Sunday, October 23, 2011

प्रबोध सम्मान 2004 सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार

सभ दिन रहताह विद्यापति  : मायानंद मिश्र
प्रबोध सम्मान 2004 सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कोन ईस्वीमे भेल छल आ लालन-पालन कोना भेल?
मायानंद मिश्र : हमर सर्टिफिकेट जन्मतिथि 1934 ईस्वी थिक, मुदा कुंडलीमे अछि 1930 ईस्वी। माइक देहावसान बादे सन 1936-37 ईस्वीमे जखन हम पांचो-छओ वर्षक रही, मातृक सुपौल आनल गेल होएब। मुदा बीच-बीचमे गामो लऽ गेल जाइत रही तकर किछु-किछु खंडित स्मृति अछि। गामक स्मृति ओ ज्ञान क्रमश: सन 1940-41 ईस्वीसँ  होमऽ लागल जे हमरा एकटा छोट बहिनि सेहो अछि आ हमरा चारिटा पित्ती तथा दुइ टा पीसी सेहो छथि। हमर लालन-पालन छठमे-सातमे वर्षसँ  मातृकेमे होमऽ लागल छल आ छोट बहीनक गाममे।
विनीत उत्पल : कोशीक झमारल अहाँक परिवार रहए, तखन साहित्यसँ कोना जुड़ाव भेल?
 मायानंद मिश्र : जखन गाममे कोसी बाढ़िक उत्पातक कारण सन 1940-41 ईस्वीमे गाम छोड़िकेँ प्रतापगंज थानाक गोविंदपुर जा कऽ हमरा सभकेँ रहऽ पड़ल। ओतए ओहि मातृवत बहीनक अपन पतिकुलक किछु जमीन छल, जाहिसँ मात्र पेट टा भरल जा सकैत छल। एहि गोविंदपुरमे सन 1945-46 ईस्वीमे हमर प्राथमिक कवित्व प्रतिभाक अंकुरण भेल छल। जखन ओहि ठामक कालीस्थानक लेल सुपौलक कोने ग्रामोफोनक कोनो गीतक सुरमे भगवतीक अर्चना-गीत लिखने छलहुँ, जकरा हम स्वयं गाबितो छलहुँ कीर्तन मंडलीमे।
विनीत उत्पल : उच्च शिक्षा कतएसँ भेटल? विस्तारसँ बताऊ?
मायानंद मिश्र : सन 1950 ईस्वीमे सुपौलसँ मैट्रिक पास कएलाक बाद आगू पढ़बाक समस्या छल जाहिमे आर्थिक-समस्या मुख्य छल। उत्साह सभक छलनि जे हम आगू पढी विशेषत: ज्येष्ठ माम पंडित रामकृष्ण झा किशुनजी तथा पिताजी पंडित बाबू नन्दन मिश्रजीक। उत्साह एहि लेल सभक छलनि जे हमरा मैट्रिकमे सेकेंड डिवीजन भेल छल जे ताहि दिनमे बहुत कम होइत छलैक। अपन इच्छा छल पटना कालेजक। आवेदन सेहो कएल। नामांकनक स्वीकृति-सूचना सेहो भेटल। किंतु अंतिम कालमे किसुनजीक विचार बदलि गेलनि जे दरभंगे। दरभंगामे पंडित श्री चंद्रनाथ मिश्र अमरजी छथिन, हुनके अभिभावकत्वमे। सन 52 ईस्वीमे विवाह कारणे आई.ए. क परीक्षा नहि देल आ सन 54 ईस्वीमे आगराक मैथिली महासभाक कारणे बी.ए. क परीक्षा नहि दऽ सकलहुँ।

विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोन मन आएल?
मायानंद मिश्र : सन 50 ईस्वीमे सी.एम. कॉलेजमे नाम लिखाओल। श्री अमरजीक डेरापर अधिक काल साहित्यिक गोष्ठी, दरभंगासँ सुपौल-मुरलीगंज-कटिहार तथा मुजफ्फरपुरसँ जयनगर धरि विभिन्न स्थानपर कवि सम्मेलन, वैदेही-कार्यालय तथा गीत लेखन। भाङक लोटाक प्रकाशन। समए चलैत गेल, परिचय-परिधि बढ़ैत गेल। एहि बीच दरभंगामे राजकमलजीसँ परिचय भेल। फेर ललित-राजकमल-मायानंद क गोष्ठी सभ, साहित्यिक चर्चा सभ जाहिमे रामू अर्थात रमाकांत मिश्र ओ दिवानाथजीक निरंतर सहभागिता। सन 54 ईस्वीमे ललितजी सब-डिप्टी कलक्टर बनि दरभंगा चल गेलाह। राजकमलजी ता पटने छलाह। हमहूँ 56 ईस्वीक अंतमे रेडियो, पटना आबि गेलहुँ।

विनीत उत्पल : ओहिकालमे पटनामे साहित्यिक परिदृश्य केहन रहए ?
मायानंद मिश्र : पटनामे रेडियो स्टेशन, हास्य-व्यंग्य-सम्राट हरिमोहन बाबूक डेरा, पंडित जयनाथ बाबूक डेरा,  गोपेशजीक डेरा, प्रो. आनंद बाबूक डेरा, फणीश्वरनाथ रेणुक डेरा, मुरादपुर खादी भंडार, श्री रूपनारायण ठाकुरजीक कार्यकर्ता-निवासमे माछ-भातक मासिक भोज आ चेतना समिति, पुस्तक भंडारक रामायण-गोष्ठी, अभिव्यंजना-प्रकाशन, विभिन्न समए ओ विभिन्न स्थानपर घनघोर साहित्यिक चर्चा होइत छल। ओहि कालमे दक्षिण बिहारसँ मिथिलांचल धरि सभ जगह कवि सम्मेलनमे शामिल भेलहुँ।

विनीत उत्पल : पटनासँ सहरसा अएलहुँ, एतए केहन बीतल?
मायानंद मिश्र : एम.ए. क पश्चात सन 61 ईस्वीमे आबि गेलहुँ सहरसा कॉलेज, सहरसा। कॉलेज अध्ययन-अध्यापन, सघन-लेखन, बलुआसँ बम्बइ धरि विद्यापति  पर्व-समारोहमे मंच संचालन, भाषणो आ कविता पाठ सेहो, विभिन्न संस्थाक संगठनात्मक प्रक्रियाक अध्ययन, सहरसामे विभिन्न पर्व-समारोहक आयोजन, मैथिली चेतना परिषद, सहरसाक गठन, पटनामे मैथिली महासंघक संगठन, डाकबंगला चौक-जाम क कार्यक्रम, लेखन आ पाठन, प्राचीन इतिहासक सघन अध्ययन, पुन: प्रथम शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनक लेखन आ तकर हिन्दी आ॓ मैथिलीमे प्रकाशन, दिशांतर, अवांतर, चंद्रबिंदु क प्रकाशन। तकैत-तकैत सहरसा कॉलेज, सहरसा आ स्नातकोत्तर केंद्र, सहरसामे 33 वर्षक सेवा-काल समाप्त भऽ गेल आ 1994 ईस्वीमे अवकाश ग्रहण कऽ लेलहुँ।

विनीत उत्पल : अहाँक दृष्टिक विस्तार कोना भेल?
मायानंद मिश्र : दृष्टिक विस्तार वस्तुत: मामक रूपमे युगांतकारी मैथिली साहित्यकार पंडित रामकृष्ण झा किशुनद्वारा स्थापित मिथिला पुस्तकालयक कारणे भेल। ओहि ठाम 47 सँ 50 ईस्वीक बीचमे पढलहुँ जाहिमे प्रेमचंद, जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, शरतचंद्र, बंकिम बाबू, रवींद्रनाथ ठाकुर तथा ताराशंकर वन्धोपाध्याय आदि प्रमुख छलाह। एहि समएमे किसुनजीक आदेश-निर्देशक विरूद्ध रातिकेँ चोरा कऽ चंद्रकांता ओ चंद्रकांता संतति संगहि शरलक होम्स सिरीज सेहो पढ़ि गेल रही। ओहि समएक मायासमकालीन नई कहानियांछल जे नियमित पढ़ैत रही।

विनीत उत्पल : पहिल रचना कोन छल?
मायानंद मिश्र : 49 ईस्वीमे हरिमोहन बाबूक प्रभावक प्रचंड प्रतापे, हम प्रथम-प्रथम मैथिलीमे हम रेल देखबनामक एकटा गद्य रचना कथात्मक शैलीमे लिखलहुँ जे हाइस्कूलक वार्षिक पत्रिकामे छपल। एहि प्रकाशन-प्रोत्साहनक कारणे भांगक लोटाक अधिकांश कथा, अही 49-50 ईस्वीमे लीखि गेलहुँ जकर प्रकाशन 51 ईस्वीमे प्रो. श्री कृष्णकांत मिश्रक वैदेही प्रकाशनक द्वारा भेल।

विनीत उत्पल : भांगक लोटा कतएसँ प्रकाशित भेल छल आ कहिया ?
मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक दुइ गोट अंतिम कथा मैट्रिक परीक्षाक बाद लिखने छलहुँ जकर प्रतिलिपि श्री अमरजी कृपापूर्वक देखि देलनि, मुदा ओहूसँ पैघ उपलब्धि हमरा लेल भेल जे आचार्य सुमनजी दुइ बिन्दु नामे आ॓कर भूमिका लीखि देलनि आ प्रो कृष्णकांत मिश्रजी ओकरा सन 51 ई.मे छापि देल वैदेही प्रकाशनक दिससँ, हमरासँ एक्कोटा टाका नहि लेलनि। अपितु एक गोट टाका देलनि, मना कएलाक उपरांतो, पंडित त्रिलोकनाथ मिश्रजी आ॓कर मूल्य, जे ओहिपर छपल छल।

