Tuesday, November 4, 2008

हारि-जीत - जगदीश प्रसाद मण्डल



चारिमे दिन दुनू प्राणी सोमन विचारलक जे आब एहि गाममे जीयब कठिन अछि तेँ गामसँ चलिये जाएब नीक हएत। दुनियाँ बड़ी टा छैक। जतए जीबैक जोगार लागत ततए रहब। सामान सभ बान्हि, करेजपर पाथर राखि गामसँ जेबाक लेल दुनू प्राणी तैयार भऽ गेल। भुखल पेट ! सुखाएल मुँह ! निराश मन ! ओसारपर बैसल दुनू प्राणीक आँखिसँ  दहो-बहो नोर टघरैत रहै ! दुनियाँ अन्हार देखि, उठैक साहसे नहि होइत छलै। सोमनक मनमे होइत जे की छलहुँ आइ की भऽ गेलहुँ? रंग-बिरंगक विचार, पानिक बुलबुला जेकाँ दुनूक मनमे उठैत आ विलीन भऽ जाइत ! आगूमे मोटरी राखल रहै। जहिना सीमा परहक सिपाही छातीमे गोली लगलासँ  घाइल भऽ जमीनपर खसि छटपटाइत, तहिना दुनू प्राणी सोमन दुखक अथाह समुद्रमे डुबैत-उगैत। भिनसरसँ बारह बजि गेलैक।
सहरसा जिलाक गाम मेरचा। पूबसँ कोशी आबि गामक कटनिया करए लागल। गर लगा-लगा गामक लोक जहाँ-तहाँ पड़ाए लगलाह। ओना सरकार पुबरिया बान्हक बाहर पुनर्वासक व्यवस्था सेहो करैत रहए मुदा ओहिसँ बोनिहारकेँ  की सुख हएत? ओकरा सबहक तँ रोजगारो छिना गेल।
पत्नी, बेटा-पुतोहुक संग फुलचनो पंडित गाम छोड़ि पछिम मुँहे बिदा भेलाह। घरारी छोड़ि अपना एक्को बीत जमीन-जाएदाद नहि छलनि। मुदा अपन व्यवसाएक सभ लूरि छलनि तेँ मनमे चिन्तो ओतेक नहि रहनि। चिन्ता मात्र रहनि ठौर भेटबाक। कखनो-कखनो मनमे होइन जे अपन गाम तँ बुझल- गमल अछि, आन गाम केहन होएत केहन नहि? मुदा उपाइये की? जीबैक लेल तँ मनुष्य सभ किछु करैत अछि। पछबरिया बान्हसँ मील भरि पाछुये रहथि आकि बान्हपर नजरि पड़लनि। बान्ह देखितहि आशा जगलनि। किएक तँ ओइ बान्हक पछिम कोनो धार-धुर नहि अछि। मुस्कुराइत फुलचन पत्नीसँ  पुछलक- ‘‘भगवान रामक खिस्सा बुझल अछि?’’
  फुलचनक मुँह दिशि देखि मुनिया बजलीह- ‘‘बहुत दिन पहिने सुनने छेलौं, आब ओते धियान नै अए।’’
‘‘जहिना अपना सभ गाम छोड़ि कऽ जा रहल छी तहिना ओहो सभ गेल रहथि। अपना सभकेँ तँ बटखरचो अछि, हुनका सभकेँ तँ सेहो नै रहनि।’’
तहि बीच फुलचनक पुतोहु कपली सासुक बाँहि पकड़ि पाछु मुँहे घुमा कहलक- ‘‘ऐँड़ीकेँ डोका काटि देलक। खुन बहैए। कनी कतौ बैसथु जे लत्ता बान्हि देबै।’’
ऐँड़ी देखि मुनिया कहलखि‍न- ‘‘कनियाँ, कतौ गाछो ने देखै छिऐ जे कनी सुस्ताइयो लैतौं। हमरो पियासे कंठ सुखैए।’’
  सासु-पुतोहुक बात सुनि फुलचन बाजल- ‘‘कनियाँ, जानिये कऽ तँ दैवक डाँग लागल अछि, तखन तँ कहुना कऽ बान्ह धरि चलू। एक तँ रौदाइल छी तइपर सँ जत्ते काल अँटकब तते रौदो बेसिये लागत।’’
  बान्हपर पहुँचतहि सभ निसाँस छोड़लनि। बान्हक पछिमसँ एकटा आमक गाछ रहै। छाहरि देखि सभ केओ गाछ तर पहुँचए गेलाह। एकटा बटोही पहिनहिसँ तौनी बिछा पड़ल छल। कने काल सुस्तेलाक बाद बटोहीकेँ फुलचन पुछलखिन- ‘‘भाय, तमाकू खाइ छह?’’
जेबीसँ चुनौटी निकालि फुलचनक आगूमे फेकैत ओ बटोही बाजल- ‘‘कोन गाम जेबह?’’
कोन गामक नाओ सुनितहि फुलचनक हृदए सिहरि गेलनि। मिरमिरा कऽ कहलखि‍न- ‘‘भाय, कोन गाम जाएब तेकर तँ ठेकान नहि अछि। मुदा मेरचासँ एलौंहेँ। धारमे गाम कटि रहल अछि। तेँ गाम छोड़ि जा रहल छी। जइ गाममे कुम्हार नञि हएत तइ गाममे बसि जाएब।’’
  कुम्हारक नाओ सुनितहि बटोही उठि कऽ बैसैत कहलखिन- ‘‘हमरो गाममे कुम्हार नै अछि। चलह, हमरे गाममे रहि जइहह।’’
  आशा देखि सोमन पुछलकनि- ‘‘ऐठामसँ कत्ते दूर अहाँक गाम अछि?’’
  ‘‘अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहीनिये अइठीनसँ अबै छी। गामे जाएब।’’
  बेर झुकैत पाँचो गोटे बिदा भेलाह। लछमीपुर पहुँचतहि बटोही रतीलाल फुलचनकेँ  कहलक- ‘‘भाइ, यएह हमर गाम छी।’’
  गाछी बँसबाड़ि देखि फुलचन पंडित मने-मन खुश! मने मन आकलन कएलनि जे जारनक अभाव कहियो नहि हएत। गाममे प्रवेश करितहि बीघा दुइयेक पोखरि देख फुलचन मने-मन तेँइ कएलनि जे नहि कतहुँ रहैक ठौर भेटत तँ पोखरिक महार तँ अछि। पोखरिक बगलेमे सभ क्यो रुकि जाइ गेलाह। रत्तीलाल आगू बढ़ि गेलाह।
  जहिना गाममे नट-किच्चककेँ अबितहि धिया-पूता देखए अबैत तहिना फुलचनो सभ तुरकेँ  देखए गामक धिया-पूता आबए लागल। गाममे कुम्हार अएबाक समाचार पसरल। थोड़े कालक बाद फुलचन पंडित बेटा सोमनकेँ हाथ पकड़ि कहलखि‍न- ‘‘बौआ, तूँ सभ एतै बैसह। हम कने गामक बाबू-भैया सभसँ  भेँट केने अबै छी।’’
  कहि फुलचन गाम दिशि बिदा भेलाह। इजोरिया पख रहै तेँ सूर्यास्त भेलोपर दिने जेकाँ लगै। जाधरि फुलचन घुरि कऽ अएबो नहि कएलाह तहिसँ  पहिनहि गामक पनरह-बीस टा नवयुवक पहुँच गेल। सबहक मनमे नव उत्साह रहै। किएक तँ एखन धरि जे अभाव कुम्हारक गाममे रहल ओ पूर्ति भऽ रहल अछि। जहिना आवश्यकताक वस्तु पूर्ति भेलासँ किनको मनमे खुशी होइ छै, तहिना फुलचनक अएलासँ  गामक लोकक मनमे खुशी रहै। पोखरिसँ थोड़े हटि कट्ठा तीनियेक परती छलै। सभ युवक विचारलक जे ओहि परतीपर बसाओल जाए। ताधरि गाम घुि‍र कऽ फुलचनो अएलाह। फुलचन दुनू बापुत परती देखलनि। परती देखि सोमन पिता दिशि घुमि बाजल- ‘‘कुम्हारक बसै जोकर परती अछि, मात्र पिऐबला पानिक दिक्कत अछि।’’
  तइपर पिता फुलचन पंडित जबाव देलनि- ‘‘एखन ने पानिक दिक्कत अछि मुदा जखन अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूरि अछि तखन दिक्कत किए रहत?’’
  घरारी पसन्द होइतहि हो-हा करैत युवक सभ बाँस काटए बिदा भेलाह। जे जेहन बाँसबला, तिनकामे तहि हिसाबसँ  बाँस काटि पच्चीसटा बाँस जमा केलनि। इहो दुनू बापुत संग दैत रहथिन। हाथे-पाथे सभ घरक काजमे जुटि गेलाह। रातिक बारह बजैत-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भऽ गेलैक।
प्रात भेने दुनू बापूत विचारलनि जे एक तँ नव गाम, तहूमे नव बाँस। काज तँ बहुत अछि। तेँ काजकेँ सोझरा कऽ चलए परत। रहै जोकर घर भलेहीं नहि भेल मुदा दिन कटै जोकर तँ भइये गेल। घर-आंगन बनबैसँ लऽ कऽ कारोबार धरिक काजमे हाथ लगबए पड़त। फुलचन सोमनसँ  पुछलखिन- ‘‘बौआ, मेरचासँ  कोन-कोन समान अनने छह?’’
  सोमन कहलक- ‘‘बाबू, सोचलहुँ जे आन गाममे लगले सभ कुछ थोड़े भऽ जाएत। तेँ चाक बनबैक शिला, तख्ता, फट्ठा, जौर, बेलक कील सभ किछु अनने छी।’’
  खुशीसँ गद-गद होइत फुलचनक मुँहसँ निकलल- ‘‘बाह-बाह। चाकक ओरियान तँ भइये गेलह। आरो की सभ अनने छह?’’
  ‘‘चकैठ, हथमैन, पिटना, पीरहुर, मजनी, छन्ना सेहो अनने छी।’’
  मुस्कुराइत फुलचन बाजल- ‘‘काजक तँ सभ किछु अछिए। आइए चाको बनबैमे हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरड़ि अनिहह। एक गोरे घरक लेबिया-मुनियामे हाथ लगा दहक। हमरा तँ समचे सभ ओड़िअबैमे समए बीति जेतह।’’
दस दिनक मेहनतिसँ रहै जोकर एकटा घर बनि गेलै। चाको सुखा गेल। जारनोक ओरियान भऽ गेलैक। चाक गारि, माटि बना सोमन चाक लग बैसल। जहिना उद्योगपतिकेँ नव कारखानाक उद्घघाटन दिन मनमे खुशी रहै छै, आइ तहिना सभ प्राणी फुलचनोकेँ  रहनि। हँसैत फुलचन पंडित बेटा दिशि देखैत बजलाह- ‘‘बौआ, जते सामान बनबैक लूरि अछि, सभ सामान बना, पका कऽ खरिहानमे पसारि, सौँसे गौवाँकेँ  हकार दऽ देखा देबनि। जिनगीक परीक्षा छी।’’
  आबा उघारि चारु गोटे खल लगा-लगा सभ वस्तु- कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पाण्डव, गणेश, लक्ष्मी, मटकूर, छाँछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहिबात, कोहा, फुच्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पातिल, तौला, मलसी, बसनी, उन्नैसमासी, कोही, लाबनि, कलश, कराही, रोटिपक्का, अथरा, कसतारा, लग्जोरी, धिया-पूता खेलैक जाँत, नादि, लोइट, माँट, टारा, टारी, बधना इत्यादि चारि-चारि खल पावनिक, बिआहक, उपनयनक, श्राद्धक, पोखरिक यज्ञ-कीर्तनक आ घरैलू काजक वस्तु सभ अलग-अलग सजा कऽ राखल। फुलचन दुनू बापूत जा गौवाँकेँ  देखैक हकार देलनि।
चारु प्राणी फुलचनकेँ अपना लूरिक ठेकान नहि छलन्हि ि‍कऐक तँ सभ काजक लेल एकबेर सभ समान कहियो नहि बनौने छलाह। मुदा आइ सभटा बना सभकेँ ई विश्वास भऽ गेलनि जे जहिना बड़का व्यापारिक दोकानमे अनेको किस्मक सौदा रहै छै तहिना तँ हमरो अछि!
  समए बीतैत गेल। अधिक बएस भेने दुनू प्राणी फुलचन शरीरसँ  कमजोर हुअए लगलाह। सोमनोकेँ  एकटा बेटा, एकटा बेटी भेलै। परिवार बढ़लै। खरचो बढ़लै।
  समए आगू मुँहे ससरैत गेल। दुनू प्राणी फुलचन मरि गेलाह। ....बेटीक बियाह सेहो सोमन कऽ लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुर्गापूजा देखए मात्रिक गेल। ओतहिसँ बौर गेल। माटिक बरतनक जगह द्रव्यक बर्तन सभ परिवारमे धीरे-धीरे बढ़ए लगलै। जहिसँ माटिक बर्तनक मांग कमए लगल। घटैत-घटैत माटिक बरतन परिवार छोड़ि देलक। रहि गेल मात्र पावनि, उपनयन, बि‍आह आ श्राद्ध।
अपन घटैत कारोबार आ टूटैत परिवारसँ दुनू प्राणी सोमन चिन्तित होअए लागल। आगूक जिनगी अन्हार लागए लगलै। कोनो रस्ते नहि देखाइ। सोचैत-बिचारैत सोमनक नजरि एकटा काजपर पड़लै। खपड़ा बनौनाइ। खपड़ापर नजरि पहुँचतहि मुस्कुराइत सोमन पत्नीकेँ  कहलक- ‘‘एकटा बड़ सुन्दर काज अछि। कमाइयो नीक आ काजो माटियेक।’’
अकचकाइत पत्नी कपली पुछलकनि- ‘‘कोन काज?’’
सोमन- ‘‘खपड़ा बनौनाइ।’’
कने काल गुम रहि कपली बाजलि- ‘‘थोपुआ खपड़ा तँ हमहूँ बना सकै छी मुदा नड़िया नै हएत।’’
जोर दैत सोमन बाजल- ‘‘हँ, हएत ! चाक परक भलेहीं नञि हूअए मगर मुंगरी परक किअए ने हएत।’’
  ‘‘हँ, से तँ हएत।’’
  दुनू प्राणी खपड़ा बनबए लगल। लोककेँ  बुझल नहि रहै तेँ अगुुरबार क्यो खोज नहि केलक। मुदा जखन एकटा भट्ठा लगौलनि तखन गामक लोक देखलखिन। खपड़ो नीक, पाको बढ़ियाँ। गिनतियेक हिसाबसँ खपड़ा बेचए लगल। बढ़िया आमदनी हुअए लगलनि।
  बढ़िया कारोबार चलल। मुदा सिमटिक एस्बेस्टस अबितहि खपड़ाक मांग कमए लगल। खपड़ा बनौनिहारकेँ  मंदी आबि गेलनि। ओना सोमनक परिवारो छोट रहै। मात्र दुइये गोटे परिवारमे रहै। मुदा तैयो गुजरमे कटमटी हुअए लगलै। फेर जिनगी भारी हुअए लगलै।
हँसी-खुशीसँ जीवन-यापन करैबला परिवार एहन स्थितिमे पहुँचि गेल जे साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत। दोसर कोनो लूरि नहि। अपन खसैत जिनगी देखि कपली पतिक मुँह दिशि तकैत बाजलि- ‘‘एना कते दिन दुख काटब ? जखन हाथ-पएर तना-उताड़ अछि आ काज करए चाहै छी तखन की अही गामकेँ  सीमा-नाङरि छैक? चलू एहि गामसँ।’’
  पत्नीक विचार सुनि सोमनक आँखि नोरा गेलै। किछु बजैक हिम्मते नहि होइ। मने-मन सोचए लागल जे जाहि लूरिक चलते एखन धरि जीलहुँ ओ लूरि आब मरि रहल अछि। दोसर लूरि तँ अछि नहि। की करब? असमंजसमे पड़ल पतिकेँ  देखि कपली बजलीह- ‘‘दुनियाँ बड़की टा छै। जतै पेट भरत ततै रहब। जहिना मेरचासँ आबि लछमीपुरमे एते दिन रहलौं तहिना अइ गाम छोड़ि दोसर गाममे रहब।’’
  पत्नीक विचारसँ सहमत होइत सोमन बाजल- ‘‘अहाँक विचार मानि लेलौं। अइ गामसँ चारिम दिन चलि जाएब। बीचमे जे दू दिन बाँचल अछि तइमे अहूँ आ हमहूँ गाममे टहलि कऽ सभकेँ जना दिअनु जे जहिना एक दिन हँसी-खुशीसँ छाती लगेलहुँ तहिना आब जा रहल छी। चुपचाप गामसँ चलि जाएब नीक नै हएत। गामसँ तँ चुपचाप ओ भगैत अछि जे अधलाह काज केने रहैत अछि।’’
  दुआरिए-दुआरिए दूनू प्राणी गाममे घुरि सभकेँ कहि देलकै- ‘‘गामसँ चलि जाएब।’’
  प्रात होइतहि दुनू प्राणी घरक सभ सामानक मोटरी बान्हि ओसारपर रखलक। भुखल पेट! सुखाएल मँुह! निराश मन! तेँ आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत।
  ओसारापर बैसल एक-दोसराक मँुहो देखैत आ कनबो करैत। दुनूक करेज छहोछीत भऽ गेल।
सबा बारह बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शान्त। साफ मेघ। घामसँ  तर-बत्तर, माथपर मोटरी, हाथमे वी.आइ.पी. बैग नेने सोमनक बेटा रामदत आंगन पहुँचल। माए-बापक दशा देखि छाती कॉंपए लगलैक। मेह जेकाँ आगूमे ठाढ़। सोगे दुनूक आँॅखि बन्न। बन्न आँखिसँ  नोर टघरैत ! दुनू अधीर। करेजकेँ थीर करैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू।’’
  बाबू शब्द कानमे पड़ितहि दुनू बेकतीक आँखि खुजलै। मुदा नोर टघरितहि रहै। किन्तु आब नोरक रुप बदलए लगल। एखन धरि जे नोर सोगसँ खसैत ओ स्नेहमे बदलि गेलै। अकचकाइत सोमनक मुँहसँ निकलल- ‘‘बौआ।’’
बिचहिमे झपटि कपली बाजलि- ‘‘बे ट-ट-अ-आ।’’
ओसारापर बैग-मोटरी राखि रामदत पिताकेँ गोड़ लगै लए झुकल की तहि बीच कपली उठि कऽ दुनू हाथे पजिया कऽ पकड़ि चुम्मा लैत पुनः बाजलि- ‘‘भाग नीक छेलौ बेटा जे हम सभ भेँट भेलियौ, नञि तँ तोँ कतऽ रहितेँ आ हम सभ कतऽ रहितौं.......!’’
माएकेँ गोड़ लागि रामदत मोटरी खोलि दू किलो भरिक रसगुल्लाक पोलीथिन, किलो भरि कटलेट, किलो भरिक बीकानेरी भुजियाक झोरा निकालि, घुसुका कऽ रखलक। दुनू प्राणीक भुखसँ जरल मन रहै। जहिना गाएक गौजुरा बच्चा माएक थन दिशि आँखि गड़ा देखैत रहैत, तहिना रसगुल्ला, भुजिया दिशि दुनूक नजरि एकाग्र भऽ गेलै। दुनूक लेल नव वस्त्र निकालि फुटा-फुटा रखलक। चमकैत स्टीलक थारी, लोटा, गिलास, बाटी एक भागमे रखलक। चाह बनबैक केटली, कप, छन्ना, आयरन, नारियल तेलक डिब्बा आरो-आरो सामान निकालि चद्दरिकेँ  झाड़लक। जहिना चुल्हिक आगिमे उपरसँ  थोड़बो पानि पड़लासँ उपर ठंढ़ापन अबै लगैत, तहिना दुनूक नजरि चीज-वस्तु देखि शीतल हुअए लगलै। एकदम स्नानोपरान्तक शीतलता जकाँ! सोमनक शीतल मनसँ  मधुर शब्द निकललै- ‘‘बच्चा गरमाएल छह। पहिने नहा लएह। तखन मन चैन हेतह।’’
  माए-बापक मँुह देखि रामदत बाजल- ‘‘बाबू हमरो भूख लागल अछि। पहिने कनी-कनी खा लिअ। पछाति नहाएब।’’
  कहि रसगुल्लाक पोलीथिनक गिरह खोलि दू बाकुट सोमनक आगू स्टीलक थारीमे आ दू बाकुट कपलीक थारीमे दऽ कटलेट, भुजियाक गिरह खोलि बाजल- ‘‘जते मन हुअए तते खाउ। नहाइक कोनो धड़फड़ी थोड़े अछि?’’
  अपनो मँुहमे रसगुल्ला दैत, बैग खोलि, मनी बैग निकालि रामदत सोमनक आगूमे देलकनि। रुपैआ देखि कपलीक मन टिकुली जेकाँ पहाड़पर चढ़ि गेल। धरतीकेँ गोड़ लगलनि।
  खाइत-नहाइत बेेर टगि गेलै। पछबरिया घरक छाहरि अधा आंगन पसरि गेल। घरक कोनमे जहिना मोथीक पुरना बिछान बिछौल छल तहिना बिछौले रहै। घरसँ बिछान निकालि कपली पछबरिया ओसार लगा बिछौलक। उपरसँ  नवका जाजीम बिछौलक। नवका सिरमा रखलक। तीनू गोटे बैसि गप-सप्‍प करए लगलाह। सोमन- ‘‘बौआ, तू बौर कोना गेलहक?’’
  मन पाड़ैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू हम बौरुलहुँ कहाँ ! मामा गाममे मुजफ्फरपुरक छलगोरिया दुर्गाक मुरती बनबैले आएल रहै। ओहो कुम्हारे रहए। तीन गोरे रहै। ओकर छोटका बेटा हमरे एतेटा रहै। ओकरासँ हमरा दोस्ती भऽ गेल। ओकरे संगे चलि गेलियह।’’
  बिचहिमे कपली टपकलीह- ‘‘रौ डकूबा, तोरा चिठियो-पुरजी नञि पठौल भेलौ।’’
  अपनाकेँ स्मरण करैत रामदत बाजल- ‘‘माए, काज सिखैमे सभ किछु बिसरि गेल रहियौ। तोरो सबहक हालत तँ बँढ़िये रहौ। तखन चिन्ते कथीक करितहुँ।’’
  सामंजस्य करैत सोमन- ‘‘जहिया जे दुख लिखल छल से भोगलहुँ। यएह तँ भगवानक लीला छिअनि। कखनो दुख तँ कखनो सुख।’’
रामदत- ‘‘बाबू एहन दशा भेलह कोना?’’
बेटाक बात सुनि सोमनक आँखि भरि गेल, उत्तर देलक- ‘‘बौआ, अखन धरिक जते लूरि-बुद्धि छलए से सभ पुरान भऽ गेल। नवका सिखलौं नै।’’
  पिताक बात सुनि रामदत नमहर साँस छोड़ि मुस्कुराइत कहलक- ‘‘बाबू, हमरा तँ छुट्टिये नै दैत रहए। बीस-बीस हजार रुपैआ मासमे कमाइ छी। तइपर सँ मूर्ति बनबौनिहारक कतार लागल रहैए।’’
  बिचहिमे कपली टोकलकनि- ‘‘बेटा, की सभ लूरि छौ?’’
  मुस्कुराइत रामदत कहए लगलनि- ‘‘माए, माटिसँ लऽ कऽ सिमटी धरिक मुरती, नाच-तमाशाक परदा, घर सभमे चित्र सभ बनबैक लूरि अछि।’’
  बेटाक बात सुनि सोमनक अहं जगलै। बाजल- ‘‘बौआ, जहन एते कमाइक लूरि छह, तहन नोकरी किए करै छह?’’
  मुस्कुराइत रामदत कहलकनि- ‘‘एते दिन जे नोकरी केलौं ओ नोकरी नञि भेल। साल भरि तँ माटिये सनैमे लागि गेल। साल भरि खढ़ बन्हैमे आ पहिल माटि लगबैमे चलि गेल। तेसर साल मुरती बनबैमे लागल। चारिम साल मुरतीक आँखि बनबैमे लागल। एहि साल पाँचम बर्ख, गुरु दैछना चुका अएलहुँहेँ। आब अपन कारोबार करब। जखने अपन कारोबार हएत तखने ने दू-चारि गोटे सिखबो करत!’’
  अपन मजबूरी देखबैत सोमन कहल- ‘‘बौआ, अपन चिन्ता जते शरीरकेँ नै खेलक तइसँ बेसी तोहर खेलक। किअए तँ हरदम मनमे नचैत रहए जे वंश अंत भऽ गेल। जाबे दुनू परानी छी ताबै धरि....। मुदा आइ सबुर भऽ गेल जे जाबे बीटमे बाँसक चढ़न्त रहै छै, ताबे उन्नैससँ बीस होइत जाइ छै मुदा निच्चाँ मुँहे होइते सरसरा कऽ कोपरो सुखए लगै छै। आशा भऽ गेल जे हमरो वंश एकसँ एक्कैस हएत!’’

