Sunday, October 23, 2011

श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी हुनक समस्‍त साहि‍त्‍यि‍क क्रि‍या-कलापक मादे मुन्नाजी द्वारा कएल गेल गप्‍प-सप्‍प


दुर दृष्‍टि‍संपन्न गमैया संसाधनसँ दूर होइत गामक लोकक मन:स्‍थि‍ति‍केँ गहींरताक संग सोझाँ अननि‍हार श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी हुनक समस्‍त साहि‍त्‍यि‍क क्रि‍या-कलापक मादे मुन्नाजी द्वारा कएल गेल गप्‍प-सप्‍पकेँ अहाँक सोझाँ प्रस्‍तुत कएल जा रहल अछि‍-

मुन्नाजी- जगदीश बावू शि‍क्षाक पूर्ण डि‍ग्रीधारी भऽ अहाँकेँ एतेक देरीसँ मैथि‍ली लेखनक प्रवृति‍क की कारण?

जगदीश प्रसाद मंडल- अपनेक प्रश्‍नक उत्तर दैइसँ पहि‍ने मुन्नाजी कि‍छु अपन बात कहि‍ दैत छी। केजरीवाल हायर सेकेण्‍ड्री स्‍कूल झंझारपुरमे स्‍पेशल नाइन्‍थसँ लऽ कऽ स्‍पेशल एलेबुन धरि‍ एक सय नम्‍वरक एक वि‍षय मैथि‍ली पढ़ने छी। मुदा कओलेजमे नहि‍ पढ़लौं। हि‍न्दी पढ़लौं। साहि‍त्‍यसँ सि‍नेह सभ दि‍न रहल। लि‍खै दि‍स दू हजार ईस्‍वीक बादे बढ़लौं। ऐठाम ि‍सर्फ एतबे कहब जे जमीनी संघर्षक उपरान्‍त वैचारि‍क संघर्ष जोर पकड़ैत अछि‍ तँए लि‍खब अनि‍वार्य भऽ गेल। जहि‍सँ जीवनमे आरो मजबूती अएल। सभकेँ माने हर मनुष्‍यकेँ अपने लगसँ जि‍नगी शुरू करक चाहि‍एनि‍। कर्मक क्षेत्र अपन गाम रहल जहि‍ठामक भाषा मैथि‍ली छी तँए हि‍न्‍दीक वि‍द्यार्थी रहि‍तहुँ मैथि‍लीमे लि‍खै छी। देरीसँ लि‍खैक कारण इहो भेल जे १९६७ई.मे जखन बी.ए.क वि‍द्यार्थी रही, वामपंथी राजनीति‍मे जुड़लौं। काजसँ जते समए बँचए ओ सेवामे लगबए लगलौं। बी.ए. धरि‍ जनता कओलेज झंझारपुरमे आ आगू सी.एम. कओलेज दरभंगामे पढ़लौं। ओना लि‍खैक आरो कारण अछि‍ जे उम्रक संग शरीरक शक्ति‍यो कमए लगल।
 
मुन्नाजी- एतेक डि‍ग्रीक (एम.ए.क) पछाति‍ तँ अहाँ समएमे नोकरी भेटव बेशी असोकर्ज नै छलै। नोकरी नै कऽ खेती-बारीक ि‍नर्णय अहाँक कोन मानसि‍कताक द्योतक ऐछ?

ज.प्र.मं.- आजुक दृष्‍टि‍ये जरूर बुझि‍ पड़ैत हएत जे ओहि‍ समए नोकरी सस्‍ता छलैक मुदा से बात नहि‍। एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु कहि‍ ि‍दअए चाहै छी। झारखंड लगा बि‍हार राज्‍य छल। अखन जते जि‍ला, सवडि‍वीजन आ ब्‍लौक आइ खंडि‍त बि‍हारमे देखै छि‍ऐ ओते पूर्ण (सौंसे) बि‍हारमे नहि‍ छल। संग-संग जते काजक वि‍वि‍धता अखन धछि‍, सेहो नहि‍ छल। अखन छत्तीस-सैंतीसटा जि‍ला खंडि‍त बि‍हारमे अछि‍ जखन कि‍ ओहि‍ समए ि‍सर्फ सत्तरहटा जि‍ला छल। जहि‍ मधुबनीमे पाँचटा सवडि‍वीजन अछि‍ ओ अपने सवडि‍वीजन छल। तहि‍ना शि‍क्षो वि‍भागमे छल। गनल-गूथल कओलेज आ हाइ-स्‍कूल रहए। आइक मधुबनी (प्रोपर)मे चारि‍टा कओलेज- झंझारपुर, सरसो, पंडौल आ बाबूबरहीमे खुजल। बाबूवरहीक कओलेज (जे.एन.) मधुबनी चलि‍ गेल। ओहि‍सँ पूर्व आर.के. काओलेज आ भरि‍सक एकटा आरो छल। बाकी सभ बादक छी। जखन जनता कओलेज झंझारपुर खुजल, ओहि‍ समए अधासँ अधि‍क शि‍क्षक (प्रोफेसर) आने-आन जि‍लाक छलाह। तँए कि‍ एहि‍ क्षेत्रमे पढ़ल-लि‍खल लोक नहि‍ छलाह से बात नहि‍।
बैंकक शाखा जते आइ देखै छि‍ऐ ओते नहि‍ छल। भरि‍सक मधुबनीमे एकटा रहए बाकी नहि‍ये जकाँ छल। तहि‍ना ब्‍लौकोक छल। एक तँ संख्‍या कम दोसर एकटा बी.डी.ओ. रहैत छलाह। जखन कि‍ बी.डी.ओ; सी.ओ. आ पी.ओ. तीनि‍टा अखन छथि‍।
कल-कारखाना नाओपर एकटा चीनी मि‍ल (लोहट) ओ गोटि‍ पङरा चाउरक मि‍ल छल। ओना आरो बहुत बात अछि‍ मुदा मोटा-मोटी कहलौं। आब अहीं कहु जे नोकरी कत्त छल। ओहि‍ अनुपातमे अखन बेसी अछि‍।
खेती करैक कारण-
जखन हम तीनि‍ये बर्खक रही पि‍ता मरि‍ गेलाह। हमरासँ तीन बर्ख पैघ भाय छलाह। ओना परि‍वारमे दूटा पि‍सि‍औत भाय रहैत छलाह। हुनका रहैक कारण छल हुनकर घर फुलपरास वि‍धानसभा क्षेत्रक घोघरडि‍हा ब्‍लौकक अमही पंचायतक हरि‍नाही गाम छनि‍। जखन कोसी पश्‍चि‍म मुँहे जोर केलक तँ गाम उपटि‍ गेल। सभ कि‍यो बेरमा चलि‍ एलाह। जे घटना १९३५-४०क बीचक छी। फेर जखन कोसी पूव मुँहे ससरल तखन १९६०ई.मे पुन: ओ दुनू भाँइ चलि‍ गेलाह। हुनका सबहक गेने गि‍रहस्‍तीक संग-संग पढ़वो करी। तहि‍येसँ खेतीसँ जुड़ाव भऽ गेल। जे जीवि‍काक साधन रहल।

मुन्नाजी- प्रारम्‍भमे अहाँ अपनाकेँ साम्‍यवादी कहि‍ सामंतवादक वि‍रूद्ध हो-हल्ला मारि‍-झगड़ामे सक्रि‍य रहलौं बादमे अइसँ वि‍मोह कि‍एक? एे सँ की फायदा वा नोकसान उठएल?

