। लुखियाकेँ आनन्दित होइत देखि पुनः भुरकुरिया बाजलि- ‘‘भइयोसँ बेसी भीहिगर जवान पीहुआ हेतनि।’’
खुशीसँ लुखियाक हृदए बमकि गेलनि, बजलीह- ‘‘कनियाँ, खाइ-पीबैमे छौँड़ाकेँ की कोनो कोताही करै छिऐ। एक तँ भगवान नउऐं-कउऐं कऽ एकटा बेटा देलनि। तेकरो जँ सुख नै होए तँ एते खटबे ककराले करै छी। बापक मन तँ परुँके बिआह करैके रहै मुदा तइ बीच अपने चलि गेल। आब साल लगलै तँ अइ बेर जेना-तेना बिआह कइये देबै।’
कहि आंगन दिशि बिदा भेलीह। अंगनासँ निकलितहि मन नागेसरपर गेलनि। सोचए लागलीह, नागेसर बेचाराक कोन दोख छैक। ओहो की कोनो अधलाह केलक। हुनको मनमे ने होइत हेतनि जे झब दे पुतोहु घर आबनि। एखन तँ वएह ने बाप बनि ठाढ़ छथिन। मुदा काज अगुताइल केलनि। गरीब छी, तेकर माने ई नहि ने जे इज्जति नहि अछि। इज्जति कऽ तँ बचा कऽ राखै पड़ैत छैक। नव कुटुमैती भऽ रहल अछि। नव कुटुम्ब दुआरपर औताह। हुनका जँ पाँच कौर खाइयो ले नहि देबनि से केहेन हएत। स्वागत की कोनो धोतिये-टाका टा सँ होइत छैक? आकि दूटा बोल आ दू कौर अन्नोसँ होइत छैक। जेहेन पाहुन रहताह तेहने ने बेबहारो करए पड़त। फेर मनमे तामस उठए लगलनि। एहेन पुरुखे की जिनका धियो-पूतोक बिआह करैक लूरि नहि होइन। तहि बीच मन पड़लनि चाह-पान। चाहो-पानक ओरियान तँ करए पड़त। एहन नहि ने हुअए जे एक दिशि करी आ दोसर दिशि छुटि जाए। चाहे-पानटा किअए, बीड़ीओ-तमाकुलक ओरियान करए पड़त ने। ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे लोक एक्के- आधे टा अम्मल रखैत अछि। ई तँ गाम छिऐक, एहिठाम तँ एक-एक आदमी पनरह-पनरहटा अमल डेबैत अछि। अपनहि विचारमे लुखिया ओझरा गेलीह। किछु फुड़बे ने करनि। बुकौर लगै लगलनि। आँखिमे नोर ढ़बढ़बा गेलनि। मनमे उठए लगलनि जे घर तँ पुरुखेक होइत छैक। एते बात मनमे अबितहि लुखिया बाटपर आबि नागेसरक बाट देखए लगलीह। नदी दिशिसँ अबैत नागेसरपर नजरि पड़लनि। नजरि पड़ितहि बजलीह- ‘‘काल्हि घरदेखिया औताह आ अहाँ निचेनसँ टहलान मारै छी।’’
नागेसर- ‘‘अच्छा चलू। बैसि कऽ सभ विचारि लैत छी।’’
दुनू गोटे आंगन दिस बढ़ल। ओचाओन खरड़ैत पीहुआकेँ देखि नागेसर कहलखिन- ‘‘एखन तू ऐंठार चिक्कन करै छेँ की जा कऽ बाबरी छँटा अयमे? काजक अंगना छियौ तेँ पहिने बाहरक काज समेटि लेमे की घरे-अंगनाक काज करै छेँ। जो, जल्दी जो।’’
खरड़ा राखि पीहुआ बिदा भेल। लुखियाक नजरि बदललनि। जहिना चश्माक शीशाक रंग दुनियाँक रंगकेँ बदलि दै छै, तहिना लुखियाक नजरि नागेसरक बदलल रुपकेँ देखलक। बदलल रुप देखितहि सिनेह उमड़ि पड़लनि। सिनेहसँ बजलीह- ‘एते लगक दिन किअए देलिऐ? चारि दिन आगूक दितियनि। भरिये दिनमे सभ काज सम्हारल हएत?’’
लुखियाक समस्याकेँ हल्लुक बनबैत नागेसर कहलखिन- ‘‘आइ पहिल दिन घरदेखिया घर-बर देखए औत आकि खाइन-पीउन करै ले? पसिन्न हेतनि तँ खेता-पीताह, नहि तँ अपना घरक रस्ता धरताह। एखन तँ ओ बटोही बनि कऽ औताह। तेँ हमरो ओते सुआगतक ओरियान करैक जरुरत नहि अछि। जखन पीहुआ पसिन हेतनि, बिआह करब गछताह, तखन ने किछु, आकि समधीन बनैले बड़ अगुताइल छी ? होइए जे कखैन समैधिक संग होरी खेलाइ?’’
समधिक संग होरी खेलाएब सुनि लुखियाक मन उड़िऐ लगलनि। बजलीह- ‘‘हम की कोनो समैधिये भरोसे फगुआ रखने छी, दिअर कोन दिनले रहत?’’
लुखियाक मनसँ चिन्ता पड़ा गेलनि। मुस्की दैत बजलीह-‘‘ बाटो-बटोही जँ दुआरपर औताह तँ एक लोटा पानियो नहि देबनि?’’
नागेसर- ‘‘से तँ देबे करबनि। यएह इज्जति तँ हमरा सभक बाप-दादाक देल अमोल धरोहर छी।’’
खुशीसँ भसिआइत लुखिया कहलनि- ‘‘पुरुषक थाह हम नहि पाएब।’’
नागेसर- ‘‘कनी कालमे बजार जाएब। जे सभ जरुरीक बस्तु अछि से सभ कीनि आनब। तइले एते माथा-पच्ची करैक कोन जरुरी। अतिथिक सुआगत मात्र नीक-निकुति खुऔनहि होइत ? आकि प्रेम-पूर्वक तुकपर खुऔने होइत। बैसैक लेल चद्दरि साफ केलहुँ ? सिरमो खोल खीचि लेब।’’
‘‘सिरमामे खोल कहाँ अछि ? ओहिना पुरना साड़ीक बनौने छी। ओहूले दूटा खोल किनने आएब।’’
  ‘‘बड़बढ़ियाँ।’’
  दोसर साँझ आंगनमे बैसि नागेसर पीहुआकेँ पुछलक- ‘‘तोरा जे नाम पुछथुन्ह तँ की कहबुहुन?’’
  पीहुआ- ‘‘से की हमरा नाम नइ बुझल अछि। बउओक, माइयोक आ गामोक नाम बुझल अछि।’’
  ‘‘ओते नै पुछै छियौ। अपने टा नाम बाज ?’’
  ‘‘पीहुआ’’
  ‘‘धुर बुड़िबक। पीहुआ नहि पुहुपलाल कहिहनु।’’
  ‘‘से हमर नाम पुहुपलाल कहाँ छी। पहिने सभ कहैत रहए आब तँ सभ पीहुए कहैत अछि। एहिना ने लोकक नाम बदली होइत रहै छै।’’
  मुँह बिजकबैत लुखिया कहलक- ‘‘हँसी-चौलमे लोक तोरा पीहुआ कहै छौ आकि जनमौटी नाओँ छियौ।’’
  छठियार राति, दाइ-माइ पुहुपलाल नामकरण केलखिन। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाधमे फानी लगबै लगल। गहींर खेत सभमे सिल्लियो आ पीहुओ आबि-आबि धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फँसबैत। अपनो खाइत आ बेचबो करैत। कछु दिनक बाद स्त्रीगण सभ पीहुआबला कहै लगलैक। फेर किछु दिनक पछाति भौजाइ सभ पीहुआ कहए लगलैक। मुदा तेकर एक्को मिसिया दुख ने पीहुएकेँ होइत आ ने पीहुआ माये-बापकेँ। तेँ पुहुपलाल बदलि पीहुआ भऽ गेल।
मने-मन नागेसर बिचारलनि जे ई पीहुआ एना नहि सुधरत। अखन सिखाइयो देबै तैयो बजै कालमे बाजिये देत। से नहि तँ दोसर गरे काज लिअए पड़त। लुखियाकेँ कहलखिन- ‘‘मोटरी खोलि सभ समान मिला लिअ।’’
दुनू दिओर-भौजाइ सभ समान मिलबए लगल। धोती देखि दुनूक बीच मतभेद भऽ गेलनि। कन्यागतक विदाइक लेल एक्के जोड़ धोती नागेसर कीनि कऽ अनने छलाह। किएक तँ बुझलनि जे बेटीबला धोती नहि पहिरैत अछि। मुदा से बात लुखिया बिसरि गेल छलीह। तेँ बजलीह- ‘‘दू गोटे औताह, तखन एक जोड़ धोतीसँ की हएत? कमसँ कम तँ जोड़ो कऽ केँ करबनि। जकरा बेसी रहै छैक ओ पाँचो टूक कपड़ा बिदाइ करैत अछि।’’
सामंजस्य करैत नागेसर- ‘‘हमरो सासुरक धोती रखले अछि। काज पड़त तँ दऽ देबनि।’’
  ‘‘गुलाबिये रंगमे रंगल अछि। एकरो गुलाबियेमे रंगि लेब। रंगो कीनि कऽ नेनहि आएल छी।’’
  दोसर दिन, सवेरे सात बजे कन्यागत दुनू बापुत पहुँचलाह। कन्यागतकेँ अबैसँ पहिनहि नागेसर एकचारीमे बिछान बिछा, तैयार केने छलाह। नबका खोलक सिरमो सिरा दिशि देने छलाह। कन्यागतकेँ अबितहि नागेसर ठेेंगा-छत्ता रखि पएर धोएले लोटा बढ़ौलकनि। चाह-पान आनए लुखिया पछुआरे बाटे लफड़ल चौक दिशि बिदा भेलि। जाधरि दुनू बापुत डोमन हाथ-पाएर धोए कुशल-क्षेम करैत, बिछानपर बैसलाह ताधरि लुखियो चौक परसँ चाह-पान कीनि अनलक। नागेसरक दुनू आँखि दुनू दिस। तेँ देखि लेलनि जे चाह आबि गेल। पीहुआकेँ कहलनि- ‘‘बौआ, चाह नेने आबह?’
  पीहुआ- ‘‘पानो।’’
  ‘‘पहिने चाह लाबह। पछाति पान अनिहह।’’
पीहुआक बोली डोमन सुनि लेलनि। तेँ नाम-गाम पुछैक जरुरते नहि रहलनि। दोहारा नमगर देह। मने-मन डोमन लड़िका पसन्द कऽ लेलनि। आँखिक इशारासँ डोमन बुचनकेँ पुछलखिन। आँखिएक इशारासँ बुचन सेहो स्वीकृति दऽ देलकनि। दुनू बापूतक मुँहमे हँसी नाचि गेलनि। मुदा लगले डोमनक मनमे एकटा शंका पैसि गेलनि। शंका ई जे मरदा-मरदी परिवार नहि अछि तेँ हो ने हो कोनो छोट-छीन बाधा ने बीचमे आबि भंगठा दिअए। चाह पीबि पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखि‍न- ‘‘समैध, जाधरि भानस होइत अछि ताधरि बाध दिशिसँ घुमि अबैले चलू। हँ, एकटा बात तँ कहबे ने केलौं, तीमन-तरकारी बेसी नै करब। सात-आठ दिनसँ लगातार माछ खेलहुँ, पेट गड़बड़ भऽ गेल अछि। गाममे रहितहुँ तँ मड़बज्झू भात आ केेरा चाहे भांटाक सन्ना संगे खइतहुँ। मुदा से तँ ऐठाम नहि हएत। तेँ दालि-भात एकटा तरकारी-सजमनि चाहे झिंगुनीक- बना लेब। तहूमे बेसी मसल्ला नै देबैक।’’
बीड़ी-सलाइ गोलगलाक जेबीमे रखि नागेसर लुखियाकेँ कहए आंगन गेलाह। ओना टाटक अढ़सँ लुखियो सुनि लेने छलीह। तेँ जबाब दैले मन उबिआइत रहनि। अवसर पाबि लुखिया बजलीह- ‘‘एते रास जे तीमन-तरकारीक ओरिआन केने छी से की हएत। अपने नै खेताह तँ आंगनवालीले मोटरी बान्हि देबनि।’’
अपिआरीमे फँसैत माँछ जेकाँ लड़िकाक माएकेँ फँसैत देखि डोमन बजलाह- ‘‘तइले की हेतैक, हिनको मोटरी बान्हि कन्हापर नेने जेबनि।’’
आँखि दाबि नागेसर लुखियाक बोली रोकै चाहलनि। मुदा लुखिया मुँहक बात बरतुहार दिशि नहि बढ़ि नागेसरे दिशि खसलनि- ‘‘बड़ बुधियार छथि। बुझब जे बेटाक बिआह केलहुँ तँ गामो-घर आ समधियो नीक भेटलाह। तेँ जेना-तेना कुटमैती कइये लेब।’’
लुखियाक बात सुनि नागेसरक मन हल्लुक भेलनि। लुखिया अपन भार दऽ बाधा हटौलक। नहि तँ बेर-बेर बाता-बाती होइत। समए पाबि डोमन जोरसँ बजलाह- ‘‘समधीने लग नुड़िआइल रहब आकि चलबो करब?’’
लुखियाक मन भीतरसँ चप-चप होइत। बजैक लेल लुस-फुस करैत। डोमनक बात सुनि बजलीह- ‘‘हिनके टा समधीन लगड़गर छन्हि, आनकेँ कि किछु छैक ?’’
मुस्की दैत नागेसर आंगनसँ निकलि बाध दिशि बिदा भेलाह। आँखि उठा-उठा डोमन गाम-घर देखैत जाइत। टोलसँ निकलि पछिम मुँहे एक पेड़िया धेलनि। गाछी टपि हाथक इशारासँ पच्छिम मुँहे देखबैत नागेसर कहलकनि- ‘‘पछबारि भाग जे चतरलाहा गाछ देखै छिऐक ओएह गामक सीमा छी।’’
दुनू बापुत देखि डोमन पुछलखिन- ‘‘उत्तरबरिया सीमा ?’’
  ओंगरीसँ देखबैत नागेसर- ‘‘ओ ढ़िमका जे देखै छिऐ, सएह छी।’’
  ‘‘दछिनबरिया।’’
  ‘‘तीन चारिटा जे छोटका गाछ एक ठाम देखै छिऐ ओ सीमेपर अछि। पीरारक गाछ छिऐक।’’
  बाधकेँ हियासि डोमन आँखिक इशारासँ बुचनकेँ देखलखिन। दुनू गोटे मने-मन अन्दाजलनि जे दू सए बीघासँ उपरेक बाध अछि। तहि बीच नागेसर बजलाह- ‘‘बुझलहुँ, बाबूक अमलदारीमे तँ सम्मिलिते छल मुदा हमरा दुनू भाँइमे बँटबारा भऽ गेल। उत्तरसँ हमर छी आ दछिनसँ भातिजक।’’
डोमन- ‘‘खोपड़ी कतऽ बनौने छी?’’
नागेसरकेँ पैछला घटना मन पड़लनि। ओंगरीसँ देखबैत कहए लगलखिन- ‘‘ओहि बँसबाड़ि आ गाछीक बीच एकटा खाधि छैक। जहिमे बिसनारिक गाछ सभ छैक। भदवारिमे पानि भरि जाइत छैक। बाँसोक पात आ गाछो सबहक पात ओहिमे खसि-खसि सड़ैत अछि। बिसनारियोक गाछ सभ सरि जाइत छैक। जाहिसँ कारी खट-खट पानि भऽ जाइत छैक। ढ़ाकीक-ढ़ाकी मच्छर फड़ि जाइत अछि। ओहि खाधिमे भैयाकेँ कालाज्वरक मच्छर काटि लेलकनि। कतबो दवाइ-बिरो भेलनि, मुदा नहि ठहरलखिन।’’
डोमन पुछलखिन- ‘‘अहाँ सभकेँ सरकारी अस्पतालमे दवाइ नहि दइए?’’
नागेसर कहलखिन- ‘‘से जँ दैतैक तँ एत्ते लोक मरबै करैत। बीस आदमीसँ उपरे हमरा गाममे कालाजारसँ मरलहेँ। अस्पतालमे किछु छैक थोड़े, ओहिना ईंटाक घर टा ठाढ़ अछि। दवाइकेँ के कहए जे कुरसियो-टेबुल बेचि नेने अछि।’’
बजैत-बजैत नागेसरक आँखि नोरा गेल। गमछासँ आँखि पोछि आगू बढ़ि गेला। तीनू गोटे खोपड़ी लग पहुँचलाह। बाधक बीचमे कट्ठा दुइएक परती, परतियेपर दुनू फरीकक खोपड़ियो आ पाँचटा अनेरुआ गाछो, दूटा साहोरक, दू-टा पितोझिया आ एकटा बज्र-केराइक। साहोरक गाछ सभसँ पुरान मुदा देखैमे सभसँ छोट। बज्र-केराइ सभसँ कम दिनक मुदा सभसँ नमहर। पितोझिया गाछक निच्चामे तीनू गोटे दुबिपर बैसि गप-सप्‍प करए लगलाह।
डोमन पुछलखिन- ‘‘रखबाड़ि–-राखी- कोना गिरहत सभ दैत अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘बीधामे पाँच घुर धानो आ गहूमो।’’
  ‘‘रब्बी, राइ माने दलि‍हन-तेलहन?’’
  ‘‘अंदाजेसँ देलक। अपनो सभ उखाड़ि दै छिऐ। जाहिसँ बोइनो भेल आ राखियो।’’
दुनू बापूत डोमन मने-मन हिसाब जोड़ए लगलाह। अगर कट्ठामे एक क्बीन्टल उपजत तँ पच्चीस किलो बीघामे भेल। जँ से नहि पचासो किलोक कट्ठा हएत, तैयो साढ़े बारह किलो बीघा भेल। सए बीघासँ उपरेक बाध अछि। तहिसँ या तँ पच्चीस क्वीन्टल, नहि तँ साढ़े बारह क्वीन्टल राखी -धान- सालमे जरुर होइतै हेतनि। तेकर बाद गहूम भेल, मड़ुआ भेल, आरो-आरो दलिहन-तेलहन भेल। दुइये माइ-पूत कते खाएत? हमरो बेटीकेँ अन्नक दुख नहि हेतै। मुस्की दैत डोमन बेटा दिशि तकलक। बेटो बाप दिशि ताकि आँखियेसँ गप-सप्‍प कऽ लेलक। कनी काल चुप रहि डोमन नागेसरकेँ पुछलखिन- ‘‘कथी-कथीक खेती बाधमे होइत अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘पान साल पहिने तक तँ अन्ने टाक खेती होइत छल। टो-टा कऽ सेरसो-तोड़ीक खेती। मुदा आब खेती बदलि रहल अछि।’’
मुस्की दैत पुन: आगू बजलाह- ‘‘की कहब, बुझू तँ राजा छी। दू सए बीघाकेँ अपन बपौती सम्पति बुझैत छी। दुनू सए बीघाक मालिक छी। एक बेर टाँहि दैत छलिऐक तँ जुआन-जुआन घसवहिनी सभ नाङरि सुटुका कऽ पड़ा जाइत छलि। मुदा आब से नहि करैत छी। खसल-पड़ल खेत, आड़ि पड़क घास कटैले ककरो मनाही नहि करैत छिऐ......।’’
किछु मन पाड़ि फेर बजलाह- ‘‘हँ तँ कहै छलौं जे जहि दिनसँ लोक बोरिंग गरौलक आ कोशियो नहरि एलैक तहि दिनसँ तँ बुझि पड़ैत अछि जे घरसँ बाध धरि लछमी सदिकाल नचितहि रहैत छथि। ककरो देखबै धानक बीआ पाड़ैत अछि तँ कियो रोपएले बीआ उखाड़ैत अछि। कियो कमठौन करैत अछि तँ कियो धान कटैत अछि, तँ कियो बोझ उघैत अछि। कियो दाउन करैत अछि, तँ कियो धान ओसबैत अछि, तँ कियो अगोँ रखैत अछि। कियो धान उसनियो करैत अछि तँ कियो पथार सुखबैत अछि। कियो मिलपर धान कुटबैत अछि तँ कियो चाउर फटकैत अछि। कते कहब।’’
डोमन बजलाह- ‘‘आनो-आनो चीजक खेती हुअए लागल होएत?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘ऐँह की कहब ! पचासो किस्मक तँ धानेक खेती हुअए लगल अछि। ओते धानक की नामो मन अछि। धानक संग-संग खाद-पानि दऽ कऽ गहूम, दलिहनक खेती सेहो होअए लगल अछि। एते दिन तँ सरिसोए-तोड़क खेती होइत छल। आब सूर्यमुखीक खेती सेहो होइत अछि। राशि-राशिक तीमन-तरकारी सेहो हुअए लगल अछि। बीघा दसेकमे पनरह-बीस गोटे नवका आमक कलम सेहो लगौलक अछि। ऐँह, की कहब, आन्ध्राक आम, मद्रासी आम सभ सेहो लोक लगौलकहेँ। अजीब-अजीब आमो सभ अछि। अइ बेर रोपू तँ पौरुकेँ सँ फड़ए लगत। जेहने देखैमे लहटगर लागत तेहने खाइयोमे।’’
डोमन पुछलखि‍न- ‘‘आमक ओगरबाहि कोना दैत अछि ?’’
नागेसर कहलखिन- ‘‘तीन आममे एक आम सरही आ चारि आममे एक आम कलमी। से जहि दिन तोड़ल जाएत तइ दिनक कहलौं, तहि बीच खसल-पड़ल आमक हिसाब नहि। तेहेन आम सभ अछि जे टुकलेसँ धिया-पूता खाए लगैत अछि। खटहो आमकेँ चून लगा कऽ मीठ बना लैत अछि। धियो-पूतो तते बुधियार भऽ गेल अछि जे अंगनेसँ चून नेने जाएत आ आममे लगा कऽ खाएत।’’
डोमन पुछलखिन- ‘‘आरो की सभ आमदनी बाधसँ अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘सभटा की मनो अछि। (ओंगरीसँ देखबैत) दछिनबारि भाग बीघा बीसेक गहींर खेत छल। चौरी। गोटे साल नहि, ने तँ पहिने सभ साल धान दहाइये जाइत छलैक। मुदा आब, जहियासँ पानिक सुविधा भेल, सभ गिरहत अपन-अपन खेतकेँ आरो खुनि कऽ पोखरि जेकाँ बना-बना माछ पोसए लगलहेँ। आन्ध्र प्रदेशक एकटा माछ छै ‘इलिस’। ऐँह, की कहब, (मुँह चटपटबैत) अपना सभ कहै छिऐ रौह, मुदा ओइ इलिस आगूमे किछु नहि। जहिना बढै़मे तहिना सुआद। हमरा की कोनो रोक अछि, हमहीं ओगड़ै छिऐ ने, जहिया मन भेल तहिया बन्सीमे दूटा मारि लेलहुँ। आ सभ खेलहुँ। सभसँ मुश्किल आब बनौनाइ भऽ गेल। काजेसँ ने छुट्टी। के ओते मेठैन कऽ कऽ खाएत। आब सुर्ज माथपर आबि गेल। चलू। भानसो भऽ गेल हएत। गरमे-गरम खाइमे नीक होइ छै।’’
तीनू गोटे बाधसँ घर दिसक रास्ता धेलनि। थोडे़ आगू बढ़ल तँ बँसवारिमे एकटा चिड़ै बजैत सुनलनि। बाजबो अजीब ढ़ंगक। मुस्की दैत नागेसर डोमनकेँ पुछलखिन- ‘‘कहू तँ ई चिड़ै की बजैत अछि?’’
कने अकानि कऽ डोमन बजलाह- ‘‘ई तँ पान-बीड़ी सिगरेट बजैत अछि।’’
बात सुनि नागेसर ठहाका दऽ हँसल। कने काल हँसि बजलाह- ‘‘ई चिड़ै अहाँ गाम सभ दिशि नहि अछि। जहिया कोशीक बाढ़ि अबैत छलैक तहियेसँ ई चिड़ै हमरा गाममे अछि। ई बजैत अछि- बढ़मा, बिसुन, महेश।’’
विचारक भिन्नताक कारणे डोमन पुनः चिड़ैक बोली अकानए लगल। बुचन सेहो अकानए लगल। अपना बातमे मजबूती अनैक लेल नागेेसर सेहो अकानए लगल। दुनू चुप। दुनू अपन-अपन दुविधामे। डोमन बुचनकेँ पुछलक- ‘‘बौआ, तूँ तँ इसकुलो देखने छहक, तांेही कहह?’’
मामूली सवालमे हारि मानब ककरा पसिन्न होइत। डोमनक मन विचारकेँ मथैत।
डोमनक बात सुनि बुचन बाजल- ‘‘बाबू, हमरा बुझि पड़ैत अछि जे ‘तुलसी, सूर, कबीर’ कहैत अछि।’’
तीनूक तीन मत, तेँ विवादक प्रश्ने नहि, तीनू अपन-अपन रमझौआमे ओझड़ाएल। तेँ तीनू चुपचाप आगू-पाछू घर दिशि बिदा भेलाह।
घरपर अबितहि डोमन बजलाह- ‘‘लोटा नेने आउ। कनी डोल-डाल दिशिसँ भऽ अबैत छी।’’
नागेसर आंगनसँ दू लोटा पानि आनि कऽ देलकनि। लोटामे पानि देखि बुचन बाजल- ‘‘बाबू, आगूमे कल-तल नै छैक?’’
डोमन बजलाह- ‘‘एखन तूँ बच्चा छह, नहि बुझल छह?’’ कहि आगू मुँहे गाछी दिशि बिदाह भेलाह। गाछी पहुँचि एकटा सरही आमक गाछक निच्चाँमे दुनू बापूत बैसि विचार-विमर्श करए लगलाह।
बुचन- ‘‘बाबू, कुटुमैती करै जोकर परिवार अछि। समलाइके मे बिआह-सादी, दुश्मनी आ दोस्ती छजैत छैक। लड़िकाक बाप नहि छैक तँ की हेतै। गाम-घरमे लोक मइटुगरकेँ अधलाह बुझैत छैक।’’
डोमन बुचनक बातो सुनैत आ मूड़ियो डोलबैत मुदा मने-मन परिवारक आमदनी आ ओहि आमदनीकेँ समटैक लूरि सोचैत रहथि। जहि हिसाबसँ आमदनीक जड़ि देखि रहल छी ओहि हिसाबसँ सम्हारैक लुरि नहि छैक। जँ दुनू एक सतहपर आबि जाए तँ परिवारकेँ आगू मुँहे ससरैमे बेसी समए नहि लगत। एतेटा बाध छैक। अलेल घास सभ दिन रहतै। बाध ओगड़ैमे की लगैत छैक? एक-दू बेर अइ भागसँ ओइ भाग घुमब मात्र छैक। अगर जँ अपनो काज ठाढ़ कऽ लिअए तँ बैसारियो नहि रहतैक आ आमदनियो बढ़ि जएतैक। हमरा बेटीकेँ एहि घर अएलासँ एकटा काजुल आ बुधियार समांग बढ़ि जेतै। जानकीकेँ सभ हिसाब-कनमा, अधपेइ, पौवा, असेरा, सेर, अढ़ैया, पसेरी, धार आ मन सँ लऽ कऽ बोरा-क्वीनटल धरि, जोड़ैक लूरि छै। तहिना कोड़ी -बीस वस्तु, सोरे- सोलह, सोरहा -सोलह सोरे, दर्जन–बारह, ग्रुस-बारह दर्जन, जोड़ा -धानक आँटी, दस, गाही–पाँच, गंडा–चारि, जोड़ा–दू, पल्ला- एक सभ बुझैत अछि। मनमे खुशी एलै। बाजल- ‘‘बौआ, ओना जानकी गिरहस्तीक काज सम्हारि दूटा गाइयोक सेवा कऽ लेत। मुदा तहिसँ दूधे टाक आमदनी बढ़त। जरुरत छैक खेतिओ बढ़बैक। तेँ नीक हएत जे एकटा गाए आ एकटा बड़द दऽ दिऐक। एकटा बड़द आ एकटा हरबाह भेने दू समांग अपन भऽ जेतै। जहिसँ बीघा दू बीघा खेतियो कऽ सकैत अछि।’’
बुचन- ‘‘अपना खेत जे नहि छैक?’’
बुचनक बात सुनि डोमन हँसए लगलाह। हँसैत बजलाह- ‘‘बौआ, समए एहन आबि गेल अछि जे खेतोबला सभ खेती छोड़ि नोकरियेक पाछु बौआ रहल अछि। जहिसँ खेती केनिहारक अभाव भऽ रहल छैक। गिरहस्तीक हाल बिगड़ि गेल छैक। जबकि जरुरत छैक खेतमे मेहनतिक। जे सभ किसान नहि बुझि रहलाह अछि।’’
बुचन- ‘‘कोना बुझत?’’
डोमन गंभीर होइत बजलाह- ‘‘बौआ खेतीमे बड़ बुद्धिक काज छै मुदा खेती दिन-दिन मूर्खेक हाथमे पड़ल जाइ छै, से सोचलहकहेँ?’’
तर्क-वितर्क कऽ दुनू बापुत तँइ कऽ लेलक जे कुटमैती करबे करब। मुदा एकटा जटिल प्रश्न आबि कऽ  आगूमे ठाढ़ भऽ गेलनि। ओ ई जे बिआह उट-पटाँग ढ़ंगसँ नहि होइ? रस्तासँ पाइक उपयोग होइ। गुन-धुन करैत दुनू बापूत घर दिशि बिदा भेलाह।
जाधरि डोमन पैखाना दिशिसँ अबैत ताधरि लुखिया चारि-पाँच बेर दौड़ि-दौड़ि आंगनसँ बान्हपर जा-जा देखलनि। मनमे उड़ी-बीड़ी जेना लगल रहनि। जे कुटमैतीमे कोनो तरहक गड़बड़-सड़बड़ नहि हुअए। नहि तँ लोक पीकी मारत। कहत जे मौगीक मुख्तिआरी छी ने। बिनु मरदक मौगी बेलगामक होइते अछि। कहलो गेल छै-‘‘राँड़ मौगी साँढ़।’’ फेर मनमे उठलनि जे किछु होउ बिआह तँ हमरे बेटाक होएत। तेँ ककरो ओंगरी बतबैक रस्ता नहि रहए देबैक। जहिना बड़तुहार कहताह तहिना हमहूँ करब। जँ दुनू गोटेक मिलान रहत तँ किअए कोइ आँखि उठाओत। एते बात मनमे अबितहि बड़तुहारकेँ लुखिया अबैत देखलनि। बान्ह परसँ दौड़ले आंगन आबि हाँइ-हाँइ कऽ थारी साँठए लगलीह।
हाथ-पाएर धोइतहि नागेसर डोमनकेँ कहलकनि- ‘‘पहिने भोजने कऽ लिअ।’’
आगू-आगू लोटा नेने नागेसर आ पाछु-पाछु दुनू बापुत डोमन आंगन ऐलाह। पीढ़ीपर बैसितहि नागेसर थारी आनि आगूमे देलकनि। आँखि घुमा कऽ देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, समधीनियोकेँ अढ़मे बजा लिअनु। विआहक सभ गप पक्का-पक्की कइये लेब। बैसारपर जखने गप उठाएब आकि चारु दिससँ लोक आबि अन्टक-सन्ट गप चालि देत।’’
आँखिक इशारासँ नागेसर भौजाइकेँ सोर पाड़ि बैसैले कहलक। तहि बीच डोमन कहलखिन- ‘‘समैध, समधीनकेँ पुछिअनु जे कोना बेटाक बिआह करतीह?’’
नागेसरकेँ अगुआ लुखिया बजलीह- ‘‘अहाँ सभ मरदा-मरदी गप करु। हमरा कोनो चीजक लोभ नहि अछि। नीक मनुक्ख घर आबए, बस एतबे लोभ अछि।’’
मने-मन नागेसर सोचैत जे हमर कतबो मोजर अछि, तइसँ की? कोनो की हमरा बेटा-बेटीक विआह हएत? तेँ हम अनेरे मुँह दुरि किअए करब। बाजल- ‘‘समैध, अहाँ अपने मुँहसँ बजियौक जे कोना करब?’’
भात-दालि सनैत डोमन बजलाह- ‘‘समैध, जहिना अहाँक भातिजक बिआह हएत तहिना तँ हमरो बेटीक हएत.....। लुखियाकेँ खुश करै दुआरे पुन: आगू बजलाह- ‘‘हमर बेटी साक्षात् लछमी छी। साल भरि की दसोसाल घुमि कऽ लड़की ताकब तँ ओहन नहि भेटत। तहूमे आब? आब तँ लोक मनुक्ख थोड़े घर अनैत अछि, अनैत अछि रुपैआ।’’
नागेसर टाटक अढ़मे बैसलि भौज दिशि तकैत बाजल- ‘‘खर्च-बर्च करै लेल किछु तँ चाहबे करी....।’’
नागेसरक बातकेँ कटैत लुखिया बजलीह- ‘‘नै ! हम ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपना घर नै आनब।’’
नागेसर भौजक गप्प सुनि चुप भऽ गेल।
मुस्की दैत लुखिया बजलीह- ‘‘जखन दुआरपर आबि बेटा मंगलनि तँ हम दऽ देलियनि। आब हमरा की अछि। दू कौर अन्न आ दू बीत कपड़ा टा चाही। घर तँ आब ओकरे सबहक -बेटे-पुतोहुक- हेतै।’’
डोमन बजलाह- ‘‘समैध, पाँच गोटे जे बरिआती चलब, हुनकर सुआगत हम नीक जेकाँ करबनि। बड़-कनियाँकेँ, जे नव घर ठाढ़ करैक वस्तु अछि से तँ देबे करब। तेकर अतिरक्ति एकटा बड़द आ एकटा लगहरि गाए सेहो देब।’’
सबहक मुँहसँ हँसी निकलल। बिआहक दिन तँइ भऽ गेल। मुस्की दैत लुखिया बजलीह- ‘‘आब की हम कहबनि जे समधीनो हमरे दऽ दोथु।’’
ठहाका दैत डोमन उत्तर देलकनि- ‘‘बाह-बाह, तब तँ दुनू रोटी चाउरेक।’’
चारि बजे सुति-उठि चाह पीबि, पान खा डोमन नागेसरकेँ कहलखिन- ‘‘समैध, सभ बात तँ तइये भऽ गेल। आब चलब।’’
दुनू जोड़ धोती नागेसर आंगनसँ आनि आगूमे रखि देलकनि। धोती देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, कतबो गरीब छी तेँ की मुदा इज्जति बचा कऽ रखने छी। बेटीक दुआरपर कोना धोती पहिरब?’’
टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहथि। डोमनक बात सुनि दोगसँ बाजलीह- ‘‘समैधकेँ कहिअनु जे जखन बेटी आओत तखन ने बेटीक घर हेतनि, ताबे तँ हमर छी कीने। हम दैत छिअनि।’’
ठहाका दैत डोमन बजलाह- ‘‘जखन हमर बेटी एहि घर आओत तखन ने ओ समधीन हेतीह आकि अखने?’’
तहि बीच पीहुआ, सभकेँ गोड़ लगलक। एक्कैस रुपैआ डोमन पीहुआ हाथमे देलखिन।
थोड़े दूर अरिआति नागेसर घुमैत बाजल- ‘‘समैध, आब बढ़िऔक। नवम् दिनक दिन भेल। अहाँ काजमे लगि जाउ आ हमहूँ लगि जाइ छी।’’
डोमन दुनू बापुत बिदा भेलाह। आगू बेटीक बिआहक ओरिआओन रहनि किन्तु मनपर नचैत रहनि लुखियाक गप्प- ‘ककरो बेटीकेँ पाइ लऽ कऽ अपन घर नै आनब।’ देह सिहरि गेलनि बेटा दिश तकलनि। ओहो आब विआह जोगर भऽ गेल रहए।