बेटाकेँ आधुनिक मुर्तिकार रूपमे पाबि सोमन गद्-गद् भऽ गेल। हृदए अह्लादसँ भरि गेलै ! नजरि सहजहि बेटाक नजरिमे गड़ि गेलै। ध्यान बढ़ंत बाँसक बीटमे बिचरण करए लगलै...! मनमे भेलै जे बेटासँ  इहो नव गुण सीखत। एखनो ई दुनू व्यक्ति बहुतो काज कऽ सकैए।

श्याम सुन्दर शशि-कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह-

श्याम सुन्दर शशि, जनकपुरधाम, नेपाल। पेशा-पत्रकारिता। शिक्षा: त्रिभुवन विश्वविद्यालयसँ,एम.ए. मैथिली, प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। मैथिलीक प्रायः सभ विधामे रचनारत। बहुत रास रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। हिन्दी, नेपाली आऽ अंग्रेजी भाषामे सेहो रचनारत आऽ बहुतरास रचना प्रकाशित। सम्प्रति- कान्तिपुर प्रवासक अरब ब्यूरोमे कार्यरत।
कतारक मैथिल भेड़ा चरवाह-
कतारक सदरमुकाम दोहासँ लगभग एक सय किलोमीटर दूर जमालिया स्थित मरुभूमिक छातीपर बनाओल गेल भेड़ाक गोहियाक आगू ठाढ़ भऽ एक गोट युवक सिटी बजा रहल छल। महाभारतकालीन कृष्ण जकाँ। जनु अपन गोप आऽ गोपीकेँ लग बजेबाक उपक्रम कऽ रहल हो। मुदा एहि मरुभूमिमे ने गाई अएबाक कोनो सम्भावना छलै आऽ ने गोपी। मुदा बकड़ी आऽ भेड़ा धरि अवश्य आबि गेल ओकर सिसकारी सुनिकए। दिनभरि ५० डिग्रीक ताप छोड़ि स्वयं थकित सुरुज भगवान संध्या रानीसँ रसकेलि करबाक धुनमे पश्चिमाचलगामी वाट पकड़ि लेने छलाह। पश्चिमसँ आवएवला सेनुताएल प्रकाश मरुभूमिक वालुपर पड़ि मलिछाह आकृति बना रहल छल। मरुभूमि पिलिया ग्रस्त रोगी जकाँ बेजान देखना जाऽ रहल छल। पछिया हावा सांय सांय कऽ रहल छल। हावाक गतिसंग वालुक छोट-छोट कण उड़ि-उड़ि राहगीरकेँ घायल बना रहल छल। बूझि पड़ैत छल जे प्रलयके पूर्व संकेत हो। चारुकात वियावान मरुभूमि आऽ एहिमे उगल एक आध बबूरक पौध। हम बेर-बेर सोचैत रहैत छी जे धन्य बबूर, ऊँट आऽ सार्कदेशक दुखिया मजुरसभ जे एहि भूमिकेँ धरती होएबाक ओहदा प्रदान करैत छैक। अन्यथा...??

मुदा ओऽ युवक शान्त छल। एक क्षणक बाद सुरुज अस्त भऽ जएतै, सगर सन्सार अन्हार भऽ जएतै आऽ सयौ विगहामे पसरल मरुभूमिपर कारी रंगक चादर ओछा जाएत। ओऽ अन्हार होएबासँ पहिनहि अपना अधिनक भेड़ा आऽ बकड़ीकेँ गोहियामे घुसियावए चाहैत छल। कर्तव्य परायण मनुपुत्रक रूपमे अपन दायित्व निर्वाह करए चाहैत छल।
एहि तरहेँ अपन ईसारापर कृष्ण जकाँ भेड़ा-बकड़ीकेँ नचावएवला युवक के नाम छल महेन्द्र कापर। नेपालक सिरहा जिल्लाक कमलाकात भेड़िया गामक ई मैथिल युवक, विजुली, पिवाक पानि, सड़क आऽ स्वास्थ्यादि सुविधासँ विहीन एहि मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ एहिना भेड़ा वकरी चड़वैत अछि। महेन्द्र कापर मात्र नहि, एहि मरुभूमिक विभिन्न भागमे बनाओल गेल विभिन्न भेड़ा, बकड़ी आऽ ऊट बथान तथा लगाओल गेल वगैचामे हजारौं नेपाली, भारतीय, वंगलादेशी, श्रीलंकन आऽ सुडियन मजुरसभ काज करैत अछि। अपना सभ दिस एक गोट कहबी नहि छैक जे, “जएवह नेपाल, संगहि जएतह कपार”। तहिना ई युवक सभ अपन करम भोगि रहल अछि। ओऽ सभ अबैत काल जे दोहा देखने छल, चकमक विजुलीवत्ती देखने छल आऽ चिक्कन चुनमुन फोरलेन सड़क देखने छल से घुरैत काल फेर देखत। ओकरा सभक वास्ते दोहा सहर दिल्ली दूर छैक।

महेन्द्र जमालियाक एहि अन्कन्टार मरुभूमिमे गत एक वर्षसँ काज करैत अछि। ओकरा जिम्मामे दू सय भेड़ा आऽ बकड़ी छैक। हमरा सभकेँ देखिते ओकर आँखिमे विशेष प्रकारक चमक व्याप्त भऽ गेलै, मुखमण्डलपर खुशीक रेखा नाचए लगलैक। साँझ पड़ि रहल छैक ओकरा लालटेम नेसवाक छैक, रातुक खाना बनेवाक छैक आऽ खुला आकाशक नीचाँ तरेगन गनैत राति बितेवाक छैक। गत एक वर्षसँ महेन्द्रक ई दैनिकी बनि गेल छैक। ईजोरिया रातिक चानकेँ देखि ओऽ अतिशय प्रसन्न होइत अछि, “ई चान हमरो बाऊ आऽ माय आउर सेहो देखैत होतै नञि”? ओकर निश्चल प्रश्न हमरा भावुक बना देने छल।
ओऽ भेड़ा आऽ बकरीकेँ गोहियामे गोतैत अछि। पठरूसभकेँ दुध पियबैत अछि। चारा रखैत अछि आऽ चैन भऽ हमरा सभसँ गप्प करवा वास्ते बैसि जाइत अछि। ओऽ एक वर्ष पूर्व कतार आएल छल। मानव तस्करसभ ओकरा कहने रहैक जे वगैचाक काज छैक। ओऽ सोचने रहय जे फलफूलमे पानि पटाएव, रोपव उखारव आ रियाल कमाएव मुदा से भेलै नहि। ओऽ भेड़ा चरवाह बनि कऽ रहि गेल। असलमे महेन्द्र अपने निरक्षर अछि। ओकर कतार आगमनके उद्देश्य छलै गाममे घर बनाएव आऽ बेटा-बेटीकेँ बोर्डिंग स्कूलमे पढ़ाएव। मुदा ओकर एक वर्षक श्रमसँ ई संभव नहि भऽ पाओल छैक। एक वर्षमे तँ महाजनकेँ ऋणो नहि फरिछाओल छैक। एहि वास्ते ओकरा आओर दू वर्ष एहि मरुभूमिक वालुकेँ फाकय परतैक। अवैत काल दलाल ओकरासँ ७५ हजार रुपैया लेने रहैक। जे ओऽ महाजनसँ ऋण लऽ कऽ चुकता कएने छल।
जहन महेन्द्रक गप्पक बखारी खुजलै तँ फेर बन्द होएवाक नामे नहि लैक। ओकरा तँ ओहि गोहियामे राति बतैवाक छलै मुदा हमरा सभकेँ सय किलोमीटर दूर दोहा अएवाक छल। हमरा सभक धरफड़ीकेँ ओऽ अकानि गेल छल। कहलक सर, कहियोकाल अवैत जाइत रहब। भेड़ा बकड़ी संगे रहैत-रहैत ओहने भऽ गेल छी, देखियौ चाहो पानिक लेल नहि पुछलहुँ। आऽ कपड़ा लपेटल एकगोट पानिक बोतल आगाँ बढ़ा देलक। “हमरा सभक फ्रिज बुझू कि एयर कन्डीशन ईहे अछि”।

गर्मीसँ सुखाएल कण्डकेँ पानिसँ भिजाओल आऽ अपन गन्तव्य दिस आगाँ बढ़ि चललहुँ। लगभग दश किलोमीटर वाट तय कएलाक बाद हमरा लोकनि जमालिया नगरमे पहुँचलहुँ। मुसलमान धर्मावलम्बी सभक रोजा खोलवाक समय भऽ गेल रहै। सड़क कातमे बनाओल गेल चबुतरापर नाना प्रकारक व्यंजन साँठल जाऽ रहल छल। लोक विस्मील्लाह करवालेल तैयार छलाह। हमरा मोन पड़ल महेन्द्रके गोहियामे राखल खवुज (कतार सरकारक सस्ता दरक रोटी) आऽ प्याउजक धेसर। एसगर महेन्द्र एखन नून, मिरचाई आऽ तेल प्याउजक संग खवुज दकरि रहल हएत। एतए ओकरेद्वारा पोसल गेल खस्सीक विरयानीक स्वाद लऽ रहल अछि मालिक आउर।
दोहा,कतार, जमलिया।(साभार विदेह www.videha.co.in)

बोनिहारिन मरनी - जगदीश प्रसाद मण्डल



छोट-छीन गाम छतौनी। तीनिये जातिक लोक गाममे। साइये घरक बसतियो। छेहा बोनिहारक गाम। ओना पास-परोसक गामक लोक छतौनीकेँ प्रतिष्ठित गाम नहि बुझैत। किऐक तँ ओहि गाम सबहक लोकक विचारे प्रतिष्ठित गाम ओ होइत जहिमे छत्तीसो जातिक लोक बसैत। जाहिसँ समाजक सभ तरहक जरुरतक पूर्ति गामेमे होइत। मुदा से छतौनीमे नहि। तेँ छतौनी जमाबंदी गाम भऽ सकैत अछि, प्रतिष्ठित नहि। मुदा एहि विचारकेँ छतौनीक लोक मानै लए तैयारे नहि। छतौनीक लोकक कहब जे जहियासँ हमर गाम बनल तहियासँ ने कहियो अपनामे झगड़ा-झंझट भेल आ ने मारि-पीट। जहिसँ ने कहियो कियो कोट-कचहरी देखलक आ ने थाना-बहाना। ततबे नहि, तीनि जातिक लोक रहितहुँ सभ मिलि एकठाम बैसि खेबो-पीबो करै छी आ तीन जातिक तीनू देवस्थानोमे पूजो-पाठ आ परसादियो खाइ छी। सभ जातिक लोक संगे-संग कमेबो करै छी आ एक-दोसराकेँ, मौका-मुसीबत पड़लापर, संगो पूरै छी। आन-आन गामबला हमरा गामकेँ अहि दुआरे गाम नै मानैए जे ओ सभ बहरवैया छी आ हमरा सबहक पूर्वज अदौसँ  रहल अछि।
छतौनीक वासी सभ दिनसँ बोनिहारे नहि रहल अछि। पहिने ओकरो सभकेँ अपन-अपन खेत-पथार छलै। खेत-पथार गेलै कोना? एहि संबंधमे छतौनीक बूढ़-पुरान लोकक कहब छनि जे हमरा सबहक पूर्बज, रौदीक चलैत, खेतक बाकी मालगुजारी राज दरभंगाकेँ समएपर नहि दऽ सकलनि, तेहिसँ ओ सभ जमीन निलाम कऽ अबधिया, छपरिया हाथे बेचि लेलक। हमरा सबहक जमीनक मलिकाना हक खतम भऽ गेल। ओ अबधियो आ छपरियो राजमे नोकरी करैत छल जे एहि इलाकामे आबि जमीनो हथिया लेलक आ मुखियो सरपंच बनि मेनजनी करैत अछि। मुदा एकटा चलाकी ओ सभ जरुर केलक जे जेना अंग्रेज आबि सत्ता हथिऔलक तेना चलि नहि गेल, बल्कि मुगल जेकाँ बसि गेल।
  जहियासँ देश अजाद भेल आ सत्ताले भोट-भाँट शुरु भेल, तहियासँ ने एक्कोटा कोनो पार्टीक नेता भोट मंगैले एहि गाम आएल आ ने एक्को बेरि गौँआ भोट खसोलक। किएक तँ आइ धरि एहि गाममे भोटक बूथ बनबे ने कएल। तेँ नेतो किअए आओत ? गाममे ने चरिपहिया गाड़ी चलैक रास्ता छै आ ने सार्वजनिक जगह स्कूल, अस्पताल। जहिठाम भाषण-भुषण हएत। जहि गाममे छतौनीक बूथ बनैत ओहि गामक लोक सभ छतौनियोक भोट खसा लैत। छतौनीक लोकक जिनगियो छोट। ने पढ़ै-लिखैक झंझट, ने चोर-चहारक झंझट, ने रोग-व्याधिक झंझट। किएक तँ गामक सभ बुझैत जे जेकरा कपारमे विद्या लिखल रहत ओ डूबियो-मरि कऽ पढ़िये लेत। चोर-चहार एबे कथीले करत। रोग-बियाधिक लेल पूजो-पाठ आ झाड़ो-फूक अछिये। तहूसँ पैघ बात जे, जे एहि धरतीपर रहैले आएल अछि ओ जीबे करत। पानि, पाथर, ठनका ओकर की बिगाड़ि लेतै। आ जे नञि रहैबला अछि ओकरा फूलोक गाछपर साँप काटि लेतै आ मरि जाएत। तेँ की, छतौनीबलाकेँ भगवानपर बिसवास नै छै? जरुर छै। जँ से नञि रहितै तँ देवस्थानमे सालमे एक बेर एत्ते धुमधामसँ पूजा किअए करै अए? उपास किअए करैए? दसनमो स्थान -देवस्थान- आ अपनो-अपनो घरमे गोसाउनिक पीड़ी किअए बनौने अछि? साले-साल कामौर लऽ कऽ बैजनाथ किअए जाइए?
  सभ अभाव रहितहुँ छतौनीक लोक हँसी-खुशीसँ जीवन बितबैत अछि। अगर जँ कियो गाममे मरैत वा साँप-ताँप कटैत वा आगि-छाइ लगैत तँ सभ कियो दासो-दास भऽ लगि जाइत। पचास बर्खक मरनी सेहो तहिमे सँ एक। जे अपना आँखिसँ अपन पति, बेटा आ पुतोहूकेँ गाछक तरमे खून बोकरि कऽ मरैत देखने। आइ बेचारी पाँच बर्खक पोता आ आठ बर्खक पोतीक बीच आशाक संग जीबि रहल अछि। कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुरपर बनाओल चिड़ैक खोंता जेकाँ केश, आंगुर भरि-भरिक पीअर दाँत, फुटल घैलीक कनखा जेकाँ नाक, गाइयक आँखि जेकाँ बड़का-बड़का आँखि, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनिया आंगी फटलाक बाद कहियो देहमे आंगीक नसीब नहि भेल, बिना साया-डेढ़ियाक साड़ी पहिरने। यएह छी मरनी।