ज.प्र.मं. - जहि‍ना छलौं तहि‍ना छी। मुदा परि‍स्‍थि‍ति‍केँ ऑकि‍ देखए पड़त। सामंतवादमे मनुष्‍यक बुनाबटि‍ जाहि‍ रूपक रहै छै ओ सामंतवादपर चोट पड़लासँ बदलैत छैक। खि‍स्‍सा-पि‍हानी आ नाटकक स्‍टेज सामाजि‍क वि‍कास आ सामाजि‍क जीवन नहि‍ होइत छैक। नाटकक स्‍टेज होइत छैक- तीन घंटामे रामक जन्‍म, जनकपुरक धनुषयज्ञ, बनमे सीताक हरण आ रावणक मृत्‍युक उपरान्‍त वि‍सर्जन। तहि‍ना खि‍स्‍सा पि‍हानीमे सेहो होइत छैक। मुदा समाजक मंच बहुत जटि‍ल होइत छैक। जहि‍क लेल समयो लगै छै आ संघर्षो होइत छैक। तहूँसँ जवर्दस्‍त वैचारि‍क संघर्ष सेहो होइत छैक। संक्षेपमे- आर्थिक वि‍कासक क्रममे खेतीक लेल जखन नवका माने उन्नति‍ कि‍स्‍मक बीआ आएल तँ सामंती सोचक लोक वि‍रोध केलनि‍। हुनकर आरोप छलनि‍ (१) वस्‍तुमे सुआद नहि‍ होइत छैक, (२) पावनि‍-ति‍हारक दृष्‍टि‍ये अशुद्ध होइत अछि‍, (३) स्‍वास्‍थ्‍यक दृष्‍टि‍सँ खाद देल अहि‍तकर होइत अछि‍ जहि‍सँ बीमारी बढ़त। तहि‍ना दरभंगा अस्‍पताल खुललापर सेहो वि‍रोध भेल। गाम-घरमे एलोपैथक वि‍रोध भेल। आरोप छलैक- गाइयक खूनक इन्‍जेक्‍शन आ सुगरक मांसक बनल दवाइ। साधारण इनारक जगह पानि‍क कल भेने सेहो वि‍रोध भेल। आरोप लगैत छल जे कलक वासर चमड़ाक होइ छै, तहि‍सँ पूजा कोना हएत आ अशुद्ध पानि‍ लोक पीति‍ कोना? कते कहब। एहि‍ परि‍स्‍थि‍ति‍केँ संक्रमण काल कहल जाइ छै। सामंतवाद टुटलाक बाद पूँजीवादी आ समाजवादी दि‍शा अबैत छैक।
हमरा गामक नब्‍बे प्रति‍शत जमीन बहरवैयाक छलनि‍। ओना तीनि‍टा जमीनदार छलाह वाकी दूटा मास छलाह। जनवादी लड़ाइ शुरू होइते दूटा मालि‍क (जमीनदार) अपन जमीन बेच लेलनि‍। एक गोटेक संग जवर्दस्‍त लड़ाइ भेल। जमीन्‍दारक संग सूदखाेर महाजन सेहो छलाह। हुनको संग लड़ाइ भेल। अखन ने कि‍यो बाहर जमीन्‍दार छथि आ ने महाजन। गाममे कि‍नको अधि‍क जमीन नहि‍ भेलनि‍। ऊपर दस बीघा आ वाकी नि‍च्‍चाँ छथि‍। एहि‍ दौरमे करीब तीस बर्ख लड़ाइ गाममे चलल। सत्तरि‍-एकहत्तरि‍क उठल तूफान शान्‍त होइत-होइत ५.५.२००५ई.केँ अंति‍म मुकदमाक अन्‍त भेल।
वि‍कासोक प्रक्रि‍या छैक। आइक भारी मशीन (कमप्‍यूटर) देखि‍ नव पीढ़ीक लोककेँ सहजहि‍ वि‍श्‍वास नहि‍ हेतनि‍। मुदा हाथक काज हाथसँ चलैबला औजारक संग लघु मशीनमे बदलल। लघुमशीन परि‍मार्जित होइत भारी आ तेज मशीन बनि‍ ठाढ़ अछि‍।


मुन्नाजी- कहल जाइछ जे अहाँक साम्‍यवादीक वि‍द्रोह छवि‍ तखन दवि‍ गेल जखन की अहाँ सामंती द्वारा देल प्रलोभनकेँ स्‍वीकारि‍ लेलौं की सत्‍य अछि‍?

ज.प्र.मं. - चारि‍म प्रश्‍नक उत्तर भेट गेल हएत मुन्नाजी। जँ से नहि‍ तँ अनठेकानी गोला फेकब हएत।

मुन्नाजी- उग्रवादीसँ रचनावादी प्रवृति‍ कोना जागल कोनो एहेन वि‍शेष घटना जे अहाँक रचनात्‍मक सोचकेँ प्रेरि‍त केने हुअए?

ज.प्र.मं. - पाँचम प्रश्‍नक उत्तर सेहो आबि‍ गेल अछि‍। दुनि‍याँक नक्‍शामे जकरा शीतयुद्ध (cold war) कहल गेल अछि‍ वएह वैचारि‍क संघर्ष छी। जकरा लेल साहि‍त्‍य प्रमुख अस्‍त्र छी।

मुन्नाजी- मैथि‍ली रचनाकारक प्रवृति‍ अछि‍ जे एक-दु रचना कऽ अपनाकेँ मैथि‍लीधारामे जोड़वामे जुटि‍ जाइछ मुदा अहाँ एकर उलट चि‍न्‍तनशील आ रचनाशील रहि‍ नुकएल सन रहलाैं?

ज.प्र.मं.- छठम प्रश्‍नक संबंधमे स्‍पष्‍ट समझ अछि‍ जे जहि‍ना उत्तरबरि‍या पहाड़सँ नि‍कलल छोट-छीन धारा सभ दछि‍न मुँहे टघरैत नदी-नालामे मि‍लैत आगू बढ़ैत गंगामे पहुँच समुद्रमे समाहि‍त भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना जँ साहि‍त्‍यक (रचनाक) दशा-दि‍शा नीक रहत तँ साहि‍त्‍यक धारा बनवे करत। ई वि‍सवास अछि‍। जना आन-आन गोटे शुरूहेँसँ रचना दि‍स बढ़लाह से नहि‍ भेल। कारण ऊपर आबि‍ गेल अछि‍।

मुन्नाजी- वि‍योगीजी अहाँ कि‍तावक आमुखमे अहाँकेँ २०गोट कथा, ५गोट उपन्‍यासक पाण्‍डुलि‍पि‍ लऽ भेँट करवाक क्रममे अहाँक दृष्‍टि‍ फरीछ दू साल बाद पुन: भेँटमे हेबाक बात कहलनि‍हेँ ऐपर अहाँक की वि‍चार?