विनीत उत्पल : भांगक लोटामे तँ हास्य छल, मुदा गंभीर लेखन दिश कोना घुरि गेलहुँ ?
 मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक पश्चात हम हास्य कथा नहि लिखलहुँ। ई प्रकाशन प्रोत्साहन हमर कथा-लेखनक प्रेरणा अवश्य बनल जाहि कारणे , 51-52 ई सँ हास्य छोड़ि, सामाजिक जीवन-संघर्षपर आधारित मनोविज्ञानक गंभीर भावक कथा सभ लीखऽ लगलहुँ जाहिमे प्रमुख छल रूपिया, सुरबा, आगि मोम आ पाथर तथा सतदेवक कथा जे कालांतरमे, सन 60 ई.मे कलकत्ताक मैथिली प्रकाशनक दिससँ प्रकाशितआगि मोम आ पाथरनामक संग्रहमे संकलित अछि, जकर अधिकांश कथा 59-60 ई.क मिथिला दर्शनमे प्रति मास छपल छल। मुदा मंच-जीवनमे हमर प्रवेश कथा-लेखनसँ नहि अपितु काव्य रचना विशेषत: गीत-रचनासँ भेल छल।

विनीत उत्पल : साहित्यिक यात्रामे केकर लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 40-50 ई. धरि अबैत-अबैत नेपाली आ॓ बच्चन क गीत-रचनाक प्रभाव हमरापर बहुत छल। सन 59 ई सँ बहुत पूर्वहि अर्थात दरभंगे कालमे सी.एम. कॉलेजक हिन्दी प्रोफेसर श्री सुरेंद्र मोहनजीसँ अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक आ॓ तार सप्तक दुइ भाग पढ़ने छलहुँ आ अतिशय प्रभावित भेल छलहुँ। क्लासमे पढ़ल प्रसाद-पंत-निराला-महादेवी वर्मासँ सर्वथा भिन्न छल ई काव्य धारा, जाहि पर टी. एस. इलियट- एजरा पाउंड सँ लऽ कऽ एलेन गिन्सबर्ग आ॓ एंग्रीजेनरेशन तथा ब्रिटेनक कवि लोकनिक प्रभाव छल। शरतचंद चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, टालस्टॉयसँ प्रभावित रही।

विनीत उत्पल : अहाँ तँ हिन्दीमे किछु लिखने रहि?
मायानंद मिश्र : सन 49 ई मे किछु हिन्दी गीत लिखलहुँ, जकर तीन गोट मुखरा, पंक्ति एखनहुं मोन अछि, ‘अरमान मेरे दिल के सभी टूट चुके हैं’, ‘अधजली कामनाएं  लेकर अपलक मैं गगन निहार रहातथा मैं अंतर मे तूफान लिए चलता हूंमुदा, 50 .क मैथिलीमे रचित आ॓हि दिल छलहुँ हम भांग पीनेतथानोचनी तोर गुण कते गैबअत्यंत लोकप्रिय भेल। स्त्रीधननामक उपन्यास नेशनल बुक ट्रस्ट छापने अछि।

विनीत उत्पल : गीतनाद, स्वरसंधानकेँ कोना साधलिऐ?
मायानंद मिश्र : गीत गाबऽ लागल छलहुँ 1942-43 ईस्वीसँ सुपौलमे अपन मातामहक कीर्तन मंडलीमे। हमरा लगैत अछि जे हमरामे कंठ-स्वर, स्वर-संधान-प्रतिभा तथा सुरताल-ज्ञान आदि जकर अनेक प्रशंसा भेल-मातामह पंडित नागेश्वर झासँ आएल अछि। एना गुनगुना कऽ तँ किछु ने किछु गबैत छलाह आ तेँ कालान्तरमे जे हम गीत-रचना कएल से कोनो ने कोनो सुरतालमे रहैत छल। आ॓हि कारणे हम स्वयं सेहो गबैत छलहुँ तथा किछु गीत किछु गायक जाहिमे गायक चूड़ामणि पंडित रघु झाजी सेहो छथि, गबैत छलाह।

विनीत उत्पल : अहाँ गायन ज्ञान कतएसँ पेलिऐ ?
मायानंद मिश्र : सन 50 ई.क अंतिम चरणमे जखननभ आंगनमे पवनक रथ पर कारी-कारी बादरि आयलनामक गीत लिखलहुँ तँ गाबिये कऽ लिखलहुँ। यएह गायन-ज्ञान हमर छन्द-ज्ञान छल। जहाँ धरि आइयो मोन अछि, बिनु छन्द-ज्ञाने प्रारम्भोमे लिखल हमर गीत-रचनामे छन्द दोष, शास्त्रीय संगीत मर्मज्ञ पंडित कवि नै ईशनाथ झा ताकि सकलाह, जे एकर पहिल आधिकारिक श्रोता बनलाह आ ने आचार्य रमानाथ झा जे एहि गीतकेँ आई..क लेल संकलित कविता कुसुममे सर्वप्रथम संकलित कएलनि।

विनीत उत्पल : अहाँ जहि साल आई.. मे रही, ओहि साल पाठ्यक्रममे अहाँक लिखल कविता सेहो छल की?
मायानंद मिश्र : अत्यधिक प्रसन्नता भेल छल आ॓हि दिन, जाहि दिन सन 52 ई.मे आचार्य पंडित रमानाथ झा आई.. क पाठ्यग्रंथक रूपमे कविता कुसुमक संकलन-संपादन कएलनि तथा आ॓हिमे नभ आंगनमे पवनक रथपरनामक गीतकेँ स्थान दैत संकलित कएने छलाह। एना तँ कोनो संकलनमे स्थान भेटलासँ प्रसन्नता होइत किंतु एतए तँ स्वयं रमानाथ बाबू द्वारा संपादित ग्रंथक गप्प छल आ सेहो आई.. क पाठ्यग्रंथमे, जखन की हम ताधरि स्वयं आई.. पास नहि कएने छलहुँ।

विनीत उत्पल : आ॓हिकालमे अहाँ कोन-कोन पत्रिकामे लिखैत छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : जहिना आ॓हि समएमे दरभंगासँवैदेहीप्रकाशित होइत छल, तहिना कलकत्तासँ मिथिलादर्शनआ॓ बादमे मैथिली दर्शन।ललित आ॓ राजकमल सामान्यत: वैदेहीमे अधिक लिखैत छलाह तथा हम स्वयं अपेक्षाकृत मिथिला दर्शनमे। नाटको लिखने छी, कथा-कविता सेहो लिखने छी।

विनीत उत्पल : अभिव्यंजनावादी काव्य की छल?
मायानंद मिश्र : 59 ई मे मैथिलीमे अनेक नवीन काव्यक लेखन प्रथम-प्रथम कएल, जकरा हम अभिव्यंजनावादी काव्य कहने छी तथा जकर प्रथम प्रकाशन सन 60 . क आरंभमे अभिव्यंजनानामक पत्रमे भेल अछि। संगहि अही 59 . मे हम एक वर्ष पूर्वक मैथिली पांडुलिपि माटिक लोकक आधारपर प्रथम-प्रथम माटी के लोक: सोने की नैयाक नामसँ हिन्दीमे लेखनारंभ कएने छलहुँ। आ जहिना सन 50 ई. मे एकटा मैथिली कृति प्रकाशित भेल छल, तहिना सन 60 ई मे दुइ गोट मैथिली कृतिबिहाड़ि पात आ पाथरतथा आगि मोम आ पाथरप्रकाशित भेल।

विनीत उत्पल : आ॓हि काल की सपना छल?
मायानंद मिश्र : हिंदीक आ॓हि अज्ञेयी नई कविता जकाँ मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलन ठाढ़ करबाक उद्देश्यसँ अभिव्यंजनाक प्रकाशन-योजना मोनमे आएल छल, जाहिमे मात्र नवीन काव्यटा रहत। आ ताहि लेल पहिने स्वयं किछु नवीन काव्य लिखल। आ ओ दू-चारि दिनपर हरिमोहन बाबूकेँ सुनाबी जे अभिव्यंजनामे हमरा एहने कविता चाही। आ  देबो केलनि जे अभिव्यंजनामे छपल छल। आधा 59 . क घोर व्यस्तताक फलस्वरूप सन 60 .क आरंभमे अभिव्यंजनाक प्रकाशन संभव भेल। प्रकाशनक खर्च ओ लोकार्पण समारोहक सभटा खर्च स्वयं पंडित जयनाथ मिश्र, एकटा अर्द्ध परिचित किशोर युवा संपादकक उत्कट उत्कंठा ओ महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षापर द्रवित होइत, कयने छलाह। सन 60 ई हमर लेखकीय जीवनक लेल अति व्यस्ततापूर्ण रहल। एहि समएमे जँ एक दिस अनेक कथा लिखल तँ दोसर दिस अनेक नवीन काव्यक सेहो रचना कएल जे कालांतरदिशांतरमे संकलित अछि। तेसर दिस जँ अभिव्यंजनाक संपादन कएल तँ किछु समीक्षा सेहो एहि कालखंडमे लिखल, जाहिमे सँ किछु मिथिला दर्शन, वैदेही आ॓ कृष्णकांत बाबूक मैथिली सम्मेलनक रचना संग्रहमे अछि। ओहि काल एकटा काल्पनिक रेडियो नाटक सेहो लिखने छी- इतिहासक बिसरल।

विनीत उत्पल : कोन-कोन पैघ साहित्यकारसँ भेट भेल छल?
मायानंद मिश्र : दिनकरजी सँ हमर परिचय पंडित जयनाथे बाबू करौने छलाह मैथिली कवि ओ चौपाल स्वरक रूपमे। पहिल बेर दिनकरजी चौंकल छलाह आ चौपालक हमर स्वर आ॓ अभिव्यक्तिक अतिशय प्रशंसा कएने छलाह। रेणुजी सँ परिचय अति त्वरित गतिसँ अंतरंग आत्मीयतामे बदलि गेल छल। प्राय: नित्य रेडियो स्टेशनमे अथवा बुध दिनकेँ अधिक खन हुनका डेरापर सायंकालकेँ सांध्य गोष्ठीमे भेंट होइत रहल।

विनीत उत्पल : अहाँ जवाहरलाल नेहरू आ इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट कएने छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरूक चिर ऋणी रहब, जनिक विशेष आग्रहक कारणे, एतेक शीघ्र सन 65 ई मे मैथिलीकें देशक एकटा स्वतंत्र साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादमी मान्यता देलक। 73 ई मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट भेल छल।