चारि साल पहिने सुबध, मनोहर आ तौनकी धान रोपए बाध गेल। जाधरि तौनकीकेँ दोसर सन्तान नहि भेल ताधरि मरनिये पति सुबध आ बेटा मनोहरक संग काज करए जाइत। धनरोपनी, धनकटनी, कमठाउन, रब्बी-राइ उखारै-काटैले संगे जाइत। पुतोहू –तौनकी- अंगनाक काज सम्हारैत। मुदा जखन दूटा पोता-पोती भेलै तहियासँ मरनी अंगनाक काज सम्हारए लागलि। अंगनोमे कम काज नहि। भानस-भात करब, पोता-पोती खेलाएब, खूँटा परक बाछीक सेवा करब। आने परिवार जेकाँ मरनियोक परिवार भरल-पूरल।
  दस आँटीक जोड़ा तीन-तीन जोड़ा बीआ उखाड़ि सुबध आ मनोहर पटैपर टंगलक आ राड़ीक जुन्ना बना तौनकी बीआक बोझ बान्हि माथपर लऽ कदबा खेत पहुँचल। कदबा एक दिन पहिने गिरहत करा देने। तेँ तीनू गोटेक मनमे खुशी होइत जे सबेर-सकाल रोपि कऽ चलि जाएब। आन दिन कदबे दुआरे अबेर भऽ जाइ छलै। मने-मन सुबध सोचैत जे बेरु पहर अपनो जे कट्ठा भरिक खेत अछि ओहो सभ तूर मिलि कऽ हाथे-पाथे रोपि लेब। कदबामे बीआ रखि सुबध आड़िपर बैसि, तमाकुल चुनबए लगल। मनोहर आ तौनकी खेतमे बीआ पसारए लगल। सौँसे खेत बीओ पसरि गेलै आ सुवधो तमाकुल खा लेलक। तीनू गोटे एक-एक आँटी खोलि खुज्जा पसारि एक-एक खुज्जा रोपैले वामा हाथमे रखलक। आड़िक कात पछिमसँ तौनकी बीचमे मनोहर आ पूबसँ सुवध पाहि धेलक। एक पाँती रोपि दोसर धेलक आकि पूब दिशि एक चिड़की मेघ उठैत देखलक। मेघक छोट टुकड़ी देखि ककरो मनमे पानिक शंका नै उठलै। कने-कने सिहकी सेहो चलए लगलै। जहिना-जहिना हवा तेज होइत जाइत, तहिना-तहिना करिया मेघक टुकड़ी सेहो उधिया-उधिया उपर चढ़ए लगलै। उपर चढ़ि-चढ़ि ओ टुकड़ी एक-दोसरमे मिलए लगल। मुदा पछिम दिशि रौद उगलै। कनिये कालक बाद सुरुज झपा गेल। हबो तेज हुअए लगलै। बिजलोका चमकए लगलै। बुन्दा-बुन्दी पानि पड़ए लगलै। जते मेघ सघन होइत जाइत तते पानियोक बुन्न जोर पकड़ैत। संगे बिजलोको बेसिआइल जाइत। घन-घनौआ बरखा हुअए लगल। पानिमे भीजै दुआरे तीनू गोरे दौड़ि कऽ आमक गाछ लग पहुँचल। खेतसँ बीघे भरि हटि कऽ आमक गाछ। खूब झमटगर। चारि हाथ उपरेमे दू फेंड़ भऽ गेल। सरही आम। गाछक पँजरेमे पछिमसँ तौनकी बैसलि आ पूबसँ सुवध आ मनोहर। तौनकी साड़ी ओढ़ि दुनू हाथक मुट्ठी बान्हि काँखमे लऽ लेलक। मुदा सुवधो आ मनोहरो छुछे देहे। गमछाक मुरेठा बान्हि लेलक। मुदा तैयो जाड़े दुनू बापूत थर-थर कपैत। नमहर-नमहर बुन्न सेहो देहपर खसै। सौँसे देहक रुइयाँ भुलकि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। मुदा की करत? कोनो उपाए नहि। पछिमो मेघ पकड़ि बरिसए लगल। जाहिसँ  दूर-दूर धरि बरखा हुअए लगलै। रहि-रहि कऽ मेघो गरजै आ बिजलोको चमकै। एक बेर खूब जोरसँ बिजलोका चमकलै। मुदा आन बेरक चमकलहासँ बिजलोकाक रंग बदलल। आन बेर पिरौंछ इजोत होइत जखनि कि एहि बेर लाल टुह-टुह। दुरकाल समए देखि तौनकी मने-मन खौंझा भगवानकेँ कोसैत जे कोनो काजक समए होइ छै। अखैन पानिक कोन काज छै। जहिना तगतगर लोक सदिखन बलउमकी करैत अछि तहिना ई टिकजरौना इन्द्रो भगवान करैए। अनेरे काजकेँ बरदा जाड़े कठुुअबैए। लोक सभ कहै छै जे देवता-पितरकेँ बड़का-बड़का आँखि होइ छै जे एक्के ठीन बैसल-बैसल सगरे दुनियाँ देखैए। से आँखि अखैन कतऽ चलि गेलै। देवियो-देवता गरीबे-गुरबाकेँ जान मारै पाछु लागल रहै अए। जन-बोनिहारक काज करैक दू उखड़ाहा होइए। भिनसुरका आ दुपहरिया। भिनसुरका उखड़ाहामे जँ एगारहो बजे पानि भेल वा कोनो बाधा भेल तँ गिरहत थोड़े बोइन देत। अगर जँ जलखै भऽ गेल रहलै तँ बड़बढ़िया नञि तँ जलखैइयो पार। यएह तँ ऐठामक चलनि छै। ई टिकजरुआ भगवान गिरहतेकेँ मदति करै छै।
  जाड़सँ कपैत सुवध मनोहरकेँ कहलक- ‘बौआ, सोचै छलौं जे आन दिन रोपैन करैमे अबेर भऽ जाइ छलै जइसँ अपन काज नञि सम्हरै छलै मुदा आइ सबेरे-सकाल रोपैन होइत तँ अपनो बाड़ीक खेत रोपि लइतौं। से सभ भंगठि गेल। कखैन पानि छुटत कखैन नै सेहो ठीक नहि। दुनू बापूत गप-सप्‍प करिते छल आकि तड़-तड़ा कऽ ठनका ओहि गाछपर खसल। जइठीनसँ दुनू डारि फुटल छलै तकरा चिड़ैत माटिमे चलि गेल। चिड़ा कऽ गाछ दुनू भाग खसल। एक फँाकक तरमे तौनकी आ दोसर फाँकक तरमे दुनू बापूत पड़ि गेल।
  पानि छुटल। सौँसे गाममे हल्ला हुअए लगलै जे बाधमे जे आमक गाछ छलै से खसि पड़लै। भरिसक ओहीपर ठनका खसलै। एक्के-दुइये लोक देखैले जाइ लगल। कातेमे ठाढ़ भऽ भऽ लोक देखैत। गाछोपर आ गाछक निच्चोमे जमीनोपर तते घोरन पसरि गेलै जे लोक गाछक भीर जाइक हिम्मते ने करैत। मुदा जीवठ बान्हि करिया गाछक जड़ि देखै बढ़ल। घोरन तँ खूब कटै मुदा तइयो हिम्मत कऽ करिया जड़ि लग पहुँचल। ठनकाक आगिक चेन्ह ओहिना दुनू फाँकमे  छल। जड़ि लग ठाढ़ भऽ ओ हिया-हिया देखए लगल। देखैत-देखैत मनोहरक टाँगपर नजरि पड़लै। टाँगपर नजरि पड़िते हल्ला करए लगल जे एक गोरे तरमे पिचाइल अछि। दौड़ि कऽ अबै जाइ जा, एकरा बहार करह? करियाक बात सुनि चारु भरसँ लोक बढ़ल। देखैत-देखैत तीनू गोरेपर नजरि पड़लै। हल्ला करैत करिया कुड़हरि अनए घरपर दौगल। तीनू खून बोकरि-बोकरि मरल। मुदा तैयो सभ बचा-बचा कऽ डारि काटए लगल। डारि काटि सील उनटौलक तँ तीनू थकुचा-थकुचा भेल। पहिने तँ कियो नै चिन्हलक, किऐक तँ तीनू बेदरंग भऽ गेल। मुदा भाँज लगौलापर पता चललै जे दुनू बापूत सुवध कक्का छी आ पुतोहु छिऐ।
  अखन धरि मरनी, अंगनेमे दुनू बच्चाकेँ खेलबैत। गौरिया आबि कऽ कहलकै- ‘दादी तोरे अंगनाक सभ, गाछक तरमे दबि कऽ मरि गेलौ।’
  गौरियाक बात सुनितहि मरनी अचेेत भऽ खसि पड़ल। दुनू बच्चा सेहो चिचियाए लगलै। मरनीकेँ अचेत देखि अलोधनी मुँहपर पानि छीटि बिअनि हौँकए लागलि। कनिये कालक बाद होश भेलै। होशमे अबितहि मरनी फेर बपहारि कटए लगल।
  बच्चाकेँ कोरामे लऽ मरनीक संग अलोधनी देखैले बिदा भेलि। गाछ लग पहुँचते तीनू गोरेकेँ मुइल देखि मरनी ओंघरनियाँ कटए लागलि। ओंघरनियाँ कटैत देखि करिया पजिया कऽ पकड़ि मरनीकेँ कात लऽ गेल। मरनीक दशा देखि सभ सांत्वना दिअए लगल। मुदा मरनीक करेज थीरे ने रहै। विचित्र स्थितिमे पड़ल। एक दिशि परिवारकेँ नाश होइत देखए तँ दोसर दिशि दुनू बच्चाक मुँह देखि कनी-मनी आशा मनमे जगै।
  चारि साल पहिलुका नहि, आब नव मरनीक जन्म भेल। जहिना आगिमे तपैसँ पहिने सोनाक जे रंग रहैत तपलापर जहिना चमकि उठैत तहिना। ओना समाजोक बेवहार जे पहिलुका छलै अहूमे बदलाव एलै। कियो खाइक बौस दऽ जाइत तँ कियो बच्चो आ मरनि‍यो लए नुआ-बस्तर। जखन ककरो भाँजमे कोनो काज अबै तँ ओ मरनियोकेँ संग कऽ लैत। जहिना परिवारमे बूढ़ आ बच्चाक प्रति जे सिनेह होइत, ओहने सिनेह मरनीक प्रति समाजोक बीच हुअए लगलै। अपनो जीबैक आशा आ बच्चोक, मरनीकेँ नव स्फूर्ति पैदा केलक। एते दिन मरनीक हाथमे पुरने खेतीक औजार टा रहै छलै ओ आब बढ़ि कऽ दोबर भऽ गेल। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, कोदारिक संग-संग हथौरी, गैंचा सेहो आबि गेलै।
  समए आगू बढ़ल। देशक विकासक गति सेहो, बहुत तेज नहि मुदा किछु गति तँ जरुर पकड़लक। गाम-गाममे बान्ह-सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल, अस्पताल सेहो बनए लगल। जाहिसँ खेतिहर बोनिहारक सेहो काज बढ़ल। मरनियो छिट्टामे माटि उघब, पजेबा उघब, गिट्टी फोड़ब, सुरखी कुटब सीखि लेलक। जाहिसँ बेकारी मेटाएल। रोज कमेनाइ रोज खेनाइ धरि गरीबो पहुँचि गेल। भलेहीं जिनगीमे बहुत अधिक उन्नति नञि एलै मुदा जीबैक आशा जरुर जगलै। मुदा ई सभ काज छतौनीमे नहि, पास-पड़ोसक आन-आन गाममे हुअए लगलै। जहिमे छतौनियोक बोनिहार सभ काज करए लगल।
छतौनियोक दिन घुरलै। सात किलोमीटर पक्की पीच सड़क जे एन.एच.सँ लऽ कऽ रेलवे स्टेशनकेँ जोड़ैत, छतौनिये होइत बनैक शुरु भेल। जहियेसँ ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाक’ छतौनी होइत बनैक चरचा भेल तहियेसँ  छतौनीक लोकक मनमे खुशी अबए लगलै। गामक लोकक तँ ओहन दशा नहि जे बस, ट्रक कीनैक विचार करैत। मुदा तैयो एते बात जरुर एलै जे बरसातमे जे घरसँ बहराएब कठिन छलै ओ आब नै रहतै। किछु गोटेक मनमे ई बात जरुर होइत जे एते दिन बिना जूत्तो-चप्पलक काज चलैत छल, से आब नै चलत। आड़ि-धुर माटिपर चललासँ, बेसीसँ बेसी काँट-कुश गरैत छल मुदा पीच भेने शीशाक टुकड़ी, लोहाक टुकड़ी सेहो गरत। जाहिसँ पएरक नोकसान बेसी हएत। मुदा फेर मनमे अबै जे एते दिन कम आमदनी रहने जुत्ता-चप्पल नै कीनि पबै छलौं से आब नै हएत। नञि बेसी तँ एक्को जोड़ा जरुरे कीनि लेब। जैसँ पएरमे बेमाइयो ने फटत।
प्रधानमंत्री योजनाक सड़क बनए लगल। मुदा जते आशा बोनिहार सभकेँ छलै तते नै भेलै। किएक तँ माटिक काज शुरु होइते रंग-बिरंगक गाड़ी सभ पहुँचए लगल। जे माटिक काज बोनिहार करैत ओ ट्रेक्टर करए लगल। ओना काजक गति तेज रहै मुदा बोनिहारक बेकारी बरकरारे रहलै। सड़कपर माटि पड़िते रौलर आबि सरियाबए लगल। खेनाइ-पीनाइ छोड़ि धियो-पूतो आ जनिजातियो भरि-भरि दिन देखते रहैत। ओना बूढ़ो-पुरान देखैत मुदा घरक चिन्ता खीचि कऽ काज दिशि लऽ जाइत। पनरहे दिनमे सातो किलोमीटर सड़कपर माटिक काज सम्पन्न भऽ गेलै। एकदम चिक्कन, उज्जड़ धप-धप। घर एते ऊँच सड़क बनि गेल।
माटिक सड़क बनिते बड़का-बड़का ट्रक चिमनीसँ ईटा खसबए लगल। ऐँह, अजीब-अजीब ट्रको सभ। एते दिन छह-पहिये ट्रक टा गामक लोक देखने मुदा एहि सड़कक बनने दस पहियासँ लऽ कऽ अट्ठारह पहियाबला ट्रक सभकेँ सेहो देखलक। तीनिये दिनमे सातो किलोमीटरक ईंटा खसा देलक। मुदा ईंटा पसारैक काज तँ इंजन नहि करत। ओ तँ लोके करत। मुदा ओहिक लेल तँ अनुभवी माने एक्सपर्ट लोकक जरुरत हएत। जे छतौनीमे नहि। तेँ बाहरेसँ अनुभवी मिसतिरी आओत! मुदा तेहेन बड़का ठीकेदार सड़क बनबैत जे अनेको सड़कक काज एक संग चलबैत। एक्के दिन तते अनुभवी मिसतिरी ईंटा पसारै लऽ आएल जे सभकेँ बुझि पड़लै जे दुइये दिनमे सातो किलोमीटर ईंटा पसारि देत। मुदा ईंटा उघैले तँ मजदूर चाहिऐ। पहिले दिन छतौनीक बोनिहारकेँ काज भेटलै। ईंटा पसरए लगल। धुरझाड़ काज चलए लगल। छतौनीक सभ बोनिहार खुशीसँ काज करए लगल। तहि बीच ईंटापर पसारैले फुटलाहा ईंटा ट्रकसँ अाबए लगल। दोहरी काज देखि छतौनीक बोनिहारक मन खुशीसँ नाचए लगल। किएक तँ गिट्टी फोड़ैले गामेक बोनिहारकेँ काज भेटतै। मुदा ठीकेदारक मुनसी, अपने खाइ-पीबै दुआरे सस्ते दरसँ गिट्टी फोड़ैक रेट लगा देलक। एक ट्रेक्टर पजेबा फोड़ैक दर साठिये रुपैया दैले तैयार भेल। एक-दू दिन तँ बोनिहार लोक गिट्टी फोड़ब बन्न केलक मुदा पेटक आगि मजबुरन सभकेँ लऽ गेलै। मरनी सेहो गिट्टी फोड़ैए लागलि। एक ट्रेक्टर गिट्टी फोड़ैमे बेचारीकेँ चारि दिन लगैत। मुदा की करैत?
एहि सड़कसँ पहिने जे सड़क बनै ओ रिआइत-खिआइत रहि जाइ। माटिक काज भेलापर साल-दू साल ईंटा बैसैमे लगै। जाहिसँ माटि ढ़हि-ढ़ूहि कऽ उबड़-खाबड़ बनि जाए। बड़का-बड़का खाधि सड़कपर बनि जाइ। तहूमे तीन नंबर पजेबा फुटि-भाँगि कऽ गरदा बनि जाइत। गामक धियो-पूतो उठा-उठा खेत-पथारमे फेकि दैत। कोठीक गोरा बनबैले स्त्रीगण सभ निकहा ईंटा उठा-उठा लऽ जाइत। मुदा अइ बेर से नै हएत। दुइये मासमे सड़क बनबैक शर्त ठीकेदारकेँ अछि। जाबे बरखा खसत-खसत ताबे सड़क बनि जएबाक छैक। पचास बर्खक मरनी जे देखैमे झुनकुट बूढ़ि बूझि पड़ैत। सौँसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जेकाँ मुँह। खैनी खाइत-खाइत अगिला चारु दाँत टूटल। गांगी-जमुनी केश हवामे फहराइत। तहूमे सड़कक गरदासँ सभ दिन नहाइत। मुदा तइओ मरनी अपन आँखि बचैने रहैत। जखन पुरबा हवा बहै तँ पछिम मुँहे घुरि कऽ गिट्टी फोड़ैए लगैत आ जखन पछवा बहए लगैत तँ पूब मुँहे घुरि जाइत। बीच-बीचमे सुसताइयो लैत आ खैनियो खा लैत। मुदा तैयो ओकर मुँह कखनो मलिन नै होए। किएक तँ हृदएमे अदम्य साहस आ मनमे असीम बिसवास सदिखन बनल रहैत। तेँ सदिखन हँसिते रहए।
भिनसुरके उखड़ाहा। करीब नअ बजैत। पूब मुँहे घुरि मरनी गिट्टी फोडै़त। तहि बीच पच्चीस-तीस बर्खक सुगिया माथ उघारने, छपुआ बनारसी साड़ी आ ओही रंगक आंगी पहिरने, घुमौआ केश सीटि जुट्टी लटकौने, ऐँड़ीदार चमड़ौ-चप्पल आ मोजा लगौने, मुँहमे सौ नम्बर पत्ती देल पान खेने, डोलचीमे नूनक पौकेट, कड़ू तेलक शीशी, मसल्लाक पुड़िया आ साबुन रखि हाथमे लटकौने आबि कऽ मरनीक लग ठाढ़ भऽ गेल। मरनीक मेहनत आ बगए देखि दिल खोलि मने-मन हँसए लागल। मरनी गिट्टी फोड़ैमे मस्त। किएक किम्हरो ताकत! सुगियाक हृदएक खुशी मुँहसँ हँसी होइत निकलए चाहैत। मुदा मुँहक पानक पीत ठोरक फाटककेँ बन्न केने। तेँ पानक पीत फेकब सुगियाकेँ जरुरी भेलै। जइ पजेबाक ढ़ेरीपर बैसि मरनी गिट्टी बनबैत ओहि ढ़ेरीपर सुगिया भरि मुँहक पीत फेकि देलक। पीतक दू-चारि बुन्न मरनीक देहोपर पड़लै। देहपर पड़िते ओ उनटि कऽ तकलक। टटका पीत चक-चक करैत। कनडेरिये आँखिये मरनी सुगियाक मुँह दिशि तकलक। सुगियाकेँ पान चिबबैत देखि मरनीक मनमे आगि पजड़ि गेलै। पजेबाक ढ़ेरी देखलक। सौँसे थूक पड़ल। मने-मन सोचलक जे आब केना गिट्टी फोरब। ढ़ेरियो आ देहो अँइठ कऽ देलक।
  आँखि गुड़ारि कऽ मरनी सुगियाकेँ कहलक- ‘गै रनडिया, तोरा सुझलौ नै जे ढेरीपर थूक फेकलेँ?’
  गरीब मरनीक कटाह बात सुनि सुगिया तमकि कऽ उत्तर देलक- ‘तोरे बान्ह छिऔ जे हम थूक नै फेकब।’
  सुगियाक बोलकेँ दबैत मरनी बाजलि- ‘एतेटा बान्ह छै, तइमे तोरा कतौ थूक फेकैक जगह नै भेटिलौ जे ऐठाम फेकलेँ।’
  सुगिया- ‘जदी एतै फेकलिऐ तँ तू हमर की करमे?’
  मरनी- ‘की करबौ। आँइ गै निरलज्जी, तोरा लाज होइ छौ जे सात पुरखाकेँ नाक-कान कटौलही। जेहने कुल-खनदान रहतौ तेहने ने चाइल चलमे।’
  सुगिया- ‘अपन देह-दशा नै देखै छीही?’
  मरनी- ‘की देखबै। ई देह बोनिहारनिक छिऐ। तोरा जेकाँ की हम कहियो बमैबला छौँड़ा सेने तँ कहियो डिल्लीबला छौँड़ा सेने बौआइ छी। एक चुरुक पानिमे डूमि कऽ मरि जो। तीमन चिक्खी नहितन। जहिना सात घरक तीमन चिक्खै छैँ तहिना सातटा मुनसा देखै छैँ। हमर पड़तर सातो जिनगीमे हेतौ। जेकरा संगे बाप हाथ पकड़ा देलक, सहि-मरि कऽ तै घरमे छी। छुछुनरि कहीं कऽ। आगि लगा ले अइ फुललाहा देहमे।’
  मरनीक बातसँ सुगिया सहमि गेलि। मनमे डर पैसि गेलै जे हो न हो कहीं मारबो ने कराए। मुँह सकुचबैत, मूड़ी गोति बिदा भेलि। सुगियाकेँ जाइत देखि मरनी साड़ीक खूँटसँ तमाकुल-चून निकालि चुनबए लागलि। मुदा तैयो मन असथिर नञि भेलै। मूड़ी उठा-उठा सुगियो दिशि देखै आ मने-मन बजबो करए ‘देह केहेन सीटने अछि, उढ़ढ़ी। जेना रजा-महराजाक बोहू हुअए। हाथ-पएरमे लुलही पकड़ने छनि जे कमा कऽ खेतीह। जेहने छुछुनरि छौरा सभ तेहने छौरी सभ।’
तमाकू खा मरनी ईंटा फोडै़ले घुमल आकि दादी-दादी करैत पोता दौगल आबि दुनू हाथे दुनू जाँघ पकड़ि ठाढ़ भऽ गेल। पाछूसँ पोतियो एलै। पोताकेँ कोरामे उठा मुँहमे चुम्मा लऽ पोतीकेँ कहलक- ‘दाइ, बौआकेँ रोटी नै देलही। दुनू गोरे चलि जाउ, मोरामे रोटी रखने छी, लऽ कऽ दुनू गोरे खाए लेब। हम अखैन काज करै छी। कनीकालमे आबि कऽ भानस करब।’
पोता-पोती, आंगन दिशि बिदा भेल। पूब मुँहे घुरि कऽ मरनी गिट्टी फोड़ए लगल। चारिटा बन्दूकधारी बड्डी-गार्डक संग सड़कक ठीकेदार उत्तरसँ दछिन मुँहे सड़क देखैत जाइत। आगू-आगू ठीकेदार पाछु-पाछु बन्दूकधारी। ठिकेदारक नजरि मरनीपर पड़ल। मरनीपर नजरि पड़िते ठिकेदारक डेग छोट-छोट हुअए लगल। ठिकेदारक आँखि मरनीपर अटकि गेल। डेग तँ आगू मुँहे बढ़बैत मुदा आँखिक ज्योति हृदएमे ढुि‍क कऽ हृदएकेँ हड़बड़बै लगलै। मनमे अन्हर-तूफान उठए लगलै। जाहिसँ मने-मन विचारए लगल जे जेकरा कमाइपर हमरा चारिटा बड्डी गार्ड अछि, करोड़ो-अरबोक आमदनी अछि, तेकर ई दशा छैक। ओ तँ हमर ओहन समांग अछि जे कमासुत अछि, ओहन तँ नहि जे ऐश-मौजक जिनगी बना कमेलहे सम्पत्तिकेँ भोगैत अछि। मुदा अँटकल नहि। आगू मुँहे बढ़िते रहल। किछु दूर आगू बढ़लापर जेना मरनीक आत्मा आगूसँ रोकि देलकै। बिचहि सड़कपर ओ ठीकेदार ठाढ़ भऽ गेल। ठाढ़ भऽ एकटा सिपाहीकेँ कहलक- ‘ओइ गिट्टी फोड़िनिहारिकेँ कने बजौने आउ?’
  ठीकेदारक बात सुनि एकटा सिपाही मरनी दिशि बढ़ल। मरनी लग जा ओहि सिपाहीकेँ कहलक- ‘मालिक बजबै छथुन। से कने चल?’
  गिट्टी फोड़ब छोड़ि मरनी उनटि कऽ सिपाही दिशि तकलक। सिपाहीकेँ देखि मने-मन सोचै लगल जे ने हम कोनो मेमलामे फँसल छी आ ने कोनो बैंकक करजा नेने छिऐ, तखैन किअए हमरा सिपाही बजबए आएल। मन सक्कत कऽ कऽ कहलक- ‘तूँ नै देखै छहक जे अखैन हम काज करै छी। जेकर बोइन लेबै ओकर काज नै करबै। अखैन जा। काजक बेरि उनहि जेतै तब ऐबह।’
  मरनीक बात ठीकेदारो आ सिपाहियो सुनैत। एक-दोसरकेँ देखि आँखि निच्चाँ कऽ लिअए। मुदा ठीकेदारक मन पीपरक पात जेकाँ डोलैत। कखनो मरनीक इमानदारीपर मन नचैत तँ कखनो ओकर अवस्थापर। जहि देशक श्रमिक एते श्रममे बिसवास करैत अछि ओहि देशक विकास जँ बाधित अछि तँ जरुर कतौ नै कतौ संचालनकर्ताक बेइमानी छैक। ई बात मनमे अबिते ठीकेदार अपना दिशि घुरि कऽ तकलक, तँ अपन दोख सामने आबि ठाढ़ भऽ गेलै।
  सिपाही कड़कि कऽ मरनीकेँ  कहलक- ‘नञि जेबही तँ पकड़ि कऽ लऽ जेबौ ?’
  सिपाहीक गर्म बोली सुनि मरनी कहलक- ‘तोहर हम कोनो करजा खेने छिअह जे पकड़िकेँ लऽ जेबह। अपन सुखलो हड्डीकेँ धुनै छी, खाइ छी।’
  मरनीक बात सुनि सिपाहियोक मन उनटए-पुनटए लगलै। एक दिशि मालिकक आदेश दोसर दिशि मरनीक विचार। आखिर, एहेन लोकक बीच एहेन सक्कत विचार अबैक कारण की छै? अनका देखै छिऐ जे सिर्फ सिपाहीक बरदी देखि डरा जाइत अछि, भलेहीं ओ सरकारक सिपाही नहियो रहए। मुदा हमरा तँ सभ कुछ अछि तैयो अइ बुढ़ियाकेँ डर नै होइ छै। फेर मनमे एलै जे हम किछु छी तँ नोकर छी मुदा ई किछु अछि तँ स्वतंत्र बोनिहारिन। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र श्रमिक। जे देशक आधार छी। आखिर देश तँ एकरो सबहक छिऐ।
  सिपाहीकेँ ठाढ़ देखि ठीकेदारे पाछू ससरि कऽ मरनी लग आएल। मरनियो सभकेँ  देखैत आ मरनियोकेँ सभ। ठीकेदार मरनीक आँखि देखैत। आँखिमे सुरुजक रोशनी जेकाँ प्रखर ज्योति। ललाटसँ आत्म-विश्वास छिटकैत। मधुर स्वरमे ठीकेदार पुछलक- ‘चाची, अहाँक परिवारमे के सभ छथि?’
  ठिकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक आँखिमे नोर अबए लगलै। मन पड़ि गेलै अपन पति, बेटा आ पुतोहुक मृत्यु। टघरैत नोरकेँ आँचरसँ पोछि बाजलि- ‘बौआ, हमर घरबला, बेटा आ पुतोहु ठनकामे मरि गेल। अपने छी आ पिलुआ जेकाँ दूटा पोता-पोती अछि।’
  ठिकेदार- ‘बच्चा सभ स्कूलो जाइए?’
  ‘नै। एक तँ गाममे इस्कूल नै छै। तहूमे पहिने गरीब लोकक धिया-पूताकेँ पेट भरतै तब ने जाएत। ने भरि पेट अन्न होइ छै आ ने भरि देह वस्त्र, ने रहैक घर छै, तखन इस्कूल कना जाएत।’
  मरनीक बात सुनि ठीकेदार सहमि गेल। मने-मन सोचए लगल जे आँखिक सोझमे देखै छिऐ ओ झूठ कोना भऽ सकैत अछि। एत्ते भारी काज केनिहारक देहपर कारी खट-खट कपड़ा छै, तोहूमे सइयो चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तैपर एते भारी हथौरी पजेबापर पटकैत अछि। ठिकेदारक मन दहलि गेलै। जहिना अकास आ पृथ्वीक बीच क्षितिज अछि, जाहि ठाम जा चिड़ै-चुनमुनी लसकि जाइत अछि, तहिना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि गेल। जेना सभ कुछ मनक हरा गेलै। शून्न भऽ गेलै। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछुक। मरनीसँ  आगू की पूछब से मनमे रहबे ने केलै। साहस बटोरि पुछलक- ‘भरि दिनमे कते रुपैया कमाइ छी?’ ठिकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक मनमे झड़क उठलै। बाजलि- ‘कते कमाएब ! जेहने बैमान सरकार अछि तेहने ओकर मनसी छै। चारि दिनमे एकटा पजेबाक ढ़ेरी फोड़ै छी तँ तीन-बीस रुपैया दैए। अइसँ तीन तूरक पेट भरत? भरि दिन ईंटा फोड़ैत-फोडै़त देह-हाथ दुखाइत रहैए मुदा एकटा गोटियो कीनब से पाइ नै बँचैए।
ठिकेदारक आँखिमे नोर आबि गेलै। मनुष्यता जागि गेलै। मुदा ई मनुष्यता कते काल जिनगीमे अँटकतै? जिनगी तँ उनटल छै। जाहिमे मनुष्यता नामक कोनो दरस नहि छैक।