Thursday, January 1, 2009

शहीद दुर्गानन्द झा- जितेन्द्र झा

जितेन्द्र झा
के राखत रुमालक इज्जति

एकटा मैल, पुरान रुमाल आ गीताक किताब चीरकालधरि सुरक्षित राखऽ चाहैत छथि अरविन्द ठाकुर । कियाकी बलिदानक चिन्हासी आ मित्रताक याद सहजने अछि ई रुमाल । जर्जर रुमाल याद दिअबैत छन्हि हिनका जेल जीवन आ दुर्गानन्दस“गे बिताओल समय ।

शहिद दुर्गानन्द झाके फांसी देलाक बाद काठमाण्डूक केन्द्रिय कारागारमे हिनका रुमाल आ गीताक पोथी सोंपल गेलनि । गीताक किताब त नहि मुदा रुमाल एखनधरि सहजने छथि अरविन्द । ओहि गीता किताबक प्रतीकके रुपमे ई एकटा ओहने गीता रखने छथि । प्रजातन्त्रक योद्धा ठाकुर ई रुमालक संरक्षण के करत से खोजि रहल छथि । एहि वास्ते ओ बहुतो नेताके आग्रह कऽ चुकल छथि, मुदा केओ हिनक आग्रह के औचित्य नहि बुझि सकल । नेपालक संग्रहालयसभ संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गत पडैत अछि । संस्कृतिमन्त्री नेपाली कांग्रेसक मिनेन्द्र रिजाल छथि । ठाकुर कहैत छथि जे मिनेन्द्र रिजालसहित कतेकोस“ अनुरोध कऽ चुकल छी एकर संरक्षणक लेल मुदा केओ नहि सुनलक । जत्तऽ दुर्गानन्द झाक नामे उपेक्षित अछि, ओत्तऽ हुनक रुमालके के पुछए ? ठाकुरक माग छन्हि जे रुमालके राष्ट्रिय संग्रहालयमे राखल जएबाक चाही ।
दुर्गानन्दके एकटा शहिदक रुपमे नेपाल सरकार सम्मान नहि कऽ सकल अछि एहनमे गीता आ रुमालक खोजी आ संरक्षण के करत ?
वि.स. २०२० माघ १५ गते दुर्गानन्द झाके फांसी देल गेल रहनि । ओहिके तीन दिनबाद जेलर ठाकुरके दुनू वस्तु देने रहथि । आब ४ दशक होबऽ लागल अछि ओहि दिनके, जहिया तत्कालीन राजापर बम फेकबाक आरोपमे दुर्गानन्द झाके फांसी चढाओल गेल रहनि । २०१८ सालमे जनकपुरक जानकी मन्दिरमे तत्कालीन राजा महेन्द्रपर बम प्रहार भेल छल । जाहिमे महेन्द्र सकुशल बांचि गेल छल । दुर्गानन्द आ अरविन्द बमप्रहारक आरोपमे जेल सजाय काटैत रहथि । नावालिग भेलाक कारणे अरविन्दके फांसी नहि देल गेलनि । जेल जीवनक चरम यातनाके याद करैत अरविन्दक आंखि नोरा जाइत छन्हि ।
अरविन्दक अनुसार दुर्गानन्द झाके तडपा तडपाकऽ मारने रहए तत्कालीन क्रुर शाही शासक । ठाकुर अनुसार एकबेर रस्सीपर लटकाओल गेल फेर कनी काल सांस फेरऽलेल छोडल गेल । तहन फंसरी पर लटकाकऽ यातना देल गेल । आ अन्तमे गोली दागल गेल दुर्गानन्द झापर । एतेक केलाक बादो क्रुुरता जारीए रहलै । दुर्गानन्दके शवधरि हुनक परिवार जनके नहि देल गेल छलैक ।


राज्य शहिदक जीवनीके सेहो उन्टा पुन्टाकऽ राखि देने अछि । कक्षा १० के पाठयपुस्तकमे दुर्गानन्द जीवनी अछि जाहिमे हुनक बलिदानी तिथिए गलत लिखल छैक ।

दूर्गानन्द झाक बलिदानके सम्मान करबाक राज्यके दायित्व छैक । मुदा साम्प्रदायिक मानसिकतासं जकडल नेता, मन्त्रीसभ एकरा अनदेखी करैत रहल । लगैछ जे दुर्गानन्द झाके शहिदक रुपमे चिन्हाबहोमे राज्यके लज्जाबोध छैक ।

हुनका प्रतिक विभेदसं दुखित छथि अरविन्द । नेपालमे प्रजातन्त्र एलाक बाद वएह सभ कुर्सी पओलक जे दुर्गानन्दसंगे आन्दोलनमे छल । मुदा ओ सभ कहियो दुर्गानन्द आ हुनक माय आ पत्नीके याद नहि कएलक । घरक एक्कहिटा सहारा दुर्गानन्दके फांसीक बाद घर सभदिनक लेल अन्हार अन्हार भऽ गेलै ।

प्रजातन्त्र एलाक बाद सत्तामे सभसं बेशी समय रहल नेपाली कांग्रेस दूर्गानन्द झाके अपन कार्यकर्ता कहैत गर्व करैत अछि मुदा ओकर व्यवहारमे मात्र घृणेटा देखाइ दैत छैक । शहिद झाक माय सुकुमारी देवी आ पत्नी काशी देवीके गुजर बसर करब मुश्किल छलैक । तहिया कोनो कांग्रेसी नेताके याद नहि एलै दुर्गानन्दक शोणित । काशी देवी सिकीमौनी बुनिकऽ संघर्षक पथपर आगु बढैत रहली । वएह काशी देवी आइ संविधान सभाक सदस्य छथि । तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी हुनका समानुपातिक सभासद् बनौने छन्हि ।
नेपाल एखन शहिद सप्ताह मनाबि रहल अछि । शहिदक नामपर नेता लम्बा चौडा भाषण दैत अछि । तालीक गडगडाहटि सेहो सुनाइत छै । मुदा दुर्गानन्द सनके शहिदके पुछनिहार कियो नहि । शहिद परिवारके घरमे चुल्हि जरलै की नहि से के देखत ? नेपालमे बलिदानी देनिहार सभके इएह गति छैक । शहिद परिवारक व्यथा कतबो बखानी कम्मे हएत । वंशवाद र परिवारवादसं रंगल कांग्रेस दुर्गानन्दक उपेक्षासं खिन्न छथि अरविन्द । ओ कहैत छथि हमसभ इएह दिन देखबालेल बलिदान नहि कएने रहौं ।

नेपालमे शहिदक नामसं कतेको प्रतिष्ठान, अस्पताल, ट्रष्ट संचालित अछि । मुदा दुर्गानन्दक नामसं किछु नहि । हुनक नामक पाछा कोइराला या एहने किछु थर लागल रहैत त बहुत किछु सम्भव छलै ।
दुर्गानन्दके उचित सम्मान करबास“ वि.पी. कोइराला, गिरिजाप्रसाद कोइरालासभके के रोकलकै से बुझऽ चाहैत अछि जनता । जकर शोणित पर प्रजातन्त्रक जग निर्माण भेलै तकरे सं सौतिनिञा व्यवहार किया ? कांग्रेस पार्टीए जहन कोनो मतलब नहि रखलक शहिदसं तहन दलीय राजनीतिमें आन पार्टी आ सरकारके देखबाक बाते कोन ?


गिरिजाप्रसादक मगरमच्छक नोर
संविधान सभामे जहन पहिल बेर सभासद् आ तत्कालीन कांग्रेस सभापति गिरिजाप्रसाद कोइराला काशी देवीके देखलनि त कोइरालाके आंखि नोरा गेल रहनि । घटनाक प्रत्यक्षदर्शी सभासद् वसन्तीदेवी झा कहैत जे हमही गिरिजाके याद दिऔलियनि जे ई दुर्गानन्द झाक पत्नी छथि । तहन भावविह्वल होइत गिरिजा काशीदेवीके हाथ पकरिक कहनेरहथि हम किछु नहि कऽ सकलौं । जनकपुरक सभा, सम्मेलनमे गिरिजाप्रसादसं काशीदेवीक भेट होइत छलन्हि ।
दुर्गानन्दके चिन्हाबऽ लेल एउटा शालिक बनाओल गेल अछि धनुषा जिलाक जटहीमे । देशके लेल ओहन बलिदानी देनिहारक लेल सरकारके कोनो आन महत्वपुर्ण जगह नहि भेटलै । की दुर्गानन्दक प्रतिमा लेल राजधानी काठमाण्डू छोट पडि गेल रहै ? जनकपुरक कोनो चौक खाली नहि रहै ? जानकी मन्दिरमे बम काण्ड भेल छलै, मन्दिर परिसरमे शालिक रखलासं मन्दिर अपवित्र भऽ जइतै ?
काठमाण्डूके केन्द्रमे शहिद गेट छैक, की ओत्त दुर्गानन्दके शालिक रखबाक हैसियत नहि रहै ? संघीय गणतन्त्र नेपालक राजधानी काठमाण्डूमे एखनो शाहवंशीय राजासभक शालिक आ राणा क्रुर शासक सभहक चिन्हासी शोभाक वस्तु बनल अछि ।
व्यवहारमे दुर्गानन्दसं एत्तेक भेदभाव केनिहार कांग्रेस पार्टी दुर्गानन्दके भजाबऽसं पाछु नहि अछि । दूर्गानन्द झाक नाम बेचिकऽ भोट बटोरबाक काज सेहो चुनावमे होइते अछि । ततबे नहि दूर्गानन्द झाक नाममे संघसंस्थारुपी दोकान सेहो खोलल गेल अछि । जकर काज छैक मात्र दुर्गानन्दक नामपर लोकके सहानुभूति आ पाइ बटोरब । (साभार विदेह www.videha.co.in)

बहीन - जगदीश प्रसाद मण्डल



  ‘आब अधिक दिन माए नहि खेपतीह। ओना उमेरो नब्बे बर्खक धत-पत हेबे करतनि। तहूँमे बर्ख पनरह-बीसेकसँ कहियो बोखार के कहए जे उकासियो नहि भेलनि अछि। एक तँ ओहिना पाकल उमेर तहिपर सँ देहक रोगो पछुआएल, तेँ भरिसक एहिबेरि उठि कऽ ठाढ़ हेबाक कम भरोस। किएक तँ एक ने एक उपद्रव बढ़िते जाइत छन्हि। अन्नो-पानि अरुचिये जेकाँ भेलि जाइ छनि।’’ -भखरल स्वरमे राधेश्याम पत्नीकेँ कहलखि‍न।
पतिक बात सुनि, कने काल गुम्म रहि, रागिनी बाजलि- ‘‘ककरो औरुदा तँ कियो नहिये दऽ सकैत अछि। तहन तँ जाधरि जीबैत छथि ताधरि हम-अहाँ सेबे करबनि की ने?’’
  ‘हँ, से तँ सएह कऽ सकैत छियनि। मुदा जिनगीक कठिन परीक्षाक घड़ी आबि गेल अछि। एते दिन जे केलहुँ, ओकर ओते महत्व नहि जते आबक अछि। किएक तँ कखनो पानि मंगतीह वा किछु कहती, तहिमे जँ कनियो देरी हएत आ कियो सुनि लेत तँ अनेरे बाजत जे फल्लांक माए पानि दुआरे किकिहारि कटैत रहैत छथिन। मुदा बेटा-पुतोहू तेहन जे छै घुरि कऽ एको-बेरि तकितो नहि छन्हि। ककरो मुँहमे ताला लगेबै। देखिते छियै जे गाममे कोना लोक झुठ बाजि-बाजि झगड़ो लगबैत आ कलंको जोडै़त अछि। तेँ चैबीसो घंटा ककरो नहि ककरो लगमे रहए पड़त। जँ से नहि करब तँ अंतिम समएमे कलंकक मोटरी कपारपर लेब।’’
 ‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा बच्चा सबहक हिसाबे कोन, तहन तँ दू परानी बचलहुँ। बेरा-बेरी दुनू गोटे रहब। अन्तुका काज अहूँ छोड़ि दिऔ। किएक तँ अंगनेक काज बढ़ि गेल। बहीनो सभकेँ जनतब दइये दिअनु।’’
  ‘‘अपनो मनमे सएह अछि। जँ तीनू बहीनि आबि जाएत तँ काजो बँटा कऽ हल्लुक भऽ जाएत। ओना अंगनासँ दुआरि धरि काजो बढ़बे करत। जखने सर-संबंधी, दोस्त-महिम बुझताह तँ जिज्ञासा करए अएबे करताह। जखन दरबज्जापर औताह तँ सुआगत बात करै पड़त”।
मूड़ी डोलबैत रागिनी बजलीह- ‘‘हँ, से तँ हेबे करत।’’

  ‘‘एखन निचेन छी आ काजो करैऐक अछि। तेँ अखने तीनू बहीनियो आ ममोकेँ जानकारी दइये दैत छिअनि।’’ आन कुटुम्बकेँ एखन जानकारी देब जरुरी नहि छै। मोबाइलमे मामाक नम्बर लगौलक। रिंग भेलै।

 ‘‘हेलो, मामा। हम राधेश्याम।’’
  ‘‘हँ, राधेश्याम। की हाल-चाल?’’
  ‘‘माए, बड़ जोर दुखित पड़ि गेलीह।’’
 ‘‘एखन हम एकटा जरुरी काजमे बँझल छी। साँझ धरि आबि रहल छी।’’ मोबाइल बन्न कऽ राधेश्याम जेठ बहीनि गौरीक नम्बर लगौलक।
 ‘‘हेलो, बहीनि। माए दुखित पड़ि गेलखुन।’’
  ‘‘एखन हम स्कूलेमे छी आ अपनहुँ कओलेजेमे छथि। छुट्टीक दरखास्त दइये दैत छिअए। साँझ धरि पहुँच जाएब।’’
  मोबाइल बन्न कऽ छोटकी बहीनिक नम्वर लगौलक।
  ‘‘सुनीता। हम राधेश्याम।’’
  ‘‘भैया, माए नीके अछि की ने?’’
  ‘‘एखन की नीक आ कि अधलाह। तीनि दिनसँ ओछाइन धेने अछि। तेँ किछु कहब कठिन।’’
  ‘‘हम अखने छुट्टीक दरखास्त दऽ आबि रहल छी।’’
  ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि मझिली बहीनि रीताक नम्बर लगौलक।
  ‘‘हेलो, रीता। हम राधेश्याम। माए, बड़ जोर दुखित छथुन।’’