विनीत उत्पल : मैथिली चेतना परिषद संस्थानक निर्माण कोना कएलहुँ आ कोना कएलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 62 ई. मे हम सहरसा मैथिली चेतना परिषद नामक संस्थाक निर्माण कएलहुँ पंडित श्री अमरेंद्र मिश्रजीक डेरापर। एहि संस्थाक तत्वावधानमे अभिव्यंजनाक प्रकशनक संगहि सन 62-63 ई मे प्रथम-प्रथम कविश्वर चंद्र प्रसिद्ध चंदा झाक जयंती समारोहक आयोजन कएने छलहुँ सहरसा परिसरमे। सहरसाक ई समारोह पूर्वांचल  मिथिलांचलक पहिल ओ आदिम समारोह तँ छलहे (प्राय:) संभव पिंडारूछ गामक पचासक दशक अनेक आयोजनक पश्चात ई दोसर स्थान छल, जाहि ठाम एहि प्रकारे हुनकर स्मरण कएल गेल। एहि स्मरण समारोहक एकटा कारणो हमरा मोनमे छल। हुनक मातृक बड़गाम छलनि, जतऽ हुनक प्रारंभिक शिक्षा भेल छलनि आ जे आधुनिक मैथिलीक सूत्रधार छलाह।
 
विनीत उत्पल : जीवनक एहि मोड़पर अहाँक जीवनदर्शन की अछि ?
मायानंद मिश्र : हम दर्शनक गप्प नहि करैत छी। किछु-किछु निष्काम कर्मक मर्म पढल अछि, किछु-किछु बुझलो अछि। की सभक जीवन-दर्शनक अनुकूल चलि पबैत अछि। माया चलऽ दैत अछि ? अनेक-अनेक प्रश्न अछि जे अनुत्तरिते रहि जाइत अछि तथापि जीवन-प्रवाह अछि जे प्रवाहित होइत चल जाइत अछि, चल जाइत रहत, अविरल, अविराम।

विनीत उत्पल : कालगतिकेँ की मानैत छी ?
मायानंद मिश्र : सर्वोपरि काल-गति। मुदा, मनुष्य गति तँ एकमात्र संघर्षक गाथा थिक। जखन-जखन समाजक ई गति ओ दुर्गति होइत अछि, तखन-तखन समाजमे पुनर्जागरण होइत अछि। युगक धाराकेँ मोड़ि समाजमे रचनात्मक परिवर्तन अबैत अछि, निश्चित अबैत अछि। अबैत रहल अछि, जकर साक्षी थिक इतिहास, मानव इतिहास। आब ओही इतिहासक प्रतीक्षा अछि। प्रतीक्षाक एकटा भिन्ने सुख होइत छैक।

विनीत उत्पल : एखुनका कालमे केकर रचना नीक लगैत अछि?
मायानंद मिश्र : मैथिलीमे नचिकेता, सुभाषचंद्र यादव, जयधारी सिंह आ डॉ महेंद्र झाक लिखल नीक लागैत अछि।

विनीत उत्पल : मैथिलीक भूत, वर्तमान आ भविष्यकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी ?
मायानंद मिश्र : सभ दिन रहताह विघापति। मैथिलीक सौभाग्य अछि जे अंग्रेज एहि भाषाकेँ लोकक आगू आनलक। मैथिलीमे लोक पढ़ैत अछि, मुदा कीनए लागत तखन लेखक आओर प्रकाशक आगू आएत।

विनीत उत्पल : अहाँक परिवारमे के सभ अछि, ओ सभ की करैत छथि ?
मायानंद मिश्र : तीन लड़का, एक लड़की अछि। पैघ बेटा प्रो. विघानंद मिश्र जे पीजी सेंटर, सहरसामे इतिहासक प्रोफेसर अछि। दोसर डॉ. भवानंद मिश्र, राजेंद्र मिश्र कॉलेज मे इतिहासक प्रोफेसर अछि। छोट कामनानंद मिश्र दिल्लीमे हिन्दुस्तान अखबारक वेबसाइट संस्करणक इंचार्ज अछि। बेटी वंदना मिश्र जमशेदपुरमे रहैत अछि। दामाद स्टेट बैंक मे अफसर छथि।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार


मूर्खता पीबि कऽ विषवमन करैत अछि समीक्षक - जीवकान्त
प्रबोध सम्मान २०१० लेल चयनित जीवकान्तसँ वरिष्ठ पत्रकार आ मैथिलीक उदीयमान कवि विनीत उत्पलक साक्षात्कार

विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कतए भेल आ दिन-वर्ष की छल? लालन-पालन कतए भेल?
जीवकांत : २७ जुलाई, १९३६ क मामाक गाम सुपौल जिलाक अभुआढ़ मे हमर जन्म भेल। किछु दिन तक तँ हमर लालन-पालन मामक गाममे भेल। तकर बाद अपन गाम मधुबन क डेओढ़मे भेल। हमर पिता चारि भाइ छलथि। संयुक्त परिवार छल आओर हम सभ १५-१६ बच्चाक लालन-पालन संगे भेल।

विनीत उत्पल : एखन अहाँक परिवारमे के सभ अछि आओर ओ सभ की करैत अछि?
जीवकांत : हम दू भाइ छी। जेठ हम छी आ नवकांत झा छोट अछि। नवकांत सेंट्रल बैंकक नौकरसँ अवकाश ग्रहण कए दरभंगामे रहैत अछि। एक बहिन आब नहि छथि। दोसर बहिन गोदावरी सुपौलमे ब्याहल गेल, जे सहरसामे रहैत अछि। तीन बच्चा अछि। पैघ बेटा अरुण चेन्नइमे बैंकमे कार्यरत अछि। छोट वरुण लखीसरायमे एलआईसीमे काज करैत अछि। बेटी प्रेम नेपालक राज विराजमे ब्याहल अछि।

विनीत उत्पल : घरमे आन लोक मैथिली पढ़ैत आ लिखैत अछि? कनियाक सहयोग लेखनमे कतेक भेटल?
जीवकांत : हमर घरमे भाइ हुअए आकि कोनो बच्चा, मैथिलीमे नहि लिखैत अछि। शुरूमे कनियाँ शुचि किछु नहि बुझैत छलीह। हुनका लगैत छल जे फालतूक काज कऽ रहल छी। हुनका अनिद्राक बीमारी छलन्हि ताहिसँ रातिमे लाइट मिझा दैत छलीह। मुदा, बादमे सहयोग करए लगलीह। धन्य ओ जे हम लिखैत छी। ओना ओ ज्योँ विरोध करतीह तँ हम किछु नहि लिखि सकैत छी। एकरा लेल हम कनियाँक आभारी छी।

विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोना आकृष्ट भेलहुँ? विस्तारसँ बताऊ?
जीवकांत : हम जाहि कालमे पैदा भेलहुँ, ताहि कालमे पढ़ैक महत्व नहि छल। हमरो पढ़ाइ देरीसँ शुरू भेल। स्कूलमे नाम लिखेबा लेल कियो नहि गेल छल। हम अपने गेल छलहुँ। ओहि कालमे हम सभ माटिपर लिखैत छलहुँ।
हमर गाममे तुलसीदासक रामायणक पाठ होइत छल। द्वारपर लोक ताश खेलाइत छल आ रामायणक श्लोकक दसटा अर्थ करैत जाइ छलाह। श्लोककेँ लऽ कऽ तर्क-विर्तक सेहो होइत छल। हमरो घरमे बेंकटेश्वर स्टीम प्रेससँ छपल मोटका रामाएण छल, जकरा पढ़ैत आ सुनैत छलहुँ। तखन धरि मैथिलीक कोनो गप नहि छल। नेना रही, सोचैत रही, जखन तुलसीदासक लिखलपर एतेक तर्क-विर्तक होइत अछि, तखन हमहूँ किएक नहि लिखै छी। शुरूमे कविता लिखलहुँ, जे आर्यावर्तमे छपल। आइ.एस.सी. कऽ कए साल भरि बाद १९६४ ई. मे प्राइवेटसँ बी.ए. कएलहुँ। छह मास धरि अहापोहमे रहलहुँ, जे हिंदीमे लिखी आकि मैथिलीमे।
ओहि काल मे मिथिला मिहिर पढ़ैत छलहुँ। ओहिसँ बेसी प्रभावित भेलहुँ। रवींद्रनाथ टैगोरक साहित्यसँ सेहो प्रभाविल भेलहुँ। हिंदीमे लिखी आओर मैथिलीमे सेहो। किछु काल बाद निर्णय लेलहुँ जे हम नित दिन लिखब। गृह जिला मधुबनीमे नौकरीक मादे खजौली, देहोल, पोखराम आदि गाममे रहलहुँ आ जीवनानुभवक व्यापक अनुभव लिखलहुँ।

विनीत उत्पल : अहाँक कालमे संस्कृतक विस्तार बेसी छल। तखन मैथिली दिश कोना प्रवृत भेलहुँ?
जीवकांत : स्वतंत्रता प्राप्तिक कालमे इंगलिश मीडियम स्कूल खुजल रहै। हिंदी स्कूलमे मैथिली पढ़ाओल जाइत छल। इंगलिश स्कूल खुजलासँ लोक संस्कृत बिसरि गेल। मुदा हम गामक लोक गामसँ प्रभावित। २४ जनवरी १९६५ मे मिथिला मिहिरमे पहिल कविता 'इजोरिया आ टिटही’ छपल। एकरासँ हमरा जोश भेटल।

विनीत उत्पल : अहाँ केकर लेखनीसँ प्रभावित छी?
जीवकांत : कविता हमर प्रिय अछि। लिखैमे आनंद अबैत अछि, ओकर गंधसँ प्रभावित होइत छी। मुदा गंधक प्रतीकमे तुलना साफ नहि होइए। कोनो गप कवितामे बेसी नीकसँ कहल जा सकैत अछि। आलोचक कहैत अछि जे अहाँ कथामे सब किछु अलग-अलग नहि करैत छी। पाठककेँ अपन दिशसँ सूत्र जोड़ए पड़ैत अछि। सबहक गंध अपन-अपन तरहक होइत छै। हमर लेखनक मूल कविता अछि, आओर अपन गप कविताक संग प्रेषित करैमे नीक लगैत अछि।