जितेन्द्र झा कोशी सन बेदर्दी कोइ ने

जितेन्द्र झा
कोशी सन बेदर्दी कोइ ने
मिथिलाक लाखो जनताके विपत्तिक बाढि देब बला कोशी नियन्त्रणलेल एखन धरि कएल प्रयास अपर्याप्त रहल बताओल गेल अछि । ५० बर्ष पहिनेसं कोशीक नामपर खर्च कएल करोडो रुपैयाक बास्तविकताक पोल खुलि गेल अछि । कोशी बाढिपर दिल्लीमे आयोजित कार्यक्रममे वक्ता सभ कोशी बांन्ह टुटलाक बाद आब दोषारोपण क क बचबाक प्रयास कएल जा रहल कहलनि । मैथिली लोकरंग मन्च सेप्टेम्बर १२ तारिखक' कोशी सन बेदर्दी कोइ नई नामक कार्यक्रम आयोजन कएलक अछि । कार्यक्रममे कोशीक बाढिपर बजनिहार वक्तासभ कोशी नदी नियन्त्रण लेल सरकारक प्रयासके आलोचना कएल गेल । नाटककार मदहेन्द्र मलंगिया कोशीक रस्तासं खेलबाड कएल गेलाक कारण एहन भयावह स्थिति उत्पन्न भेल कहलनि । 'मात्र कोशीके बदनाम कएल जारहल अछि' मलंगिया आगु कहलनि 'कोशीके बुझब आबश्यक अछि । तहिना मैथिली इ पत्रिका विदेहके सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर कोशी बाढिके सरकारी लाचारीके संज्ञा देलन्हि ।कोशीक तटबन्ध टूटत से बुझितो सरकार मुकदर्शक बनल रहल हुनक आरोप रहनि ।मधेपुराक शान्ति यादव अपन आंखिक आगु कोशीक विकराल रुप देखने बतबैत पर्यावरण विद सेहो एकरा कत्तेक बुझि सकल अछि से प्रतिप्रश्न कएलनि ।
कोशीप्रति ओतुक्का जनताके सुसुचित करबाक आवश्यकता पर भारती जोड दैत कहलनि 'बाढिप्रति संवेदनशील बनाएब आबश्यक अछि ।
बिछियाक आर्तनाद
पेटमे अन्न नईं, राहतलेल आकाशमे टकटकी लगौने आंखि, आङमे लत्ताकपडाक अभाव आ भोक्कासी ...। सभ अपन अपन पीडा सुना रहल अछि । पेटके राक्षस शान्त नई भेलाक बाद ओ त सौंसे आदमीएके खा लेलक । नवजात शिशु कत्तेक काल भुक्खे रहैत, ओकरा कोशीक कोरमे छोडिदेल गेल ।
कोशी सन बेदर्दी जगमे कोइ नइ लघुनाटकमे किछु एहने देखल गेल । मैलोरंगक आयोजनमे दिल्लीमे सेप्टेम्बर १२ क' मन्चित लघुनाटकमे कोशीक बिभीषिका देखएबाक प्रयास कएल गेल । नाटकमे राहतलेल मारामारी कएनिहार जनता भुखसं मृत्युवरण करबाक बाध्यताके जीवन्त रुपमे प्रस्तुत कएल गेल। पीडितके रोदनसं दर्शक भावविह्वल बनल छल । मैलोरंग सेप्टेम्बर १२ सं १४ तारिखधरि मैथिली लोकरंग महोत्सव स्थगित कएलक अछि । कोशी क्षेत्रमे घुरैत मुस्कानकसंग महोत्सव आयोजन हएत मैलोरंग जनौलक अछि ।
संघर्षक कठिन बाट
मैथिली साहित्यकार व्रजकिशोर बर्मा मणिपद्मक स्मृतिमे नयां दिल्लीमे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन कएल गेल । एहि कार्यक्रममे मैथिली नाटक मन्चन हएबाक संगहि मिथिलांगन संस्थाक स्मारिका सेहो विमोचन कएल गेल । मिथिलांगन साहित्यकार मणिपद्मक स्मृतिमे 'उगना हल्ट' नामक मैथिली नाट्क मन्चन कएने छल ।

ब्रज किशोर बर्मा मणिपद्म मैथिली साहित्यक चर्चित नाम अछि । लोक साहित्यक संरक्षणमे हुनक योगदान उल्लेखनीय मानल जाईत अछि । इएह योगदानक सम्मान करैत हुनका मैथिलीको वाल्टर स्काट सेहो कहल जाईत छन्हि । लोरिक, राजा सल्हेश, नैका बन्जारा जेहन लोकगाथाक संरक्षण करबामे हुनक योगदान सराहनीय रहल कार्यक्रममे कहल गेल । मिथिलांगन एहिसं पहिने सेहो मणिपद्मक स्मृतिमे विभिन्न कार्यक्रम आयोजन करैत आएल अछि । तहिना त्रैमासिक मिथिलांगन पत्रिका सेहो प्रकाशनके निरन्तरता देल गेल संस्था जनौलक अछि । उगना हल्टक लेखक कुमार शैलेन्द्र आ निर्देशक संजय चौधरी छैथ । नाटकमे दिल्लीमे संघर्षरत मैथिली रंगकर्मीक जीवनक कटु सत्य देखएबाक प्रयास कएल गेल अछि । उगना हल्ट बिहारक मधुवनी जिलाक एक रेल्वे स्टेशनको नाम अछि , यद्यपि नाटकके परिवेश नयां दिल्लीक रंगकर्मीक अडडा मण्डी हाउसपर केन्द्रित अछि । स्थानीय पण्डौल आ सकरी बीचक स्टशन अछि उगना हल्ट । नाटकमे मैथिली भाषा संस्कृतिक संरक्षणलेल अपस्यांत नवतुरियाक कथा ब्यथा समेटल गेल अछि । वएह युवाक संघर्षक इतिबृत मे नाटक घुमैया । कियो संगीतकार बन' चाहैत अछि त कियो गीतकार, ककरो फ़िल्ममे हिरो बनबाक धुन सबार छइ त ककरो हिरोइन । अन्ततः कडा संघर्षक बाद सभ अपन लक्ष्य प्राप्त करबामे सफ़ल होइत अछि । नाटकमे संगठने शक्ति अछि आ एहिसं सफ़लता पाबि सकैत छी से पाठ सिखएबाक प्रयास कएने छैथ नाटककार । छिरिआएल आ दिग्भ्रमित जंका बुझाईत पात्रक अभियान अन्तमे सफ़ल होइत अछि । अन्ततः नाटक सुखान्त अछि ।
साहित्य केन्द्रित पुस्तक मेला
नया दिल्ली । विद्यापतिक गीत, हरिमोहन झाक कथा, लोकोक्ति संग्रह, पत्रपत्रिकाक इतिहास, गोरा(अनुवाद), इत्यादि । ई कोनो मैथिली पुस्तकालयके सूची नईं, १४ म्‌ दिल्ली पुस्तक मेलामे लागल किताबक नाम अछि ।

महिला लेखनके केन्द्र बनाक' मेला आयोजन कएल गेल छल । जाहिमे लगभग तीन सय प्रकाशक स्टल लगौने रहए । मुदा मेलामे मैथिली भाषामे मात्र दु तीनटा किताब मैथिली साहित्यमे महिला लेखनके सबुत बनल छल । मेलामा पाकिस्तान, अमेरिका, चिन, स्पेन , दुबई आ इरानक प्रकाशक सहभागी छल। मेलामे मैथिली भाषाक पुस्तक सेहो राखल रहए । साहित्य विद्यापति आ हरिमोहन झाक किताव बेश बिकाएल छल । ओना साहित्य एकेडमीक स्टलपर मैथिलीक दर्जनसं बेशी किताब नई छल । तें पाठकलग किताब चुनके अबस्था नई रहए । महिला लेखनके केन्द्र बनाओल गेल मेलामे साहित्य एकेडमीसं प्रकाशित महिला लेख संग्रहित एकटा किताब मेलाक उद्देश्य पुरा करैत छल । मेला मैथिलीक संकीर्ण प्रकाशन अबस्थाके प्रतिबिम्बित क रहल छल । प्रवासमे रहनिहार मैथिली भाषीके साहित्य एकेडमीक स्टल मैथिली किताबके दर्शन धरि करादेने रहए । मैथिली साहित्यिक खोराक चाहनिहारके पुस्तक मेला थोर बहुत सहायक छल । संख्यात्मक हिसाबसं मैथिली भाषाक पोथी थोरबे छ्ल । मेलामा साहित्यसंगहि कला-संस्कॄतिक अदभुत संगम सेहो प्रस्तुत कएल गेल छल । प्रख्यात महिला साहित्यकारक गैर साहित्यिक किताब सेहो राखल गेल छ्ल । महिला स्रष्टाक रचनासंगहि हुनकर सभहक आत्म बृतान्त सेहि उपलब्ध कराओल गेल छल । एहि मेलामे लगभग १५ करोड भारतीय रूपैयाको कारोबार हुएबाक अनुमान कएल गेल अछि । मेला सेप्टेम्बर 1 तारिखसं ७ तारिखधरि चलल छल।