   ‘भैया, हम तँ अपने तते फिरीसान छी जे खाइक छुट्टी नहि भेटैत अछि। काल्हियेसँ दुनू बच्चाक प्रतियोगिता परीक्षा छियै’
बिना स्विच ऑफ केनहि राधेश्याम मोबाइल राखि अकास दिशि देखए लगल। ठोर पटपटबैत- ‘बच्चाक परीक्षा......, मृत्यु सज्जापर माए....! केकरा प्राथमिकता देल जाए? एक दिशि, जे बच्चा एखन धरि जिनगीमे पएरो नहि रखलक, सौंसे जिनगी पड़ल छैक। दोसर दिशि कष्टमय जिनगीमे पड़ल बृद्ध माए। खैर, सभकेँ अपन-अपन जिनगी होइ छैक आ अपना-अपना ढ़ंगसँ सभ जीबए चाहैत अछि। हम चारि भाए बहीनि छी तेँ ने दोसरपर ओंगठल छी। मुदा जे असकरे अछि, ओ कोना माए-बापक पार-घाट लगबैत अछि। किछु सोचितहि छल कि नव उत्साह मनमे जगल। नव उत्साह जगितहि नजरि पाछु मुँहे ससरल। चारु भाए-बहीनिमे माए सभसँ बेसी ओकरे मानैत छलि आ ओकर सेबो केलक। कारणो छलैक जे बच्चेसँ ओ रोगा गेल छलि। मुदा आश्चर्यक बात तँ ई जे जेकरा माए सभसँ बेसी सेवा केलक वएह सभसँ पहिने बिसरि रहलि अछि।
  गोसाँइ डूबैत-डूबैत मामो आ दुनू बहीनि-बहिनोइ पहुँच गेलखि‍न।
अबितहि डॉ. सुधीर -छोट बहिनोइ- आला लगा सासु माएकेँ देखि कहलखिन- ‘‘भैया, माए बँचतीह नहि। मुदा मरबो दस दिनक बादे करतीह। तेँ एखन ओते घबड़ेबाक बात नहि अछि। अखन हम जाइ छी, मुदा बहीनि डॉ. सुनिता रहतीह। ओना हमहूँ दू-दिन तीन-ि‍दनपर अबैत रहब।’’
  डॉ. सुधीरक बात सुनि सभकेँ क्षणिक संतोष भेलनि। मामा कहलखिन- ‘‘भागिन, ओना हम ककरो छींटा-कस्सी नहि करैत छिअनि मुदा अपन अनुभवक हिसाबे कहैत छिअह जे भरि दिन तँ स्त्रीगण सभ मुस्तैज रहथुन मुदा रातिमे नहि। ओना हमरो गाम बहुत दूर नहिये अछि। एखन तँ धड़फड़ाइले चलि एलहुँ। तेँ एखन जाइ छी। काल्हिसँ साँझू पहरकेँ एबह आ भोर कऽ चलि जेबह। भरि राति दुनू माम-भगिन गप-सप्‍प करैत ओगरि लेब।’’
दुनू बहिनोइयो आ मामो चलि गेलखिन।
  ‘‘आइ सातम दिन माएकेँ अन्न छोड़ब भऽ गेलनि। दू-चारि चम्मच पानि आ दू-चारि चम्मच दूध, मात्र अधार रहि गेल छनि।’’ -आंगनसँ दरवज्जापर आबि रागिनी पतिकेँ कहलखि‍न।
  पत्नीक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगलाह। मनमे उठलनि चारु भाए-बहीनिक पारिवारिक जिनगी। कतेक आशासँ दुनू गोटे माए-पिता हमरा चारु भाए-बहीनिकेँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा, विआह-दुरागमन करा परिवार ठाढ़ कऽ देलनि। जहिना गौरी जेठ बहीनि एम.ए. पास अछि। तहिना एम.ए. पास बहिनोइयो छथि। हाई स्कूलमे बहीन नोकरी करैत अछि तँ कौलेजमे बहिनोइ। परिवारक प्रतिष्ठा, समाजोमे बढ़वे केलनि जे कमलनि नहि। तहिना छोटकियो बहीनि अछि। बहीनो डॉक्टर आ बहिनोइयो डॉक्टर। तहिना तँ पिताजी मझिलियो बहीनिकेँ केलनि। दुनू परानी इंजीनियर। बम्बइमे दुनू गोटे नोकरी करैत अि‍छ।
 जहिना तीनू बहीनि पढ़ल-लिखल अछि तहिना बहिनोइयो छथि। अजीव नजरि पितोजीक छलनि। मनुष्यक पारखी। तेँ ने बहीनिक विआह समतुल्य बहिनोइक संग केलनि। एक माए-बापक तीनू बेटी, पढ़ल-लिखल, एक परिवारमे पालल-पोसल गेलि, मुदा तीनूक विचारमे एते अंतर कोना अबि गेलै। एहि प्रश्नक जबाव राधेश्यामकेँ बुझैमे अयबै नहि करनि। मन घोर-घोर होइत। एक दिशि माइक अंतिम अवस्थापर नजरि तँ दोसर दिशि मझिली बहीनिक व्यवहारपर।
विचारक दुनियाँमे राधेश्याम औनाए लगलाह। प्रश्नक जबाब भेटिबे ने करनि। अपन परिवारपर सँ नजरि हटा बहीनि सभक परिवार दिशि नजरि दौड़ौलनि।
  गौरीक ससुर उमाकान्त हाई स्कूलक शिक्षक रहथिन। अपने बी.ए. पास मुदा पत्नी साफे पढ़ल-लिखल नहि। नाओ-गाँव लिखल नहि अबनि। ओना पिता पंडित रहथिन। मुदा बेटी कऽ परिवार चलबैक लूरिकेँ बेसी महत्व देथिन। जाहिसँ कुशल गृहिणी तँ बनि जाएत, मुदा ने चिट्ठी-पुरजी पढ़ल होइछै आ ने लिखल। ओना जरुरतो नहि रहै। किऐक तँ ने पति-पत्नीक बीच चिट्ठी-पुरजीक जरुरत आ ने कुटुम्ब-परिवारक संग। मुदा दुनू परानी उमाकान्त आ सरिताक बीच असीम स्नेह। मास्टर सहाएबकेँ अपन बाल-बच्चासँ लऽ कऽ विद्यालयक बच्चा सभकेँ पढ़बै-लिखबैक मात्र चिन्ता। जहि पाछू भरि दिन लगलो रहथि। जखन कि पत्नी सरिता परिवारक सभ काज सम्हारैत। एखनुका जेकाँ लोकक जिनगियो फल्लर नहि, समटल रहै। गौरीक परिवारपर सँ नजरि हटा राधेश्याम छोटकी बहीनि डॉ. सुनिताक परिवारपर देलनि। जहिना बहीनि डॉक्टरी पढ़ने तहिना बहिनोइयो। जोड़ो बढ़ियाँ। सुनिताक ससुर बैद्य रहथिन। जड़ी-बुट्टीक नीक जानकार। जहिना जड़ी-बुट्टीक जानकार तहिना रोगो चिन्हैक। जहिसँ समाजमे प्रतिष्ठो नीक आ जिनगियो नीक जेकाँ चलनि। तेँ अपन चिकित्साक वंशकेँ जीवित रखैक दुआरे बेटाकेँ डॉक्टरी पढ़ौलनि। पत्नियो तेहने। अंगनाक काज सम्हारि, बाध-बोनसँ जड़िओ-बुट्टी अनैत आ खरलमे कुटबो करैत रहथि। दवाइ बैद्यजी अपने बनाबथि किऐक तँ मात्राक बोध गृहिणीकेँ नहि रहनि। छोटकी बहीनिक परिवारपर सँ नजरि हटा मझिली बहीनिक परिवारपर देलनि। रीताक ससुर मलेटरिक इंजीनियरिंग विभागमे हेल्परक नोकरी करैत। अपनहि विचारसँ मलेटरिऐक बेटीसँ विआहो -लभ-मैरिज- केने। मलेटरिक नोकरी, तेँ पाइयो आ रुआबो। हाथमे सदिखन हथियार तेँ मनो सनकल। मुदा बेटा-बेटीकेँ नीक जेकाँ पढ़ौलनि। जहिना रीता इंजीनियरिंग पढ़ने तहिना घरोबला। दुनू बम्बइक कारखानामे नोकरी करैत। कमाइयो नीक खरचो नीक, तहिना मनक उड़ानो नीक। एकाएक राधेश्यामक मनमे उठल जे आब तँ माइयक अंतिमे समए छी तेँ एक बेरि रीताकेँ फेरि फोन कऽ कऽ जानकारी दऽ दिअए। मोवाइल उठा रीताक नम्वर लगौलनि। रिंग भेल बाजलि‍-  ‘‘हेलो, हम राधेश्याम।’’
‘‘हेलो, भैया। अखन हम स्टाफ सबहक संग काजमे व्यस्त छी।’’
   रीताक जबाव सुनि राधेश्याम सन्न रहि गेलाह। रातिक दस बजैत। इजोरियाक सप्तमी अन्हार-इजोतक बीच घमासान लड़ाइ छिड़ल। किछु पहिने जहि चन्द्रमाक ज्योति अन्हारपर शासन करैत, वएह चन्द्रमा पछड़ि रहल अछि। तेज गतिसँ अन्हार आगू बढ़ि रहल अछि। तहि बीच छोटकी बहीन डॉ. सुनीता आंगनसँ आबि भाय राधेश्यामकेँ कहलक- ‘‘भैया, हम तँ भगवान नहि छी, मुदा माइयक दशा जहि तेजीसँ बिगड़ि रहल छनि, तहिसँ अनुमान करैत छी जे काल्हि साँझ धरि परान छुटि जेतनि।’’
  एक दिशि माइक अंतिम दशा आ दोसर दिशि रीताक बिचारक बीच राधेश्यामक धैर्यक सीमा डगमग करए लगलनि। विचित्र स्थिति। जिनगीक तीनिबट्टीपर वौआए लगलाह। तीनिबट्टीक तीनू रस्ता तीनि दिस जाइत। एक रास्ता देवमंदिर दिशि जाइत तँ दोसर दानवक काल-कोठरी दिशि। बीचक रास्तापर राधेश्याम ठाढ़। एकाएक निर्णय करैत राधेश्याम बहीनि सुनिताकेँ कहलखिन- ‘‘कने गौरियो कऽ बजाबह।’’
  आंगन जा सुनिता गौरीकेँ बजौने आएलि। दुनू बहीनिक बीच राधेश्याम बजलाह- ‘‘बहीनि, जहिना हमर बहीन रीता तहिना तँ तोड़़ो सबहक छिअह। तेँ, तोहूँ सभ एक बेरि फोन लगा माइक जानकारी दऽ दहक। हम निर्णय कऽ लेलहुँ जे जहिना एहि दशामे माइक रहनहुँ, ओकरा अपन धिया-पूतासँ अधिक नहि सुझैत छैक तहिना हमहूँ ओकरा भरोसे नहि जीबैत छी। तेँ जँ माए के जीवितमे नहि आओत तँ मुइलाक बाद नहो-केश कटबैक जानकारी नहि देबइ। हमरा-ओकरा बीच ओतबे काल धरि संबंध अछि जते काल माइक प्राण बँचल छैक। कहलो गेल छैक ‘भाए-बहीनि महीसिक सींग, जखने जनमल तखने भिन्न।’ मन तँ होइत अछि जे भने ओ एखन स्टाफ सभक बीच अछि, तेँ एखने सभ बात कहि दियै। मुदा कहनहुँ तँ किछु भेटत नहि, तेँ छोड़ि दैत छियै।’’
  जहिना अकासमे उड़ैत चिड़ैकेँ बंश रहितहुँ परिवार नहि होइ छै तहिना जँ मनुक्खोक होइ तँ अनेरे भगवान किऐक बुद्धि-विवेक दइ छथिन। किऐक नहि मनुक्खोकेँ चिड़ैइये-चुनमुनी आ कि चरिटंगा जानवरेक जिनगी जीबए देलखिन।’ बजैत-बजैत राधेश्यामोक आ दुनू बहीनियोक करेज फाटए लगलनि। आँखिसँ नोर टघरए लगलनि। भाए-बहीनिक टूटैत संबंधसँ सभ अचंभित हुअए लगलथि। सबहक हृदयमे रीता नचए लगलनि। बच्चासँ विआह धरिक रीताक जिनगी सबहक आँखिमे सटि गेलनि। एक दिशि रीता बम्बइक घोड़दौड़ जिनगीक प्रतियोगितामे आगू बढ़ए चाहैत छलि तँ दोसर दिशि देवालमे टांगल फोटो जेँका सबहक हृदयमे चुहुट कऽ पकड़ने। जहिना बाँसक झोंझसँ बाँस काटि निकालैमे कड़चीक ओझरी लगैत तहिना धि‍या-पूताक ओझरीमे रीता।
  ‘तीनू ननदि-भौजाइ गौरि, सुनिता आ रागिनी माए लग बैसि मने-मन सोचए लगलीह। कियो-ककरो टोकैत नहि। तीनू गुमसुम। सिर्फ आँखि नाचि-नाचि एक-दोसरपर जाइत। मुदा मन श्वेतबान रामेश्वरम् जेँका। एक दिशि जिनगी रुपी भूमि स्थल जेँका विशाल भूभाग देखैत तँ दोसर दिशि मृत्यु रुपी अथाह समुद्र। यएह थिक जिनगी आ जिनगीक खेल। जहि पाछु पड़ि लोक आत्माकेँ बलि चढ़वैत। तहि बीच माए बाजलि- ‘रीता.....।’ रीताक नाम सुनि तीनूक हृदयमे ऐहेन धक्का लगलनि जहिसँ तीनू तिलमिला गेलीह।
रातिक एगारह बजैत। गामक सभ सुति रहल। इजोरियो डुबैपर। झल-अन्हार। दलानक आगूमे, कुरसीपर बैसि राधेश्याम आँखि मूनि अपन वंशक संबंधमे सोचैत रहथि। मनमे अएलनि जे आइ सप्तमीक चान डुबि रहल अछि, अन्हार पसरि रहल अछि, मुदा कि कल्हुका चान आइसँ कम ज्योतिक होएत? की अगिला ज्योति पैछला अन्हारक अनुभव नहि करत? सभ दिनसँ अन्हार-इजोतक बीच संघर्ष होइत आएल अछि आ होइत रहत। फेरि मनमे उठलनि जे आजुक राति हमरा लेल ओहन राति अछि जे भरिसक माइक जिनगीक अंतिम राति हएत। जनिका संग हजारो राति बीतल ओहिपर विराम लगि रहल अछि। विचारक दुनियाँमे उगैत-डूबैत राधेश्याम। तहिकाल शबाना पोतीक संग पहुँचलीह। दलान-आंगनक बीच रास्तापर दुनू गोटे चुपचाप ठाढ़ि। दुनू डेराएल। राधेश्याम आँखि मुनने तेँ नहि देखैत। परोपट्टामे हिन्दु-मुसलमानक बीच तना-तनी। जहि डरसँ शबाना दिनकेँ नहि आबि अन्हारमे आएलि। किऐक तँ सरोजनीक स्नेह खींचि कऽ लऽ अनलकै। रेहना शबानाकेँ कहलक- ‘‘दादी, अइठीन किअए ठाढ़ छीही, अंगना चल ने?’’
  रेहनाक अवाज सुनितहि राधेश्याम आँखि तकलनि तँ दुनू गोटेकेँ ठाढ़ देखलनि। पुछलथि-  ‘‘के?’’
  शबाना बाजलि- ‘‘बेटा, राधे।’’
  ‘‘मौसी।’’
  ‘‘हँ’’
  ‘‘एत्ती राति कऽ किऐक अलेहेँ?’’
  ‘‘बौआ, से तू नै बुझै छहक जे गाम-गाममे केहेन आगि लागि रहल छैक। पाँचम दिन सुनलौं जे बहीनि बड़ जोड़ अस्सक छथि। जखने सुनलहुँ तखने मन भेल जे जाइ। मुदा की करितौं? मन छटपटाइ छलए। बेटाकेँ पुछलियै तँ कहलक जे से तू नै देखै छीही रस्ता-बाटमे इज्जत-आवरुक लुटि भऽ रहल अछि। मार-काट भऽ रहल अछि। ऐहन स्थितिमे कोना जेमए। मुदा मन नै मानलक। जिनगी भरि दुनू बहीनि संगे रहलौं, आइ बेचारी मरि रहल अछि तँ मुँहो नै देखब? जी-जाँति पोतीकेँ संग केने एलौं।’’
  कुरसीपर सँ उठि राधेश्याम शबानाक बाँहि पकड़ि आंगन दिशि बढ़ैत बहीनिकेँ कहलखि‍न- ‘‘मौसी एलखुन। पाएर धोइले पानि दहुन।’’
  राधेश्यामक बात सुनि दुनू बहीनियो -गौरी आ सुनिता- आ रागिनियो घरसँ निकलि आंगन आइलि। गौरी बजलीह- ‘‘मौसी, शबाना मौसी!’’
  शबाना बजलीह- ‘‘हँ।’’
  दुनू गोटे -शबानो आ रेहनो- पएर धोए सोझे बहीन सरोजनी लग पहुँच दुनू पएर पकड़ि कानए लगलीह। कनैत देखि सरोजनी पुछलखि‍न- ‘‘कनै किअए छेँ। हम कि कोनो आइये मरब? एत्ती रातिकेँ किअए एलैहेँ?’’
  शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, रस्ता-पेरा बन्न अछि। दू बर्खसँ भौरियो-बट्टा -घुमि-घुमि बेचनाइ- बन्न भऽ गेल। जखैनसँ अहाँ दऽ सुनलौं, तखैनसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेल तेँ दिन-देखार नै आबि चोरा कऽ अखैन ऐलौंहेँ।’’
  सरोजनी बहुत कठीनसँ बाजलि- ‘‘धिया-पूता नीके छौ कीने?’’
  शबाना कहलकनि- ‘‘शरीरसँ तँ सब नीके अछि, मुदा कारबार बन्न भऽ गेल अछि।’’
  ‘‘गामो दिशि गेल छलेँ?’’
  ‘‘नै। कन्ना जाएब....। तेसर सालक बाढ़िमे अहूँक गाम कटि कऽ कमला पेटमे चलि गेल आ हमरो गाम कोसीमे। आब सुने छी जे हमरो गाम भरनापर बसल हेँ आ अहूँक गाम कमलाक पछबरिया छहरक पछबरिया बाधमे। घनश्यामपुर तक तँ रस्ता छइहो मुदा ओइसँ आगू रस्ते सबपर मोइन फोड़ि देने अछि। पौरुकाँ जे जाइत रही तँ लगमा लगमे डूबए लगलौं।’
सरोजनी गौरीकेँ इशारासँ कहलक- ‘‘दाइ, बड़ राति भेलइ। मौसीकेँ खाइले दहक।’’
  शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, पहिने हम कना खाएब? पहिने बौआ राधेश्यामकेँ खुआ दियौ। खा कऽ सुति रहत। हम भरि राति बहीनसँ गप-सप्‍प करब। बहुत दिनक गप्‍प पछुआइल अछि।’’
  शबानाक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचए लगल जे दुनियाँमे बहीनिक कमी नहि अछि। लोक अनेरे अप्पन आ बीरान बुझैत अछि। ई सभ मनक खेल छिअए। हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैमे जे संग रहए, ओइह अप्पन। शवानाकेँ कहलक- ‘‘मौसी, माए तँ ने सिर्फ हमरे माए छी आ ने अहींक बहीनि। सबहक अप्पन-अप्पन छिअए, तेँ कियो अप्पन करत की ने?’’
पूबरिये घरक ओसारपर राधेश्याम सुतल। बाकी सभ पूबरिया घरमे बैसि गप-सप्‍प करए लगलीह। गौरी पुछलनि- ‘‘मौसी, अहाँ दुनू बहीनि तँ दू गामक छिअए। दुनू गोरेमे चीन्हा-परिचए कहिया भेलि?’’
  शबाना बाजनि- ‘जइहेसँ ज्ञान-परान भेलि, तेहियेसँ अछि। हमरा बाप आ तोरा नाना कऽ दोसतिआरै रहनि। कोस भरि पूब हमर गाम झगड़ुआ अछि आ कोस भरि पछिम बहीनिक। अखन तँ दुनू गाम उपटि कऽ दोसर ठीन बसल अछि। मुदा पहिने बड़ सुन्दर दुनू गाम छलै।
  गौरी बाजलि- ‘‘मौसी, हम तँ बच्चेमे, बहुत दिन पहिने गेल रही। तइ दिनमे तँ बड़ सुन्दर गाम रहए।’’
  शबाना बजलीह- ‘‘हँ, से तँ रहबे करए। मुदा आब देखवहक तँ बिसबासे ने हेतह जे यएह गाम छिअए। हँ, तँ कहै छेलिहह, काकाकेँ बहुत खेत-पथार रहनि। चारि जोड़ा बड़द खुट्टापर, चारि-पाँचटा महीसियो रहनि। मुदा हमरा बापकेँ खेत-पथार नै रहए। गामेमे खादी-भंडार रहए। सौँसे गामक लोक चरखोे चलबै आ कपड़ो बीनै। सभसँ नीक कारीगर रहए हमर बाप। घरक सभ कियो सुतो काटी आ कपड़ो बनबी। सलगा, चद्देरि, गमछी आ धोती बीनैमे हमरा बापक हाथ पकड़िनिहार कियो नहि। बहीनिक गामक सभ हमरे बापसँ कपड़ा कीनए। सौँसे गामसँ अपेछा रहए। पाँचे-सात वर्खक रही तहियेसँ बहीनिक ऐठाम अइठीन जेबो करियै आ खेबो करियै।’’
  शबानाक बात सुनि गौरीकेँ अचरज लगलै। मने-मन सोचए लगली जे एक तँ गरीब तहूमे मुसलमान। तहि बीच दोस्ती। मुस्की दैत रागिनी बाजलि- ‘‘कोन पुरना खिस्सा मौसी जोति देलखिन। ई कहथु जे दुनू बहीनिक बिआह एक्के दिन भेलनि?’’
  शबाना बाजलि- ‘धूर्र कनियाँ! अहाँ की बजै छी। हमरासँ बहीनि दू-तीन बरख जेठ छथि। बहीनिक विआहसँ दू वर्ख पाछु कऽ हमर विआह भेल। कक्का हमरा बापकेँ कहलखिन जे पूबरिया आ दछिनबरिया इलाका कोशिकन्हा भऽ गेल तेँ आब कथा-कुटुमैती उत्तरेभर करब नीक हएत।’
  कन्ने गुम रहि, शबाना बाजलि- ‘‘बेटी, कपारक दोख भेल। आब अपनो बुझै छी जे नैहरक काजक जे महौत छेलै से अइ काज –-भौरीक- नै अछि। मुदा की करितियै?
अइठीम उ काज अछिये नहि। ने खादी-भंडार छै आ ने कारोवार अछि।’’
  मुस्की दइत रागिनी बाजलि- ‘‘मौसी, अपना विआहमे तँ हम कनियेटा रही। सभ गप मनो ने अछि। हिनका तँ मन हेतनि, विआहमे झगड़ा किअए भेल रहए?’’
  कने काल गुम रहि शबाना ठाहाका मारि हँसि, बाजलि‍- ‘‘अहाँक बावू बड़ मखौलिया रहथि। हँसी-चौलमे ककरो नइ जीतए देथिन। घरदेखीमे एलथि। हम दुनू बहीनि खूब छकौलिएनि। पीढ़ी तरमे खपटा, झुटका बैसैले आ रुइयाँ तरि कऽ खाइले सेहो देलिएनि। खा कऽ जहाँ उठलाह कि एक डोल करिक्का रंग कपारपर उझलि देलिएनि। मुदा हुनका लिए धनि सन। तहिना बरिआतीमे ओहो छकौलकनि। सबहक धोतीमे चारि-पाँच दिनक सड़लाहा खैर लगा देलकनि। पहिने तँ बरिआती सभ अपनमे रक्का-टोकी केलक। मुदा जखन भाँज लगलै जे घरवारी सभकेँ सड़लाहा खइर लगा देलक। तखन बरिआतियो सभ टूटल। मुदा कहे-कही भऽ कऽ रहि गेलइ। मारि-पीटि नहि भैल।’’ कहि हँसै लागलि। सभ हँसल।
राधेश्याम ओसारपर सुतल रहथि। मुदा एक्को बेरि आँखि बन्न नहि भेलनि। किऐक तँ मनमे शंका होइत जे अनचोकेमे ने माए मरि जाए। खिस्से-पिहानीमे राति कटि गेल।
भोर होइतहि शबाना राधेश्यामकेँ कहलक- ‘‘बौआ, अपन मन अछि जे आब बहीनिकेँ एक काठी चढ़ाइये कऽ जाएब। मुदा गामे-गाम जे आगि लगल देखै छिअए तइसँ डर होइए।’’
  राधेश्याम- ‘‘मौसी, एहिठाम कियो किछु नहि बिगाड़ि सकैत छओ। जहिया तक तोरा रहैक मन होउ, निर्भीकसँ रह।’’
  शबाना बाजलि- ‘‘बौआ, मन होइए जे बहीनिक सभ नुआ-बिस्तर हम खीचि दिअए। फेरि ई दिन कहिया भेटत’’
  राधेश्याम- ‘‘दुनू बहीनिक बीच हम की कहबौ। जे मन फुड़ौ से कर।’’
   इम्हर आब राधेश्यामक माए सरोजनीक टनगर बोलो मद्धिम भेल जा रहल छलनि।