ज.प्र.मं.- मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतक वि‍योगीजी पहि‍ल साहि‍त्‍यकार छथि‍ जि‍नकासँ पहि‍ल भेँट छी। ओना एक-दू बेर फोनपर गप भेला बाद उमेश मंडल पटना गेल रहथि‍ तँ भेँट केलकनि‍। कि‍छु रचना सभ लऽ कऽ सेहो गेल रहथि‍। दू-चारि‍ पन्ना पढ़ि‍ कऽ सुनेवो केलकनि‍। मुदा डेढ़-दू घंटाक बात चीतमे जाने-पहचानक बात बेसी भेलनि‍।
हुनकासँ हमर पहि‍ल भेँट मधुबनीमे छी जखन ओ मधुबनी अएलाह। ओही क्रममे रहुआ कथा-गोष्‍ठीक जानकारि‍यो देलनि‍ आ चलैइयोले कहलनि‍। हुनक सम्‍पादनमे देशज पत्रि‍का २००३ई.मे ि‍नर्मलीक कि‍तावक दोकानमे भेटल। जाहि‍मे यात्रीजी आ कि‍रणजीक संग गप-सप्‍प सेहो नि‍कलल। वि‍चारक दृष्‍टि‍सँ यात्रीजी सँ वि‍द्यार्थीये जीवनसँ प्रभाि‍वत छलौं। पत्रि‍का पावि‍ आरो प्रभावि‍त भेलौं आ वि‍योगी जीक संग आकर्षण सेहो बढ़ल। तहि‍ना कि‍रण जीक जि‍नगीसँ सेहो बहुत प्रभावि‍त कओलेजे जीवनसँ छलहुँ। लगसँ हुनका देखने रहि‍एनि‍। जखन हम सी.एम. काओलेजमे पढ़ैत रही तखन ओ प्रोफेसर छलाह। गप-सप्‍पक क्रममे ओ बजलाह जे जहि‍ना बजै छी तहि‍ना ि‍लखब मैथि‍ली छी। हुनकर ई वि‍चार तहि‍ये नहि‍ अखनो रग-रगमे समाएल अछि‍।


मुन्नाजी- उपरोक्त आमुखमे ओ कहने छथि‍ जे अहाँ हुनकर (वि‍योगीजीक) एहेन अंधभक्त छी जे हुनकर कि‍ताबकेँ ताकि‍-ताकि‍ कऽ पढ़ैत रही एकटा कि‍ताबकेँ तकबाक क्रममे पटना धरि‍ गेलौं मैथि‍ली साहि‍त्‍यक पाठक शुन्‍यता (कीनि‍ कऽ पढ़ैबला)मे जँ ई सत्‍य छै तँ एकर की कारण?

ज.प्र.मं.- अहू प्रश्‍नक उत्तर आबि‍ गेल अछि‍। ई बात हुनकामे जरूर छन्‍हि‍ जे उपकरि‍-उपकरि‍ कतेक कि‍ताब देलनि‍। भक्‍त आ भगवान साम्‍प्रदायि‍क भाषा छी। कि‍यो अपन कर्मसँ बढ़ैत-घटैत अछि‍ मुदा आगूसँ अधला सोचब आ करबकेँ अधला बुझै छी।

मुन्नाजी- कि‍छुए समयान्‍तरलमे वि‍वि‍ध वि‍धापर अहाँक ८गोट पोथीक प्रकाशनसँ केहेन अनुभूति‍ भऽ रहल ऐछ अगि‍ला लक्ष्‍य की ऐछ?

ज.प्र.मं.- पोथी प्रकाशि‍त भेलापर जहि‍ना आन गोटेकेँ अनुभूति‍ होइत छन्‍हि‍ तहि‍ना भेल। लक्ष्‍यक जहाँ धरि‍ प्रश्‍न अछि‍ तँ प्रसादजीक पाँति‍ मन पड़ैत अछि‍-
      जीवन का उद्देश्‍य नहि‍ है शान्‍त भवनमे टि‍क जाना
      और पहुँचना उन राहो पर जि‍नके आगे राह नहि‍।‍


मुन्नाजी- एतेक पोथी प्रकाशनक पछाति‍यो अहाँक ठोस मूल्‍यांकन वा पुरस्‍कारक हेतु चयन नै भेलासँ अप्‍पन परिश्रम नि‍रर्थक सन तँ नै लगैए।


ज.प्र.मं.- कोनो रचनाक मूल्‍यांकन समए करैत अछि‍। समयानुकूल रचना छी वा नहि‍ ई समए आँकि‍ कएल जा सकैत अछि‍। रहल पुरस्‍कारक बात? प्रेमचन्‍द सन उपन्‍यास सम्राट आ कलमक जादूगरकेँ कोन पुरस्‍कार भेटलनि‍। मुदा ओ अपना श्रमकेँ नि‍रर्थक कहाँ बुझलनि‍। अंति‍म साँस धरि‍ सेवा करैत रहलाह।
अपन पचहत्तरि‍म जन्‍म दि‍नक अवसरपर नामबर भाय (डॉ. नामबर सि‍ंह) बाजल छलाह- जते काज अखन धरि‍ केलहुँ ओते पाँच बर्खमे करब।‍ हुनकर कते सेवा छन्‍हि‍ सर्ववि‍दि‍त अछि‍। जखन पचहत्तरि‍ बर्खक बूढ़क एहेन वक्‍तव्‍य छनि‍ तखन तँ हम अपनाकेँ जवान वुझै छी।

मुन्नाजी- मैथि‍लीमे प्रारम्‍भेसँ बनल जाति‍-पॉति‍क फाॅटकेँ अहाँ कोन दृष्‍टि‍ए देखै छी। आ स्‍वयं अहाँ ओइ बीच अपनाकेँ कतऽ पबै छी।

ज.प्र.मं.- शुरूहेसँ वर्ण नहि‍ वर्गमे वि‍श्‍वास अछि‍। जहि‍ आधारपर काज करैत एलौं आ करि‍तो छी। समाजमे जे जाति‍-धर्मक (सम्‍प्रदायक) खेल चलैत अछि‍ ओ राजनीति‍ केनि‍हारक चालि‍ छी।

मुन्नाजी- पि‍छड़ावर्गसँ आगाँ (रचनात्‍मक रूपेँ) अबैत लोकक अहाँ उपर उठेवा लेल कोनो सहयोगी बनव पसि‍न्न करब? हुनका सबहक लेल कोनो संदेश?