दूटा पाइ - जगदीश प्रसाद मण्डल



हलहोरिमे फेकुओ दिल्लीक रैलीमे जाइक विचार केलक। परसू सौझुका गाड़ी सभ पकड़त। दिल्लीक लड्डूक बात फेकुआकेँ बुझल। तेँ खाइक मन रहै। अबसर भेटल छलै। किएक तँ ने गाड़ीमे टिकट लागत आ ने संगबेक कमी। मात्र चारि दिनक खेनाइ टा अपन खर्च। गाड़ीमे लोक बेसी खाइतो नहि अछि किएक तँ पेशाब-पैखानाक समस्या रहै छै। फेकुआ माएकेँ कहलक- ‘‘माए, परसू दिल्ली जेबउ। बटखरचाक ओरियान कऽ दिहेँ?’’
  माए बाजलि- ‘‘की सभ लेबही?’’
  फेकुआ कहलक- ‘‘दू सेर चूड़ा लऽ कऽ डाॅक्टर सहाएब नागेंद्र जी चलैले कहलखिनहेँ। हमरो दू सेर चूड़ा कूटि दिहेँ।’’
  फेकुआक बातक विश्वास माएकेँ नहि भेलै। मने-मन सोचलक जे दू सेर चूड़ा तँ एक दिनमे लोक खाइत अछि। चारि दिन कोना पुरतै? फेर मनमे एलै जे दू सेर चूड़ो आ चारि-दुना आठटा रोटियो पका कऽ दऽ देबै। कहुना भेलै तँ रोटी सिद्ध अन्न भेलै।
गाड़ी अबैसँ पहिनहि जुलूसक संग फेकुआ स्टेशन पहुँचल। जिनगीक पहिल दिन फेकुआ गाड़ीमे चढ़त। प्लेटफार्मपर भीड़ देखि फेकुआक मन घबड़ेबो करै आ उत्साहो जगै जे एत्ते लोक चढ़त से हेतै आ हमरा बुत्ते की नहि चढ़ि हएत। निरमली-सकरीक बीच छोटी लाइन। गाड़ियो छोटकिये। मुदा सकरीसँ दिल्लीक लेल गाड़ियो बड़की आ लाइनो बड़की। गाड़ीमे चढ़ि फेकुआ सकरी पहुँचल। दिल्लीक गाड़ी लगले रहै। हाँइ-हाँइ कऽ निरमलीक गाड़ीसँ उतरि दिल्लीवाली गाड़ीमे सभ चढ़ल। गाड़ी खुजल।
ओना सकरीसँ दिल्ली जाइक लेल चौबीस घंटा लगैत। मुदा आइ से नहि भेल। चालीस घंटामे पहुँचल। मुदा चालीस घंटा कोना बीतल से फेकुआ बुझबे ने केलक। हलहोरियेमे पहुँचि गेल। ने एक्को बेर खेलक आ ने पानि पीलक। मुदा तैयो भुख बुझिये ने पड़ए। गाड़ीसँ उतड़ै काल फेकुआ खिड़की देने प्लेटफार्म दिशि तकलक, जेरक-जेर सिपाही घुमैत। मुदा फेकुआक नजरि कतौ नहि अँटकि, मोटका सिपाहीपर अँटकल। ओकर मनही पेटपर नजरि गेलै। तइ परसँ छअ आंगुर चाकर ललका बेल्ट। जे बेर-बेर निच्चाँ ससरैत। चानि‍ परसँ पसीनाक टघार। दस किलोक बन्दुक कान्हमे लटकल। मुदा तखने नागेन्द्र जी सेहो अपन छबो संगीक संग हाथसँ सभकेँ उतड़ैक इशारा दैत। धड़फड़ा कऽ फेकुओ उतड़ल।
प्लेटफार्म टपि जहाँ फेकुआ मुसाफिर खाना प्रवेश करए लगल आकि ममिऔत भायपर नजरि गेलै। ममिऔत भाय रतना चरिपहिया गाड़ीक ड्राइवर। अपना मालिककेँ गाड़ी पकड़बैले आएल। भायपर नजरि पड़ितहि फेकुआ गोर लगलक। गोर लागि लालकिला मैदान दिसक रास्ता धेलक। पाछूसँ झटकि कऽ आगू बढ़ि रतना फेकुआसँ घरक कुशल पूछलक। कुशलक जबाब नहि दऽ फेकुआ कहलक- ‘‘काल्हि साँझ धरि लाल किला मैदानमे रहब तेँ ओतै अबिहह। अखैन नै रुकबह।’’
  ‘‘कनी चाहो पीबि ने ले?’’
  ‘‘नै अखैन कुछो नै पीबह।’’
फेकुआ बढ़ि गेल। मुदा रतनाकेँ पाछू घुमैक डेगे ने उठै। फेकुए दिशि तकैत। मने-मन विचारए लगल जे हो न हो काल्हि भेँट नहि हुअए। ओत्ते लोकमे के कत्तऽ रहत तेकर कोन ठीक। तहूमे सौझुका बात कहलक। दिल्ली छिऐ। कोन ठीक जे बिजलीक इजोत रहतै की नहि। एत्ते लोकमे तँ दिनोमे अन्हरायले रहत। एक्को दिन मेजमानियो ने करौलिऐ। गाममे दीदी सुनत तँ की कहत ? ओ की कोनो दिल्लीकेँ दिल्ली बुझैत हएत। ओ तँ गामे जेकाँ बुझैत हएत। जहिना गाममे सभकेँ सभ चिन्है छै तहिना। मुदा ई तँ दिल्ली छी। भाड़ाक एक कोठरीमे सोहर गाओल जाइत छैक आ दोसरमे कन्नारोहट होइ छै। विचित्र स्थितिमे रतना पड़ि‍ गेल। आइ धरि रतनाक बुद्धिपर एहन भार कहियो नहि पड़ल। एकाएक मनमे एलै जे कौल्हुका छुट्टी लऽ कऽ भोरे फेकुआक भेँट करब। भेँट भेलापर लालकिला, जामा मस्जिद देखा देबै।
  दोसर दिन भोरे रतना फेकुआक भेँट करै बिदा भेल। लाल किला मैदान पहुँचते भेँट भऽ गेलै। भेँट होइतहि दुनू भाइ गामेक बसिया रोटी खा पानि पीलक। भरि दिन संगे, रैली समाप्त कऽ दुनू गोटे डेरापर आएल। पैघ सेठक ड्राइवर रतना, तेँ डेरो नीक। सभ सुविधा। मुदा रतनाक डेरासँ फेकुआक मनमे खूब खुशी नहि भेलै। मन पड़ि गेलै माइक ओ बात जे सदिखन बजैत- ‘‘अनकर पहीरि कऽ साज-बाज छीनि लेलक तँ बड़ लाज।’’ अपना जएह रहए ओहिसँ सबुर करी। मुदा माइयक बात फेकुआक मनमे बेसी काल नहि अँटकल। किएक तँ तीन दिनसँ नहाएल नहि छल। जहिसँ देहमे लज्जतिये ने बुझि पड़ै। रतनाकेँ कहलक- ‘‘भैया, पहिने हम नहेबह। बिना नहेने मन खनहन नै हएत। ओना ओंघियो लागल अछि। तेँ नहा कऽ खेबह आ भरि मन सुतबह।’’
फेकुआकेँ रतना बाथ रुम देखा देलक। बिजली जरैत। पानि चलैत बाथ रुम देखा रतना गैस चुल्हि पजारि भानस करए लगल। भरि मन फेकुआ नहाएल। मन शान्त भेलै। मनमे उठलै जखन दिल्ली आबि गेलहुँ तँ किछु लैये कऽ जाएब। रतना लग आबि बैसल। भानसमे देरी देखि रतना कहलकै- ‘‘बौआ देखही, ई दिल्ली छिऐ। ऐठाम लोक सोलह-सोलह घंटा खटैत अछि। दरमाहाक संग ओभरटाइमोक पाइ भेटै छै। मुदा जिनगी जीबैक लुरि नहि रहने सभ चलि जाइ छै। ने गामक कर्जसँ मुक्ति होइ छै आ ने अही ठाम चैनसँ रहैत अछि। भुतलग्गु जेकाँ सदिखन बुझि पडै़त छै। तोरा एहि दुआरे कहि दै छिऔ जे तूँ अपन छोट भाए छियेँ।’’
  रतनाक बात सुनि कने-काल गुम रहि फेकुआ कहलक- ‘‘भैया, तूँ सभ तरहे पैघ छह। जखन तोरा लग छी तँ तोँही ने हमर नीक-बेजाए बुझबहक।’’
  फेकुआक बातसँ रतनाकेँ अपन जिम्माक भार बुझि पड़लै। बाजल- ‘‘देखही बौआ, अखन जे कहलिऔ से स्टील फैक्ट्रीक स्टाफक बात कहलिऔ। मुदा सभ एहने अछि सेहो बात नहि छै। एहनो लोक अछि जे अपन मेहनत आ लुरिसँ गरीब रहितो अमीर बनि गेल। अपने इलाकाक ढ़ोरबा छी। जेकरा हम तँ ढ़ोरबे कहै छिऐ मुदा ओ ढोढ़ाइ बाबू बनि गेल। जखन गामसँ आएल तँ बौआ-ढहना कऽ चारि दिनक बाद ऐठीन आएल। ओकरा शैलूनमे नोकरी लगा देलिऐ। किछु दिन तँ काज करैमे लाज होए। किएक तँ ओ धानुक छी। मुदा किछुए दिनक पछाति तेहेन हाथ बैसि गेलै जे नौओ कऽ उन्नैस करए लगल। अपनो खूब मन लगए लगलै। दरमहो बढ़ि गेलै। तीन सालक बाद जेना ओकरा ऐठीनसँ मन उचटि गेलै। सोचलक जे जखन लुरि भऽ गेल अछि तखन कतौ कमा कऽ खा सकै छी। से नहि तँ गामेक चौकपर दोकान खोलब। अपना जँ दू पाइ कम्मो हएत तइसँ की, समाजक उपकार तँ हेतै। सएह केलक। ले बलैया, गामक लोक कियो ठाकुर तँ कियो नौआ तँ कियो हजमा कहए लगलै। घरक जनिजातिकेँ नौआइन कहए लगलै। सभसँ दुखद घटना तखन भेलै जखन कथा-कुटुमैती आ जातिक काजसँ अलग कएल गेलै। मुदा ओहो कर्म-योगी। गामकेँ प्रणाम कऽ अपन परिवारक संग दिल्ली शहर चलि आएल। वाह रे वनक फूल, ऐठाम आबि कऽ अपन शैलूनक कारोबार ठाढ़ कऽ लेलक। छह टा स्टाफ रखने अछि। बहिनीक बिआह इंजीनियरसँ केलक। हमहूँ बिआहमे रहिऐ।’’
  फेकुआ बाजल - ‘‘हमरो कोनो लाज-सरम नै हएत। जे काजमे लगा देबह, हम पाछु नै हटबह।’’
  रतना- ‘‘परसू रवि छिऐ। हमरो छुट्टी रहत। ताबे दू दिन अरामे कर।’’
  फेकुआ- ‘‘हमरा ओते सुतल नीक नै लगतह। चलि जेबह बुलैले।’’
  रतना- ‘‘रौ बुड़िबक! गाममे लोक खिस्सा कहै छै जे फल्लां तेहेन काबिल छै जे एक्के पाइमे बेचि लेतउ। मुदा अइठीन सभ काबिले छै। तैं देखबिही जे अइठीन सभसँ पैघ कारबार मनुक्खेक खरीद-बिक्रीक छैक। देहाती बुझि कोइ ठकि कऽ बेचि लेतउ। कहतौ जे हवा-जहाजक नोकरी धड़ा देबउ आ चलि जेमए आन देश।’’
  रतनाक बात सुनि फेकुआ क्षुब्ध भऽ गेल। मुदा मनमे एलै जे जेना हम बेदरा रही तहिना भैया कहैए। मुदा किछु बाजल नहि। दम साधि कऽ रहि गेल।
तीन दिनक उपरान्त फेकुआ कपड़ा सिलाइक दोकानमे काज शुरु केलक। दू हजार रुपैया दरमाहा। भिनसर छअ बजेसँ राति नअ बजे धरिक डयूटी। बीचमे एक बेरि अधा घंटा जलखै करैले आ एक घंटा खाइ बेर छुट्टी। फेकुआक मनमे उठल जे ड्यूटी तँ बीसो घंटा कऽ सकै छी मुदा सुतैक जे आठ घंटा छै से कना पुरत। मुदा फेर मनमे एलै जे जखन दू पाइ कमाए चाहै छी तखन तँ सभ सुख-भोग कमबए पड़त। दोकानमे आठटा कारीगर। आठो नोकरे। फेकुआ अनारी, तेँ दोकानक झाड़-बहारसँ काज शुरु केलक। कपड़ा काटब आ सिलाइ मशीन चलौनाइ सेहो कने-कने सीखए लगल।
दुइये माए-बेटा फेकुआ। दस साल पहिनहि बाप मरि गेल। अपने दिल्ली धेलक आ माए गाममे। मुदा माइयो थेहगरि। पुरुखे जेकाँ बोनि-बुत्ता करैत। नोकरी होइतहि फेकुआकेँ माए मन पड़लै। माइये नहि गामो मन पड़ल। मन पड़ल गामक स्मृति। माइक ममता जगि मनकेँ खोरए लगलै। मनमे उठए लगलै- परदेशियाक परिवारमे गेटक-गेट कपड़ा.....राशि-राशिक चीज-बौस.. रेडियो, घड़ी, टी. वी, मोबाइल इत्यादि। ककरा नहि नीक वस्तुक सेहन्ता होइ छै। मुदा ओहन सिहन्ते की जेकरा पुरबैक ओकातिये ने रहै। दू हजार महीना रुपैआक गरमी फेकुआक मनमे तरे-तर चढ़ि गेल। कोना नहि चढ़ैत? मुदा आमदनियेक गरमी चढ़ल, खर्चक पानि परबे ने कएल। सोचलक जे सभसँ पहिने माएकेँ चिट्ठी लिखि जना दिऐ।
आठ दिनक बाद फेकुआ रतनाकेँ कहलक- ‘‘भैया, हमरा तँ लिखल-पढ़ल नै होइए। मुदा जखन नोकरी लागि गेल तँ माएकेँ जनतब देब जरुरी अछि। किएक तँ ओकरा होइत हेतै जे कत्तऽ बौआइ-ढ़हनाइए। रतनोक मनमे जँचल। वी. आइ. पी. बैगसँ पोस्ट-कार्ड निकालि रतना चिट्ठी लिखैले तैयार भेल। पुछलक- ‘‘बाज की सभ दीदीकेँ लिखबीही?’’
फेकुआ लिखबए लगल-
स्थान- दिल्ली
ता.- ०५.०६.२००७
माए,
गोर लगै छिऔ
भगवानक दया आ तोरा सबहक असीरवादसँ तेहेन नोकरी भेटल जे कहियो मनमे नै आएल छल। दू हजार रुपैआ महीनाक तलब। अपना कते खर्च हएत। जे उगड़त से मासे-मास पठा देबउ। बेङबा कक्काकेँ कहिअनि जे चिमनीपर जा कऽ ईंटाक दाम बुझि अबैले। पहिने घर बना लेब। अपना चापा-कलो नै छौ, सेहो गड़ा लेब। घरक आगू जे मलिकाबाक चौमास छै, ओहो कीनि लेब।
तोहर फेकुआ

सात बजे भिनसर। मेघौन समए। कखनो कऽ सुरुज देखि पड़ैत आ फेर झपा जाइत। झिहिर-झिहिर पुरबा हबा चलैत। पान-छअ गोटेक संग फेकुआक माए रामसुनरि धन-रोपनी करए बिदा भेलि। किछुए आगू बढ़लापर डाक-प्यूनकेँ देखलक। मुदा आन स्त्रीगण जेकाँ रामसुनरि नहि जे दिनमे दू बेर मोबाइलसँ तीन पन्नाक चिट्ठीे आ तइ परसँ जे समदिया भेटल ओकरा दिया समाद पठौत। मनमे कोनो हलचल नहि। रामसुनरिक आगूमे आबि हँसैत डाकप्यून कहलक- ‘‘काकी, फेकुआक चिट्ठी एलौहेँ।’’ कहि झोरासँ निकालि पोस्ट कार्ड देलक। छबो स्त्रीगण डाकप्यूनकेँ चारु भागसँ घेरि कऽ ठाढ़ भेलि। हाथमे पोस्ट-कार्ड अबितहि रामसुनरिक मन बिहाड़िमे उड़ैत ओहि सुखल पात जेकाँ जे सरंगोलिया उठि अकासमे उड़ैत, तहिना उड़ि गेल। जिनगीक पहिल पत्र। मनमे एलै जे पहिने ककरोसँ पत्र पढ़ा ली। ओना डाकप्यून लगमे सँ चलि गेल। मुदा तेकर अफसोस नहि भेलै। किएक तँ जाधरि प्यून लगमे छल ताधरि पत्र पढ़ेबाक विचार मनमे आएलो नहि छलैक। फेर मनमे एलै जे काज कामै नै करब। अखन खूँटमे बान्हि कऽ रखि लै छी आ जखन निचेन हएब तखन पढ़ा लेब। सएह केलक।
गोसाँइ डुबैत रामसुनरि निचेन भेलि। निचेन होइतहि चिट्ठी पढ़बै लऽ श्याम ओहिठाम बिदा भेलि। श्यामोक घर लगे। पोस्ट-कार्ड हाथमे लऽ श्यािम सत्यनारायण कथा जेकाँ पढ़ए लगल। मुदा दोसरे पाँती- दू हजार रुपैआ महिना तलब- मे रामसुनरि ओझरा गेलि। मने-मन सोचए लागलि जे छौँड़ाकेँ घरक सोह एलै। बुद्धियो फुटैक उमेर भेल जाइ छै। आब कहिया चेतन हएत। अगिला साल तक बिआहो कइये देबै। असकरे राकश जेकाँ अंगनामे रहै छी। लगले विचार बदलि गेलै। बुदबुदाए लागलि- कोना लोक कहै छै जे मसोमातक बेटा दुइर भऽ जाइ छै। विचारमे डूबल रामसुनरि। तहि बीच श्याम बाजल- ‘‘सभ बात बुझलिऐ ने काकी?’’
  श्यामक पुछबसँ रामसुनरिक भक्क खुजल। बाजलि- ‘‘बौआ, चिट्ठी पढ़ल भऽ गेलह। की सभ छौड़ा लिखने अछि?’’
  काकीक मनक बात नहि बुझि श्याम खौंझा गेल। मुदा किछु बाजल नहि। चिट्ठीकेँ निच्चाँमे रखि श्याम ओहिना मुँहजबानिये कहए लगलनि। मुदा पोस्ट-कार्डकेँ निच्चाँमे राखल देखि बेचारी रामसुनरिकेँ भेलै जे अपने दिशिसँ कहैए। जाहिसँ विश्वासे ने भेलै। मुदा झगड़ो करब उचित नहि बुझलक। किएक तँ बेटाक पहिल चिट्ठी छी तेँ अशुभ व्यवहार नीक नहि।
दोसर दिन एकटा पोस्टकार्ड कीनि रामसुनरि चिट्ठी पढ़बैयो आ लिखबैयो लेल सोहन ऐठाम गेलि। दुनू पोस्टकार्ड- लिखलहो आ सौदो- रामसुनरि सोहनकेँ दैत कहलक- ‘‘बौआ, पहिने पढ़ि कऽ सुना दएह। तखन लिखियो दिहह।’’
  पत्र पढ़ि कऽ सोहन सुना देलकनि। समाचार सुनि रामसुनरिक मन खुशीसँ उत्साहित भऽ गेलै। बाजलि- ‘‘बौआ आब चिट्ठी लिखि दियौ। सोहन चिट्ठी लिखए लगल-
परमानपुर
ता. ०३.०७.२००७
फेकू।
असीरवाद।
अखन हम अपने थेहगर छी तेँ हम्मर चिन्ता जुनि कर। रहैले घरो अछिये। एक घैल पानि इसकूल बला कल परसँ लऽ अबै छी वएह भरि दिन चलैत अछि। तेँ पानियोक दिक्कत नहिये अछि। नहाइले धारो आ पोखरियो अछि। कहियो-काल बरखोमे नहा लै छी। तेँ अइ सभले तूँ चिन्ता किए करै छेँ? अखन खाइ-खेलाइक उमेर छौ। तेँ कमा कऽ जे मन फुड़ौ से करिहेँ। अगिला साल धरि अबिहेँ, बिआहो कऽ देबउ। असकरे अंगनामे नीक नै लगैए।
माए, रामसुनरि‍

साल भरि बीति गेल। जहिना गाममे रामसुनरि अपना काजमे हेरा गेलि तहिना दिल्लीमे फेकुओ। साले भरिमे फेकुआ कपड़ा सिलाइक कारीगर बनि गेल। अपना देहक कपड़ा-लत्ता कीनैत-कीनैत फेकुआक सालो भरिक दरमाहा सठि गेल। माइक जिनगी तँ जहिनाक तहिना रहल मुदा फेकुआक जिनगीमे बदलाब आएल। दुब्बर-दानर फेकुआ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल। कपड़ा सिआइक लुरि भेने आत्मबलो मजबूत भेलै। मुदा गामक जिनगी आ दिल्लीक जिनगीक बीचक संघर्ष फेकुआक मनमे चलितहि रहल।
रवि दिन। रतनो आ फेकुओक छुट्टी रहै। सुति उठि दुनू ममियौत-पिसियौत विचारलक जे साल भरिसँ बगेरी नहि खेलहुँ। से नहि तँ आइ बगेरिये आनब। तहि बीच रोडपर देखलक जे पुलिसक गाड़ी इम्हरसँ ओम्हर कऽ रहल छै। दुनू भाँइकेँ कोनो भाँजे नहि लगै। कोठरीसँ निकलि रतना चाहबलासँ पुछलक। चाहबलासँ भाँज लगलै जे महल्लासँ एकटा जुआन लड़की आ एकटा सेठक बेटाक अपहरण रातिमे भऽ गेलै। समाचार सुनि दुनू भाँइ डरा गेल। बगेरीक विचार छोड़ि गामक गप-सप्‍प करए लगल।
  रतना बाजल- ‘‘बौआ, तोरा साल लगि गेलह। एक बेर गाम जा सभक भेँट केेने आबह।’’
  गामक नाम सुनितहि फेकुआक मन उड़ि कऽ दोसर दुनियाँ पहुँचि गेलै। मन पड़लै- चिमनीक ईंटा....चापाकल....घरक आगूक चौमास। मन गामक सीमापर अटकि गेलै। सीमा परसँ अंगना पहुँचैक साहसे ने होए। किएक तँ बाटेपर माएकेँ ठाढ़ भेल देखए। की कहैत हएत माए ? साल भरि भऽ गेलै, ने एक्कोटा पाइ पठौलक आ ने एक्को खण्ड साड़ी। कहियो काल जे अस्सक पड़ैत हएत तँ के दवाइयो आनि कऽ दैत हेतै। पौरुकाँ जे चिट्ठी आएल, तइ दिनसँ दोसर चिट्ठियो ने आएलहेँ। हमहूँ तँ नहिये पठौलिऐ। छुच्छे चिट्ठिये लिखने की हेतै। मने-मन बुढ़िया सरापैत हएत। कहैत हएत जे छौंड़ा ढ़हलेलक ढ़हलेल रहिये गेल। मुदा हमहीं की करब ? छुच्छे हाथे गामे जा कऽ की करब ? टिकटो जोकर पाइ नञि अए। चिन्ता आ सोगसँ फेकुआक मन दबा गेल। कोनो बाटे ने सुझैत। मनक भीतर बिरड़ो उठि गेलै। बिरड़ोक हवामे फेकुआक मन सोंगक तरसँ निकलि गेल। मनमे एलै जे गाम तँ गाम छी। जहिठाम लोक माघक शीतलहरी आगि तापि कऽ काटि लैत अछि। बिना कम्मल-सीरकक जाड़ बिता लैत अछि, गाछ तर जेठक रौद काटि लैत अछि। मुदा  दिल्लीमे से हएत ? साल भरिक कमाइ साल भरिक मौसमक अनुकूल कपड़ेमे चलि गेल। नहि लैतहुँ तँ सेहो नहि बनैत। लेलहुँ तँ गाम छुटि गेल। जहिना घनघोर बादलक फाँटसँ सूर्यक रोशनी छिटकैत, तहिना फेकुओक मनमे भेल। रतनाकेँ कहलक- ‘‘भैया, एकटा चिट्ठी लिखि दएह।’’
  लगेमे रतनाकेँ सभ कुछ छलै। पोस्ट-कार्ड निकालि लिखैले तैयार भेल। फेकुआ लिखबए लगल-
दिल्ली
ता. ११.०८.२००८
माए,
गोड़ लगै छिऔ।
मनमे बहुत छल हेतौ जे तोरो बेटा दिल्लीमे नोकरी करैत छौ। मुदा सभ हरा गेल। सिर्फ एक्केटा चीज बँचल जे ऐठाम–-दिल्लीसँ, ओइठाम-गाम धरि जीबैक रस्ता धरा देत। तेँ खुशी अछि। हाथ खाली अछि। गाम कोना आएब?
फेकुआ