Saturday, November 29, 2008

जितेन्द्र झा- जनकपुर-अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद

जितेन्द्र झा- जनकपुर
अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद अपन बिभिन्न माग सहित भारतक राजधानी नयां दिल्लीस्थित जन्तर मन्तरमे धर्ना देलक अछि । सोमदिन देल गेल एहि धर्नामे भारतक विभिन्न स्थानसं आएल मैथिल आ संघ संस्थाक प्रतिनिधि सहभागी रहथि । जन्तर मन्तरमे भेल एहि धर्नामे मिथिला क्षेत्रक विकासक लेल अलग मिथिला राज्य बनाओल जाए से माग कएल गेल । अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषद एहि अवसरपर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिलके ज्ञापन पत्र सेहो बुझौलक । ज्ञापन पत्र बुझेनिहार प्रतिनिधि मण्डलमे डा भुवने•ार प्रसाद गुरमैता, डा रबिन्द्र झा, डा धनाकर ठाकुर,डा कमलाकान्त झा, चुनचुन मिश्र, भवेश नन्दनसहितके सहभागिता छल । परिषदक धर्नामे दिल्लीमे रहल विभिन्न राजनीतिक दलसं सम्बद्ध नेतालोकनि सेहो सहभागी रहथि। परिषदक नेपालक पदाधिकारी आ कार्यकर्ता सेहो धर्नामे सामेल रहथि । धर्नामे भीख़ नंहि अधिकार चाही हमरा मिथिला राज्य चाही से नारा लगाओल गेल रहए । परिषद मैथिली भाषाक आधारपर राज्य बनएबाक माग करैत आएल अछि ।
कोना बचाएब संस्कृतिक विरासत ?

मिथिलाक परम्परा आ धरोहरिके मौलिक विशिष्टता गुमिरहल कहैत विज्ञसभ चिन्ता ब्यक्त कएलनि अछि । संस्कृतिक अपन अलग स्थान बांचल रहए से डा गंगेश गुन्जक कहब छन्हि । मैथिली संस्कृतिक विभिन्न पक्षपर नयां दिल्लीमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न गोष्ठीमे बजैत गुन्जन मैथिली संस्कृतिक संरक्षणपर जोड देने रहथि ।

नाटककार महेन्द्र मलंगिया मिथिलाक लोकसंस्कृतिमे रहल टाना टापर, घरेलु उपचार, शकुन सहितके विषयके फ़रिछियाक' प्रस्तुत कएने रहथि । मैथिली संस्कृतिक संरक्षणलेल एहिमे समाहित गुणके उजागर करब आवश्यक रहल मलंगिया कहलनि । मिथिलामे सातो दिन सात तरहक वस्तु खाक' यात्रा गेलासं शुभ यात्रा हएबाक चलन आ एहने चलनमे रहल वैज्ञानिकता दिश ध्यान जाएब आवश्यक रहल ओ कहलनि ।

साहित्यकार देव शंकर नविन मैथिली भाषा संस्कृतिके मुल भावना विपरित होबए बला काजके अपमानित कएल जाए से कहलनि । मैथिलीक मौलिकताके लतियाक' कएल जाए बला कोनो काजके बहिष्कार कएल जाए नविनक विचार छन्हि । गायक, साहित्यकार सहित सभके मैथिली गीत संगीत, भाषा संस्कृतिके प्रतिकुल असर होब बला काज नई करबालेल ओ आग्रह कएलनि । नक्कल आ स्तरहीन प्रस्तुतिके अपमानित करबालेल नविन आग्रह कएलनि ।

मैथिली भोजपुरी एकेडमीक अध्यक्ष अनिल मिश्र मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके विकासक सम्भावना बढाओल जाए से कहलनि । साहित्य, लोक संस्कृतिके समॄद्ध कएल जाए से कहैत ओ मैथिली भोजपुरी एकेडमी एहिदिशसं एहिलेल काज हएबाक प्रतिबद्धता ब्यक्त कएलनि । मिथिला संस्कृति लेल कएल जाएबला काज आपसमे बांटि लेल जाए से मिश्रक सुझाव छन्हि । संस्कृतिक विरासतके रेखाङकित करैत रोड मैप बनएबापर ओ जोड देलनि । संचारमाध्यममे मैथिलीके स्थान भेटए ताहिलेल प्रयास कएल जएबाक ओ जनतब देलनि । दिल्ली प्रसारित सरकार दुरदर्शनमें मैथिलीक स्थानलेल दिल्लीक मुख्यमन्त्री शीला दीक्षितके ज्ञापन पेश कएल जएबाक आश्र्वासन देलनि ।
सुभाषचन्द्र यादव एकमात्र वक्ता रहथि जे अपन विचार पहिनहिये सँ लिखि क' देने रहथि से एतए प्रस्तुत अछि।-
मैथिली लोक-कथा
सुभष चंद्र यादव
मैथिली मे लोक-कथा पर बड़ कम काज भेल अछि। लोक-कथाक किहुए संकलन उपलब्ध अछि आ से स्मृतिक आधार पर लिपिबद्ध् कयल गेल अछि, फील्ड वर्कक आधार पर नहि । लोक-साहित्यक कोनो इकाइ हो, ओकर एक सँ अधिक रूप विद्यमान रहैत छैक , जे फील्ड वर्क कयले सँ प्राप्त भऽ सकैत अछि । स्मृति मे ओकर मात्र एकटा रूप रहैत छैक, जकरा सर्वोत्तम रूप मानि लेब आनक भऽ सकैत अछि । लोक-कथा क जतेक संकलन अखनधरि भेल अछि, से अपूर्ण अछि ।
मैथिली मे लोक-गीत, लोक – गाथा आ लोक – देवता क लेल तऽ किछु फील्ड वर्क कयलो गेल, लोक – कथाक लेल भरिसक्के कोनो फील्ड वर्क भेल अछि । आब जखन एक युश्त सँ दोसर पुश्त मे लोक – साहित्यक अंतरण दिनोदिन संकटग्रस्त भेल जा रहल अछि, तैं एकर संश्क्षण जरूरी अछि ।
लोक – साहित्यक संश्क्षण मात्र एहि लेल जरूरी नहि अछि जे ओ अतीतक एकटा वस्तु थिक; ओ अपन समयक विमर्श आ आत्मवाचन सेहो होइत अछि आ एकटा प्रतिमान उपस्थित करैत अछि । ओकर रूपक, प्रतीक , भाव आ शिल्पक उपयोग लिखित साहित्य मे हम सभ अपन-अपन ढंग सँ करैत रहैत छी । तहिना लिखित साहित्य सेहो लोक-साहित्य केँ प्रभावित करैत रहैत अछि ।
लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन मुख्यत: स्थान आ कालक निर्धारण पर केन्द्रित रहल अछि । ओकर कार्य, अभिप्राय आ अर्थ सँ संबंधित प्रश्न अखनो उपेक्षित अछि । मैथिली मे तऽ लोक-साहित्य संबंधी अध्ययन अखन ठीक सँ शुरुओ नहि भेल अछि । जे पोथी अछि, ताहि मे लोक-साहित्यक परिभाषा आ सूची उअपस्थित कयल गेल अछि ।
लोक-कथाक उपलब्ध संकलन सभ मे ओहन कथाक संख्या बेसी अछि जे देशांतरणक कारणेँ मैथिली मे आयल अछि। मैथिलीक अपन लोक – कथा, जकरा खाँटी मैथिल कहि सकैत छिऐक , से कम आयल अछि ।
रामलोचन ठाकुर द्वारा संकलित मैथिली लोक-कथा, जकरा हम अपन एहि अत्यंत संक्षिप्त अध्ययनक आधार बनौने छी, ताहू मे खाँटी मैथिली लोक-कथा कम्मे अछि । लोक-कथाक अभिप्राय आ अर्थ संबंधी अपन बात कहबाक लेल जाहि दूटा कथाक चयन हम कयने छी, से अछि — ‘एकटा बुढ़िया रहय ‘ आ ‘ एकटा चिनता खेलिऐ रओ भैया ‘।
एहि दुनू कथाक वातावरण विशुद्ध मैथिल अछि । दुनू क विमर्श , आत्मवाचन आ प्रतिमान मैथिल-मानसक अनुरूप अछि । दुनू कथाक विमर्श न्याय पर केंद्रित अछि ।
पहिल कथाक बुढ़िया दालिक एकटा फाँक लेल बरही, राजा , रानी , आगि, पानि आ हाथी केँ न्याय पयबाक खातिर ललकारैत अछि, किएक तऽ खुट्टी ओकर दालि नुका लेने छैक आ दऽ नहि रहल छैक ।
कथाक विमर्श पद्यात्मक रूप मे एना व्यक्त भेल अछि – हाथी – हाथी – हाथी ! समुद्र सोखू समुद्र । समुद्र ने अगिन मिझाबय , अगिन । अगिन ने रानी डेराबय , रानी । रानी ने राजा बुझाबथि , राजा । राजा ने बरही डाँड़थि , बरही । बरही ने खुट्टी चीड़य , खुट्टी। खुट्टी ने दालि डिअय , दालि । की खाउ , की पीबू , की लऽ परदेस जाउ।
जाइत अछि । चुट्टी तैयार भऽ जाइत छैक । फेर तऽ चुट्टीक डरँ हाथी , हाथीक डरँ समुद्र , समुद्रक डरँ आगि , आगिक डरँ रानी , रानीक डरँ राजा , राजाक डरँ बरही न्याय करक लेल तैयार भऽ जाइत छैक आ खुट्टी बुढ़िया केँ दालि दऽ दैत छैक ।
ई कथा रामलोचन अपन माय सँ सुनन छलाह । ओ कहलनि जे माय वला वृत्तांत मे बुढ़िया हाथिए लग सँ घूरि जाइत छैक । लिपिबद्ध करैत काल ओ एकर पुनर्सृजन कयलनि । हुनक लिपिबद्ध कयल वृत्तांत मे बुढ़िया हाथियो सँ आगू चुट्टी धरि जाइत अछि । बुढ़िया केँ चुट्टी धरि लऽ गेनाइ कथाक व्यंजना मे विस्तार अनैत छैक । लेकिन लोक – कथाक एहन प्रलेखन कतेक उचित अछि ?
एहि कथाक आत्म वाचन बुढ़ियाक माध्यमे प्रकट भेल अछि । अपन स्थितिक प्रति बुढ़िया जे प्रतिक्रिया करैत अछि , सएह एहि कथाक आत्म – वाचन थिक । एकटा दालिक बल पर बुढ़िया परदेस जेबाक नेयार करैत अछि । राजा- रानीक सेर भरि दालि देबाक प्रस्ताव केँ तिरस्कृत करैत अछि । समुद्र सँ हीरा – मोतीक दान नहि लैत अछि । दालि पर अपन अधिकार लेल लड़ैत रहैत अछि । तात्पर्य ई जे सपना देखबाक चाही । भीख आ दयाक पात्र नहि हेबाक चाही । दान लेब नीक नहि । स्वाभिमानी हेबाक चाही आ अपन हक लेल लड़बाक चाही ।
कथा ई प्रतिमान उपस्थित करैत अछि जे न्याय संघर्षे कयला सँ भेटैत छैक ।
’एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया ’ न्यायक विवेकशीलता पर विमर्श करैत अछि । मुनिया (चिड़ै) केँ एकटा चीन खेबाक अपराध मे प्राणदंड भेटै वला छैक । ई विमर्श पद्यात्मक रूपमे चलैत छैक , जाहि मे ओकर दारुण अवस्था सेहो चित्रित भेल छैक ।
बरदवला भाइ !
परबत पहाड़ पर खोता रे खोंता
भुखै मरै छै बच्चा
एकटा चिनमा खेलिऐ रओ भइया
तइलएपकड़ने जाइए ।
फेर घोड़ावला अबै छै , हाथीवला अबै छै , खुद्दी-वला अबै छै । मुनिया सभ सँ मिनती करैत अछि ।ओहो सभ खेतवला केँ पोल्हबैत छैक;=छोड़बाक बदला मे बरद , घोड़ा , हाथी देबऽ लेल तैयार छैक ,लेकिन खेतवला टस सँ मस नहि होइत अछि । जखन भूखे-प्यासे जान जाय लगै छैक , तखन खुद्दीक बदला मे मुनिया केँ छोड़ि दैत अछि ।
मुनिया करुणा आ मानवीयताक आवाहन करैत अछि । मनुस्मृति मे कहल गेल छैक जे चुपचाप ककरो फूल तोड़ि लेब चोरि नहि होइत छैक ; तहिना ककरो एकटा चीन खा लेब कोनो अपराध नहि भेल । इएह कथाक आत्मवाचन थिक ।
कथा ई प्रतिमान उप़स्थित करैत अछि जे सभक जीवक मोल बराबर होइत छैक । असहाय आ निर्धनो केँ जीबाक अधिकार छैक । एहि संसार मे ओकरो लेल एकटा स्पेस (जगह) हेबाक चाही।