ज.प्र.मं.- जाहि‍ठाम व्‍यवस्‍था बदलैक प्रश्‍न अछि‍ ओ ने एक दि‍नमे हएत आ ने एक गोटे बुते हएत। सबहक कल्‍याण हएत आ सभकेँ करए पड़त। तँए सभकेँ कहैत छि‍अनि‍ जे जागू, उठि‍ कऽ ठाढ़ होउ। आगू बढ़ू। मि‍थि‍ला सबहक मातृभूमि‍ आ मैथि‍ली सबहक भाषा छी तँए अपन बुझि‍ सेवामे लागि‍ जाउ।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

प्रखर दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ युवा लघुकथाकार मुन्नाजीक भेँटवर्ता


हम पुछैत छी- मुन्नाजी
शब्‍दक जादूगर मैथि‍ली समीक्षाक प्रखर
दृष्‍टि‍दर्शी एवं फरि‍छाएल कथाकार श्री
 दुर्गानन्‍द मंडलजी सँ युवा लघुकथाकार
 मुन्नाजीसँ भेँटवर्ताक सारांश अहाँ सबहक
 आगाँ राखल जा रहल अछि-


मुन्ना जी-       अहाँ मैथि‍लीक रचना कोना आ कहि‍या प्रारंम्‍भ केलौं, एतेक दि‍न धरि‍ हेराएल वा नुकाएल कि‍ए रहलौं?

दुर्गानन्‍द मंडल-   जी हम मैथि‍लीक रचना श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीक स्‍नेहाशील अजस प्रेरणाक बले 2009मे शुरू कएलहुँ। जहाँतक नुकाएल वा हेराएलक भाव अछि तँ हम कहए चाहब जे हम नै तँ नुकाएल रही आ ने हेराएल रही, हँ तखन अल्हुआ जकाँ झपाएल जरूर रही।

मुन्ना जी-       अहाँक कथाक गढ़नि‍ बड्ड ठोस होइछ जेना सोनारक एक-एक गॉथल मोती जकाँ अहाँ एहेन शब्‍द प्रयोग कोना कऽ पबै छी, स्‍वभावि‍क रूपेँ वा शब्‍द संगोर मात्र कऽ रचना करै छी?

दुर्गानन्‍द मंडल-   कथाक गढ़नि‍ प्रयुक्त शब्‍द स्‍वभावि‍क रूपेँ रहैत अछि। संगोरसँ ततबेक दूर जते की गदहाक माथमे सींग।

मुन्ना जी-       अहाँ कथा पाठ करबाकाल सेहो एक-एक शब्‍दकेँ फरि‍छा श्रोताक सेझाँ राखि‍ ओकर अस्‍ति‍त्‍वकेँ फरि‍छा दैत छी एकर की ध्‍येय?

दुर्गानन्‍द मंडल-   कथा पाठ करबाकाल एक-एक शब्‍द श्रोता बन्‍धूक सोंझा राखब ओकरा अस्‍ति‍त्‍केँ फरि‍छा देब, कथाकेँ सोझरा दैत अछि। कथा श्रवणीए भऽ जाइत अछि आ श्रोता बन्‍धू श्रवण करैमे सेहो आनन्‍दक अनूभव नि‍श्‍चि‍त रूपेँ होइत छन्‍हि‍। जे एकटा फरि‍छाएल कथाकारक कथाक सार्थकता थि‍क।

मुन्ना जी-      गैर बाभन वर्गसँ कति‍एल रचनाकारक कति‍येवाक वा नुकएल रहवाक की कारण अपन रचनाक सामर्थ्‍यहीनता वा आर कोनो वि‍शेष कारण?

दुर्गानन्‍द मंडल- गएर बाभन वर्गक कति‍आएल रचनाकारक कति‍येबाक वा नुकाएल रहबाक कोनो एक-आधटा कारण नै अछि‍। जँ वि‍स्‍तृत रूपसँ चर्च कएल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक क्षेत्र वा ओकर वि‍स्‍तार मात्र एकटा जाति‍ वा वर्ग वि‍शेषसँ देखल जाइत रहल। जेकरा ओ लोकनि‍ अपन पूर्वजक धरोहरि‍क रूपमे अमानति‍ बुझैत रहलाह। मुदा आइ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍स्‍तार ओ अपन सभ परि‍सि‍मनसँ बहरेबाक लेल औना रहल छलीह। मुदा वर्ग वि‍शेषक खि‍ंचल एकटा सीमा-रेखा जेकरा लांघि‍ कऽ बाहर भऽ जाएब बड्ड कठीन छल। ने ि‍सर्फ छल आइयो अछि‍। जेना जँ कोनो गएर-ब्रह्मण-कर्ण-कायस्‍थ वर्गक लोककेँ साहि‍त्‍यसँ अनुराग होइ तँ सभसँ पहि‍ने अपन मातृभाषाक प्रति‍ हेबाक चाही। मुदा जखन ओ मातृभाषा (मैथि‍ली)मे लि‍खए लेल कलम उठबैत छथि‍ तँ बैरि‍अर जकाँ ओहन-ओहन शब्‍द सभ आबि‍ ठाढ़ भऽ जाइत अछि‍ जे ओ अपना जीवनमे तँ अपने नहि‍ये बाजल छलाह अपि‍तु कि‍नको मुँहेँ कखनो-कहि‍यो सुननहुँ नै छलाह। तँ हमर कहबाक भाव मुन्नाजी अपने करीब-करीब बुझि‍ गेल हएब। एतबे नै समए-कुसमए मैथि‍ली साहि‍त्‍य लेखनमे नीकसँ नीक कथाकारक पदार्पण भेल मुदा ओइ कथाकार लोकनिमे सँ अधि‍कांशकेँ वर्ग-वि‍शेष पर्दाक पाछाँ रखलनि‍। मात्र कि‍छु गि‍नल-चुनल कथाकार लोकनि‍केँ पर्दापर आनल गेल। जे वर्ग-वि‍शेषक कोनो ने कोनो रूपमे पछि‍लग्‍गु वा मुँहलग्‍गु बनि‍ हुनकहि‍ शब्‍द आ बोलीकेँ (जे मात्र लि‍खल जाइत, बाजल नै) प्रश्रय दैत रहला। ओना ई अलग बात जे आजुक परि‍स्‍थि‍ति‍ थोड़ैक बदलल सन बुझाइत अछि‍। तहु लेल हमर कहब हएत जे बदलैत परि‍स्‍थि‍ति‍केँ देख गएर ब्राह्मण वा जि‍नका दऽ अपने कहऽ चाहै छी ओ सभ आगाँ आबि‍ रहला अछि‍। आ आरो एता से वि‍श्‍वास अछि‍।

मुन्ना जी-      अहाँ समीक्षा सेहो लि‍खै छी, समीक्षाक प्रमुख आधार की रखै छी, रचनाकारक व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन?