विनीत उत्पल : लेखनमे कोना प्रोत्साहित होइत छलहुँ?
जीवकांत : अहाँ सोमदेवक नाम सुनने होएब। हमर कविता पढि़ कऽ यात्री जी हुनका कहलथिन जे जीवकांतकेँ कहियौ ओ उपन्यास लिखताह। एकरा संगे मिथिला मिहिरसँ लिखबाक आमंत्रण आएल। एकरा एक तरहसँ हम चुनौतीक रूपमे लेलहुँ आ जे ओ लिखबैत रहल, फरमाइश करैत छल, से लिखैत रही। शिक्षक संघसँ सेहो जुड़ल रही ताहिसँ पटना जाइत रही। ओहि काल पटनामे लोकसँ भेट होइत रहए आओर प्रोत्साहन भेटैत रहए। तीनटा उपन्यास फरमाइशपर लिखलहुँ जे धारावाहिक रूपमे छपल।

विनीत उत्पल : अहाँकेँ ई नहि लगैत अछि जे साहित्य अकादमी देरीसँ अहाँक लेखन~पर विचार केलक?
जीवकांत : साहित्य अकादमीक पुरस्कारकेँ लोक संदेहक दृष्टिसँ देखैत छैक। ओतए जाएज लोककेँ किनारा कऽ दैत छै। हम साहित्य अकादमीक पॉलिटिक्स नहि जनैत छी। गाममे रहैत छी। कोनो दोस्त नहि बनेलहुँ। ओहिनो मिथिला समाज आ लोक अनौपचारिक अछि। भऽ सकैत अछि साहित्य पुरस्कार विलंबसँ भेटल। मुदा एहि सभमे हम नहि पड़ैत छी।

विनीत उत्पल : पैघ-पैघ पत्रिकामे कोना लिखए लगलहुं?
जीवकांत : एखनसँ तीस साल पहिने समकालीन भारतीय साहित्य शुरू भेल, तखन हम किछु अनुवाद कएलहुँ। मैथिलीमे पहिल कहानी हमरे आएल। पहिल बेर मैथिली विशेषांक आएल। एकटा अनुवाद केदार कानन केलथि। मैथिली कविता पठबैत रही। हिंदी संपादक आ हिंदी पत्रिका खूब आदरसँ हमर रचना छपैत रहए। समय अंतरालपर कोलकाता, मुंबइ, दिल्लीसँ प्रकाशित पत्रिका सेहो छपै लागल।

विनीत उत्पल : पहिल कविता संग्रह कोन छल आओर के छपलथि?
जीवकांत : 2003 मे 'तकैत अछि चिड़ै’ कविता संग्रह छपल, जेकरा ऊपर साहित्य अकादमी पुरस्कार देलक। ओकर हिंदी अनुवाद 'निशांतक चिडिय़ा’ छपल। एकरो साहित्य अकादमी छपलक। ढेरे विश्वविद्यालयमे शोध भऽ रहल अछि। प्रखर आलोचक सेहो लेखनक प्रशंसा कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहांक कविता 'रहस्य’ मे गूथल बुझाइत अछि?
जीवकांत : कविताक आरंभ कतहुसँ जे होइत अछि से तार्किक परिणति तक जरूर पहुँचैत अछि। लोक कहैत अछि जे हमर कविता आखिर मे 'टर्न’ लऽ लैत अछि। लोक काल आ पाठक हमर सामने नहि रहैत अछि, ताहिसँ अलग-अलग पाठक हमर कवितामे अलग-अलग गप देखैत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ तँ खूब समीक्षा केने छी?
जीवकांत : समीक्षक तौर पर हम ओते प्रोफेशनल नहि छी। बैसल रहैत रही तँ पढ़ैत रही। नव पोथी पढ़लाक बाद छोट-छोट टिप्पणी करैत छी। पूरे ४० साल मे ६०-७० टा पोथीपर छोट-छोट टिप्पणी केने छी। एकरा बाद मन बहलबैत छी, हास-परिहास आ चर्चा, बहुत रास गप करैत छी।

विनीत उत्पल : नव लेखक आ हुनकर रचनाकेँ कोना देखैत छी?
जीवकांत : एखन नवलेखक तेजीसँ आबि रहल अछि। देहातसँ सेहो लेखक आबि रहल अछि। बीच वाला पीढ़ी्मे अद्भुत लेखक भेल। महाप्रकाश आ सुभाषचंद्र यादव लोक विवशता, निर्धनताक विलक्षण चित्रण अपन रचनामे करैत छथि।
मैथिली कविता सेहो गंभीर भऽ रहल अछि। ओकर स्तर बढि़ गेल अछि, सोच काफी आगू तक अछि।

विनीत उत्पल : मैथिलीक साहित्यमे समीक्षकेँ अहाँ कोन दृष्टिसँ देखैत छी?
जीवकांत : समीक्षा यूरोपसँ आएल अछि। यूरोपमे अन्वेषणक संग समुचित परिप्रेक्ष्यमे समीक्षा होइत अछि। हिन्दुस्तान एहि विधामे पिछड़ल अछि। हिंदी भाषा्मे सेहो नीक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। लोक वेद कहैत अछि जे हिंदीक पैघ समीक्षक नामवर सिंह समीक्षा नहि कऽ भाषण दैत छथि। तटस्थ भऽ कऽ मूल्यांकन नहि भऽ रहल अछि। नीक लेखककेँ पएरसँ दबा देल गेल आओर जेकरा किछु नहि अबैत अछि ओकरा कन्हापर बैसा देल जाइत अछि। विद्यापतिपर आइ धरि कियो मैथलीमे नीक समीक्षा नहि केलक अछि। रामानाथ झाक समीक्षा जयकांत बाबूक समीक्षा नहि भऽ रहल अछि। अंग्रेजीमे नीक बुद्घि होइत अछि। अंग्रेजीसँ एम.ए. केलाक बाद लोकक नीक बुद्घि होइत अछि, मुदा मैथिलीसँ एम.ए. कोर्स करबाक बाद छात्र बरबाद होइत अछि। नाश कऽ दैत अछि ओकर भविष्य। जखन महीसे खराब होएत तखन कोनो नीक चीज आनि कऽ दियौ खेनाइ खरापे बनत। सोनारक काज लोहारक हथौड़ीसँ नहि भऽ सकैत अछि। समीक्षामे कोनो नीक काज नहि भऽ रहल अछि।
'अपन बट्टी भरि पनबट्टी’ सनक लोक अछि। जाइत-पाति बेसी अछि। लोक एक-दोसरकेँ छोट बुझैत अछि। रचना्क मूल भावनमे कमी आएल अछि। अपन रचना आ अपन लगुआ-भगुआमे लोक फंसल जाइत अछि। सब अपनाकेँ पैघ बुझैत अछि। सभटा लोक काजक क्रेडिट अपना लेल लेबाक लेल मारि कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : रचना्मे अनुभवक की भूमिका होइत अछि? मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल अहाँक विचार की अछि?
जीवकांत : सभ लोकक अपन अनुभव होइत अछि। ओकरे ठीक-ठाक कए लेखक शास्त्र बना दैत अछि। सभटा लेखक अपन अनुभवकेँ पुनर्जीवित करैत अछि। जहिना-जहिना शिक्षक स्तर बढ़त, तहिना-तहिना मैथिलीक प्रचार-प्रसार बढ़त। मिथिलामे शिक्षकक कमी अछि। स्त्री शिक्षा एखनो बेसी नहि अछि। साक्षरता जेना-जेना बढ़त आर्थिक स्थिति तेना-तेना नीक होएत। मैथिली बढ़त। इंटरनेटेपर मैथिली बढि़ रहल अछि। गौरीनाथ नीक काज कए रहल छथि। कोलकाताक स्वस्ति फाउंडेशन सेहो नीक काज कए रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँक रचना विद्रोही प्रवृतिक अछि, से किए?
जीवकांत : सरकार बनेने छी। जनताकेँ सुरक्षा चाही, सडक़ चाही। आजादी भेटल, त्रुटि सेहो भेटल। कमजोर लोकक संग दुर्व्यवहार भऽ रहल अछि। अन्यायक खिलाफ आवाज उठबैत हमर मनोदशा अछि। १९७० ई. मे कोलकातामे 'किरणजी’सँ भेट भेल छल। ओ कहलथि जे हमर स्टैंड तँ सत्ता विरोधी अछि। हुनकर गप ठीक छल।

विनीत उत्पल : मार्क्सवादकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी?
जीवकांत : मार्क्सवादक पहिने सेहो गरीबी छल। विद्यापति अपन कवितामे गरीबीक व्यापक वर्णन कएने छथि। 'कखन हरब दुख मोर’ गीतमे एक तरहेँ गरीबीक वर्णन कएल गेल अछि। 'नहि दरिद्र सब जुग माही’ आ संस्कृत श्लोक 'सर्वे गुणा कांचन भाजयंति’ मे सेहो दरिद्राक गप अछि। गरीबीक खिलाफ गरीबक पक्षमे सभ दिन लिखल जाइत रहल अछि।

विनीत उत्पल : अहाँ आ अहाँक लेखन ककरासँ प्रभावित अछि?
जीवकांत : हम सेहो मार्क्सवादसँ प्रभावित छी। लोहियासँ सेहो प्रभावित छी। बराबरी आ समानताक विचारकेँ प्रमुखता दैत छी। मार्क्सक समर्थक रही। एकरा लेल दीक्षा नहि लेलहुँ, कियो ई गप पैदा नहि केलक, अपने पैदा भेल।