श्याम भद्र मैथिली भाषाक अपन संचारमाध्यम हुअए से माग कएलनि । एहिलेल संगठित प्रयास करबालेल ओ कार्यक्रममे आग्रह कएलनि । बिहारमे अतिरिक्त भाषाके श्रेणीमे मैथिलीके राखल गेल कहैत भद्र रोष प्रकट कएलनि । मातृभाषाक श्रेणीमे मैथिली नई भेलासं विद्यार्थी मैथिली नई पढि रहल हुनक दाबी छन्हि ।

रंगकर्मी प्रमिला झा मेमोरियल ट्रष्ट घोंघौरक ट्रष्टी श्रीनारायण झा मैथिलमे प्रतिबद्धताक कमी हएबाक विचार व्यक्त कएलनि । हिन्दीमे लिखनिहार मैथिल स्रष्टा अपन मैथिली भाषामे किया नईं लिखैया नारायणक प्रतिप्रश्न रहनि । मैथिलीके समांग आ समान दुनु रहैत स्थिति सन्तोषजनक नइ रहल ओ कहलनि । अष्ट्‌म अनुसूचिमे मैथिली आबि गेलाक बाद आब सहज रुपे भाषा संस्कृतिक काज आगु बढए नारायण कहलनि ।

गोष्ठीमे मैथिलीलेल काज कएनिहार संस्थाक वर्तमान भूत भविष्यपर सेहो वक्तासभ बाजल रहथि । मैथिलीमे रंगकर्मक विकासके बात होइतो एहिमे काज कएनिहारके प्रोत्साहनलेल कोनो पक्षसं ध्यान नई देल गेल कहल गेल । प्रमिला झा नाटयवृति शुरु भेलाक बादो एक्कोटा नव पुरस्कार/वृत्तिक शुरुवात नई भ' सकल मैलोरंगक प्रकाश झा कहलनि । तहिना झा एकगोट मैथिल दोसर मैथिल पर विश्र्वास करए त सभ तरहक समस्या समाधान हएत कहलनि । मैथिलबीचके आपसी विश्र्वासके ओ विकासक मूलमन्त्रके संज्ञा देलनि ।

अन्तर्राष्ट्रिय मैथिली परिषदक कृपानन्द झा सरकारी स्तरपर मैथिलीके संरक्षण नई भेट रहल कहैत रोष प्रकट कएलनि । मैथिलीक संरक्षण लेल मिथिला राज्य स्थापना हुअए - झा कहलनि । मैथिली भाषा संस्कृतिदिश लागल संस्था आर्थिक संकटसं ग्रस्त रहल कहैत ओ गोष्ठीमे सहभागीके ध्यानाकर्षण करौने रहथि ।

विद्यापति संगीत संरक्षणलेल योजनाबद्ध काज हएब आवश्यक रहल गायिका अंशुमालाक विचार छन्हि । दिल्ली युनिवर्सिटीमे संगीतसं एम फ़िल क' रहल अंशुमाला विद्यापति संगीतले स्थापित करबालेल व्याकरणक आवश्यकता पर जोड देलनि । मैथिलीमे लोकसंगीत आ युवाबीचके दुरी बढब चिन्ताक विषय रहल ओ कहलनि । 'लोकसंगीत नई बुझनिहार लडकीसं वियाह नई करब एहन चलन हएबाक चाही' मैथिली संस्कृति संरक्षणलेल अंशुमाला सुझाव दैत बजलिह ।

गोष्ठीमे सहभागी रंगकर्मी अपन कथा ब्यथा सेहो सुनौने रहथि । दिल्लीमे रहिक' रंगकर्म क' संघर्षरत कलाकार बाध्यताबश गुणस्तरहीन काज क' रहल मैलोरंगक दीपक झा कहलनि । एहिद्वारे कलाकारके अपमानित करबाक काज कियो नई करए दिपकके आग्रह छन्हि ।

संस्कृति बचएबाक अभियान

मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतके संरक्षण सम्बर्द्धनक लेल योजनाबद्ध काज करबा पर जोड देल गेल अछि । मिथिलाक सांस्कृतिक विरासत : संरक्षण आ विकासक सम्भावना विषयपर बजैत वक्तासभ एहन विचार रखलनि अछि ।
मैथिली लोक रंग दिल्लीक आयोजनमे २५ दिसम्बरक' सम्पन्न मैथिलोत्सवमे बजैत वक्तासभ मैथिली संस्कृति रक्षाक लेल ठोस कार्ययोजना बनाओल जाए से कहलनि । मैथिलोत्वसमे भेल संगोष्ठीमे लोक नाटय, खानपान, हस्तशिल्प, लोक नॄत्य, लोक विश्र्वास, पुरातात्विक संरक्षण, चित्रकला, पाण्डूलिपि, पावनि तिहार, देवी देवता, रीति रिवाज, मठ-मन्दिर, पहिरन-ओढन, लोकसाहित्य, लोकवाद्य, शिष्टाचार,मेला सहितक विषयपर वक्तासभ बाजल रहथि ।

गोष्ठीमे कथाकार अशोक, कमलमोहन चुन्नु, नाटककार महेन्द्र मलंगिया, मोहन भारद्वाज, सीयाराम झा सरस, सुभाष चन्द्र यादव, गंगेश गुन्जन, मैथिली भोजपुरी एकेडमीक उपाध्यक्ष प्रो अनिल मिश्र, डा अनिल चौधरी, देवशंकर नविन सहित वक्तासभ मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक विभिन्न विषयपर बाजल रहथि ।
भारतीय भाषा संस्थान मैसुरक सहयोगमे मैलोरंग नयां दिल्लीक राष्ट्रिय नाटय विद्यालयमे कार्यक्रम आयोजन कएने छल।

मैथिलोत्वसमे मैलोरंग रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्ति सेहो वितरण कएलक । एहिबेरक नाटयवृत्तिक पओनिहारिमे पहिल मधुबनीक मधुमिता श्रीवास्तव, द्वितीय कोलकाताक वन्दना ठाकुर आ तृतीय दिल्लीक नेहा वर्मा छथि।
रंगकर्मी प्रमीला झा नाटयवृत्तिक स्थापना प्रथम महिला बाल नाटय निर्देशक प्रमीला झाक स्मृतिमे भेल अछि । प्रमीलाक स्मृतिमे स्थापित प्रमीला मेमोरियल ट्रष्ट,घोंघौर एहि नाटयवृतिक स्थापना कएने अछि ।

मैथिलोत्वसमे संगोष्ठी, वृति वितरणक बाद सांगीतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल छल । सांगीतिक कार्यक्रममे सुन्दरम, घनश्याम, दिवाकर, प्रभाकर, गुन्जन, अंशुमाला, कल्पना मिश्रा, राखी दास,रीतेस सहितक कलाकार दर्शकके मनोरन्जन करौने रहथि । (साभार विदेह www.videha.co.in)