दुर्गानन्‍द मंडल- मुन्नाजी, ओना हम कोनो समीक्ष नै छी। आ ने समीक्षा करबाक हमरा सामर्थ्‍य अछि‍। समीक्षा जगतमे एकसँ एक, पैघ समीक्षक सभसँ अपनेक भेँट-घाँट भेल हएत। जे प्रखर समीक्षकक रूपमे जानल जाइत रहलाहेँ। तखन समए पाबि‍ जे कि‍छु एक-आधटा लि‍खलौं। तैसँ हमरा समीक्षक नै मानल जाए। तखन, अपनेक प्रश्‍न- समीक्षामे व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेषण वा कृति‍त्‍व वि‍वेचन- तँ वि‍चारनीय अछि‍। समीक्षाक प्रमुख आधार कोनो एकटाकेँ नै मानि दुनूकेँ आधार बनाओल जाए।‍ कि‍एक तँ कथाकारक कोनो कथाक समीक्षाक आधार जतबए हुनकर व्‍यक्‍ति‍त्‍व वि‍श्‍लेशन रहै छन्‍हि‍ ततबाए कृति‍त्‍व वि‍वेचन सेहो। तखन खगता ऐ बातक अछि‍, जे कि‍छु ओ कथाक मादे पाठककेँ देमए चाहै छथि‍न ओकरा ओ अपना जीवनमे कतेक अनुशरण करै छथि‍?       

मुन्ना जी-      अहाँक कथाक मुख्‍य वि‍न्‍दु की होइछ, कोनो कथाक कथानक कतए केन्‍द्रि‍त रहैछ?
 दुर्गानन्‍द मंडल- कथाक मुख्‍य बि‍न्‍दु गाम-घर, सर-समाजसँ जुड़ल समस्‍या आ नि‍दानक संग अपन सभ्‍यता-संस्‍कृति‍केँ यथावत रखनाइ। आ से सभ बि‍न्‍दुपर।     

मुन्ना जी-       गैरबाभन रचनाकारक उपस्‍थि‍ति‍क भवि‍ष्‍य अहाँ केहेन देखै छी, बाभन वा जमल रचनाकारसँ उखरि‍ हेरा जाएब वा अपन फरि‍छएल दृष्‍टि‍ऍ ओइसँ आगु डेग बढ़ा स्‍थापि‍त हएब सन?

दुर्गानन्‍द मंडल-  हि‍नकर सबहक भवि‍ष्‍य एकदम सवर्णि‍म अछि‍। कारण अहाँ नीकसँ जनै छी जे अपन समाजमे अखनो वैदि‍क व्‍यवहार-चालि‍-चलन ि‍वद्यमान अछि‍ आ से हुनके सबहक बीच अहाँ देखब। नि‍श्‍चि‍त रूपेँ अपने ऐपर वि‍श्‍वास करी जे जँ ओ इमानदारी पूर्वक रचना करता तँ सत्‍यक समीप रहैक कारणे ओ कि‍नकोसँ फरि‍छाएल दूष्‍टि‍ऍं सोझा औताह। तखन खगता ऐ बातक अछि‍ जे ऐ कर्मकेँ अो अपन तपस्‍या बुझथि‍। पूर्ण नि‍ष्‍ठा आ लगनसँ लेखनीकेँ अनवरत रूपेँ साधथि‍।    

मुन्ना जी-       अहाँक कथेपर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य की अछि, एकर अति‍रि‍क्‍त आर की सभ रचना करैत छी?

दुर्गानन्‍द मंडल-   कथापर केन्‍द्रि‍त रचनाक मूल उद्देश्‍य पाठक बन्‍धुकेँ पूर्ण मनोरंजनक संग समाज बीच व्‍याप्‍त आराजक्‍ता, अंधवि‍श्‍वास, जाति‍-पाति‍ आदि‍केँ दूर करैत एकटा मानवीय मूल्‍यकेँ स्‍थापि‍त करब। जहाँधरि‍ आर-आर रचनाक प्रश्‍न अछि‍। मुन्ना बाबू तै सम्‍बन्‍धमे हम ई कहब जे शुरूहेँसँ अर्थात् जहि‍यासँ पाटीपर लि‍खब छोड़लहुँ पोथीक अध्‍ययन करब शुरू केलहुॅँ तहि‍येसँ साहि‍त्‍यक वि‍धा- कथा, उपन्‍यास, कवि‍ता आदि‍सँ बड्ड सि‍नेह रहल। कहि‍यो काल लघुकथा, कवि‍ता सेहो लि‍खैत रहलौं। वि‍श्‍वास अछि‍ जे आगाँ और लि‍खब। वि‍देह पत्रि‍काक सम्‍पादक श्री गजेन्‍द्र ठाकुर जीक सि‍नेहसँ हमरा अपनामे सृजनात्‍मक शक्‍ति‍क संचार भेल। बहुत रास एहेन शब्‍द सभ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे अप्रयुक्‍त छल। जेकरा ठेंठ कहल जाइ छलै ओ जखन ठाकुर जीक लि‍खल पोथी कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पढ़ि‍ देलखहुँ आ जनलहुँ तँ आरो वि‍श्‍वास भऽ गेल।     

मुन्ना जी-       भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल कोनो जाति‍क) लोकक उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनेने रहबाले अहाँ कोनो डेग उठाएब वा एकरा अनठि‍या देब उचि‍त बुझब?
दुर्गानन्‍द मंडल-  भवि‍ष्‍यमे अपन जाति‍-बि‍रादरी (पि‍छड़ल जाति‍क) उपस्‍थि‍ति‍क नि‍रन्‍तरता बनौने रहबा लेल एकरा अनठि‍या देब उचि‍न नै अपि‍तु समए-समएपर नवसँ लऽ कऽ पुरान कथाकार लोकनि‍क बीच ठाम-ठाम चर्चा, परि‍चर्चा, पाँच-दस कथाकार मि‍ल कथा गोष्‍ठि‍क आयोजन, कथा-पाठ आदि‍पर उचि‍त समीक्षादि‍ करब। जइठाम मैथि‍ली पत्र-पत्रि‍काक अनुपलब्‍धता अछि‍ ओइठाम दस-बीस पाठक बना पत्र-पत्रि‍का वा पोथी आदि‍ मंगाएब। ओकरा अपनहुँ पढ़ि‍ दोसरोकेँ पढ़़बाक आग्रह करब। कि‍छु लि‍खबा-पढ़बाक प्रेरणा देब हम उचि‍त बूझब।
             
              मुन्नाजी अपने हमरा...... बुझलहुँ। ऐ लेल धन्‍यवाद।
(साभार विदेह www.videha.co.in )

अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप


राग द्वेष, भेदभाव, मैथिलीक उठापटकसँ दूर एकान्त भऽ अपन प्रारम्भिक रचना समएसँ आइ धरि अनवरत विहनि कथा लेखनमे लीन श्री अनमोल झा सँ युवा विहनि कथाकार एवं समालोचक मुनाजीक अन्तरंग गपशप:

मुन्नाजी: भाइ नमस्कार। सामान्यतः रचनाकार सभ कथा-कवितासँ लिखब शुरू करैत छथि मुदा अहाँ विहनि कथासँ रचना लिखब प्रारम्भ कऽ विहनि कथेकेँ प्रमुखतासँ लिखैत रहलौंहेँ। एकरा प्रति रुचि वा आदर कोना जागल?
अनमोल झा: नमस्कार भाइ। बहुत-बहुत नमस्कार। शुरू तँ हम केने रही- बाबा कहथिन महरानीकथासँ जे हमर पहिल रचना छल। मुदा तकरा बादेसँ हम विहनि कथा लिखऽ लगलौं। जहाँ धरि रुचि आ आदरक प्रश्न अछि भाइ, से निश्चित रूपसँ हम कहब जे ऐ लेल हम सगर राति दीप जरय” (कथा गोष्ठी) सँ बहुत उपकृत होइत रहलौंहेँ। हम दोसर कथागोष्ठी जे २९.०४.१९९० ई. मे श्री जीवकान्तअ जीक संयोजनमे भोला उच्च विद्यालय, डेओढ़मे भेल रहए, तहियासँ जुड़ल छी। आ ओइसँ लुरि-भास सभ सिखैत रहलौंहेँ।
ओना कथा गोष्ठीमे कथाक प्रधानता रहैत अछि। एम्हर आबि कऽ थोड़-थोड़ विहनि कथा सभ सेहो पढ़ल जाइत अछि, जकर हमरा आतुरताक संग प्रतीक्षा रहैत अछि।
अन्य भाषामे विहनि कथा चिन्हार भऽ स्थापित भऽ गेल अछि। मैथिलीयोमे कथाक संगे-संग भारतक सभ भाषा लग ई ठाढ़ हो, स्थापित हो, तँए हम विहनि कथेकेँ प्रमुखता दऽ रहलौं अछि।

मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त कथो लिखलौं आ से छपबो कएल। दुनूक मध्य की समानता आ भिन्नता अछि? दुनूमे सँ जे एकटा पसिन्न करए लेल कहल जाए तँ ककरा पसिन्न करब आ किएक?
अनमोल झा: हमर एखन धरि १६० टा लघुकथा मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिका आ संकलनमे प्रकाशित अछि, जकर सभ पत्र-पत्रिका आ संकलन हमरा लग उपलब्ध अछि। एकर अतिरिक्त आरो कतौ छपल अछि आ से हमरा सूचना नै अछि से सभ छोड़ि कऽ। आ तहिना सतरहटा कथा सेहो प्रकाशित अछि।
कथा आ विहनि कथाक मध्य समानता आ भिन्नताक बात पुछैत छी से हमरा जनैत उपन्यास आ कथामे जे समानता वा भिन्नता अछि सएह कथा आ विहनि कथामे अछि।
दुनूमे सँ निश्चित रूपे हम विहनि कथाकेँ पसिन्न करब। कारण ऐमे जे मारक क्षमता होइत अछि से आन कोनोमे नै। आ सफल विहनि कथाक ईएह गुण अछि जे ओ पाठककेँ बिना मर्माहत केने नै छोड़ि सकैत अछि।

मुन्नाजी: विहनि कथाक अतिरिक्त बाल कथा सेहो लिखैत रहलौं अछि, आर की की लिखैत छी? सभ तरहक लेखनक की उद्देश्य?
अनमोल झा: बाल रचना लिखैत हमरा नीक लगैत अछि तैं लिखैत छी। जखन हम ई लिखैत छी तँ अपना-आपकेँ बालपनमे अनुभव करैत छी जे नीक लगैत अछि।
एकर अतिरिक्त कथा, कविता, रिपोर्ताज लिखैत रही आ एखनो हल्का-फल्लक लिख लैत छी। एकर सबहक पाछाँ कोनो तेहेन उद्देश्य नै अछि। मुदा विहनि कथा हमर प्राण छी आ तैं एकरे सभटा समर्पित अछि।

मुन्नाजी: मैथिलीमे विहनि कथाक कोनो मोजर वा पुछारि नै छै। विहनि कथाकारक तँ कोनो नामे निशान नै बुझल जाइछ। एहन स्थितिमे जगजियार हेबासँ बेसी हेरा जएबाक सम्भावना अछि। ऐ स्थितिमे अपनाकेँ कोना पबै छी?
अनमोल झा: हम जतऽ छी ठीक छी। मैथिलीमे ओनाहो बड़ पेंच-पाँच छैक। बिना पैरबी, पाइ वा पदक किछु नै होइत छैक आ से हमरा लग नै अछि तैं हेरा जाएब वा जगजियार होएब ई बिना माथामे रखने विहनि कथा लिखैत छी आ लिखैत रहब।
मुन्नाजी आब मैथिलीमे विहनि कथाक मोजर वा पुछारि नै छैक से नै कहियौ। यदि अहाँ सन समर्पित लोक आर थोड़बो भेटि जाइ मैथिलीकेँ तँ अपने ने मोजर भऽ जेतै एकर।

मुन्नाजी: अहाँ एखन धरि ढेर रास विहनि कथा लिखि गेल छी। संख्यात्मक बलेँ बड्ड मजगूत छी। मुदा किछु रचना कमजोर बनि सोझाँ आएल अछि। तँ अहाँकेँ नै लगैछ जे बेसी लिखबासँ बेसी आवश्यक अछि जे कम्मे आबए मुदा ठोस रचना आबए?
अनमोल झा: अहाँक कहब यथार्थ अछि भाइ। ओना धान कुटलापर चाउरमे खुद्दी हएब स्वाभाविक अछि। खुद्दीमे चाउर नहि ने देखाइ अछि अहाँकेँ।
ओना अहाँक सुझावक स्वागत अछि। हम एकर ध्यान राखब।

मुन्नाजी: अहाँकेँ डेढ़ दशकक अपन विहनि कथा यात्रामे की अनुभव रहल। तहियासँ आइक स्थितिमे की अन्तर छै।
अनमोल झा: डेढ़े दशक किएक कहैत छी मुन्नाजी। दू दशक ने कहियै। हमर पहिल प्रकाशित रचना २ टा विहनि कथा घृणा-स्नेह आ विवश चेतना समितिक स्मारिका विद्यापति स्मृति पर्व १९९१ ई. मे छपल अछि। खएर छोड़ू, काजक गप करी।
विहनि कथा यात्राक मादे की कहू भाइ, हमरे सन थेथर लोक अछि जे १९, २० बरख सँ एकरा पकड़ि कऽ लेखन करैत रहल। बड़ दुरूह रस्ता छल तखन (एखन नै) आ तैं बहुत गोटा ऐ विधामे आबि कऽ फेर अपन कथा-कविता दिस चल गेलाह। देखलन्हि जे नाम ने जस तँ की करब एतऽ। ऊपरसँ उपहासे। ओना आब पुछबनि तँ कहता ओ सभ एकर जन्मदाते हम छी तँ हम छी।
मुदा हमरा ऐ विधामे मोन लगैत अछि आ ऐ बले लोक चिन्हतो अछि हमरा। एखन पहिलुका सन स्थिति नै रहलै। विहनि कथा मैथिलीमे अपन स्थान बना लेने अछि, जकर प्रमाण पत्र-पत्रिकाक लघुकथा विशेषांक आ सभ पत्र-पत्रिकामे विहनि कथाक रहब अछि। एकर भविष्य नीक अछि। लोककेँ कथा-उपन्यासकेँ पढ़बाक पलखति नै छैक एखन। एहन स्थितिमे ओ सभ बात विहनि कथामे कनिये कालमे भेटि जाइत छै। तैँ एकर पाठको वर्ग तैयार भऽ गेल अछि। दिनानुदिन विहनि कथाकारो सभ उभरि कऽ आबि रहलाहेँ आ से सतति रचनाशील छथि। आजुक परिप्रेक्ष्यमे विहनि कथाक तुलनात्मक स्थिति नीक अछि, बहुत नीक जे रचनाकार सभ थोड़े लिख कऽ पड़ा नै जाइत छथि आन विधा दिस।