विनीत उत्पल : तखन अहाँ मार्क्सवादक विरोध किए कए रहल छी?
जीवकांत : मार्क्सवाद उत्तम विचार छी, मुदा हिंसाक पक्षमे बेसी अछि। भारतीय राजनीति आ संस्कृतिमे मार्क्सवादक संभावना कम अछि, ताहिसँ एतए समाजवाद प्रबल भेल। भारतीय संस्कृति 'सर्वे भवन्तु सुखिनः’ पर आधारित अछि। एतए गांधी प्रासंगिक छथि। मार्क्सवाद बारंबार अपन रास्तासँ भटकैत अछि। मार्क्सवादक नीतिकेँ जमीनपर उतारब कठिन अछि। रूसक जमीनपर उतरल मार्क्सवाद राष्ट्रवादक प्रबल समर्थक बनि गेल। तिब्बत, भूटान, नेपाल आ पाकिस्ताक बलधकेल जमीनमे चीनी झंडा फहराइत अछि।

विनीत उत्पल : 'सुमन’ जीक अहाँ हमेशा विरोध कएलहुँ, तखन अभिनंदन ग्रंथमे बड़ाइ करबाक की मतलब अछि?
जीवकांत : 'सुमन’ जीक बड़ाइ लिखलहुँ तँ हम अछूत(......)भऽ गेलहुँ। हुनकर अध्यात्मपर लिखल अद्भुत अछि। संस्कृतमे लिखलन्हि। ओ आगि लगबैक क्षमता रखैत छथि। ओ संस्कृति आ मूल्यक विषयक ध्वजवाहक छलाह। ओ मैथिली कविताकेँ उत्कृष्टता तक लऽ गेलथि। हम मार्क्सवादी भऽ जाइ तकर माने ई तँ नहि होएत जे हम वेद-पुराणकेँ बिसरि जाइ। अभिनंदन ग्रंथ लेल फरमाइशी लेख लिखाओल गेल छल। हम हुनकर काव्य आ आध्यात्मपर लिखलहुँ। सही काल छल, एकरा लेल हम खुश छी।

विनीत उत्पल : कवितामे विशेष परिवर्तन कतए तक जाएज अछि?
जीवकांत : हमरा संग ढेर लोक एलाह। सभ पछुआ गेल। पाँच साल बाद हम अपन विषय परिवर्तन केलहुं। हर क्षेत्र~मे अपनेकेँ परिवर्तन करबाक चाही। जे परिवर्तनक समर्थक होएत ओ कालजयी होएत। हमहुँ विषय बदलैत गेलहुँ ताहिसँ जीवित छी। असहमतिक कविता पंजाब आ बंगालसँ आएल। बंगालमे सुभाष मुखोपाध्याय भेलाह जे कहलथिन 'हे कृष्ण, कुरुक्षेत्र मे घोड़ाक रास छोडि़ कए फेरसँ वंशी बजाउ।’ कविताक विषय सभ दिन बदलैत रहैत अछि। विद्यापति शृंगार आ भक्तिकेँ लऽ कए लिखलथि। एखन शृंगारसँ लोककेँ वैर भऽ गेल अछि। देश प्रेमक कविता लिखल गेल। मुदा दोसर विश्वयुद्घमे देशप्रेमक गपमे देखल गेल जे ई मनुष्यकेँ बर्बाद कऽ रहल अछि। राजनीतिपर कविता लिखब बेवकूफी अछि। आदमी, मित्रता, सुख-दुख कविताक विषय रहैत अछि। जेना-जेना समय बदलत, तेना-तेना विषय सेहो बदलत। जहिना कविता बदलत तहिना एकर रूपो बदलत। एकरा एना देखी, बच्चाक छठियार करैत छी, ओकरा बाद बच्चा्मे कतेक परिवर्तन होइत अछि।

विनीत उत्पल : मैथिली समाजक स्थिति लेल की कहबाक अछि?
जीवकांत : पैरवी-पैगाम आ गुटबाजी होइत अछि। अपन गाम आ समाज सिद्घांतवादी नहि अछि। जवाहरवादी अछि ताहिसँ तुरंत झुकि जाइत अछि। क्वालिटीसँ समझौता भऽ जाइत अछि। नीक लोकक नाम लेबासँ लोक अपवित्र भऽ जाइत अछि।

विनीत उत्पल : अहाँपर लोक आरोप लगबैत अछि जे 'चेला’ बनाबैत छी जेना महाप्रकाशपर रेखाचित्रमे रमेशकेँ उद्घृत करैत सुषाष चन्द्र यादव लिखै छथि। ई गप कतेक सच अछि?
जीवकांत : हम गुरुजी रही। साइंस टीचर रही तँ शिष्य तँ बनबे करत। सभ आदमी अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। कुणाल, प्रदीप बिहारी आदि ई नाम अछि। हालमे शिवशंकर कहलथिन जे अहाँक रचना हम पढ़ैत रही। तारानंद वियोगी कहलथिन अहाँक कविता मासमे दूटा पढ़ैत रही, मिथिला मिहिरमे, ताहिसँ प्रेरित भेलहुँ आ लेखनक मुख्य धारासँ जुड़लहुँ। हमहुँ कहैत छी, यात्रीजीक लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ। हमहुँ कहैत छी जे हम यात्रीजी आ विद्यापतिक चेला छी। हम कमांडो नहि बनेने छी। हम कोनो पुरस्कार लेल पैरवीकार नहि बनेने छी। हम दलाल नहि बनेने छी। हमर रचनासँ प्रभावित भऽ कऽ कियो रचना कर्ममे आएल, एहिमे हमर की गलती? हम अपन समर्थनमे भीड़ नहि जुटेलहुँ, वोट नहि मांगलहुँ, समीक्षाक लेल पैरवी नहि कएलहुँ। तखन जे कियो कहैत अछि जे हम हुनकर 'चेला’ छी तँ एहि~मे गलत की अछि ?

विनीत उत्पल : विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रहकेँ लऽ कऽ मोहन भारद्वाज जी समीक्षाक पर खूब विवाद भेल छल? ताहि लेल अहाँ की कहैत छी?
जीवकांत : मोहन भारद्वाज विवेकानंद ठाकुरक कविता संग्रह 'गामक कविता, कविताक गाम’ पर एकटा समीक्षा केने रहथिन। ओहिमे मोहन भारद्वाजजी लिखलथिन्ह जे हिनकर कविता सभटा समकालीन संभावनाकेँ खारिज करैत अछि। एहि संदर्भमे हम गौरीनाथकेँ एकटा पत्र पठेने छलहुँ। एतेक घटिया समीक्षा आ तुलनात्मक अध्ययन नहि भऽ सकैत अछि। संगे-संग पत्रक फोटोस्टेट कॉपी आओर लोककेँ पठेने छलहुँ। एकहि रचनासँ सभटा कविता खारिज भऽ जाए, एहन संभव नहि अछि। हमर विरोधक पत्र कोनो पत्रिकामे नहि आएल। मुदा गौरीनाथ एकरा मुद्दा बना देलक।
विनीत उत्पल: मोहन भारद्वाजक समीक्षाकेँ किछु गोटे गदगदी समीक्षा कहलन्हि मुदा ओ सभ बादमे अपने सेहो गदगदी समीक्षा कएलन्हि, मात्र किताब आ लेखक बदलि गेल!
जीवकांत: ई सभटा समीक्षक दारू पी कऽ, पैसा पी कऽ, मूर्खता पी कऽ विषवमन करैत अछि।

विनीत उत्पल : अपनेसँ अनुदित पुस्तक पर मूल पोथीक लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार लेखक सभ लेमए शुरू कए देलन्हि अछि। जेना अहाँ हालेमे अपन निबन्धमे मायानंद मिश्र द्वारा अपन लिखल हिन्दीक पोथीक स्वयं मैथिलीमे अनुदित पुस्तक 'मंत्रपुत्र’पर पुरस्कार लेबाक विषयमे लिखलहुँ?
जीवकांत : एहि मुद्दापर हमरा किछु नहि कहबाक अछि। मुदा मायानंद मित्र पुरस्कार लेलन्हि तँ किछु जरूर सोचने हेताह, सोचिए कऽ लेने हेताह। वैहि कहि सकैत छथि जे किए लेलन्हि।

विनीत उत्पल : साहित्य आ साहित्य लेखनमे इमानदारी आ नैतिकता कतेक आवश्यक अछि?
जीवकांत : लोककेँ सभ ठाम ईमानदार हेबाक चाही। 'पंजरि प्रेम प्रकासिया’मे हम खूब ईमानदारीसँ लिखने छी। मुदा, लोक गंगाजल लऽ कऽ अपन जीवनी लिखैत अछि। कविता, कहानी, नाटक तकमे लोक गंगाजल छींट कऽ लिखैत अछि। लेखनमे प्रेम, खून, हत्या, लार नहि अबैक चाही। हम सभ पाखंड करैत छी। मुदा जे लेखक जीवनक सत्य आ समाजक स्थिति लिखलक ओ अपन धरतीपर बदनाम भऽ गेल। राजकमल चौधरी साहित्यमे समाजक सत्य लिखलक, बदनाम भऽ गेल। ओ सत्य लिखलन्हि तँ हुनका 'अय्यास प्रेतक विद्रोह’ कहल गेल।

विनीत उत्पल : मिथिलाक केंद्र मानल जाएबला शहर 'मधुबनी’मे मैथिलीक पोथी नहि भेटैत अछि, एना किए?
जीवकांत : हम तँ देहातमे रहैबला लोक छी। बासन तँ दिल्ली, मुंबई, कोलकातामे बिकाइत अछि। मधुबनी, दरभंगा, घोघरडीहामे तँ घास छिलैबला लोक रहैत अछि। पढ़ै वाला लोक तँ बाहरे चलि जाइत अछि। मधुबनीमे पोथी नहि बिकाइत अछि, ओहिमे लेखकक कोन दोष? पब्लिशर्स आ सर्कुलेशनक मामला्मे समर्पित लोकक जरूरत अछि। गीता प्रेसक पोथी सभ ठाम बिकाइत अछि। हिंद पॉकेट बुक्सक पोथी ठामे-ठाम भेटैत अछि। हिंदीमे धर्मयुग, सारिका बंद भऽ गेल अछि। हमर सबहक पोथी दोकानमे नहि भेटि रहल अछि। लोक-वेद खैरातमे पोथी लएले चाहैत अछि।

विनीत उत्पल : प्रबोध सम्मान 2010 प्राप्त करबाक लेल बधाई।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