भैयारी - जगदीश प्रसाद मण्डल



मैट्रिक परीक्षा दऽ दीनानाथ आगू पढ़ैक आशासँ, संगियो-साथी आ शिक्षको ऐठाम जा-जा विचार-विमर्श करैत। बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक रहने, कॅालेजक पढ़ाइक तौर-तरीका नहि बुझैत। ओना ओ हाइ स्कूलमे थर्ड करैत मुदा क्लासमे सभसँ नीक विद्यार्थी। सभ विषए नीक जेकाँ परीक्षामे लिखने, तेँ फेल करैक चिन्ता मनमे एक्को मिसिया रहबे ने करै।
मूर्ख रहितो माए-बाप बेटाकेँ पढ़बैमे जी-जान अरोपने। ओना घरक दशा नीक नहि मुदा पढ़बैक लीलसा दुनूक हृदएमे कूट-कूट कऽ भरल। जखन दीनानाथ मैट्रिक परीक्षाक ि‍दअए दरभंगा सेन्टर जाइक तैयारी करए लगल, तखन माए अपन नाकक छक, जे डेढ़ आना-छअ पाइ भरि रहए, बेचि कऽ देलकै। अगर जँ माए-बापक मन बेटा-बेटीकेँ पढ़बैक रहत आ थोड़बो मेहनतिसँ ओ पढ़त तँ लाख समस्योक बावजूद ओ पढ़बे करत। तेहिमे सँ एक दीनानाथो। काल्हि एगारह बजिया गाड़ीसँ परीक्षा दिअए जाएत तेँ आइये साँझमे पिता रामखेलावन पत्नी सुमित्राकेँ कहलक- ‘काल्हि एगारह बजे बौआ गाड़ी पकड़त तेँ अखने ककरोसँ आध सेर दूध आनि कऽ पौड़ि दिऔ। दहीक जतरा नीक होइ छै।’
माइयोक मनमे जँचलै। आध सेर दूध पौड़ैक विचार माए केलक आ मने-मन ब्रह्म-बाबाकेँ कबुला केलक जे अहाँ हमरा बेटाकेँ पास करा देब तँ कुमारि भोजन कराएब। संगे हाँइ-हाँइ कऽ चिकनी माटि लोढ़ीसँ फोड़ि अछिनजल पानिमे सानि, दिआरी बना, साफ पुरना कपड़ाक टेमी बना, दिआरीमे करु तेल दऽ साँझ दिअए ब्रह्म स्थान बिदा भेलि। रस्तामे मने-मन ब्रह्म-बाबाकेँ कहैत जे हे ब्रह्मबाबा कहुना हमरा बेटाकेँ पास कऽ दिहक। तोरेपर असरा अछि।
स्कूलमे सभसँ नीक विद्यार्थी दीनानाथ, मुदा नीक रहितहुँ क्लासमे थर्ड करैत। एकर कारण रहए जे हाइ स्कूल सेेक्रेट्रीक मातहत चलैत। जाहिसँ स्कूलक सर्वेसर्वा सेक्रेट्रिये। इज्जतोक दुआरे आ फीसोक चलैत स्कूलमे फस्ट सेक्रेट्रिएक लगुआ-भगुआ करैत। जँ कहीं सेक्रेट्रीक समांग नञि रहैत तखन हेडमास्टरक समांग फस्ट करैत। मुदा एहि बैचमे सेक्रेट्रियोक सवांग आ हेडमास्टरोक सवांग। तेँ सेक्रेट्रीक समांग फस्ट करैत आ हेडमास्टरक समांग सेकेण्ड आ दीनानाथ थर्ड। जे फस्ट करैत ओकरा पूरा फीस आ सेकेण्ड-थर्डकेँ आधा फीस माफ होइत। ओना आन शिक्षक सभकेँ एहि बातक क्षोभ होइन मुदा कैयो की सकैत छथि। किएक तँ आन शिक्षक सबहक गति कोठीक नोकरसँ नीक नञि रहनि, सात घंटी पढ़ौनाइ आ डेढ़ सए रुपैया महीना पौनाइ मात्र रहनि। मुदा तैयो ओ सभ इमानदारीसँ काज करैत। असेसमेंटक चलनि सेहो रहए। बीस नम्बरक हिसाबसँ सभ विषएक असेसमेंट होइत। सिर्फ समाजे-अध्ययनक हिसाब अलग रहए। असेसमेंटक नम्बर परीक्षाक नम्बरमे जोड़ि कऽ रिजल्ट होइत। जे असेसमेंटक नम्बर सेक्रेट्री आ हेडमास्टरक हाथक खेल रहए। परीक्षाक तीन मासक उपरान्त रिजल्ट निकलै।
मास दिन परीक्षाक बीति गेल। दू मास रिजल्ट निकलैमे बाकी। माघक अंतिम समए। सरस्वती पूजा पाँच दिन पहिने भऽ गेल। शीतलहरी चलैत। जाहिसँ मिथिलांचल साइबेरिया बनि गेल। दिन-राति एक्के रंग। बरखाक बून्न जेकाँ ओस टप-टप खसैत। सुरुजक दरसन दू माससँ कहियो ने भेल। दिन-राति कखन होए ओ लोक अन्हारेसँ बुझैत। सभ अपन-अपन जान बँचवै पाछू लागल।
  खेती-पथारीक काज सबहक बन्न। रब्बी-राइ ठंढ़सँ कठुआएल। बढ़बे ने करैत। बोराक झोली ओढ़ोलाक बादो माल-जाल थर-थर कपैत। जहिना महीसक बच्चा तहिना गाइयक बच्चा कठुआ-कठुआ मरैत। बकरीक तँ फौतिये आबि गेल। गाछ सभ परहक घोरन सुड्डाह भऽ गेल। चिड़ै-चुनमुनीसँ लऽ कऽ नढ़िया, खिखिर, साँप मरि-मरि जहाँ-तहाँ महकैत।
माघक पूर्णिमासँ दू दिन पहिने रामखेलावनकेँ लकबा लपकि लेलक। सौँसे देहक अधा भाग सुन्न भऽ गेलै। क्रियाहीन। बिठुओ कटलापर किछु नहि बुझैत। चिड़ैक लोल जेकाँ टेढ़ मुँह भऽ गेलै। ओना उमेरो कोनो बेसी नहि, चालीस बर्खसँ भीतरे। रौतुका समए। शीतलहरीक चलैत अन्हारो बेसी। ओना इजोरिया पख रहए। मुदा भादबक अन्हार जेकाँ अन्हार। पिताक दशा देखि दीनानाथक मन घबड़ा गेलै। तहिना माइयोक। मुदा तैयो मनकेँ थीर करैत दीनानाथ डाॅक्टर ऐठाम विदा भेल। किछु दूर गेलापर पएर तेना कठुआ गेलै जे चलिये ने होइ। मनमे भेलै जे बाबूसँ पहिने अपने मरि जाएब। घरोपर घुरि कऽ नञि गेल हएत। बीच पाँतरमे दीनानाथ असकरे। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै। मनमे एलै, आब की करब? मुदा फेर मनमे एलै जे हाथसँ ठेहुन रगड़लापर पएर हल्लुक हएत। सएह करए लगल। जाँघ हल्लुक भेलै। हल्लुक होइते डाॅक्टर ऐठाम चलल।
डाॅक्टर ऐठाम पहुँचिते रोगीक भीड़ देखि दीनानाथ फेर घबड़ा गेल। मनमे एलै, जे सौँसे दुनियाँक रोगी एतै जमा भऽ गेल अछि। असकरे डाॅक्टर सहाएब छथि आ दूटा कम्पाउण्डर छनि, कोना सभकेँ देखथिन। मुदा रोगो एकरंगाहे, तेँ बेसी मत्था-पच्ची डाॅक्टरकेँ करै नै पड़नि। धाँइ-धाँइ इलाज करैत जाथि। मुदा मेले जेकाँ रोगी एबो करै। थोडे़ काल ठाढ़ भऽ कऽ देखि दीनानाथ सिरसिराइते डाॅक्टर लगमे जा बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब, कनी हमरा अइठीन चलियौ। हमर बाबू एते बीमार भऽ गेल छथि जे अबै जोकर नञि छथि।’
  दीनानाथक बात सुनि डाॅक्टर कहलखिन- ‘बौआ, ऐठाम तँ देखिते छी, कोना एते रोगी छोड़ि कऽ जाएब? जे ऐठाम पहुँचि गेल अछि ओकरा छोड़िकेँ जाएब उचित हएत।’
  ‘समए रहैत जँ हमरा ऐठाम नै जाएब तँ बाबू मरि जेताह।’
  ‘अहाँ घबड़ाउ नै तत्खनात दूटा गोली दै छी। हुनका खुआ देबनि आ एतै नेने अबिअनु।’
दीनानाथक मनमे पिताक मृत्यु नचए लगल। मन मसोसि दुनू गोलि लऽ बिदा भेल। मुदा घर दिशि बढ़ैक डेगे ने उठए। एक तँ ठंढ़, दोसर मनमे निराशा आ तेसर शीतलहरीसँ रातिओ अन्हार। मुदा तैयो जिबठ बान्हि कऽ बिदा भेल। कच्ची रस्ता रहने जहाँ-तहाँ मेगर आ तइ परसँ कते ठाम टुटलो। जइसँ कए बेर खसबो कएल मुदा तैयो हूबा कऽ उठि-उठि आगू बढ़िते रहल। घरपर अबिते दुनू गोली पिताकेँ खुऔलक। तहि बीच माए गोइठाक घूर कऽ सौँसे देह सेदैत। अपना खाट नहि। एते रातिमे ककरा कहतै। मुदा पितिऔत भाइक खाट मन पड़लै? मन परिते पितिऔत भाय लग जा कहलक- ‘भैया खाटो दिअ आ संगे चलबो करु। एहेन समएमे अनका ककरा कहबै। के जाएत ?’
  दीनानाथक बात सुनिते पितिऔत भाय धड़फड़ा कऽ उठि खाट नेनहि बढ़ल। खाटपर एक पाँज पुआर बिछा सलगी बिछौलक। दुनू पाइसमे बरहा बान्हि खाट तैयार केलक। खाट तैयार होइते दुनू गोरे रामखेलावनकेँ उठा ओहिपर सुतौलक। बरहामे बाँस घोसिया दुनू गोरे कान्हपर उठा बिदा भेल। पाछु-पाछु सुमित्रो बिदा भेलि। थोड़े काल तँ दीनानाथ किछु नहि बुझलक मुदा थोड़े कालक बाद कन्हा भकभकाए लगलै। कान्ह परक छाल ओदरि गेलै। जइसँ बाँस कान्हपर रखले ने होए। लगले-लगले कान्ह बदलै लगल। मुदा जिबट बान्हि डाॅक्टर ऐठाम पहुँचि गेल।
  डाॅक्टर एहिठाम पहुँचते डाॅक्टर सहाएब देखलखिन। बीमारी देखारे रहए। धाँए-धाँए पाँचटा इन्जेक्शन लगा देलखिन। इन्जेक्शन लगा डाॅक्टर दीनानाथकेँ कहलखिन- ‘हिनका खाटेपर रहए दिअनु। बेसी चिन्ता नै करु। तखन तँ नमहर बीमारी पकड़नहि छनि। किछु दिन तँ लगबे करत।’
  रामखेलावनकेँ नीन आबि गेलै। खाटक निच्चाँमे तीनू गोटे -दीनानाथ, पितिऔत भाय आ सुमित्रा- बैसल। सुमित्रा मने-मन सोचैत जे समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे बेटा-पुतोहू ककरा देखै छै। जाबे पति जीबैत रहै छै ताबे स्त्रीगण गिरथाइन बनल रहैत अछि। पुरुखकेँ परोछ होइतहि दुनियाँ अन्हार भऽ जाइ छैक। बिना पुरुखक स्त्रीगण ओहने भऽ जाइत अछि जेहने सुखाएल गाछ। कहलो गेल छै जे साँइक राज अप्पन राज, बेटा-पुतोहूक राज मुँहतक्की। मुदा की करब ? अपन कोन साध। ई तँ भगवानेक डाँग मारल छिअनि। हे माए भगवती, कहुना हिनका नीक बना दिअनु। जँ से नञि करबनि तँ पहिने हमरे लऽ चलू।
  दोसर दिन डाॅक्टर रामखेलावनकेँ देखि कहलखिन- ‘हिनका घरेपर लऽ जइअनु। ऐठामसँ नीक सेवा घरपर हेतनि। बीमारी आब आगू मुँहे नहि बढ़तनि मुदा इलाज बेसी दिन करबै पड़त। हमर कम्पाउण्डर सभ दिन जा-जा सुइयो देतनि आ देखबो करतनि। तै बीच जँ कोनो उपद्रव बुझि पड़त तँ अपनो आबि कऽ कहब।’
  कहि दूटा सुइया फेर डाॅक्टर सहाएब लगा देलखिन। दवाइक पुरजा बना देलखिन। एकटा सूइया आ तीन रंगक गोली सभ दिन दैले कहि देलखिन। गप-सप्‍प सभ कियो करिते छलाह आकि तहि बीच रामखेलावन पत्नीकेँ कहलक- ‘किछु खाइक मन होइए।’
  खाइक नाम सुनिते दीनानाथक मुँहसँ हँसी निकलल। लगले दोकानसँ दूध आ बिस्कुट आनि कऽ देलक। दूध-बिस्कुट खुआ दुनू भाँइ खाट उठा बिदा भेल।
  घरपर अबिते टोल-परोससँ लऽ कऽ गाम भरिक लोक देखए अाबए लगल। शीतलहरी रहबे करै मुदा तैयो लोक अबैक ढ़बाहि लगल। दू घंटा धरि लोक अबैत रहल। दीनानाथ माएकेँ कहलक- ‘माए, बड़ भूख लगल अछि। पहिने भानस कर। भुखे पेटमे बगहा लगैए।’
  दीनानाथक बात सुनि माए भानस करए बिदा भेलि। भूख तँ अपनो लागल मुदा कहती ककरा। बेर-बिपतिमे तँ एहिना होइते छैक। दीनानाथक बात पितिआइन सेहो सुनलक। बेचारी पितिआइन सोचलक जे सभ भुखाइल अछि। बेरो उनहि गेलै। आब जे भानस करए लगत तँ साँझे पड़ि जेतैक। तहूँमे सभ भुखे लहालोट होइए। से नञि तँ घरमे जे चूड़ा अछि ओ दऽ दै छिऐ जइसँ तत्खनात तँ काज चलि जेतै। सएह केलक।
  दीनानाथ आ सुमित्रा चूड़ा भिजा कऽ खाइते छल आकि माम -सुमित्राक भाए- आएल। भाएकेँ देखितहि सुमित्राक आँखिमे नोर आबि गेल। बिना पएर धोनहि भाए मकशूदन बहिनोइ लग पहुँचि देखए लगलथि। बहिनोइक दशा देखि दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलनि। नोर पोछि बेचारे सोचै लगलाह जे हम तँ सियान छी तहूमे पुरुख छी। जँ हमहीं कानबै तँ बहीन आ भागिनक दशा की हेतै। धैर्य बान्हि बहीनकेँ कहलक- ‘दाइ, ई दुनियाँ एहिना चलै छै। रोग-व्याधि सह-सह करैत अछि। जइ ठीन गर लगि जाइ छै पकड़ि लैत अछि। अपना सभ सेबे करबनि की ने मुदा.......। रुपैयाक लेल दवाइ-दारुमे कोताही नञि होनि। आइ भोरे पता लागल। पता लगिते दौगल एलहुँ। अपने गाए बिआएल अछि। काल्हि गाइयो आ जहाँ धरि हएत तहाँ धरि रुपैयो आनि कऽ दऽ देबौ। अखन हम जाइ छी, काल्हि आएब।’
  चारि दिनक बाद रामखेलावनक मुँह सोझ भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ सेहो हुअए लगल। मुदा एकटा पाएर नीक नहि भेल। कनी-कनी झखाइते डेग उठबैत।
  सभ दिन भोरे आबिकेँ कम्पाउण्डर सूइयो दैत आ चला-चला देखबो करैत।
दू मासक बाद दीनानाथक रिजल्ट निकलल। फस्ट डिबीजन भेलै। नम्बरो नीक। छह सौ तीन नम्बर। हेडमास्टरक समांगकेँ सेहो फस्ट डिबीजन भेलै। मुदा नम्बर कम। पाँच सौ पैंतालिस आएल छलै। सेक्रेट्रीक समांगकेँ सेकेण्ड डिवीजन भेलै। मुदा नम्बर बढ़िया, पाँच सए चौंतीस। आगू पढै़क आशा दीनानाथ तोड़ि लेलक। किएक तँ घरमे कियो दोसर करताइत नहि। एक तँ पिताक बीमारी, दोसर घरक खर्च जुटौनाइ, तै परसँ छोट भाए अठमामे पढै़त। मुदा दीनानाथकेँ अपन पढ़ाइ छोडैैैैै़क ओते दुख नै भेलै जते परिवार चलौनाइसँ लऽ कऽ पिताक सेवा करैक सुख भेलै। जे बेटा बाप-माइक सेवा नै करत ओ बेटे की? अपन पढ़ैक आशा दीनानाथ छोट भाए कुसुमलालपर केन्द्रित कऽ देलक।
  अधिक काल मकशूदन बहीनेक ऐठाम रहए लगलाह। गाइयोक सेवा आ खेतो-पथारक काज सम्हारए लगलथि। अपना ऐठामसँ अन्नो-पानि आनि-आनि दिअ लगलखिन। अपना घर जेकाँ भार उठा लेलक। अपन दशा देखि रामखेलावन मकशूदनकेँ कहलखिन- ‘हम तँ अबाहे भऽ गेलौं। जाबे दाना-पानी लिखल अछि ताबे जीबै छी। मरैक कोनो ठीक नहि अछि तेँ अपना जीबैत कतौ दीनानाथक बिआह करा दियौ। बेटा-बेटीक बिआह-दुरागमन कराएब तँ माए-बापक धरम छिऐ। मुदा हम तँ कोनो काजक नै रहलौं। कमसँ कम देखियो तँ लेबै।’
  बहनोइक बात सुनि मकशूदन गुम्म भऽ गेला। मने-मन सोचए लगला जे समए-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे नीक मनुख घरमे आनब कठिन भऽ गेल अछि। सभ खेल रुपैआपर चलि रहल अछि। मनुखक कोनो मोले ने रहलै। एहेन स्थितिमे नीक कन्याँ कोना भेटत ? तखन एकटा उपाए जरुर अछि जे रुपैया-पैसाक भाँजमे नहि पड़ि, गुनगर कन्याँक भाँज लगाबी। जइसँ घरक कल्याण हेतै। पाहुन जखन हमरा भार देलनि तँ हम दान-दहेज नहि आनि नीक कन्याँ आनि देबनि। बहिनोइकेँ कहलखिन- ‘पाहुन, रुपैआक पाछू लोक भसिआइत अछि। अगर अहाँ हमरा भार दै छी तँ हम रुपैआक भाँजमे नहि पड़ि नीक मनुक्ख आनि कऽ देब। से की विचार?’
  मकशूदनक बात सुनि बहीन धाँइ दऽ बाजलि- ‘भैया, रुपैया मनुक्खक हाथक मैल छिऐ। मुदा मनुक्ख तपस्यासँ बनैत अछि। तेँ हमरा नीक पुतोहू हुअए। रुपैआक भुख हमरा नै अछि।’
  बहीनक बात सुनि मकशूदनक मनमे सबुर भेलनि। बजलाह- ‘बहीन, जहिना तोरा सबहक पुतोहू तहिना तँ हमरो हएत की ने। के एहेन अभागल हएत जे अपन घर अबाद होइत नै देखत?’
अपन पढ़ाइक आशा तोड़ि दीनानाथ मने-मन अपना पएरपर ठाढ़ होइक बाट ताकए लगल। संकल्प केलक जे जहिना नीक रिजल्ट पबैक लेल विद्यार्थी जी-तोड़ मेहनति करैत अछि तहिना हमहूँ परिवारकेँ उठबैक लेल जमि कऽ मेहनति करब।
बिऔहती लड़कीक भाँज मकशूदन लगबए लगला। मुदा मनमे एलनि जे हम तँ वर पक्ष छी तेँ लड़की ऐठाम पहिने कोना जाएब ? कने काल गुनधुन करैत सोचलनि जे बेटा-बेटीक बिआह परिवारक पैघ काज होइत अछि तेँ एहेन-एहेन छोट-छीन बेवहारपर नजरि नहिये देब उचित हएत। तहूमे तँ हम लड़काक बाप नहि माम छी। पाहुन जखन भार देलनि तँ नहियो करब उचित नै हएत।
अपना गामक बगलेक गाममे लड़कीक भाँज मकशूदनकेँ लगलनि। परिवार तँ साधारणे मुदा लड़की काजुल। काजमे तपल। किएक तँ माए सदिखन ओकरा अपने संग राखि खेत-पथारक, घर-आंगनक काजसँ लऽ कऽ अरिपन लिखब, दुआरिमे पूरनि, फूलक गाछ, कदमक फुलाइल गाछक संग-संग पावनि-तिहारमे गीत गौनाइ सभ सिखबैत। बड़द कीनैक बहानासँ मकशूदन भेजा विदा भेला। पहिने दू-चारि गोटेक ऐठाम पहुँचि बड़दक दाम करैत कन्यागतक दुआरपर पहुँचला। कन्यागत दुआरपर नहि। मुदा लड़की बाल्टीमे पानि‍ भरि अंगना अबैत। लड़कीकेँ देखि मकशूदन पुछल- ‘बुच्ची, घरवारी कतए छथि?’