  चारिये दिनमे चिट्ठी माएक हाथ पहुँचल। चिट्ठी हाथमे अबितहि रामसुनरि निङहारि-निङहारि देखए लगलीह। छौँड़ा कतौ अछि जीबैत तँ अछि। बेटा धन छी। कतौ रहह। आब तँ फुटि कऽ जुआन भऽ गेल हएत। जहिना चाह-पान खा-पी बड़का लोकक धोधि फुटि जाइ छै, तहिना तँ फेकुओकेँ भेल हएत। किएक तँ ओहो ने चाह-पान खाइत-पीबैत हएत। गोराइयो गेल हएत। मोछो-दाढ़ी भऽ गेल हेतै। जहिना भगवान घरसँ पुरुख उठा लेलनि, तहिना तँ फेरि दैयो देलनि। जुआन बेटापर नजरि पहुँचतहि रामसुनरिक मन खुशीसँ नाचि उठलै। मने-मन बुदबुदाए लगलीह- दस बर्खसँ घरमे पुरुख नञि छल तेँ की कोनो पुरुखक घरसँ हमर घर अधला चलल। संतोषे गाछमे मेबा फड़ैत छै। परसुका बात मन पड़लै। चाहक दोकानपर परसू पंडी जी कहैत रहथिन जे अइ बेर शुरुहे अगहनसँ घन-घनौआ लगन अछि। हमहूँ फेकुआक बिआह कइये लेब। बिआह मनमे अबिते सोचलक जे बहुत दिनसँ पाँच गोटेक अंगनामे हाथो नै धुऐलौं। सेहो कइये लेब। समाजक भोजमे तँ नै सकब मुदा जहाँ धरि सकड़ता हएत, तइमे पाछुओ नै हटब। लोक ई नै बुझै जे मसोमातक बेटाक बिआह होइ छै। डफरा-बौसली हवागाड़ी सेहो लइये जाएब। अनका जेकाँ एक ढ़कियाक मुँह नै पसारब। अपना बेटी-जमाएकेँ जे देत से देत। हम किए मंगिऔ। जे आदमी पोसि-पालि कऽ एकटा मनुक्ख देबे करत तेकरासँ फेर की मंगिऔ? किछु नञि मंगबै। लुरि रहत तँ कामधेनु बना कऽ राखब नहि तँ माटिक मुरुत रहत। एकाएक रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। पोस्ट-कार्ड निकालि हियासि-हियासि देखए लगलीह। फुटा-फुटा करिया अक्षर तँ नहि बुझैत मुदा कृष्ण जेकाँ कारी मुरुत जरुर बुझि पड़ैत। चिट्ठी पढ़ाबै लऽ रामसुनरि बिदा भेलि। अंगनासँ निकलितहि मनमे उठलनि आब की कोनो पहिलुका जेकाँ लोककेँ बारह बर्ख कटिया सोन्हबए पड़ै छै। आब तँ साले भरिमे लोककेँ धिया-पूता भऽ जाइत छैक। कहुना भेल तँ हमरो फेकुआ शहरे-बजारक भेल की ने। एते बात मनमे अबितहि मुँहसँ हँसी निकलल। असकरे। तेँ कानकेँ सुनै दुआरे तेना रामसुनरि जोरसँ बजैत जेना दोसरकेँ कहैत होइ। फुसिओहोक बेटी युग जितलक। भाग तँ मुँह-कान नीक नञि छै। नञि तँ युगमे भूर करैत। बिआहक आठमे मासमे बेटी भऽ गेलै। ई तँ धन्यवाद एहि समाजकेँ दी जे एक सूरे सभ बाजल जे सतमसुआ बच्चा छिऐ। जँ एना बिआहक विदागरीमे हएत तँ केहेन होएत? मुदा ओ बच्चा सतमसुआ नहि। समाज झूठो बाजि ओकरा सतमसुआ बच्चाक पालन-पोसनसँ बचेलक।
  रविक दरबज्जा लग अबितहि रामसुनरिक नजरि चिट्ठीपर पहुँचल। रवि दरबज्जेपर बैसि किछु लिखैत छल। रामसुनरिकेँ लग अबितहि रबि उठि कऽ चौकीपर बैसबैत पुछलक- ‘‘काकी फेकू भाइक बिआह कहिया करबीही ? हमहूँ बरिआती जेबउ ?’’
  रविक बात सुनितहि रामसुनरिक मन बृन्दाबनक रास लीलापर पहुँचि गेलनि। कनिये काल कृष्णक रास-लीला देखि घुरि कऽ आबि चिट्ठी पढ़बो आ लिखबो लेल रबिकेँ कहलक। चिट्ठी पढ़ि कऽ रबि सुना देलकनि। पत्र लिखैले तैयार होइत बाजल- ‘‘की सभ लिखब?’’
रामसुनरि लिखबए लागलि-
परमानपुर
ता. १५.०८.२००८
बौआ फेकू।
हम तोरा कमाइक कोनो आशा केने छी, जे पाइ नै छौ तँ गाम कोना ऐमे ? ककरोसँ पैंच-खोंइच लऽ कऽ चलि आ। तीन भुरकुरी धान-गहूम रखने छी, वएह  बेचि कऽ दऽ देबै। आब तोहूँ चेतन भेलेँ। लोक कलंक जोड़त। हमरो आब अइ दुनियामे नीक नै लगैए। तेँ सोचए छी जे अपन काज जल्दी पुरा ली। अगते अगहनमे चलि अबिहेँ। ताबे कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। अखैन हमहूँ थेहगर छी मुदा अइ जिनगीक कोन ठेकान छै। आब ई परिवारो आ दुनियो तोरे सबहक ने हेतौ। समएपर चलि अबिहेँ, जइसँ काज बिथुत ने होउ।’’
माए ।

माएक पत्र सुनि फेकुआ मने-मन खूब खुशी भेल। मनमे भेलै जे हमरो काज एहि दुनियाँ, एहि समाजमे छैक। मुदा मनमे खुशी बेसी काल टिकल नहि। लगले माघक कुहेस जेकाँ बुद्धि अन्हरा गेलै। कोन मुँह लऽ कऽ गाम जाएब। साल भरिक कमाइ माइयक हाथमे की देबै। ई बात सत्य जे हमरा भरोसे माए नहि जीबैत अछि। मुदा हमरा ओकर कोनो दायित्व नहि अछि, सेहो तँ नहि। हे भगवान कोनो गर सुझाबह।
  पनरहे दिनक पछाति एकटा घटना घटल। फेकुआक नोकरी छुटि गेल। ओना नओ गोटेक संग फेकुआ काज करैत। मुदा आठो गोटे पुरना कारीगर समयानुसर अपनाकेँ बदलैत जाइत, नव-नव डिजानिक कपड़ा सिबैक लूरि सिखैत जाइत। फेकुआ अनाड़ी, तेँ शुरुहसँ सिलाइक काज सिखए पड़लै। साल भरिमे कहुना कऽ पुरना दिल्लीक कारीगर बनल। मुदा फैशनमे बिहाड़ि एने फेकुआ उड़ि कऽ कातमे खसल। ओना मालिकोक मनमे बेइमानी घोसिआएल रहै। बेइमानीक कारण छल पाइबलाक चसकल मन। एकटा अट्ठारह बर्खक लड़की कारीगर दू हजार दरमाहामे भेँट गेलै।
सवा बर्खसँ शहरमे रहैत-रहैत फेकुओक सुतल बुद्धि जगि कऽ करोट लिअए लगलैक। जहिसँ आत्मबलोक जन्म भऽ चुकल छलैक। मुदा खिच्चा। सक्कत बनिये रहल छलैक। जहिना मालिक नोकरीसँ हटैक बात कहलकै तहिना फेकुआ हिसाब मंगलक। हिसाब लऽ फेकुआ डेरा बिदा भेल। पाइ रहबे करै। रस्तेमे काॅफी पीबि डेरा आएल। डेरा आबि पंखा खोलि पलंगपर ओंघरा गेल। ओंघराइते मनमे अबै लगलै- ई शहर छी, गाम नहि। शहरमे जाहि तेजीसँ मशीन, फैशन आ जीवन-शैली बदलि रहल अछि, ओहिमे हमरा सन-सन मुरुखक कोन बात जे पढ़लो-लिखल लोक ओंघरनियाँ देत। नवका मशीन पुरना इंजीनियरकेँ धक्का देत। पुरना बुद्धिकेँ नवका बुद्धि धक्का देत। मुदा नीक-अधलाह के बुझत ? सभ भोग-विलासक जिनगीक पाछु आन्हर बनि गेल अछि। बाप रे, ई तँ भुमकमक लक्षण छी। फेर मनमे एलै, भरिसक हमर माथ, नोकरी छुटने तँ ने चढ़ि गेलहेँ। ओह, अनका विषएमे अनेरे ओझराइ छी। जेकरा भोगए पड़तै ओकरा सुआस बुझि पड़ै छै, तँ हमरे की। ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना माथपर हाथ लऽ साहोर-साहोर करैत अछि। फेर मनमे एलै जे हमहूँ तँ जूड़िशीतलक नढ़िये जेकाँ भेल छी। एक दिशि चारु भागसँ कुकूर दाँतसँ पकड़ि-पकड़ि तीड़ैत अछि तँ दोसर दिशि शिकारी सभ लाठी बरिसबैत अछि। गामक लूरि सीखलहुँ नहि, सीखि लेलहुँ शहरक लूरि। तँ आब लिअ। क्वीन्टलिया बोरामे भरि-भरि रखने जाउ। फेकुआक मन औनाए गेल। दुबट्टियेमे हरा गेल। तिनबटिया-चारिबट्टिया तँ बाँकिये अछि। माएपर तामस उठलै। बुदबुदाए लगल- ‘‘ई बुढ़िया गछा लेलक जे शुरुहे अगहनमे चलि अबिहेँ। कनियाँ ठेमा कऽ रखबौ। बिआह कइये देबउ।’’
  एक दिशि केँचुआइल कनियाँक बदलैत रुप तँ दोसर दिशि माइयक सिनेह। समुद्रक पानि जेकाँ फेकुआक मनकेँ अस्थिर कऽ देलक। सोचए लगल जे माए नीक छोड़ि कहियो अधलाह नहि केलक आ ने कहियो सोचलक, ओकरापर आँखि उठाएब अनुचित छी। काल्हिये गाम चलि जाएब। बिआहो कइये लेब। दू गोटे पति-पत्नी ओहन लोक एकठाम होएब जे किछु कऽ सकैत अछि। ‘दू पाइ’ क आशा हृदएमे समेटि सौझुका गाड़ी पकड़ि, तेसर दिन गाम पहुँचि गेल।