राजमोहन झासँ गजेन्द्र ठाकुरक साक्षात्कार


राजमोहन झासँ गजेन्द्र ठाकुरक साक्षात्कार
गजेन्द्र ठाकुर:मैथिलीक जन सामान्यसँ दूर भऽ मैथिली साहित्यकार सभ मैथिलीकेँ प्रदर्शनक वस्तु बना देलखिन्ह, साहित्यसँ लोक किएक दूर होइत गेल?
राजमोहन झा:एहि लेल अहाँ साहित्यकारकेँ कोना दोषी कहैत छियन्हि?
गजेन्द्र ठाकुर:ओ साहित्य धरि सीमित रहलाह? समाजसँ कोनो मतलब नहि रहलन्हि? अपन लिखलथि आ गोष्ठी आ कवि सम्मेलन धरि सीमित रहलाह? गाम-घर छोड़ि देलन्हि। मैथिली साहित्यकार समाज आ राजनीतिसँ दूर रहलाह। फैशन जेकाँ साहित्य लिखल गेलै, पढ़ल गेलै आ सुनल गेलै?
राजमोहन झा:से तँ आब भऽ रहल छै। पहिनुका साहित्यकार तँ एना नञि करथि।
गजेन्द्र ठाकुर: एकटा हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गाममे लोक कोनो दोसरक रचनाकेँ नहि पढ़ने-सुनने छथि। मिथिला मिहिर गाम-गाम जाइत छलै , बन्द भऽ गेलै, । हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गामक लोक कोनो दोसर साहित्यकारक नामो नहि सुनने छथि। दोसर साहित्यकार हरिमोहन झा जेकाँ काज किएक नहि कऽ सकलाह?
राजमोहन झा:ई तँ एकटा मिस्ट्री जेकाँ छैक। हरिमोहन झाक साहित्य एतेक पोपुलर कोन कारणसँ भेलन्हि आ दोसर साहित्यकारक किएक नहि भेलन्हि। ओ गुण दोसर साहित्यकार सभमे किएक नहि अओलन्हि। एकर ओनो रेडीमेड सोल्युशन नहि भेटल अछि। जखन कि हरिमोहन झाक साहित्यक सेहो आलोचना होइत छैक जे साहित्यमे जै समाजकेँ ओ पेन्ट केलन्हि से सम्पूर्ण समाज नहि छै।एकटा विशेष वर्गकेँ लऽ कए ओ साहित्य रचलन्हि। दलित समाज हुनकर साहित्यसँ वंचिते जेकाँ छन्हि। तकर बावजूद एतेक पोपुलर कोना रहथि आ छथि से एखनो धरि नीक जेकाँ एक्सप्लेन नहि भेल छैक। कहल जाइत छैक जे हुनके साहित्यसँ पाठक वर्ग तैयार भेलैक पाठक रूप मे जे वर्ग एग्जिसटेन्समे आएल से हुनके साहित्यसँ।
गजेन्द्र ठाकुर:साहित्य उद्देश्यपूर्ण होएबाक चाही वा एकर उद्देश्य मात्र मनोरंजन होएबाक चाही।
राजमोहन झा:सैह सेल्फ एनेलाइज करबाक छै। मनोरंजन तँ रहबाके चाही नहि तँ क्यो पढ़बे नहि करत मुदा अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन नहि होएबाक चाही। विभिन्न स्तरक लोकक लेल विभिन्न स्तरक साहित्य, जकर जे आवश्यकता छै तकर पूर्ति होएबाक चाही।
गजेन्द्र ठाकुर:बेर-बेर सुनबामे आबए छै जे मैथिली भाषा मरि रहल अछि। माइग्रेशन नीक चीज छियैक मुदा एक जेनेरेशनमे जाहि समाजक नब्बे प्रतिशत जनसंख्या माइग्रेट कए गेल ओहिमे तँ एहि प्रकारक वस्तु तँ अवश्य आएत। भारतसँ बाहर जे जाइत छथि हुनकर भाषा अंग्रेजी आ जे भारतमे दोसर ठाम जाइत छथि अदहा गोटे हिन्दी बाजए लगैत छथि।
राजमोहन झा:लोक मे भाषा प्रेम घटल अछि। पहिने ई नहि रहैक।लोक मैथिली छोड़ि रहल अछि।
गजेन्द्र ठाकुर: ई भारतक मैथिली भाषी प्रदेशक विषयमे तँ सत्य अछि मुदा नेपालमे हिन्दी विरोधक कारण अप्रत्यक्ष रूपसँ मैथिलीकेँ लाभ भेल छै।
राजमोहन झा:भारतमे स्थिति खराप छै।पहिलुका लोक जेना समर्पण आब लोकमे नहि छै।
गजेन्द्र ठाकुर:बबुआ जी झा “अज्ञात”केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देबाक अहाँ विरोध कएने रहियन्हि...
राजमोहन झा:हम विरोध नहि कएने रहियन्हि। दिल्लीमे आन-आन सभ कएने रहथि।
गजेन्द्र ठाकुर:आरम्भक तीसम अंकमे अहाँक सामूहिक वक्तव्य आएल छल। ओहिमे २००१क साहित्य अकादमी पुरस्कार बबुआजी झा “अज्ञात”क “प्रतिज्ञा पाण्डव” आ अनुवाद पुरस्कार सुरेश्वर झाकेँ देल जएबाक विरोध भेल छल। आरम्भ तँ आब लगैए बन्द भऽ गेल अछि।
राजमोहन झा:हँ।.....आरम्भ बन्द नहि भेल अछि स्थगित अछि।
गजेन्द्र ठाकुर:भालचन्द्र झाक “बीछल बेराएल मराठी”एकांकी जे मूलभाषासँ सोझे अनूदित छल, सुभाष चन्द्र यादव जीक बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद) सेहो एहि तरहक सोझे अनूदित कृति छल तकरा पुरस्कार नहि भेटल। ओहि समय मे कोनो विरोध नहि भेल। मुदा अनचोक्के सभ क्यो बबुआजी झा “अज्ञात”क पाछाँ पड़ि जाइ गेलाह, हुनका बिनु पढ़ने ककरो इशारापर आ क्षुद्र उद्देश्य पूर्तिक लेल तँ ई नहि कएल गेल? जखन कि मूल समस्या मैथिलीक अछिये, पाठक शून्यता आ साहित्यक जनसँ दूर होएब आ भाषाक मृत होएबाक खतरा, तकर विरोध किएक नहि कहियो भेल?
राजमोहन झा:शैलेन्द्र कुमार झाक अनूदित संस्कार सेहो सोझे अनुवाद छल तकरो पुरस्कार नहि भेटलैक। विरोध तँ होइत अछि, मुदा लोक परवाह नहि करैत छथि।
गजेन्द्र ठाकुर:तकर कारण पाठकक कमी तँ नहि अछि? जूरी आ साहित्यकारो जखन दोसराक अनूदित आ लिखित रचनाकेँ नहि पढ़ैत छथि? सिद्धार्थ राईक नेपाली कविता संग्रहक मैथिली अनुवाद “ओ लोकनि जे नहि घुरलाह” मेनका मल्लिक द्वारा कएल गेल, २००६ ई. मे प्रकाशित भेल, मनप्रसाद सुब्बाक नेपाली कविता संग्रहक अनुवाद“अक्षर आर्केष्ट्रा” नामसँ प्रदीप बिहारी कएलन्हि, ई २००७ ई.मे प्रकाशित भेल। मुदा जे जूरी एहि पोथी सभकेँ देखबे नहि करताह तँ फेर अपन लगुआ-भिरुआकेँ अनुवाद पुरस्कार दिअओताह, भने सोझे कएल अनुवाद रहए वा नहि। ओना अकादमी द्वारा२००७ मे अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) केँ अनुवाद पुरस्कार देबाक प्रशंसा होएबाक चाही। मुदा चयन प्रक्रियामे नीक चीजक निरन्तरता किएक नहि रहैत अछि?
राजमोहन झा:नञि विरोध तँ होइत रहैत छैक, होएबाक चाही। सोझे अनुवाद कएल पोथी पुरस्कारक पात्र अछि।
गजेन्द्र ठाकुर:मुदा जूरीमे तँ सभटा पुरने लोक सभ छथि । पुरना लोकमे पहिल कथा, पहिल कविता, पहिल नाटक, पहिल पत्र-पत्रिका आदिक उपधि लेल घमासान होइत रहैत अछि। कोनो पत्र-पत्रिका जे छपलक सएह पढ़लक ताहिसँ कोनो मतलब नहि। पुरना लोकमे अहाँक हिसाबे भाषा प्रेम बेशी रहए।
राजमोहन झा:नञि एहि तरहक जूरीक विरोध होइत रहल छैक। आइ काल्हिक साहित्यकारमे गुटबन्दी बेशी भेल अछि। पहिने नहि रहए।
गजेन्द्र ठाकुर:एहि बेर फ्रेंच भाषाक जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियोकेँ नोबल पुरस्कार भेटलन्हि। मेरिकाक न्यू जर्सीक फिलिप रॉथ पिछड़ि गेलाह। कहल गेल जे अमेरिकामे जे आत्ममुग्धताक स्थिति अछि ताहि कारणसँ ओतए अनुवादपर ध्यान नहि देल जाइत अछि आ ताहि कारणसँ ओकर साहित्य पाछाँ भए गेल अछि। ई आत्ममुग्धता मैथिलीक सम्दर्भमे कतेक अछि।
राजमोहन झा:टांशलेशन तँ बहुत जरूरी छैक। तखने तँ कम्पेरीजन कए सकब।जीवनानुभवसँ लोक लिखैत अछि, जरूरी छै, तकरा अनुवाद आर विस्तार प्रदान करत।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप


तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप


सार्थक बाल साहित्यक प्रसार सं मैथिली कें नवजीवन भेटत 
       तारानन्द वियोगीक संग अनिल गौतमक वार्तालाप
                