बाल्टी रखि सुशीला बाजलि- ‘बाड़ीमे मिरचाइ कमाइ छथि। अपने चौकीपर बैसियौ। बजौने अबै छिअनि।’
बाल्टी अंगनामे रखि सुशीला बाड़ीसँ पिताकेँ बजौने आएलि। पड़ोसी होइ दुआरे दुनू गोटे दुनू गोटेकेँ चेहरासँ चिन्हैत मुदा मुँहा-मुँही गप नै भेने अनचिन्हार। कन्यागत पूछल- ‘किनकासँ काज अछि?’
मुस्कुराइत मकशूदन- ‘अखन दुइये गोरे छी, तेँ मनक बात कहै छी। हमरो घर बीरपुरे छी। हमरा भागिन अछि। काल्हि खन पता चलल जे अहाँकेँ बिऔहती बच्चित‍या अछि तेँ ओइठाम कुटमैती कऽ लिअ।’
कुटुमैतीक नाम सुनि कन्यागत गुम्म भऽ गेलाह। कनी-काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘हम गिरहस्त छी। सेहो नमहर नै छोट। अइठीनक गिरहतक की हालत अछि से अहाँ जनिते छी। तेँ अइबेर बेटीक बिआह नै सम्हरत।’
कन्यागतक सुखल मुँह देखि मकशूदन बजलाह- ‘मनमे जे दहेजक भूत पकड़ने अछि ओ हटा लिअ। अहाँकेँ जहिना सम्हरत तहिना बिआह निमाहि लेब।’
मकशूदनक विचार सुनि कन्यागतक मुँह हरिआए लगलनि। दरबज्जे परसँ बेटीकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘बुच्ची, सरबत बनौने आबह?’
बड़का लोटामे सरबत आ गिलास नेने सुशीला दरबज्जापर आबि चौकीपर रखए लागलि। तहि बीच पिता बजलाह- ‘बुच्ची, इहो कियो आन नहि छथि। पड़ोसिये छिआह। बीरपुरे रहै छथि। दहुन सरबत।’
दुनू गोटे सरबत पीलनि। सरबत पीबि पिता कहलखिन- ‘बुच्ची, चाहो बनौने आबह।’
सुशीला चाह बनबए गेलि। दरबज्जापर दुनू गोरे गप-सप्‍प करए लगलाह।
मकशूदन- ‘जेहने अहाँक कन्याँ छथि तेहने हमर भागिन। अजीब जोड़ा बिधाता बनाकेँ पठौने छथि। काल्हिये अहूँ लड़काकेँ देखि लियौ। संयोग नीक अछि तेँ शुभ काजमे विलंब नहि करु।’
मकशूदनक विचारसँ जते उत्साहित कन्यागतकेँ हेबाक चाहियनि तते नहि होइत। किएक तँ मनमे घुरिआइत जे कहुना छी तँ बेटीक बिआह छी। फुसलेने काज थोडे़ चलत। मुदा कन्याक माए दलानक भीतक भुरकी देने अढ़ेसँ गप्पो सुनैत आ दुनू गोटेकेँ देखबो करैत। मने-मन उत्साहितो होइत जे फँसल शिकार छोड़ब मुरुखपना छी। माए-बापक सराध आ बेटीक बिआहमे ककरा नै करजा होइ छै। जानिये कऽ तँ हम सभ गरीब छी। गरीबकेँ जनमसँ लऽ कऽ मरै धरि करजा रहिते छै। तैले एते सोचै विचारैक कोन काज। करजो हाथे बेटीक बिआह कइये लेब। फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास लड़का अछि। एहेन पढ़ल-लिखल लड़का थोड़े भेटत। कहबियो छै जे पढ़ल-लिखल लोक जँ हरो जोतत तँ मुरुखसँ सोझ सिराओर हेतै। आइक युगमे मूर्खो बड़क बाप पचास हजार रुपैया गनबैत अछि। खुशीसँ मनमे होइ जे छड़पि कऽ दरवज्जापर जा कहिअनि जे अगर अहाँ आइये बिआह करए चाही तँ हम तैयार छी। मुदा स्त्रीगणक मर्यादा रोकि दैत। तेँ बेचारी अढ़ेमे अहुरिया कटैत। मुदा पतिक मन बदलल। ओ मकशूदनकेँ कहलक- ‘देखू, हम भैयारीमे असकरे छी मुदा गृहिणी तँ छथि। हुनकासँ एक बेर पूछि लै छिअनि। किएक तँ हम घरक बाहरक काजक गारजन छी ने, घरक भीतरी काजक गारजन तँ वएह छथि। जँ कहीं बेटी बिआहक दुआरे किछु ओरिया कऽ रखने होथि तँ कइये लेब।’
कन्यागत भोला उठि कऽ आंगन गेला। आंगन पहुँचते पत्नी झपटि कऽ कहए लगलनि- ‘दुआरपर उपकरि कऽ लड़काबला एलाहेँ तेँ अहाँ अगधाइ छी। जखैन लड़काक भाँजमे घुमैत-घुमैत तरबा खियाएत आ बेमाइसँ खूनक टगहार चलत तखन बुझबै। तीन-तीन साल बेटीबला घुमैए तखन जा कऽ कतौ गर लगै छै। जा कऽ कहि दिअनु जे अखैन हमर हालत नीक नञि अछि मुदा जँ अहाँ तैयार छी तँ हमहूँ तैयार छी। वर देखैक दिन कौल्हुके दऽ दिअनु।
पत्नीक बातसँ उत्साहित भऽ भोला आबि कऽ बजलाह- ‘पत्नीक विचार सोलहो आना छनि। मुदा कहबे केलहुँ जे अखैन हमर हालत बढ़ियाँ नै अछि।’
मकशूदन- ‘काल्हि अहाँ लड़का देखि लियौ। जँ पसिन्न हएत तँ जहिना कुटमैती करए चाहब तहिना कऽ लेब। असलमे हमरा लोकक जरुरत अछि, नै की रुपैआ-पैसाक।’
आठे दिनक दिनमे बिआह भऽ गेल। भोलाक बहिनो आ साउसो नीक जेकाँ मदति केलकनि। अपना घरसँ सिर्फ एकटा सोनाक सुक्की -नअटा चौवन्नीक छड़- भोलाकेँ निकलल।’
पनरह दिनक उपरान्त दीनानाथ पुबरिया ओसारपर बैसि, पितासँ छीपि कऽ माएकेँ कहलक- ‘माए, घरक दशा जे अछि से तोहूँ देखते छीही। जेना घर चलैए तेना कते दिन चलत। साले-साल खेत बिकाइत। जइसँ किछुए सालक बाद सभ सठि जाएत। छोड़ैबला काज एक्कोटा नञि अछि। जहिना कुसुमलालक पढै़क खर्च, तहिना बाबूक दवाइ आ पथ्यक। मुदा आमदनी तँ कोनो दोसर अछि नहि। लऽ दऽ कऽ खेती। सेहो डेढ़ बीघा। तहूमे ने पानिक जोगार अपना अछि आ ने खेती करैक लूरि। एते दिन तँ बाबू कहुना-कहुना कऽ करैत छलाह, आब तँ सेहो नै हएत। हमहूँ जँ कतौ नोकरी करए जाएब सेहो नै बनत, किएक तँ बाबूक देखभाल सेहो करैक अछि। तखन तँ एक्केटा उपाए अछि जे घरेपर रहि आमदनीक कोनो काज ठाढ़ करी।’
  बेटाक बात सुनि माए गुम्म भऽ गेलीह। जइ घरमे आमदनी कम रहत आ खरचा बेसी हएत ओ घर कोना चलत। एते बात मनमे अबिते माइक आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलनि। आँचरसँ नोर पोछि बाजलि- ‘बौआ, हम तँ स्त्रीगणे छी। घर-अंगनामे रहैवाली। तूँ जँ बच्चो छह तँ पुरुखे छह। जखैन भगवाने बेपाट भेल छथुन तखन तँ किछु करै पड़तह।’
दुनू गोटेक -माइयो आ बेटोक- मुँह निच्चाँ मुँहे खसल। ने बेटाक नजरि माए दिशि उठैत आ ने माइक नजरि बेटा दिशि। जहिना मरुभूमिमे पियासल लोकक दशा होइत, तहिना दुनूक दशा होइत। केबाड़ लग ठाढ़ सुशीला दुनूकेँ देखैत। जोरसँ कियो अहि दुआरे नहि बजैत जे रोगाइल पिता वा पति जँ सुनताह तँ सोगसँ आरेा दुख बढ़ि जेतनि। केबाड़ लगसँ घुसकि ओसारपर आबि सुशीला बाजलि- ‘माए चिन्ता केलासँ दुख थोड़े भगतनि। दुखकेँ भगबैले किछु उपाय करै पड़तनि। छोटका बौआ बच्चे छथि, बाबू रोगाइले छथि मुदा अपना तीनू गोरे तँ खटैबला छी। खटलासँ सभ कुछ होइ छै।’
सुशीलाक बात सुनि सासु बजलीह- ‘कनियाँ, कहलिऐ तँ बड़बढ़िया मुदा ओहिना तँ पानि‍ नै डेंगाएब।’
सासुक बात सुनि पुतोहु बाजलि- ‘हमर एकटा पित्ती धानक कुट्टी करै छथि। जहिना अपन परिवार अछि तहूसँ लचड़ल हुनकर परिवार छलनि। तइ परसँ चारि-चारिटा बेटिओ छलनि। मुदा जइ दिनसँ धानक कुट्टी करए लगलथि तइ दिनसँ दिने-दुनियाँ घुरि गेलनि। चारु बेटिओक बिआह केलनि, बेटेाकेँ पढ़ौलनि। ईंटाक घरो बनौलनि आ पाँच बीघा खेतो कीनि लेलनि। अखन हुनकर हाथ पकडै़बला गाममे कियो नै अछि।’
पत्नीक बात सुनि दीनानाथक भक्क खुजल। भक्क खुजिते दीनानाथ खुशीसँ उछलि अंगनामे कूदल। दरबज्जापर आबि कागज-कलम निकालि हिसाब जौड़ए लगल। डेढ़ सेर धानमे एक सेर चाउर होइत अछि। ओना धानक बोरा अस्सिये किलोक होइत अछि जखैनकि चाउरक सौ किलोक। चारि सए रुपैये बोरा धान बिकैत अछि तँ पान सौ रुपैये क्वीन्टल भेल। एक क्वीन्टल धानक सड़सठि किलो चाउर भेल। दू-चारि किलो खुद्दियो हएत जेकर रोटी पका कऽ खाएब। एक किलो चाउरक दाम साढ़े दस रुपैयासँ एगारह रुपैया होइत। अइ हिसाबसँ एक क्वीन्टल धानक चाउरक लगभग सात सौ रुपैया भेल। पान सएक पूँजीसँ सात सएक आमदनी भेल। तइ परसँ तीस किलो गुड़ो। जेकर दाम साठि रुपैया भेल। खर्चमे खर्च सिर्फ जरना, कुटाइ आ गाड़ीक भाड़ा। बाकी सभ मेहनतिक फल भेल। अगर जँ एक बोराक कुट्टी सभ दिनक हिसाबसँ करब तँ पाँच हजारक महीना आमदनी जरुर हएत।
हिसाब जोड़ैत-जोड़ैत दीनानाथक मनमे शंका उठल जे हिसाबेमे तँ नै गलती भऽ गेल। कागज-कलम छोड़ि उठि कऽ टहलै लगल। मने-मन हिसाबो जोड़ैत। मनमे कखनो हिसाब सही बुझि पड़ैत तँ कखनो शंका होइत। आंगन जा पानि पीलक। दू-चारि बेर माथ हसोथलक। फेर आबि कऽ हिसाब जोड़ए लगल। मुदा हिसाब ओहिना कऽ ओहिना होइ। मनमे बिसवास जगलै। जाहिसँ काजक प्रति आकर्षण सेहो भेलै। फेर आंगन जा माएकेँ पुछलक- ‘एक बोरा धान उसनैमे कते समए लगतौ?’
माए बाजलि- ‘एक बोरा धान तँ दसे टीन भेल। दुचुल्हियापर पाँच खेप भेल आ चरिचुल्हियापर अढ़ाइये खेप भेल। एक्के घंटामे उसनि लेब।’
माइक बात सुनि दीनानाथ तँइ केलक जे हमहूँ यएह रोजगार करब। पूँजीक लेल पत्नीक सोना सुक्कीमे सँ पाँचटा निकालि आ सबा भरि बेचि, धान कीनि कुट्टी शुरु केलक। जाहिसँ परिवारमे खुशहाली आबि गेलै।
कुशुमलाल बी.ए. पास कऽ मधुबनी कोर्टमे किरानीक नोकरी शुरु केलक। कोर्टेक बड़ाबाबूक बेटीसँ बिआह सेहो केलक। मधुबनियेमे डेरा राखि दुनू परानी रहए लगल। तीन-चारि बर्ख तँ संयमित जीवन बितौलक। सिर्फ वेतनेपर गुजर करैत। मुदा तेकर बाद पाइ कमाइक लूरि सीखि लेलक। जाहिसँ खाइ-पीबैक संग-संग आउरो लूरि भऽ गेलै। घरोवाली पढ़ल-लिखल। जहिना कमाइ तहिना खर्च। शहरक हवामे उधियाए लगल। सिनेमा देखैक, शराब पीबैक, नीक-नीक वस्तु कीनैक आदति बढ़ैत गेलै। एक दिन पत्नी कहलकै- ‘गाममे जे खेत अछि ओ अनेरे किअए छोड़ने छी। ओहिसँ की लाभ होइए। ओकरा बेचि कऽ अहीठाम जमीन कीनि अपन घर बना लिअ।’
स्त्रीक बात कुसुमलालकेँ जँचल। रवि दिन छुट्टी रहने गाम आबि भाए दीनानाथकेँ कहलक- ‘भैया, हम अपन हिस्सा खेत बेचि लेब। मधुबनियेमे दू कट्ठा खेत ठीक केलहुँहेँ। ओ कीनि ओतै घर बनाएब। भाड़ाक घरमे तते भाड़ा लगैए जे एक्को पाइ बचबे ने करैए जे अहूँ सभकेँ देब।’
कुसुमलालक बात सुनि दीनानाथ कहलक- ‘बौआ, अखन बाबू-माए जीविते छथुन, तेँ हम की कहबह? हुनके कहुन।’
दीनानाथक जबाब सुनि कुसुमलाल पितासँ कहलक। रोगाइल रामखेलावन खिसिया कऽ कहलक- ‘डेढ़ बीधा खेत छौ। दस कट्ठा हमरा दुनू परानीक भेल, दस कट्ठा दीनानाथक भेलै आ दस कट्ठा तोहर भेलौ। अपन हिस्सा बेचि कऽ लऽ जो।’
खेत कीनै-बेचैक दलाल गामे-गाम रहिते अछि। कुसुमलाल जा कऽ एकटा दलालकेँ कहलक। पाँच हजार रुपैये कट्ठाक हिसाबसँ दलाल दाम लगा देलक। कुसुमलाल राजी भऽ गेल। मुदा बेना नै लेलक। तरे-तर दीनानाथो भाँज लगबैत। साँझू पहर जखन कुसुमलाल मधुबनी बिदा भेल तखन दीनानाथ कहलकै- ‘बौआ, जते दाम तोरा आन कियो देतह तते हमहीं देबह। बाप-दादाक अरजल सम्पति छी, आन कियो जे आबि कऽ घरारीपर भट्टा रोपत ओ केहेन हएत ?
मुदा दीनानाथक बात कुसुमलाल मानि गेल। पचास हजारमे जमीन लिखि देलक। मधुबनियेमे कुसुमलाल घर बना लेलक। अपना गामक लोकसँ ओते संबंध नहि रहलै जते सासुरक लोकसँ। सासुरक दू-चारि गोटे सभ दिन अबिते-जाइत रहैत। आदरो-सत्कार नीक होए।
बीस बर्ख बाद दीनानाथक बेटा मेडिकल कम्पीटीशनमे कम्पीट केलक। बेटी आइ.एस.सी. मे पढ़िते। पढै़मे दुनू भाए-बहीन उपरा-उपरी। तेँ परिवारक सभकेँ आशा रहै जे बेटिओ मेडिकल कम्पीट करबे करत। माए-बापक सेवा आ बेटा-बेटीक पढ़ाइ देखि दुनू परानी दीनानाथक मन खुशीसँ गद-गद। परिवारोक दशा बदलि गेल। मुदा तैयो दीनानाथ धानक कुट्टी बन्न नञि केलक। आरो बढ़ा लेलक। मनमे इहो होइ जे धनकुटिया मिल गरा ली मुदा समांगक दुआरे नहि गड़बैत। टाएरगाड़ी कीनि लेलक। जाहिसँ खेतिओ करै आ भड़ो कमाइ।
कुसुमलालकेँ सेहो दूटा बेटा। दुनू पब्लिक स्कूलमे पढ़ैत। जेठका अठमामे आ छोटका छठामे। मधुबनियेमे डेरा रहितहुँ दुनू होस्टलेमे रहैत। तइ परसँ सभ विषएक ट्यूशन सेहो पढ़ैत। तेँ नीक खर्च होइ।
शराब पीबैत-पीबैत कुसुमलालक लीभर गलि गेलै। किछु दिन मधुबनियेमे इलाज करौलक मुदा ठीक नहि भेने दरभंगाक अस्पतालमे भर्ती भेल। चारि मास दरभंगोमे रहल मुदा ओतहु लीभर ठीक नै भेलै। तखन पटना गेल। पटनोमे ठीक नै भेलै, संगहि शरीर दिनानुदिन खसिते गेलै। अंतमे दिल्लीक एम्समे भर्ती भेल। ओतहु ठीक नञि भेलै। शरीर एते कमजोर भऽ गेलै जे अपनेसँ उठियो-बैसि नञि होइ। हारि-थाकि कऽ मधुबनीक डेरापर आबि गेल। मुदा एते दिनक बीमारीक बीच दीनानाथकेँ जानकारीयो ने देलक। सारे-सरहोजिक संग घुमैत रहल।
ओछाइनपर पड़ल-पड़ल सैाँसे देहमे धाव भऽ गेलै। ढाकीक-ढाकी माछी देहपर सोहरए लगलै। कतबो कपड़ा ओढ़बै तैयो माछी घुसि-घुसि असाइ दऽ दै। दिन-राति दर्दसँ कुहरैत। सदिखन घरवालीक मन तामसे लह-लह करैत। गरिएबो करैत। दुनू बेटामे सँ एक्कोटा लगमे रहैले तैयार नहि। जेठका बेटा कहए- ‘पप्पा जी, महकता है।’
जखन कखनो लगमे अबैत तँ नाक मूनि कऽ अबैत। छोटका बेटा सेहो तहिना। सदिखन बजैत-‘पप्पा जी, अब भूत बनेगा। लगमे रहेंगे तो हमको भी पकड़ लेगा।’
जइ आॅफिसमे कुसुमलाल काज करैत ओहि आॅफिसक एकटा स्टाफ दीनानाथकेँ फोनसँ कहलक- ‘कुसुमलाल अंतिम दिन गनि रहल अछि तेँ आबि कऽ मुँह देखि लियौ।’
फोन सुनि दीनानाथ सन्न भऽ गेल। जेना दुनियाँक सभ कुछ आँखिक सोझासँ निपत्ता भऽ गेलै। सुन-मशान दुनियाँ लगै लगलै। मनमे एलै, कियो ककरो नहि। दुनू आँखिसँ नोर टधरए लगलै। नोर पोछि सोचए लगल जे कियो झुठे ने तँ फोन केलक। फेर मनमे एलै जे एहेन समाचार झूठ किअए हएत? अनेरे कियो पैसा खर्च कऽ फोन किअए करत? एहेन अवस्थामे कुसुमलाल पहुँच गेल मुदा आइ धरि किछु कहबो ने केलक। खैर, जे होए। मुदा हमरो तँ किछु धर्म अछि। अपना कर्तव्यसँ कियो मनुख एहि दुनियाँमे जीबैत अछि। अखन तँ अबेर भऽ गेल। काल्हि भेारुके गाड़ीसँ मधुबनी जाएब। एते विचारि माएकेँ कहलक- ‘माए, एक गोटे मधुबनीसँ फोन केने छेलाह जे कुसुमलाल बहुत दुखित छथि तेँ आबि कऽ देखिअनु।’
दीनानाथक मुँहक बात सुनिते माएक देहमे आगि लगि गेलनि। जरैत मने बाजलि- ‘कुसुमा हमर बेटा थोड़े छी जे मुँह देखबै। उ तँ ओही दिन मरि गेल जइ दिन हमरा दुनू परानी बाप-माएकेँ छोड़ि चलि गेल। जँ अइ धरतीपर धरमक कोनो स्थान हेतै तँ ओइमे हमरो कतौ जगह भेटत। जँ कोनो शास्त्र-पुराणमे पतिब्रता स्त्रीक चरचा हेतै तँ हमरो हएत। आइ बीस बर्खसँ अइ हाथ-पाएरक बले बीमार पतिकेँ जीबित राखि अपन चूड़ी आ सिनुरक मान रखने छी।’
माइक बात सुनि दीनानाथ मने-मन सोचलक जे कुसुमलाल अगर हमरा कमा कऽ नहिये देलक तँ हमर की बिगड़ल। माइयो-पिताक दर्शन भोरे-भोर होइते अछि, बालो-बच्चा आनंदेसँ अछि। तखन तँ एक-वंशक छी जा कऽ देखि लिऐ।
दोसर दिन भोरुके गाड़ीसँ मधुबनी पहुँचि ओ कुसुमलालक डेरापर पहुँचल। बाहरेक कोठरीमे कुसुमलाल। चद्दरिसँ सौँसे देह झाँपल। मुँह उघारितहि कुसुमलाल बाजल- ‘भ-इ-अ-अ।’ कहि सदाक लेल आँखि मूनि लेलक।
दीनानाथ- ‘बौआ कुसुम, वौआ.....बौआ..... बउआ।’