मुन्नाजी: अहाँ अपन सर्वस्व ऊर्जा विहनि कथामे लगा रहल छी। ऐ यात्रामे आर के सभ सहभागी छथि आ हुनकर सभक की रुखि छनि।
अनमोल झा: हमर ऐ यात्रामे श्री सत्येन्द्र कुमार झा, श्री गजेन्द्र ठाकुर, श्री मुन्नाजी, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक, श्री मिथिलेश कुमार झा, श्री रघुनाथ मुखियाक संग आर कतेको नव लोक हमरा संग आ सहभागी छथि। आ हिनका सभसँ मैथिली विहनि कथा बहुत आशा रखैत अछि।
हिनका सभक रुखि नीक छनि। ऐमे श्री सत्येन्द्र कुमार जीक तँ एकटा विहनि कथाक संग्रह प्रकाशितो छनि आ दोसर प्रकाशनार्थ ओरियाओल छनि।

मुन्नाजी: अन्यान्य कथा साहित्य मध्य मैथिली विहनि कथा कतऽ देखाइछ आ एकर की भविष्य छै?
अनमोल झा: अन्यान्य कथा साहित्य लग मैथिली विहनि कथाक पहुँच प्रायः एखन धरि नै भेल अछि। कारण अछि एकरा घरेमे आ अपने लोक मोजर दैक लेल तैयार नै छथि। जे शुरू-शुरूमे सभ भाषामे लघुकथा अपन जगह पाबै लेल झेलने आ भोगने छल यएह बात एकरो संग भऽ रहल अछि।
मुदा एकर भविष्य उज्जवल अछि। दिनपर दिन नीक-नीक विहनि कथा सभ सामने अबैत अछि जे अपन मजगूतीक बात कहैत अछि।

मुन्नाजी: अहाँक विहनि कथा संख्याक बलेँ मजगूत होइतो एकर कोनो संगोर सोझाँ नै आएल अछि, आगामी योजना की अछि?
अनमोल झा: हमर धरि कोनो संग्रह नै निकलल अछि तकर प्रमुख कारण अछि अर्थ। हम एकटा प्राइभेट कम्पनीमे काज करैत छी। ततएसँ नून-तेलसँ बेसी नै किछु होइछ जे ई सभ किछु करब।
कोनो संस्था, प्रकाशक वा व्यक्ति ओकरे पोथी प्रकाशित करैत छथिन जे अपने सम्पन्न हो वा जकर पहिलेसँ पोथी प्रकाशित होनि। हम तहूमे छटा जाइत छी।
ओना हमर तीनटा विहनि कथाक पाण्डुलिपि तैयार अछि, तीनटा फाइल कऽके। पहिल विहनि कथाक संग्रहक पाण्डुलिपि जे तीन साल पहिने डॉ. विद्यानाथ झा विदितजीकेँ देने रहियनि। ओ कहलनि जे चालीस बर्खसँ कम उमेरक साहित्यकारकेँ साहित्य अकादेमीमे पोथी छापैक प्रावधान छैक, तइमे छपि जाएत।
दू सालक बाद कहलनि प्रेसमे अछि। तकरो आब एक सालक करीब भऽ गेलै। कत्तौ पता नै, कोनो सूचना नै।
दोसर संग्रहक प्रकाशन लेल श्री गजेन्द्र ठाकुर जीकेँ निवेदन कएल जे श्रुति प्रकाशन बहुत मैथिली पोथी छपैत अछि। एकटा हमरो विहनि कथाक संग्रह छपवा दिअ। ओहो स्पष्ट रूपे नै तँ नै कहलनि, हँ भऽ जेतै आश्वासन देने रहथि। ओकरो कतेक दिन भऽ गेलै। कोनो बात फेर आगाँ नै बढ़ल।
तेसर विहनि कथा संग्रहक प्रकाशन लेल कोलकाताक मिथिला सांस्कृतिक परिषदलग पाण्डुलिपि जमा कएल अछि। देखियौ की होइत अछि। जखने कतौसँ छपत तखने बुझवै जे छ्पल।
आगामी योजनाक मादे पुछैत छी से योजना की रहत भाइ। हमरा सन साधारण लोक लेल कोन योजना आ कथीक योजना? हँ एकटा योजना धरि अवश्य अछि जे विहनि कथा लिखैत रहब, से सदति लिखैत रहब। छपय तँ सेहो नीक, नै छपय तँ सेहो नीक। संग्रह आबए तँ सेहो नीक, नै आबए तँ सेहो नीक। धरि लिखैत रहब विहनि कथा अवश्ये हम।

मुन्नाजी: दू दशकक विहनि कथा यात्रामे अपनासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम पीढ़ी)क केहेन सहयोग/ विरोधक आभास भेल, हुनकर सभक योगदानक विषयमे की कहबै?
अनमोल झा: हमरासँ वरिष्ठ (पुरान वा मध्यम) पीढ़ीक साहित्यकार सभक सहयोग सदति भेटैत रहल अछि। बीच-बीचमे उठा-पटक सेहो ओ सभ खूब करथि। हमर विहनि कथा लऽ कऽ मुँहो-कान खूब घोकचाबथि। हमरा मोन अछि जे विराटनगर कथा-गोष्ठी (१४.०४.१९९२ ई.) मे हमर विहनि कथाकेँ सभ लोकि कऽ हवामे उड़ा देलनि। तकरा बाद सभकेँ खारिज करैत गुरुवर पं. श्री गोविन्द झा हमर ओइ विहनि कथाक प्रशंसा केलनि। हमरा बल भेटल आ हम विहनि कथा लिखिते रहलौं।
ओना निश्चय रूपेँ कहए पड़त जे ऐ ठोक-ठाक उठा-पटकमे हमरा हतोत्साह नै, एक प्रकारक बले भेटैत रहल, जे एना नै एना लिखलासँ नीक विहनि कथा बनत।
आर एखन वएह लोक सभ पटना कथा-गोष्ठी (२१.०२.२००९) मे हमर विहनि कथा टेक्नोलोजी आ युद्ध क प्रशंसे नै केलनि, भरि रातिमे कएक बेर ओकर बड़ नीक हेबाक चर्चा करैत रहलाह।
हमरा ऐ विधामे श्री प्रदीप बिहारी, श्री तारानन्द वियोगीक सहयोग आ योगदान निश्चय रूपसँ भेटल। आ हम हुनका सभसँ आ हुनक विहनि कथा संग्रह सभसँ बहुत किछु सिखलौंहेँ।
अस्तु, धन्यवाद भाइ।