अनिल--बाल साहित्यक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कारक लेल अहां कें बधाइ भाइ। हमरा सभक लेल ई बहुत                     खुशीक बात थिक। घोषणा सुनि क' अहां कें केहन लागल?
ता..वि.--धन्यवाद भाइ। हमरो नीक लागल अछि। एहि तरहें चयन भेने ई आस्था बनल अछि जे हमरा भाषाक नेतृत्वकर्ता लोकनि मे, निर्णायक लोकनि मे गुणग्राहकता अवश्य छनि। ओना तं कही जे हमर साहित्य-लेखनक जे लक्ष्य अछि से बहुत दूरगामी अछि आ पुरस्कार भेटने वा नहि भेटने कोनो बात बनैत वा बिगडैत हो, से बात एकदम्मे नहि अछि। तखन होइ की छै जे अहां अटट्ट दुपहरी मे सोर-फोर कतहु जा रहल होइ आ रस्ता मे कोनो ठाम छांहदार गाछक शीतलता भेटि जाय वा एक लोटा ठंढा जल भेटि जाय, तं नीक तं लागबे करत। दोसर बात ई होइ छै जे बाहर अहांक भने बहुत सम्मान हो मुदा एकटा विडम्बना जरूर बाहरक लोक कें सालैत रहैत छै जे हिनका घरक लोक सब कतेक हृदयहीन छथिन। जे किछु। नीक तं हमरो लागल अछि।
अनिल-- अहां कहलियै जे दूरगामी लक्ष्य अछि। की अछि अहांक दूरगामी लक्ष्य?
ता..वि.--देखू भाइ, कोनो लेखकक जीवन के चरम सार्थकता की थिक? यैह जे ओ अपन भाषा, जाहि मे लेखन करैत अछि, के तागत बढाबए। एहि-एहि प्रकारक नवीन अनुभूति आ अभिव्यक्ति अपन भाषा मे लाबए, जाहि लेल कदाचित ओकर भाषा एखन धरि अक्षम छल, बेगरतूत छल। आ से कोनो तात्कालिकताक हिसाबें नहि। भाषा-साहित्यक अविरल इतिहासक हिसाबें। से भेल मूल बात। दोसर दिस पुरस्कारे कें जं लिय' तं अनेक एहन पुरस्कार अछि जाहि मे अहांक लेखन कें सम्पूर्ण भारतीय भाषा वा सम्पूर्ण विश्वक भाषाक प्रतिस्पर्धा मे राखल जाइत अछि। जेना ज्ञानपीठ वा बुकर आदि। काल्हि धरि मैथिली मे लिखि क' अहां एतए धरि सोचियो नहि सकैत रही। आइ सोचि सकै छी। मुदा, एहि लेल तं असाधारण कोटिक साधना आ अभ्यास चाही कि ने।
अनिल--मुदा मैथिली मे की अहां ताहि तरहक माहौल देखै छियै? एतए तं कहांदन डेग-डेग पर गुटबाजी छै।
ता..वि.--माहौल कें देखबाक हमरा फुरसति हो, तखन ने? हमरा तं अपन काजे सं फुरसति नहि भेटैत अछि। अहां कें प्रायः बूझल हो जे हम नियमित रूप सं तीन-चारि घंटा रोज लेखन करै छी। दोसर दिस, नोकरी एहन अछि, जाहि मे ने तं अल्ली-टल्ली मारि सकै छी, ने एहन हमर प्रवृत्तिये अछि। एखनहु, एहू जुग मे किताब आ पत्रिके पढब हमर मनोरंजनक साधन अछि। साहित्ये सं जीवन भेटैए, साहित्ये सं मनोरंजन। कहि लिय' जे 'उसी से ठंढा, उसी से गरम'। एहना हालति मे, की हम गुट बनाएब आ की हम गुट सभक गतिविधि बूझब। एकटा समय छल, जखन मैथिली मे जखन किछु गलत होइ तं बड जोर सं रिएक्ट करी। ओहुनो हाइपर सेन्सेटिव टाइप के हम आदमी छी। आब मुदा, हम सोचै छी जे गलत के प्रति रिएक्ट केने अहां बहुत किछु नहि क' सकै छी। सही बात ई भेलै जे अहां सही लाइन परअपन काज केने चलू। ओहुना, जं अहां वास्तविक अर्थ मे एक लेखक छी तं अहांक काज सही लाइन पर लेखने करब हेबाक चाही, गलत लेखनक प्रति रिएक्ट करब मात्र नहि। यौ भाइ, अपन लिखलके अन्ततः काज अबै छै। हम तं अपना गाम-घरक परिसर मे सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविटी मे सेहो लागल रहलहुं अछि। लेकिन, मानै छी जे लेखनक कोनो विकल्प नहि होइ छै।
        गुटबाजी के जहां धरि बात अछि, तं एहि सम्बन्ध मे हमर विचार सर्वथा भिन्न अछि। गुटबाजी कें हम किन्नहु अधलाह नहि मानै छी। गुट माने की? दू-चारि गोटे एकठाम जुटलहुं-जुडलहुं, सैह ने? एहि लेल तं लाइक माइंड हएब सर्वथा जरूरी छै। एम्हर, अपना ओतक परंपरित संस्कृति की थिक?  हम सब, प्रत्येक व्यक्ति अपने कें सब सं महान, सब सं काबिल मानै छी। एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति। एहना स्थिति मे जं दू-चारि गोटे एकठाम बैसथि, विचार-विमर्श करथि आ समाज कें तकर किछुओ आउटपुट भेटैत देखार पडैत हो तं ई तं बहुत नीक बात भेलै। हमरा जं परिभाषा करए कहब तं हम तं गुटबाजीक यैह परिभाषा करब। मुदा, एहि तरहक गुटबाजी कतहु होइत हो मैथिली-परिसर मे, से तं हमरा देखार नहि पडैत अछि। तखन बचल बात-- खिधांस आ कुटिचालि के,तं तकर तं कोनो व्याकरण नहि हो। की एसगर आ की झुंड बना क"। तकर उद्देश्य की तं सृजनात्मक काजक विरोध करब। हम हिनका सभक परबाहि नहि करैत छी। जं परबाहि करितहुं तं आइ महिषी गाम मे हरबाही करैत रहितहुं। अहूं सब कें कहै छी जे हिनका सभक परबाहि नहि करी।
                     अपन भाषा मे किछु वरेण्य साहित्यकार सब भेलाह अछि, जनिकर सान्ध्य-गोष्ठी बहुत नामी अछि आ बहुत फलप्रद भेल अछि। जेना सुमन जीक सान्ध्य-गोष्ठी। एखनहु जं कतहु एहन होइत हो, एहि सं रचनात्मक, सार्थक आउटपुट बहराइत हो,एहि सं समाज मे मिलि-बैसि क' किछु सोचबाक-करबाक (सह वीर्यं करवावहै) उत्साह भेटैत हो, तं हम तकर स्वागत करै छी।
अनिल-- अहां कें बाल साहित्यकारक रूप मे पुरस्कृत कएल गेल, जखन कि अहां मूलतः बाल साहित्यकार नहि, एक गंभीर सृजनात्मक लेखक छी। अहां कें तं साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटबाक चाहैत छल। ई बात अहां कें नहि अखडल?
ता..वि.-- यौ भाइ, हम बाल साहित्यकार छी, एहि बात सं सदैव अपना कें गौरवान्वित अनुभव करैत छी। सार्थक बाल साहित्यक सृजन एक असाधारण बात थिक, से कृपया मोन राखू। (हंसैत) ओना तं हम बहुत किछु छी। एकटा खिस्सा कहै छी। एक कार्यक्रम मे रांची गेल रही। ओतए डा० धनाकर ठाकुर सं परिचय भेल। पहिले भेंट छल। ठाकुर जी हमर नाम पुछलनि। हम कहलियनि--तारानन्द वियोगी। ओ कहए लगलाह--'यौ, मैथिली मे तं कहांदन कैक टा तारानन्द वियोगी छथि। एकटा छथि जे मिथिलाक धरोहर सब पर काज करै छथि। एकटा आर छथि जे सदरि काल 'दलित-दलित' करैत रहै छथि।    एकटा छथि जे बड सुन्दर कविता-कथा-आलोचना सब लिखै छथि। एहि मे सं अहां कोन तारनन्द वियोगी छी?' तं, से सैह बात।
                बात पुछलहुं अखडै के। किए अखडत? हम साफ करै छी जे अखडैत नहि अछि। तकर कारण अछि। अहां भने कतबो नीक लेखन करैत होइ, ओकर परखबाक जखन बात अबै छै तं ओहि मे रुचि-भिन्नता एक महत्वपूर्ण कारक बनैत अछि। अहां कें जं हमर लेखन पसिन्न नहि पडल, तं एकर मतलब छै जे ओ अहांक लेल नहि लिखल गेल अछि। रुचि-भिन्नताक कारण ओ अहां कें नहि पसिन्न पडल। मुदा, तै दुआरे हम दुखी होइ वा हमरा अखडए, तकर हम कोनो कारण नहि देखै छी।
                   हमर तं सोच अछि जे लेखक कें एतबा इमान्दार हेबाक चाही जे जं ओकरा बेइंसाफीक संग वा साहित्येतर कारण सं पुरस्कृत कएल जा रहल हो, तं ओकरा पुरस्कार कें ठुकरा देबाक चाही। अहां कें प्रायः बूझल हो जे चेतना समिति, पटना जखन हमरा 'महेश पुरस्कार' देने छल, तं समुचित रूप सं तकर कारण बतबैत हम ओहि पुरस्कार कें स्वीकार करबा सं इनकार क' देने छलियनि।
अनिल- मुदा भाइ, सुनबा मे आएल अछि जे फाइनल राउन्ड मे प्रसिद्ध लेखक लोकनिक मोट-मोट किताब सब प्रतिस्पर्धा मे छलै। तकरा सभक बदला अहांक एक पातर-सन पोथी कें पुरस्कारक लेल चुनि लेल गेल। ई बात जरूर जे निर्णय सर्वसम्मति सं भेलै। मुदा की एकरा अहां बेइंसाफी नहि मानै छियै?