अनेरुआ बेटा - जगदीश प्रसाद मण्डल



तेसरि साँझ। अन्हरियाक चौठ रहने चान तँ नञि उगल छै मुदा पूब दिशि धाही छिटकए लगल छलै। सुनसान अन्हार देखि किछु क्षण पहिनहि एकटा कुमारि, समाजमे लोक-लाज बँचबैक खियालसँ दस दिनक जनमल बच्चाकेँ रस्ताक किनछरिमेे राखि अढ़े-अढ़ आंगन चलि गेलि। बच्चाकेँ नओ दिन तँ झाँपि-तोपि कऽ बीमारीक बहाना बना रखलक। मुदा घटना खुलैक दुआरे दसम दिन जी-जाँति कऽ फेकलक नहि, रस्ताक कातमे ओरिया कऽ रखि देलक। पाँचे-सात मिनटक पछाति गंगाराम हाटसँ घर अबैत रहए। जनमौटी बच्चाक जे रुदन गंगाराम सुनलक, एकाएक ओकर पएर अस्थिर भऽ गेलै। बीच बाटपर ठाढ़ भऽ ओ अवाज अकानए लगल। ई अवाज तँ कोनो जानवर वा जन्तुक वा चिड़ैक तँ नहि थिक। मनुक्खक बच्चाकेँ बोली बुझि पड़ैत अछि। मुदा एहिठाम मनुक्खक बच्चाकेँ बोली भऽ कोना सकैत अछि? तहूमे ककरो देखबो ने करै छिऐ। बाँसक गारल खूँटा जेकाँ गंगाराम बीच बाटपर ठाढ़। कने काल ठाढ़ रहि ओ आस्ते-आस्ते बच्चा दिशि पएर बढ़बए लगल। झल-अन्हार रहने अधिक दूर देखबो ने करैत छल। खेतमे जेना कीड़ी-मकोड़ी। क्यो अपन माए-बापकेँ सोर पाड़ैत तँ क्यो अरामसँ गीत गबैत। तहिसँ सौँसे बाध अनघोल होइत रहै। बच्चाक लग पहुँचि गंगाराम बैसि बच्चाकेँ निहारै लगल। एकटा मन कहलकै- ई तँ मनुक्खक बच्चा छी। मुदा दोसर मन कहलकै- एहिठाम बच्चा आएल कोना? तरकारीक झोरा दूबिपर रखि, दहिना हाथ बच्चाक देहपर दऽ हसोथै लगल। देह सिहरि गेलै। रोंइयाँ-रोंइयाँ ठाढ़ भऽ गेलै। मुदा मनमे खुशी उपकलै। मन थीर कऽ बच्चाकेँ दुनू हाथे उठा लेलक। उठा कऽ बच्चाकेँ पेटमे साटि, वामा हाथे बच्चाकेँ थाम्हि दहिना हाथे खढ़-पात पोछए लगल। बच्चा ओहिना पूर्ववते कनैत रहए। खढ़ पोछि गंगाराम कान्हपर सँ गमछा उतारि बच्चाकेँ लपेट लेलक। तरकारीक झोरा कान्हमे टाँगि छाती लगौने बच्चाकेँ अपना ओहिठाम अनलक।
आंगन आबि गंगाराम हँसैत घरवालीकेँ कहलक- ‘‘आइ भगवान खुश भऽ एकटा बेटा देलनि।’’
पतिक बात सुनि अकचकाइत भुलिया लगमे दौगल आबि पतिक कोरासँ बच्चा अपना कोरामे लैत पुछलक- ‘‘कतए ई बच्चा भेटल ? आ-हा-हा, बच्चा तँ बड़ दीव अछि।’’
‘‘हाटसँ घुमैत काल बाटपर भेटल। एकर सेवा करु। जँ अप्पन बनि कऽ आएल हएत तँ जीवे करत नञि तँ जहिना रस्ते-रस्ते आएल तहिना चलि जाएत।’’
पतिक बात सुनि भुलिया मने-मन सोचए लागलि जे अपना तँ ने गाए अछि आ ने बकरी, जेकर दूध पिया बच्चाकेँ पालितहँु। अपने तँ दूध हेबे नञि करत किएक तँ बुढ़ाढ़ीमे सभ अंग सुखा गेल। निराश मनमे भुलियाक आशा जगलै। मनमे अएलै जे अपन ने छाती सुखि गेल मुदा पितिऔत दियादनी तँ चिलकौर अछि। मन पड़ितहि भुलिया भगवानकेँ धन्यवाद दैत बाजलि- ‘‘जहिना भगवान सुखाएल बोनमे फूल फुलौलनि तहिना ओकर अहारोक ओरियान तँ वएह करथिन।’’
पचास बर्खक गंगाराम। अड़तालीस बर्खक भुलिया। मुदा जते थेहगर गंगाराम तहिसँ कम भुलिया। अड़तालीस बर्खक भुलिया साठि बर्खसँ उपर बुझि पड़ैत छलि। झुनकुट बूढ़ि जेकाँ। बूढ़िक सभ लक्षण भुलियामे आबि गेल छलै मुदा कोरामे बच्चा देखि भुलियाक शरीरमे जुआनीक खून दौड़ए लगलै। नव उत्साह, नव-जीवन। आनन्दसँ विह्वल नजरिसँ भुलिया पतिकेँ देखैत आ गंगाराम पत्नीकेँ। दुनूक मनमे खुशीक हिलोर उठैत रहै। पानिक गुब्बारा जेकाँ खुशी मँुहसँ निकलए चाहैत रहै। बच्चाकेँ चुप रहै दुआरे भुलिया अपन छातीमे बच्चाकेँ लगा लेलक। कनी काल बच्चा छातीमे लगि मुँह बन्न केलक मुदा दूध नहि भेटने फेर ओहिना कानए लगल।
गंगारामक घरक बगलेमे पितिऔत भाए रुपलालक घर। बच्चाकेँ छाती लगौने भुलिया रुपलालक आंगन पहुँचलि। रुपलालक स्त्री कबूतरी अपना बच्चाकेँ दूध पीयबैत रहए। तीन मासक बच्चा रहै कबूतरीक। भुलियाक कोरामे बच्चाकेँ कनैत देखि अपना बच्चाकेँ ओछाइनपर सुता भुलियाक कोरासँ बच्चाकेँ कोरामे लैत दूध पीयबए लागलि। भुखल बच्चा, हपसि-हपसि दूध पीबए लगल। बच्चाकेँ दूध पीबैत देखि भुलिया कबूतरी दियादनीकेँ कहलक- ‘‘भगवान तोरा सात गो बेटा आउरो देथुन।’’
  भुलियाक बातकेँ हँसीमे उड़बैत कबूतरी बाजलि- ‘‘चारियेटा मे तँ अकछि गेलौं आ सातटा आरो पोसब पार लागत। अपन असिरवाद घुमा लौथु। जेतबे अछि तेकरे निमेरा होए तेहीसँ बहुत हएत। फेर बात बदलैत बाजलि- दीदी, बुढ़ाढ़ियोमे जे हिनका बेटा भेलनि से केहेन पोरगर छनि। हिनके जेकाँ आँखि, मुँह, नाक लगै छनि। भैया जेकाँ किछु ने बुझि पड़ैए।’’
  भुलिया- ‘‘सभ दिन तू एक्के रंग रहि गेलैं। कहियो तोरा बजै-भुकैक लूरि नञि भेलौ। जेठ-छोटक विचार तँ बुझबे ने करै छीही। ककरो किछु कहि दै छीही। कोनो गत्तरमे लाज-सरम तँ छौहे नै।’’
  हँसैत कबूतरी दोहरबैत बाजलि- ‘‘एँह दीदी, हिनका अखन की भेलनिहेँ, एकटा के कहाए जे जोड़ो लगि जेतनि।’’
  कबूतरीक बातसँ भुलियाकेँ तामस नै उठै। बच्चाक आनन्द हृदएकेँ पानि जेकाँ कोमल बना देने छलै। भुलिया- ‘तोरे भैयाकेँ हाटसँ अबै काल रस्तामे ई बच्चा भेटलै।’’
  कबूतरी- ‘‘भेटुआ बच्चाक मँुह हिनका मुहसँ किअए मिलै छै। ई हमरासँ छिपबै छथि।’’
  खौंझा कऽ भुलिया बाजलि - ‘‘अच्छा हो, हमरे भेल। आब तँ मनमे सबुर भेलौ।’’
  बात बदलैत कबूतरी बाजलि- “दीदी, जहिना एकटा बच्चाकेँ दूध पीयबै छी तहिना अहू बच्चाकेँ दूध पिया देबनि। कोनो कि हमरा घरमे मौसरी नै अछि जे बच्चाकेँ दुधकट्टू हुअए देबनि। लोकेक काज समाजमे लोककेँ होइ छै किने। हिनका अन्हार घरमे दीप जरलनि। तइसँ कि हमरा खुशी नञि होइए।’’
  कबूतरीक बात सुनि भुलियाक मन गद-गद भऽ गेलै। भुखाइल बच्चाकेँ पेट भरिते निन्न आबि गेलै। बच्चाकेँ बिछौनपर सुतबैत कबूतरी बाजलि- ‘‘दीदी, बच्चाकेँ एतै रहए देथुन। राति-विराति जखैन भुख लगतै पिया देबै।’’
  ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि भुलिया अपना आंगन आबि पतिकेँ कहलक- ‘‘आब बच्चा जीबे करत। बड़ दूध गोधनपुरवालीकेँ होइ छै। दुनू बच्चाकेँ पालि‍ लेत।’’
  बच्चाक लेल गंगारामक मन कनैत। मुदा भुलियाक बात सुनि मन हरिया गेलै। मनमे एकटा शंका जरुर उठलै- ‘‘बच्चाकेँ अपना अंगना किअए ने नेने अएलहुँ? आन तँ आने छी।’’
  पतिकेँ चोहटैत भुलिया कहलक- ‘‘अहाँ पुरुख छी, तँ की बुझबै? माएक की मासचर्ज होइ छै से स्त्रीगणे बुझि सकैए। जे माए एक दिन बच्चाकेँ छातीसँ लगा लेत ओ जिनगीमे कहियो ओहि बच्चाक अधला नै सोचत।’’
  गंगाराम चुप भऽ गेल। मुदा एकटा बात मन पड़लै। बाजल- ‘‘अपने दुनू गोरे ने ओकर बाप-माए हेबै, तेँ कोनो नाम तँ रखि देबै कि ने।’’
  पतिक बात सुनि भुलियाक मनमे छठियारक दृश्य आबि गेलै। मुस्की दैत बाजलि- ‘‘आन बच्चाकेँ तँ स्त्रीगण सभ मिलि कऽ नाओँ रखै छै। मुदा से तँ अइ बच्चाकेँ नै भेलै। अपने दुनू गोरे मिलि कऽ नाम रखि दियौ।’’
  भुलियाक विचार सुनि पति बिहुँसैत बाजल- ‘‘मंगल नाम रखि दिऔ।’’
सात मासक उपरान्त बच्चाक मुँहमे दाँतो जनमए लगल आ ठाढ़ भऽ कऽ डेगा-डेगी चलौ लगल। अन्न सेहो चाटए लगल आ पानि सेहो पीबए लगल। बच्चाक सिनेह एते अधिक दुनू परानीमे रहै जे कखनो आँखिक परोछ होअय, से नहि चाहए। भुलिया बोइन करब छोड़ि देलक। अंगना-घरक काज सम्हारि साबेक जौर ओसारेपर बैसि बॉंटए लागलि। ओकरे बेचि-बेचि दू पाइ कमा लैत छलि। अपना तँ साबे नहि रहै मुदा अधियापर बँटैक लेल गाममे साबे भेटै। दुनू परानी गंगारामकेँ एते उत्साह बढ़ि गेलै जते दस बर्ख पहिने छलै। भरि-भरि दिन काज करैत मुदा थाकनि बुझिये ने पड़ै। भुलियाकेँ जैखन मंगल माए कहए तैखन आनन्दसँ ओ उन्मत भऽ जाए।
पाँच बर्खक अवस्थामे मंगलक नाम पिता स्कूलमे लिखा देलक। मंगल पढ़ए लगल। पाँचे किलास तक पढ़ाइ गामक स्कूलमे होइत रहै। पँचमा तक मंगल पढ़ि लेलक। दस बर्खक भइयो गेल। मुदा दुनू परानीमे गंगारामक देह एत्ते अव्वल भऽ गेलै जे काज करैले लोक अढ़ौनाइ छोड़ि देलकै। कहुना-कहुना दुनू परानी जौर बाँटि-बाँटि गुजर करए। जिनगी भारी लागए लगलै। मुदा दसे बर्खक मंगलमे ज्ञानक उदए कनी-मनी भऽ गेलै। जहिना बच्चेमे हनुमान बाल सुर्जकेँ गीरि गेल छलाह, तहिना। मंगल बापकेँ कहलक- ‘‘बाबू अहाँ दुनू गोरे काज करै जोकर नै रहलौं। हमरा मन होइए जे चाहक दोकान खोली। अपने डेढ़ियापर एकटा एकचारी बान्हि दिअ, ओहिमे हम दोकान खोलब।’’
गंगारामक मनमे जँचलै। मुदा चाह तँ गामक लोक पीबैत नहि अछि, तखन दोकान चलतै कोना? मुदा तइयो एकचारी बान्हि देलक। बाड़ीमे एकटा जीमरक गाछ रहै ओकरा पच्चीस रुपैयामे बेचि, चाह बनबैक बरतन-वासन मंगल कीनि लेलक।
चाहक दोकान मंगल शुरु केलक। नव वस्तुक दोकान गाममे। मुदा पहिल दोकानकेँ तँ मोनोपोली माने एकाधिकार होइ छै। शुरुमे तँ गामक लोक नव चीज पेय बुझि सेहन्ते पीनाइ शुरु केलक। मुदा धीरे-धीरे दोकान जमि गेलै। जइसँ एत्ते कमाइ हुअए लगलै जे कहुना-कहुना गुजर चलऽ लगलै। तीन साल बीतैत-बीतैत दुनू परानी गंगाराम मरि गेल। जाधरि गंगाराम जीबैत छल ताधरि गाममे मंगलक प्रति कोनो तरहक घिरना नञि छलै मुदा गंगारामक मरलाक बाद लोकमे धिरना जागए लगलै। मुदा तइयो दोकानक बिकरीमे कमी नञि अएलै, किएक तँ समाजक लोक चाह-पानि पीयब शुरु कऽ देने छल।
चाहक दोकान केलाक उपरान्तो मंगलक मनमे पढ़ैक जिज्ञासा जीबिते रहै। खाइ-पीबैसँ जे पाइ उगड़ै ओइसँ ओ किताब, कागज, कलम कीनि-कीनि पढ़बौ करए आ लिखबो करै। मरै काल गंगाराम मंगलकेँ जन्मक इतिहास सुना देने रहै। जाहिसँ मंगलमे समाजक कुरीति, कुव्यवस्था जे करमी लत्ती जेकाँ छाड़ने अछि, ओहि बिन्दुपर नजरि पहुँचि गेल छलै। तेँ किताबक अध्ययनक संग-संग समाजोक बेबहारक अध्ययन करए लागल। चाहक दोकान चलबैत तेँ दस गोटेक संग गप-सप्प  करैक लूरि सेहो सीखि लेलक। ततबे नहि रुपचन गामक खिसक्कर। मुदा बड़ गरीब। साँझू पहरकेँ एक झोँक चाहक बिकरी खूब होइ, बादमे गहिकी पतरा जाइ। जखन गहिकी पतरा जाइ तखन रुपचन मंगलक दोकानपर अबै। दू गिलास चाह पिया मंगल रुपचनक दिमाग साफ कऽ दै। दू-चारिटा पछुऐलहा गहिकियो रहै, तहि बीच रुपचन पुरना खिस्सा उठाबै। एक घंटा, दू घंटा, तीनि-तीनि घंटा तक रुपचन खिस्सा कहै। खिस्सा सभ दिन बदलि-बदलि कऽ कहै। कहियो राजा-रानी, तँ कहियो रानी सरंगा तँ कहियो रजनी-सजनीक। कहियो गोनू झा तँ कहियो डाकक। कहियो अल्हा-रुदल तँ कहियो दीना-भद्री। कहियो लोरिक तँ कहियो सलहेसक।
एहि रुपे मंगलक बुद्धिक बखारीमे किताबक ज्ञान, समाजक ज्ञान आ खिस्साक ज्ञान जमा हुअए लगलै। रातिमे जे खिस्सा सुनै ओ दिनमे जखन समए भेटै, लिखि लिअए। लिखैत-लिखैत पाँतियो सोझ-साझ हुअए लगलै आ जिज्ञासो बढ़ए लगलै।
एक दिन बेरि टगैत, एक गोटे मंगलक ऐठाम चाह पीबए आएल। देह-दशासँ बिल्कुल साधारण। हाथमे एकटा चमड़ाक बैग। ओ आदमी ‘भारत जागरण’ पत्रिकाक सम्पादक। गामक दशा-दिशाक अध्ययन करैक लेल गाम दिशि आएल छल। मंगलसँ गप-सप्‍प करैत ओ सम्पादक हेरा गेलाह। उन्मत्त भऽ गेल। जेना मंगलक हृदए आ सम्पादकक हृदए एक ठाम भऽ कतौ सफरमे निकलल हुअए, तहिना।
  भक्क टुटितहि दुनू गोरे हँसए लगल। सम्पादक कहलखिन- ‘बौआ, अहाँ चाह बनाउ। एखन धरि हमहुँ आइ चाह नै पीने छलौं। आइ हम रहब। निचेनसँ गप-सप्‍प करब।’
  मंगल चाह बनबए लगल। चाह बनल। दुनू गोटे पीलक।
  खेला-पीलाक बाद, रातिमे दुनू गोटे एक्के बिछानपर बैसि गप-सप्‍प करए लगल। जे किछु खिस्सा-पिहानी मंगल लिखने छल ओ हुनका–-सम्पादककेँ- आगूमे रखि देलक। उनटा-पुनटा सम्पादक जी देखए लगलथि। भाषा-शैली तँ नहि जँचलनि मुदा विषए-वस्तु हृदएकेँ पकड़ि लेलकनि। हँसैत बजलाह- ‘‘बड़ सुन्दर वस्तु सभ अछि। एकरे तकैले हम आएल छी।’’
  कहि बैग खोलि किछु पत्रिका आ किछु किताब दैत कहलखिन- ‘‘एहिमे लिखैक तौर-तरीका निर्धारित कएल अछि। एकरा ठीकसँ पढ़ि जे आधार निर्धारित अछि, ओहि अधारपर लिखब। हम सम्पादक छी। मासिक पत्रिका चलबैत छी। अहाँक एक-एक कथा सभ मासक पत्रिकामे छापब। एक कॉपी अहूँकेँ पठा देल करब।’
  तीन-चारि घंटा धरि सम्पादक जी मंगलकेँ बुझबैत रहलखिन। भोरे सुति उठि चाह पीबि ओ चलि गेलाह।
मंगलक कथा पत्रिकामे मासे-मास छापए लगल। मंगलक अनेको पाठकमे एकटा लड़की सेहो। नाम सुनएना। दर्शन शास्त्रसँ एम.ए.मे पढ़ैत। पाँचम मासक पत्रिकामे सम्पादकजी मंगलक परिचएमे एकटा उपन्यासक चरचा सेहो कऽ देलखिन, नाम छलै ‘मरल गाम’। सुनएनाक पिता वकील। सुनएनाक मन ‘मरल गाम’ नाम पढ़ि नाचए लागल। मनमे अाबए लगलै जे हमर देश तँ गामक देश छी। जखन गामे मरल अछि तखन देशकेँ की कहबै? ई विचार सुनएनाक मनमे उड़ी-बीड़ी लगा देलक। जे सुनएना पिताक सोझाँमे भरि मँुह बजैत नहि ओ सुनएना आइ पितासँ डिस्कस करैले तैयार भऽ गेलि।
  कोर्टसँ आबि वकील सैहेब चाह पीबि टहलैले गेलाह। टहलि-बूलि कऽ दोसर साँझमे आबि कौल्हुका केसक तैयारीक लेल फाइल निकाललनि। पत्नी चाह आनि कऽ देलखिन। चाह पीबि, पान खा वकील सहाएब फाइल खोलैत रहथि आकि सुनएना आबि कऽ आगूक कुरसीपर बैसि बाजलि- ‘‘बाबूजी, एकटा सवाल मनमे घुरिया रहल अछि। ओ कने बुझा दिअ?’’
  ‘की?’
  ‘आइ पत्रिकामे पढ़ने छलहुँ जे सचमुच गाम मरल अछि? जँ गाम मरल अछि तँ देश गामक छी। देशकेँ की कहबै?’
  सुनएनाक प्रश्नक गंभीरतापर नजरि नहि दऽ वकील सैहेब कहलखिन- ‘ई साहित्यकार लोकनिक समझ छिअनि, तेँ एहिपर किछु नहि कहि सकै छिअह।’
  ‘साहित्यकारो तँ अही समाजक लोक होइ छथि। हुनको आने लोक जेकाँ जिनगी छनि। तखन ओ एहन विचार किअए लिखलनि?’
  ‘साहित्यकारक बात साहित्यकारे बुझि सकैत छथि। हम तँ बकील छी कानूनक बात बुझै छिऐ। एखन तूँ जा, हम एकटा केसक तैयारी करब।’
सुनएना उठि कऽ चलि गेलि। अपना कोठरीमे बैसि कऽ विचार करए लागलि। जहि देशक गाममे ने पानि पीबैक ओरियान छै, ने खाइक लेल सभकेँ संतुलित भेाजन भेटै छै, ने भरि देह कपड़ा भेटै छै, ने रहैक लेल घर छै, ओहि देशकेँ मरल नै कहबै तँ की कहबै। एखनो लोक सरल पानि पीबैत अछि, कहुनाकेँ किछु खा दिन कटैत अछि, गाछक निच्चाँमे आगि तापि समए बितबैत अछि, हजारो रंगक रोग-व्याधिसँ घेरल अछि, ओहि देशकेँ की कहबै? हजारो बर्खक मनुक्खक इतिहासमे एखनो धरि सरस्वतीक आगमन सभ मनुक्ख धरि नै भेल अछि, ओहि देशकेँ की कहबै? ढेरो प्रश्न सुनएनाक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल रहए। मन घोर-घोर हुअए लगलै। अचेत जेकाँ सुनएना कुरसीपर ओंगठि सोचए लागलि। सोचैत-विचारैत अंतमे एहि प्रश्नपर आबि अटकि गेलि जे किताबक भाँज लगा कऽ पढ़ी। मुदा किताब भेटत कत्तऽ। फेर मन एलै जे किताब लिखनिहारे लग पहुँचि किताबक भाँज लगाबी। पत्रिका निकालि लेखकक पता पुरजीपर लिखलक।
  दोसर दिन सुनएना मंगलक भाँज लगबै बिदा भेलि। नओ बजेक समए। भिनसुरका गहिकीकेँ सम्हारि मंगल केतली, टोपिया, ससपेन, गिलास इत्यादि बरतन दोकानक आगुमे रखि, चुल्हिसँ छाउर निकालि चुल्हि निपैत। सुनएना चाहक दोकानपर एहि दुआरे पहुँचल जे एहिठामसँ सौंसे गामक लोकक भाँज लगि सकैए। दोकानपर पहुँचि मंगलकेँ पुछलक- ‘‘एहि गाममे मंगल नामक एक व्यक्ति छथि, हुनकर घर बता दिअ।’’
  अपन नाम सुनि मंगल चौंकि गेल। मुदा चुप्पे रहल। जेना मने-मन गाममे मंगलकेँ तकैत रहए। सुनयनो सएह बुझलक। कनी काल गुम्म रहि बाजल- ‘‘बहीन जी, अगर मंगल एहि गाममे हएत तँ जरुर भाँज लगा देब। मुदा एखन हमरा ऐठाम आएल छी, तेँ बिनु खेने-पीने कोना जाएब? ई तँ मिथिला छिऐ। जहिना घरवारीक लेल स्वागत करब अनिवार्य अछि तहिना तँ अतिथियो लेल।’
  मंगलक बात सुनि सुनएनाक मनमे जेना पियासलकेँ शीतल पानि भेटि जाइत, तहिना भेल। बाँसक फट्ठाक बनौल बेंचपर सुनएना बैसि गेलि। हाथ धोए मंगल सस्पेन अखारि, चुल्हि पजारि चाह बनबए लगल। ब्रेंच परसँ उठि सुनएना चुल्हि लग जाए चाहलक आकि कुर्तीक निचला कोन फट्टीमे फँसि गेलै, जइसँ फटि गेलै। मुदा तेकर चिन्ता नहि कऽ सुनएना मंगल लग बैसि गेल। लगमे सुनएनाकेँ बैसैत देखि पुछलक- ‘मंगलसँ कोन काज अछि?’
  सुनएना- ‘‘मंगल साहित्यकार छथि। हुनकर लिखल एकटा उपन्यास ‘मरल गाम’ छनि। ओहि पोथीक भाँज हम बजारमे लगेलहुँ मुदा कतौ नहि भेटल। तेँ लिखिनिहारेक भाँज लगबए एलहुँ।’’
  सुनएनाक बात सुनि मंगल नमहर साँस छोड़ि बाजल- ‘‘मंगलकेँ अहाँ कोना जनैत छी?’’
  सुनएना- ‘‘हुनकर लिखल कथा हम ‘भारत जागरण’ मे पढ़ैत छी ओहिमे ‘मरल गाम’ उपन्यासक चरचा देखलिऐक। जकरा पढ़ैक इच्छा मनमे भेल। तेँ एलहुँहेँ।’’
  मंगल बुझि गेल। खुशीसँ मन ओलरि गेलै। मनमे अएलै जे पियासलकेँ पानि देब ओहने आवश्यक होइत अछि जेना भूखलकेँ अन्न। मुदा हमरा तँ एक्के काॅपी अछि जे लिखने छी। जँ ई काॅपी दऽ देबै तँ अपन साल भरिक मेहनत चलि जाएत। मुदा नहि देब तँ आरो महापाप हएत। फेर मनमे अएलै जे अपना ऐठाम पढ़ैले दऽ दियै आ कहि दियै जे जहिया हमर दिन-दुनियाँ घुरत तहिया छपाएब। छपेलाक उपरान्त अहाँकेँ देब। ताबे एहिठाम रहि पढ़ि लिअ।’’
  तहि बीच चाह बनल। दुनू गोटे पीलक। चाह पीबि सुनएना बाजलि- ‘‘मंगलक भाँज लगा दिअ।’’
  विस्मित भऽ मंगल बाजल- ‘‘हमरे नाम मंगल छी। हमहीं उपन्यास लिखने छी। मुदा छपाओल नहि अछि। सिर्फ लिखलेहे टा अछि। तेँ हम आग्रह करब जे एहिठाम रहि पढ़ि लिअ। जहिया छपाएब तहिया अहाँकेँ एक काॅपी जरुर देब।’’
  मंगलक बात सुनि सुनएना अचंभित भऽ गेलि। पएरसँ माथ धरि मंगलकेँ निङहारए लागलि। आगिक धुँआ, चुल्हिक कारीखसँ मंगल बेदरंग भेल। देहक वस्त्र परसौतीक वस्त्र जेकाँ, सौँसे देहसँ गरीबी झक-झक करैत। मंगलक बगए देखि सुनएनाक आँखि नोरा गेलै। नोर पोछैत सुनएना बाजलि- ‘‘एहिठाम रहि कऽ हम उपन्यास नहि पढ़ि सकब। किएक तँ कोनो पोथी पढ़ैक मतलब होइत अछि जे ओहि पोथीक विषए-वस्तुकेँ नीक जेकाँ बुझब। से धड़-फड़मे कोना संभव अछि?’’
  सुनएनाक विचारमे गंभीरता देखि मने-मन मंगल सोचए लगल। आत्माक उत्साह बढ़ए लगलै। सुनएना दिशि तकलक। सुनएनाक आँखिमे पढ़ैक भूख जोर पकड़ने देखलक। मनमे एलै जे हमहूँ तँ अनके लेल लिखने छी। तखन छपौलासँ हजारो हाथ जेतै मुदा एखन तँ एक्के हाथ जा रहल अछि। मनमे सबुर अएलै जे कमसँ कम एक्कोटा पढ़निहारक हाथ तँ जाएत। तहि बीच सुनएना बाजलि- ‘‘जहिना हम काॅपी एहिठामसँ लऽ जाएब तहिना पढ़लाक बाद घुमा देब। तेँ पोथी हरेबाक कोनो संभावने नै अछि। एहिठाम रहि पढ़ैमे हमरो लाचारी अछि। लाचारी ई अछि जे भरि दिन तँ हम कतौ रहि सकै छी मुदा सूर्यास्तक बाद घर पहुँचब जरुरी अछि।’’
  मंगलक विचारमे कने स्नेह एलैै। बाजल- ‘‘बड़बढ़ियाँ, हम अहाँकेँ पोथी दऽ दै छी। आगूक बात अहाँ जानी।’’
  हाथमे पोथी अबिते सुनएनाक मनमे खुशी अएलै। एक टकसँ पोथी देखि मंगल दिशि ताकि मुस्किया देलक। मने-मन मंगल सुनएनाकेँ पढैत आ सुनएना मंगलकेँ। सुनएना हँसैत बिदा भऽ गेलि।
सुनएना एम.ए. नीक जेकाँ पास केलक। नारी अधिकारक सर्मथक वकील साहेब। मुदा मन ओतए ओझरा जानि‍ जेतए देखथि जे नारी सिर्फ एक्के-आध बिन्दुपर नहि, जीवनक सभ क्षेत्रमे जकड़ल अछि। जेकरा मेटाएब धिया-पुताक खेल नहि। कठिन संघर्षसँ हएत। कतौ वैचारिक संघर्ष करै पड़त तँ कतौ बलक। एहि विचारमे वकील साहब कुरसीपर बैसि सोचैत रहथि। साँझक समए। पत्नी चाह बनौने एेलखि‍न। टेबुलपर चाह राखि, बगलक खाली कुरसीपर बैसि कहलखि‍न- ‘‘अपना सबहक पढ़ल-लिखल समाजक परिवारमे सुनएना अछि तेँ ने मुदा जँ एहेन बेटी किसानक घरमे रहतै तँ लोक ओकरा एना उन्मुक्त रहए दैतै !’’ चाहक चुसकी लैत वकील साहेब पुछलखिन- ‘‘अहाँ की कहए चाहैत छी, कने खोलि कऽ बाजू।’’
  ‘‘सुनएनाक बिआह कऽ लिअ। तखन तँ मनोज रहत की ने ओ तँ बेटा धन छी। बेटा-बेटीक बिआह करब माए-बापक अनिवार्य कर्तव्य छी। मुदा हमरा मनमे एकटा नव विचार अछि। ओ ई जे सुनएनाकेँ सेहो पूछि लिऐ।’’
  सुनएनासँ पूछैक बात सुनि पत्नी ढोढ़ साँप जेकाँ हनहनाइत बाजलि- ‘‘लोक की कहत? आइ धरि ककरा देखलिऐ जे माए-बाप बेटा-बेटीसँ पूछि कऽ बिआह करैत अछि।’’
  पत्नीक विचार सुनि वकील साहेब मने-मन सोचए लगलाह जे नारीकेँ मात्र पुरुखे नहि नारियो दाबि कऽ रखै चाहैत अछि। अजीब घेरा-बंदीमे नारी फँसल अछि। मुदा अपन विचारकेँ मनेमे राखि सुनएनाकेँ सोर पाड़लखिन। अपना कोठरीसँ निकलि सुनएना आएलि। कुरसीपर बैसलि। सुनएना माए दिशि देखए लागल। तामसे माए पति दिशि देखैत। वकील साहेब सुनएनाकेँ कहलखि‍न- ‘‘बाउ, आब तूँ एम.ए. पास कइये लेलह। माए-बापक दायित्व होइत छैक बेटा-बेटीक बिआह करब। तेँ हमहूँ अपन भार उतारए चाहै छी। तोरो किछु बजैक छह।’’
  पिताक बात सुनि सुनएनाक देहमे कँप-कँपी आबि गेलै। मनमे थोड़े ओज। मुदा असथिरसँ बाजलि- ‘‘बाबूजी, विआह तँ सभ पुरुष-नारीक लेल अनिवार्य प्रक्रिया छिऐ। जाहिसँ सृष्टिक विकास प्रक्रियामे सहयोग होइ छै। रहल बात जे विआह केहेन होअए। एखन जे देखि रहल छी ओ नब्बे-पनचानबे प्रतिशत अनमेल बिआह होइत अछि। कतौ धनक मिलानीसँ तँ कतौ दहेजक चलैत, कतौ कुल-मूलक चलैत तँ कतौ किछु। मुदा हमरा विचारसँ बिआह हेबाक चाही मनक मिलानीसँ। जे टिकाउएटा नहि आनन्दमय सेहो हएत।’’
  सुनएनाक बात सुनि माए उत्तेजित होइत बाजलि- ‘‘बेटी, हमरा सबहक मिथिलाक परम्परा रहल अछि जे ई विआह काज माए-बापक विचारसँ होइ नै की बेटा-बेटीक विचारे। किन्तु जँ बेटा-बेटीक विचारसँ बिआह हएत तँ समाज ढनमना जाएत।’’
  सुनएना बाजलि- ‘‘बड़ सुन्नर बात कहलीही माए मुदा परम्पराक भीतर जे दुरगुण छैक ओहूपर नजरि देमए पड़तौ।’’
  मुँहपर हाथ देने वकील सहाएब चुप-चाप सुनैत रहथि। सुनएनाक तर्कक आगू माए कमजोर पड़ैत गेलीह। मुदा तैयो चुप होइले तैयारे नहि छलीह। सामंजस्य करैत वकील सैहेब सुनएनाकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, तूँ अप्पन विचार दएह?’’
  सुनएना बाजलि- ‘‘अहाँ खर्च कत्ते करए चाहै छी बाबूजी?’’
  खर्चक नाम सुनि वकील सहाएब चौंकि गेलाह। मुदा अपनाकेँ स्थिर राखि कहलखिन- ‘‘बाउ, अप्पन की ओकाइत अछि से तोहूँ जनिते छह। मुदा जे ओकाइत अछि ओहिमे हम कंजूसी नै करबह। दू भाए-बहीन छह। ई सम्पत्ति तँ तोरे सबहक छिअह।’’
  सुनएना बाजलि- ‘‘बाबूजी, मनुक्ख देहे आ धने पैघ नहि होइए, पैघ होइए ज्ञान आ कर्तव्ये। सभ स्त्री चाहैए जे हमर जीवन-संगी बुधियार आ कर्मठ हुअए। एखन हम अहाँकेँ अंतिम निर्णए नहि दऽ रहल छी मुदा एते जरुर कहब जे सोनपुरमे मंगल नामक एकटा चाहक दोकानदार अछि। ओकरा कियो ने छै। मुदा ओकर जे काज आ बुद्धि छैक ओ ओकरा एक दिन महान साहित्यकारक रुपमे दुनियाँक बीच अनतै। एखन ओकरा गरीबी जरजर बनौने छै। गरीबीक जालमे ओ एना ओझरा गेल अछि जाहिसँ निकलब कठिन छैक। किन्तु जँ ओकरा ओहि गरीबीक जालसँ निकालल जाए तँ ओ जरुर उगैत सूर्य जेकाँ अकासमे चमकए लगत।’’
  वकील सहाएब कहलखिन- ‘‘बाउ, यदि तूँ हृदएसँ ओकरा चाहैत छह तँ हमरा दिशिसँ कोनो आपत्ति नहि। मुदा एखन समए रहैत विचारि लैह।’’
  सुनएना बाजलि- ‘‘अनेक विषमता रहितो हमरा दुनू गोटेक बीच आत्माक समता अछि। हमहूँ नारीक संबंधमे किछु लिखए चाहै छी। किएक तँ अपना एहिठाम नारीक प्रति जे अदौसँ अखन धरि अन्याय होइत रहल अछि ओ हमरा हृदएकेँ दलमलित कऽ देने अछि। दुनियाँक सुन्दरसँ सुन्दर वस्तु हमरा फीका लगि रहल अछि।’’
  वकील सहाएब कहलखिन- ‘‘बाउ, हम तोहर विचारकेँ मानि लेलियह। तूँ अपनेसँ जा कऽ देखि आबह जे कते मदतिसँ ओ मंगल उठि कऽ ठाढ़ हएत। हम ओते मदति कऽ देबै।’’
  पिताक विचार सुनि सुनएना हँसैत अपना कोठरी दिशि बिदा भेलि। सुनएनाक विचारपर वकील सहाएब मने-मन गौर करए लगलथि। मुदा पत्नीक मनक तामस आरो बढ़िते गेलनि।