साभार विदेह (www.videha.co.in)

हम पुछैत छी- मुन्नाजीक अनलकान्त सँ गप्प-सप्प।

साभार विदेह (http://www.videha.co.in/)


मुन्नाजी: अहाँक सृजनरथ कथायात्रासँ प्रारम्भ भेल छल, प्रारम्भसँ एखन धरि अपन कथायात्राकेँ कोन दृष्टिये देखै छी। ऐ बीच कथा आ कथानकमे कोन बदलाव देखबामे आएल?
अनलकान्त: अपन कथायात्राक बारे मे हम पहिनहि कहलहुँ जे स्‍वयं किछु नै कहब। एकर सही मूल्‍यांकन दोसर लेखक, पाठक वा आलोचक कऽ सकै छथि। ओना मैथिली मे आलोचक तँ छथिये नै तहन सहृदय पाठक आ दोसर लेखक एकर निर्णायक भऽ सकै छथि। ओना मैथिली कथामे बदलावक गप्प कहबै तँ समएक जे दवाब छै से तँ अबै छै मुदा जतेक एबाक चाही से हमरा मैथिली साहित्यमे नै देखबा मे अबैए।

मुन्नाजी: अहाँ अपनाकेँ साम्यवादी रूपेँ स्थापित करबाक प्रयास केलौं। सातम-आठम दशकमे उठल साम्यवादी विचारधाराक हो-हल्लाक बाद एहेन कोनो विचारधारा मैथिली मध्य बनि सकल?
अनलकान्त: नै हमरा ई गलत लगैए जे सातम आकि आठम दशकमे हो हल्ला भेल। बाबा नागार्जुन जखन रचनात्मक शुरुआत केलनि आजादीक पूर्वे, ओइ समयक जे हुनकर लेख देखबनि ओ जे राजघरानाक विरुद्ध प्रश्‍न उठेलनि, से की छल ? ओ किसान आन्दोलन, कम्यूनिस्ट आन्दोलनक समर्थक ताहि जमाना सं छलाह। जहिया मार्क्सवादी विचार नै छलै तहिया न्‍यायक प्रश्‍न नै छलै की ? हँ, सातम-आठम दशकमे नक्सलबाड़ी आन्दोलनक बाद मैथिलीमे अग्नि पीढ़ी आगू भऽ एलै आ तहिया  जे सामाजिक दवाब छलै- ओइमे रामलोचन ठाकुर, अग्निपुष्प, कुणाल, नरेन्‍द्र आदि हस्‍तक्षेप कयलनि। हँ ओ एहेन दवाब छलै जाइमे जे ओइ धाराक समर्थक नहियो रहयवला अनेक दृष्टिसंपन्‍न लेखक एहि पीढि़क संग समानधर्मे टा नै, सहमना रूप मे सेहो सोझा अयलाह। आइ ओहि धारा मे कुमार पवन, सारंग कुमार, विद्यानंद झा, कामिनी आदि सन अनेक युवा रचनाकार भेटताह।

मुन्नाजी: अहाँ मैथिली-हिन्दी मध्य समान रूपेँ सक्रिय छी, दुनू मध्य की समानता-भिन्नता अनुभव करै छी?
अनलकान्त: एकटा हमर मातृभाषा छी, दोसर हमर रोजी-रोटीक भाषा। हमरा दुनू मे कोनो द्वैध नै बुझाइ अछि।

मुन्नाजी: अहाँ प्रकाशकीय गतिविधि (प्रकाशन आ वितरण)मे सेहो सक्रिय छी। तँ कहू मैथिलीमे श्रेष्ठ रचनाक की स्थिति अछि, पाठकक भेल वृद्धि कते महत्व रखैत अछि?
अनलकान्त: पाठकक मैथिलीमे अभाव भेलैए। १९९९-२००० मे जतेक पत्रिका-किताब बिका जाइत छलै आब से स्थिति नै छै।

मुन्नाजी: अहाँ अपना जनतब कहू जे मैथिली पत्रकारिता वा प्रकाशन कतऽ अछि, ई आर्थिक लाभमे जा सकैए?
अनलकान्त: निश्चित रूपसँ आर्थिक लाभ भऽ सकै छै, ओइ लेल आवश्यक छै पैघ प्रकाशन संस्थाक, जतऽ पर्याप्‍त पूजी संग व्‍यावसायिक सूझ-बूझ सेहो होइ। हमरा सभकेँ ओते संसाधन नै अछि। हमरा सभकेँ आर्थिक लाभ नै भेल, मुदा घाटामे सेहो नै रहलौं। ओइ रूप मे हम बजारकेँ गलत नै कहै छिऐ। आब हम एक बेर कतौसँ विज्ञापन आनि लेलौं तँ हमरा लाभ भऽ गेल, मुदा तकरा एहि व्‍यवसायक स्‍थायी भाव तं नै कहबै ? हमसभ किछु खास नै केलहुं, एकदम छोट प्रयास अछि हमरासभक...

मुन्नाजी: अहाँ अंतिकासँ किछु रचनाकारकेँ बेरा कऽ रखैत रहलौंहेँ, तकर की कारण, विचारधाराक अभाव की रचनाक स्तरक अभाव?
अनलकान्त: हमरा नै कोनो नाम मोन पड़ैत अछि, जिनका हमसभ बेराकऽ रखने होइ। अंतिका मे हमरासभ जते लोककेँ छपने छी तकर नाम नुकायल नै छै। तकर अलाबे के बारल छथि तकर नाम अहीं कहि सकैत छी...

मुन्नाजी: अपन समतुरिया रचनाकारकेँ कतऽ राखऽ चाहब, ओइ भीड़ मध्य अपनाकेँ कतऽ पबै छी?
अनलकान्त: हम अपन समकक्ष सभ रचनाकार केँ अपना सँ आगू मानै छी। ओइ भीड़ मे हम सब सं पाछू छी।
मुन्नाजी: मैथिली साहित्य बभनौटी (ब्राह्मणवादक) शिकार रहल अछि। मुदा नव सदीमे सक्रिय गएर ब्राह्मण रचनाकारक प्रवेशकेँ अहाँ कोन तरहेँ देखै छिऐ?
अनलकान्त: ब्राह्मणेत्तर जे छथि, हुनका लग भोगल पीड़ा छनि तें हुनके स्‍वर सभसँ विश्‍वसनीय हैत।
मुन्नाजी: अपन अमूल्य समए दऽ उतारा देबा लेल बहुत-बहुत धन्यवाद।

अनलकान्त: अहूँ के धन्‍यवाद।

सुनल जाओ मैथिलीमे समाचार २२ अक्टोबर २०११ (साभार जानकी एफ.एम.)