ता..वि.- क्षमा करब भाइ। जं अहां मोट-मोट पोथी आ छोट-छीन-पातर पोथीक आधार पर बाल साहित्य कें बुझबाक दाबी करै छियै तं हम साफ कहब जे बाल साहित्य कें अहां साफे नहि बुझै छियै। ओ बच्चाक लेल लिखल गेलैए ने यौ। सेहो कोन बच्चाक लेल? मिडिल स्कूल मे पढनिहार छठा-सतमाक बच्चाक लेल। सुनियोजित ओकर फारमेट छै। ओकर अपन टारगेट ग्रुप छै। एक दिस अहां कहै छियै जे बच्चाक स्कूल बैग कें हल्लुक करब अपना सभक राष्ट्रीय आवश्यकता छै, आ दोसर दिस, ओकर मनोरंजन आ प्रेरण लेल मोट-मोट पोथीक जरूरति देखैत छिऐक, तं ई तं उचित बात नहि भेलै। मुदा तैयो, अहांक जानकारी लेल कहि दी जे बाल साहित्य-कृतिक लेल जे अन्तर्राष्ट्रीय मानदंड छै, ताहि पर ई पोथी दुरुस्त उतरल अछि। मैथिली मे आई.एस.बी.एन. नंबरक संग कम पोथी छपल अछि। सेहो नंबर एकरा भेटल छै।
                   असल मे, मोट-पातरक आधार पर बाल साहित्यक मूल्यांकने नहि कएल जा सकैए। मूल बात छै जे ओकर विषय-वस्तु, आजुक बच्चा लेल, आजुक जुगक चैलेंज के सन्दर्भ मे, कतेक उपयोगी छै। कतेक प्रासंगिक छै। दोसर जे ओकर भाषा आ शिल्प टारगेट ग्रुपक बच्चाक लेल कतेक सम्प्रेषणीय छै। ई नहि ने हेतै जे अहां लिखबै बच्चाक लेल, आ बिम्ब आ प्रतीक आ कथन-भंगिमा राखबै निज अप्पन। परकाया-प्रवेश तं अहां कें करैए पडत।
 अनिल- मुदा अहां उपनिषद-कथा पर लिखलियै-ए। की एकरा प्रासंगिक कहल जेतै? की ई मौलिक कृति भेलै?
ता..वि.--मौलिक कृति तं  ई १००  प्रतिशत भेल। कारण, उपनिषदक कोनो कथाक ई अनुवाद नहि थिक। अहां एक सय आठ उपनिषद उनटा लिय'। कत्तहु एक ठाम ई कथा अहां कें अविकल नहि भेटत।  असल मे ई शब्द द्वारा ओहि युगक पुनर्सृजन थिक। उद्देश्य अछि- सकारात्मक जीवन-प्रणाली कें बच्चाक सामने उद्घाटित करब। ओहि युगक लोक कोन तरहें सोचै-बिचारै छला, केहन हुनकर जीवन-प्रणाली छलनि, आपसी सम्बन्ध आ पर्यावरणक प्रति हुनकर कतेक सकारात्मक नजरिया छलनि, जीवन मे प्राथमिकताक निर्धारण कोन तरहें करी एहि सम्बन्ध हुनका लोकनिक तरीका छलनि, आदि-आदि अनेको विन्दु सभक पुनर्सृजन ई कथा-पुस्तक थिक। मजेदार बात ई छै जे एहि पोथीक जे प्रेरण-तत्त्व छै से एकर बाल-पाठक कें अलग सं कतहु देखारे नहि पडत। दोसर बात छे जे एहि समस्त कथा-वस्तु कें अत्यन्त मनलग्गू ढंग सं गूथल गेलै-ए। एहि किताबक योजना हम एना कए बनौने रही जे हमर अधिकांश बाल पाठक एकरा दू-तीन सिटिंग मे पढि जाथि। मुदा, बाद मे पता लागल जे बेसी पाठक तं एक्के सिटिंग मे पढि गेलाह अछि।   
              प्रासंगिकताक जहां धरि सवाल अछि, हम तं देखै छी जे आजुक एहि उपभोक्तावादी व्यक्तिवादी कठमुल्लावादी समय मे एहि तरहक सोच राख' बला कृतिक बहुते महत्व छै। ततबे बेसी प्रासंगिकता छै। असल मे, अपना ओतए, मिथिला मे, शुरुहे सं ई चलन रहलै-ए जे उपजीव्य ग्रन्थ तकबाक हो तं रामायण मे ढुकू अथवा महाभारत मे। बड बेसी भेल तं भागवत मे। हम बेबाक भ' ' कह' चाहै छी जे आजुक युगक चुनौती सभक सन्दर्भ मे उपनिषद, जातक-कथा, त्रिपिटक साहित्य आदि बेसी उपयोगी आ प्रासंगिक  अछि। महाभारत  मे वन कें जराओल जाइ छै जखन कि उपनिषद मे वनक संग मैत्री कएल जाइ छै। अहां कें की चाही? अहांक युगक बच्चा वनक प्रति की रुख अपनाबय? की ओकरा संस्कार मे अहां देब' चाहै छियै? सोचियौ।
अनिल-- बहुत अनमोल बात कहलियै भाइ। एही तरहें सोचबाक चाही। बाल साहित्य कें ल' ' आगुओ अहांक कोनो योजना अछि?
ता..वि.--बहुतो योजना अछि। असल मे, बाल साहित्य पर हम सांस्थानिक ढंग सं काज करए चाहै छी। हमरा स्पष्ट लगैत अछि जे आगू जे मैथिली जीयत आ बढत तं ताहि मे बाल साहित्यक बहुत पैघ भूमिका हेतै।एकर प्रसार मैथिली मे नवजीवन भरि देत।
            मधुबनी मे जखन हमर पोस्टिंग छल तं अनेक तेजस्वी युवा लोकनिक संग हमर मित्रता भेल। एहि मे वशिष्ठ  (ऋषि वशिष्ठ) छला महाकान्त ठाकुर आ प्रकाश झा छला। किशोरनाथ, सुधीर कुमार मिश्र,  राकेश कुमार मिश्र, रघुनाथ मुखिया--ई सब गोटे हमरा टीम मे रहथि। हम सब एक सुचिन्तित योजनाक तहत बाल साहित्यक लेखन, प्रकाशन आ वितरणक काज एकदम संस्थागत तरीका सं करब शुरू केलहुं। एक हजार प्रति किताबक संस्करण छपए। टीमक सदस्य लोकनि एकरा स्कूले स्कूल जा क' बेचि आबथि। सही हाथ धरि पोथी पहुंचि जाए। एक बच्चा जं पोथी कीनए तं ओकर परिवारक सदस्य आ अडोसिया-पडोसिया मिला क' पन्द्रह-बीस पाठक हमरा लोकनि कें भेटि जाथि। हम युवक मित्र लोकनि कें लेखन मे आगां केने छलियनि। हम तं बुझू पाछू लागल लिख' लगलहुं। एखनहु वशिष्ठ महाकान्त आ हुनक टीमक सदस्य लोकनि एहि काज कें आगू बढा रहल छथि। हम अपनहु एहि योजना कें जारी रखबाक लेल प्रतिश्रुत छी। लेखन अपन ठाम पर अछि,तकर महत्व सर्वोपरि छै,मुदा एक्टीविज्म के सेहो बहुत बेगरता छै। हम जकरा लेल लिखी तकरा धरि जं पहुंचय, तं एहि सं बढि क' आनन्द नहि हो।
अनिल-- हम प्रश्न करए चाहैत रही जे लेखन कें ल' ' की सब योजना अछि?
ता..वि.-- एकटा तं हमर योजना अछि जे 'मिथिला' सं बच्चाक आत्मीय परिचयक लेल एक पुस्तक-माला तैयार करी। उद्देश्य जे भावी पीढीक भीतर अपन देस-कोसक प्रति अनुराग जाग्रत करए। मिथिलाक गौरवशाली इतिहास, एकर नायक, एकर सांस्कृतिक सौरभ, एकर जीवन-पद्धति---एहि समस्त चीज पर। खास बात ई जे सब टा प्रकरण कथात्मक हेतै आ से तते मनलग्गू जे हमर बालपाठक ओकरा दू-तीन सिटिंग मे पूरा पढि जाथि। उद्देश्य एकैसम शताब्दीक सुपुरुष मैथिल तैयार करब। मात्र अतीत-गान नहि, ओहि मे सकारात्मक तत्वक खोज, आडेन्टिटीक खोज---जे आब' बला युग मे हुनका जीवनक काज आबि सकए।
             एकटा पोथी हम, एम्हर तैयार केलहुं-ए गोनू झा पर। छुच्छ हंसी-ठट्ठाक लेल गोनू झाक खिस्सा के अनेक पोथी पहिनहि सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सब मे गोनू झाक कोनो व्यक्तित्व ठाढ करबाक कोशिश नहि भेल अछि, मिथिलाक एहि नायकक चरित्र नहि गढल जा सकल अछि। असल बात छै जे हमरा समक्ष कोनो चीज स्पष्ट रहत तखने ने हम अपन साहित्य द्वारा ओकरा पुनर्सृजित करबाक चेष्टा करब। एहि तरहक एक पोथी हम गोनू झा पर लिखनहु छी, जे नेशनल बुक ट्रस्ट सं प्रकाशित छै। मुदा, ओहि सं हम सन्तुष्ट नहि छी। उदात्त मैथिल मानुसक रूप गोनू झाक व्यक्तित्व ठाढ करबाक लेल जे औपन्यासिक कलेवर चाही, से अहां कें हमर अगिला किताब मे भेटत।
        तहिना, लोक साहित्य, संस्कृत वाङ्मय,त्रिपिटक साहित्य--एहि सब मे अनेक मजेदार आ अति प्रासंगिक वाकया सब आएल अछि। इच्छा अछि जे तकरा सब कें बच्चाक लेल प्रस्तुत करी। एहि समस्त योजना सभक मूल्यगत उद्देश्य यैह जे अपन बाल पाठक मे हम विज्ञान-बुद्धि, लोकतांत्रिक संस्कृति,  पर्यावरणक प्रति संवेदनशीलता, आ अपन आइडेन्टिटीक प्रति आत्मतोष देखए चाहै छी।
अनिल-- एहन बहुमूल्य वार्तालापक लेल भाइ, अहां कें धन्यवाद।
ता..वि.-- अहूं कें धन्यवाद।

(साभार विदेह www.videha.co.in )