Friday, November 21, 2008

उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज बहादुरगंज स’ रिपोर्ट-

उमेश कुमार- पुत्र श्री केशव महतो, बहादुरगंज
बहादुरगंज स’ रिपोर्ट- बाढक स्थिति बडे खतरनाक रहल, आब कोना के ओ बीत गेल। हमर सभक गाममे कोनो राहत कर्मी नै अएला, नेता सभ चुनाव मे अबै छथ, मुदा रौदी दाही मे नै।
गाममे सरकारी स्कूल अछि, सप्ताहमे दू दिन खुजल रहै ये, कशीबारी मे। चारि दिन बन्दे रहै ये, अहा पत्रकार छी हितेन्द्र भैया ई मुद्दा तैं भेजी रहल छी। गामक लोक खेती बारी करै ये , धान,गेहूँ परवल खीरा, करैला, कद्दू ,तारबूज ,गोभी, बैगन आ मछली मारै ये।
विराटनगर नेपाल मे सेहो लोक सभ सम्बन्धी सभ छथि, 20 किमी दूर बहादुरगंजमे हास्पीटल अछि, गाममे झोलाछाप हास्पीटल अछि जे झोलाछाप डाक्टरक झोरामे रहै ये। पिछला साल एक गोटे के बहादुर गँज हास्पीटल् ले गेलौ, डाक्टर सभ पानी चढा देलकै , तीन दिन तक पानी चढैते रहलै, कियो खेनाइ नै देलकै, ओ पेट फूलि क मरि गेल।
घर सभ फूसक आ घासक, धानक पुआरक बनल छै, अगिलग्गेमे से सभ जरैत रहैत छै।
एक-एक्अ आदमी के 5-6 टा बच्चा जिबैत रहैत छै, 9-10 बच्चामे।
विराटनगर लग गाम मे मौसाक घर गेलौ, ओतए सरकार मैथिली या नेपाली बाजय लेल कहने अछि, सभ गोटे ओत मैथिली बाजै छथि, भारतमे स्थिति खराप।
नेपालमे मैथिली के नीक स्थितिक कारन अछि ओतुक्का मैथिली मात्र मैथिल ब्राह्मन आ कर्न कायस्थ मे सीमित नै अछि, ओतय महतो यादव सभ मैथिली के अपन बुझैत छथि. भारतमे कतेको ठाम मात्र दू जातिमे सीमित अछि, तेसर के अशुद्ध कहल जै छै से ओ अपनाके मैथिली से दूर केने छथि,जाति-पाति से अपन उन्नति जे हुए मुदा समाजक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मैथिलीक उन्नति नै हैत,जाति-पाति से मिथिला के उन्नति नै हैत

जाति-पाति से कुंठाग्रस्त लोक नीक रचना नै लिखि सकताह आ घृनामे जरैत रह ताह।

नेपालमे घर फूसोके छै मुदा बेसी लकडी आ टीना के छै। ओत खेती बारी भारते जेका छै। ओतहुओ हास्पीटल दूरे छै।
ओते रिक्शा टेम्पू नै चलै छै, खाली बस चलै छै। ओत गाम्मे सेहो बिज्ली छै, गाममे मुदा रोड नै छै, ऊबर खाबर छै, बरसातमे कीचड्क्ष भे जाइ छै। शहरमे रोड ठीक छै। विराटनगर से 20 किलोमीटर दूर नया बजार हटियामे आधा बजार मे बजार आ आधामे दारू बिकाइत छै, जतए छोट से पैघ बच्चा सभी दारू पीबै छै।
आर समाचार बाद मे। (www.videha.co.in साभार विदेह)