Saturday, November 1, 2008

पीरारक फड़ - जगदीश प्रसाद मण्डल



गोल-गोल हरियर-हरियर भुआ जेकाँ सोहरी लगल डारिमे जेहने हरियर पात तेहने फड़, वएह थिक पीरारक फड़। पाँचेटा पुरान गाछ गाममे, बड़का-बड़का आम, जामुन सीसो गाछक जन्म ओ पाँचो पीरारक गाछ देखने। सए बरखक करिया बाबा कहैत जे जहियासँ मोन अछि ओ पाँचो गाछ ओहिना बुझि पड़ैत अछि। एते ठनका खसल, बिहाड़ि आएल मुदा ओइ पाँचो गाछक रुइयाँ भग्न नहि भेलै। दस गजसँ नमहर नहि, ने मेघडम्मर जेकाँ बहुत पसरल आ ने छिड़िआएल। छोट-छीन बरखाकेँ रोकि पानिक बुन्नकेँ माटिक मुँह नहि देखै दैत घनगर पात सजा कऽ सजल। सहतक कोथी जेकाँ चोखगर काँट, डारि रुपी पहरुदारकेँ सजौने। छड़गर-छड़गर डारिमे चौरगर-चौरगर पात जेना इन्द्रकमल वा तगड़ फूलक होइत। तहिना फूलो।
पाँचो पीरारक गाछ सइयो बिहाड़ि, हजारो बरखा, नमहरसँ छोट धरि सइयो बेर पाथरक चोट खेलक, बाढ़ि रौदीकेँ हँसैत-हँसैत सहलक। जहिना गामक उत्तरबरिया बाधमे एक्के आड़िपर पतिआनी लगा पाँचो गाछ ठाढ़। देखबोमे पाँचो एक्के रंग। ने नमहर ने छोट डारि, जे एक-दोसरसँ हक-हिस्सा लेल झगड़ैत। पाँचोमे अटूट प्रेम। जखन पाँचो फूलसँ सजैत तखन बुझि पड़ैत जे एक-दोसरक जुआनीक रंग देखि हृदयसँ खिलखिला-खिलखिला हँसैत होअए। एतेक नमहर जिनगीमे ने कियो जड़िकेँ तामि-कोड़ि पानि देलक आ ने ठारिकेँ छकड़ि-छुकड़ि गाछकेँ सुन्दर बनौलक। सोलहो आना देखभाल भगवानेक उपर। तेँ पाँचो गाछ स्वाभिमानसँ भरल जे ककरो एहसान रुपी कर्ज जिनगीमे नहि लेलौं। सदिखन पाँचो हँसैत-इठलाइत मन्द हवामे झुमैत।
पहिने पाँचो गाछक फूल फुला कऽ फड़ बनि झड़ि जाइत। बादमे फड़ पूर्ण जिनगीक सुख भोगि अंतिम अवस्थामे पकलापर पवन रुपी न्योतहारीकेँ पठा चिड़ै-चुनमुनीकेँ बजा अपन शरीर दान करैत, यएह पाँचो गाछक जिनगी भरिक धर्म रहल।
ओहि गाछसँ हटिये कऽ लोक सभ खेतक जोत-कोर कऽ उपजबैत। जे ओहि गाछपर सुगवा साँप रहैत छैक। सुगवा साँप लोककेँ देखैमे अबिते ने छैक ओ हरियर-लत्ती जेकाँ रहैत छैक। जकरा कटलासँ स्वर्ग-नरकक द्वार अनेरे खुजि जाइत छैक। बीचमे कतौ कोनो रुकावट नहि होइत छैक।
उत्तरवारि बाधक रखबारि रतना करैत छल। दू साल पहिने दुनू परानी मरि गेल। दू सालसँ क्यो बाधक रखबारि करैले तैयारे ने होइत। डर होइत जे पीरारक गाछपर सुगवा साँप रहैत छैक तेँ के अपन जान गमौत, दू-चारि सेर अन्न सालमे हेतै की नहि।
साल भरि पहिने पिचकुन नोकरी करैले मोरंग गेल। रौदियाह समए भेने किसानोक दशा नीक नहि। जन-बोनिहारक चर्चे की। साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत। गरीब-गुरबा गाए-बकरी बेचि-बेचि मोरंग, सिलीगुड़ी, आसाम नोकरी करए गेल। पिचकुनमा सेहो रखवारीवाली नवकी कनियासँ पनरह रुपैआ कर्जा लऽ गेल रहए। अखन धरि गाममे पिचकुनमाकेँ बकलेले-ढहलेेले बुझैत छल। जते गोटेक मेड़िया नोकरी करए गेल छल ओहिमे सँ किछु गोटे विराटनगर, किछु गोटे रंगैली, किछु गोटे सिलीगुड़ी आ किछु गोटे आसाम गेल। पिचकुनमाकेँ बकलेल बुझि सभ छोड़ि अपन-अपन गर लगबै गेल। असकरे पिचकुनमा इटहरी चौकसँ थोड़े आगू जा एकटा गाछक निच्चाँमे बैसि चूड़ा आ घुघनी खाए लगल। खाइते छल आकि दू गोटेकेँ उत्तर मुँहे जाइत देखि चूड़ा-घुघनीकेँ गमछाक खोंचड़ि बना खाइते संगे बिदा भेल। खेबो करै आ गप्पो-सप्प करै।
जाइत-जाइत धनकुटासँ कोस भरि पाछुए पहुँचल। जहि दुनू गोड़ेक संग रहै ओ दुनू किसान। एक गोटे मंगत राम पिचकुनकेँ नोकरी रखि लेलक। मरद-मौगी मिला पचासोटा जन मंगतराम खटबैत। सखुआक तीन महला घर बनौने। किछु खेत पहाड़ोपर रहै। जइमे मड़ुआ, सामी-कौनी उपजैत। नेबो सनतोला सभक गाछ सेहो रहैक। पहाड़क उपरमे रौद देखि पिचकुन उजड़ा पहाड़ बुझै। छोट-छोट गाछसँ लऽ कऽ पैघ-पैघ गाछक जंगल। छोट-छोट पहाड़सँ लऽ कऽ नमहर-नमहर पहाड़ देखि पिचकुन मने-मन सोचए जे दोसर दुनियाँमे चलि एलौं। मुदा रास्ताक ठेकान रहने भरोस रहै जे तीन दिनमे अपन गाम चलि जाएब। बड़का-बड़का बखारी, नारक टाल देखि पिचकुन मने-मन खुशी होइत जे मालिक खूब धनिक अछि। कहियो नोकरीसँ हटाओत नहि। जब गाम जाइक मन हएत छुट्टी लऽ कऽ चलि जाएब आ फेरो चलि आएब। रस्तो तँ देखले अछि।
साल भरि नोकरी केलाक बाद पिचकुनकेँ गाम अबैक मन भेलै। जहियासँ पिचकुन नोकरी कऽ रहल एक्को पाइ घर नहि पठौलक। पठबिते कोना? ने डाकघरक ज्ञान रहै आ ने ककरो अबैत-जाइत देखै। एकटा थारुनसँ पिचकुनकेँ लाट-घाट भऽ गेलै। अठारह-उन्नैस बरखक ओ थारुन। मंगते रामक जन। ओकर नाम धनिया। पिचकुनक संग अबैले धनिया राजी भऽ गेलि। साल भरिक बाद पिचकुन गाम आओत तेँ माए लेल ऊनी स्वीटर, चद्दरि आ अपनाे लेल फुलपेंट भरि बाँहिक स्वीटर चद्दरि सेहो कीनि लेलक। समाज सभ लेल सनतोला किनलक। कपड़ा, सनातोलाक मोटरी बान्हि, रुपैआकेँ फुलपेंटक जेबीमे लऽ मोटरीमे सेहो बन्हलक। बटखरचा लेल मुरही लऽ लेलक। धनिया अपन धएल-धड़ल रुपैआ कपड़ा सभ बान्हि रातियेमे तैयार भऽ गेलि। जंगल-झारक दुआरे रातिमे नहि निकलल। भुरुकवा उगिते दुनू गोटे अपन-अपन मोटरी लऽ चुपचाप बिदा भऽ गेल। जही रस्तासँ पिचकुन गेल रहए ओही रस्तासँ विदा भेल। इटहरी आबि दुनू गोटे बस पकड़लक। बससँ बथनाहा आबि पएरे बिदा भेल। कोसीमे नाओपर पार भऽ निरमली तक पएरे आएल। निरमलीमे गाड़ी पकड़ि गाम आएल।
फुलपेंट कमीज, पएरमे चप्पल पहिरने, बाबरी उनटौने कान्हपर मोटरी लेने आगू-आगू पिचकुन आ पाछू-पाछू धनिया आबि माएकेँ गोड़ लगलक। टोल-पड़ोसक लोक पिचकुनकेँ चिन्हबे ने करैत। पिचकुन माएकेँ गोड़ लागि ओलतीमे चप्पल रखि माएकेँ घर लऽ जा मोटरी खोलि रुपैआक गड्डी चुपचाप देखौलक। ऊसरमे दूबि जनमि गेल। रुपैआक गड्डी देखि माएक मोन उड़ि गेलै। हसोथि-पसोथि कऽ सभ कपड़ा समेटि, रुपैया तरमे घोंसिया मोटरी बान्हि धरैनपर रखलक। धनिया ओसारपर बैसलि। धनियाक संबंधमे माए पिचकुनकेँ पूछलक- ‘‘ई कनियाँ के छथुन?’’
  मुसकी दैत पिचकुन कहलक- ‘‘तोरे पुतोहु। ओतै बिआह कऽ लेलौं।’’
  एक्के-दुइये टोलक जनिजाति आबए लागलि। पिचकुनक माए सभकेँ एक-एकटा सनतोला देलक। एकटा दसटकही जेबीसँ निकालि पिचकुन माएकेँ दैत कहलक- ‘‘माए भूख लागल अछि। जो दोकानसँ बेसाहि सभ कुछ लऽ आन। पहिने भानस कर। ताबे हम नहा लै छी। तीन दिनक रस्ताक झमारल छी, ओंघीसँ देह भसिआइत अछि।’’
  पुतोहु देखि पिचकुनक माए मुनेसरी सौँसे टोल पुतोहु देखैले हकार देलक। जातिकेँ भोजो गछलक।
सातम दिन पिचकुन दुनू परानी साँझकेँ सोमनी दादी ऐठाम गेल, आंगनमे बिछान बिछा सोमनी दादी पोता-पोती सभकेँ खेलबैत रहथि। दादीकेँ पिचकुन गोड़ लागि इशारासँ धनियाकेँ सेहो गोड़ लगै लऽ कहलक। धनिओ दादीकेँ गोड़ लगलक। ओछाइनिक कोनपर बैसि पिचकुन आँखिक इशारासँ दादीकेँ जाँतै लेल कहलक। धनिया सोमनी दादीकेँ जाँतए लागलि। पिचकुन सोमनी दादीकेँ कहए लगल- ‘‘दादी, गाममे तँ सभ बकलेले-ढहलेल बुझैत छलाए। साल भरि पहिने मोरंग गेलौं। कमेबो केलौं आ ओतै बिआहो कऽ लेलौं। आब गामेमे रहब। गाममे अहाँ सभसँ पैघ छी दुनू परानीकेँ असिरबाद दिअ।’’
  उत्तरवारि बाधमे, सभसँ बेसी खेत सोमनी दादीक। जहि बाधमे दू सालसँ रखवार नहि। पिचकुनकेँ दादी उत्तरवारि बाध रखवारि करैले कहलक। संगे पाँच कट्ठा खेत बटाइओ करैले कहलक। रोजी देखि पिचकुन गछि लेलक। पिचकुनकेँ खोपड़ी बन्हैले दादी दूटा बाँस, एक बोझ खढ़ आ एक मुट्ठी सावे गछलक।
दोसर दिन पिचकुन दुनू परानी उत्तरवारि बाध जा कऽ खोपड़ी बन्हैक जगह टेबलक। एकटा उचगर परती छल जहिपर बरसातोमे पानि नहि अटकै। धनियाक नजरि पीरारक गाछपर पड़लै, गाछ लग जा धनिया गाछमे फड़ तजबीज करए लागलि। फड़ देखि धनिया साड़ी कऽ फाँड़ बान्हि गाछपर चढ़ि गेलि। गाछमे लुबधल पीरारक फड़ देखि धनियाक मोन चपचपा गेलै। तीमन करैले दसटा तोड़िओ लेलक। जना ककरो माटिमे गड़ल रुपैआक तमघैल भेटलासँ खुशी होइत तहिना धनियाक मोन खुशी। पिचकुन कोदारिसँ परतीकेँ छिलए-बनबए लगल। मने-मन धनिया एक मनसँ उपरे फड़ एक-एकटा गाममे ठिकलक। खुशीसँ धनियाक मुहसँ गीत निकलए लगल। गीत गुनगुनाइत पिचकुनकेँ सोर पाड़ि धनिया कहलक- ‘‘तकदीर जागि गेल। देखै छिऐ गाछमे कोंकची लागल फड़ छै। काल्हिसँ तोड़ि हाट लऽ जाएब। खूब महग बिकाएत।’’
  पिचकुनकेँ बुझले ने। धनियाक बातपर बिस्वासे ने करै। खिसिया कऽ पिचकुन पुछलक- ‘‘अहाँ चिन्है छिऐ जे की छिऐ? जँ लोक खइतै तँ एहिना लुधकी लगल रहितै?’’
  पीरार देखि मने-मन धनिया अपन गरीबीकेँ खुशहाली दिशि‍ बढ़ैत देखति‍। गरीबी मनमे अमीरीक ज्योति अबैत देखलक। धनियासँ रक्का-टोकी नहि कऽ पिचकुन बाजल- ‘‘हमरा हाट-बजार करैक लूरि नै अछि। केना बेचब?’’
  धनिया नैहरोमे हाट-बाजार करैत छलि। खेतीक सभ काजक लूरि सेहो रहै। हाँस-बत्तक पोसबो करै आ हाट जा बेचबो करै। निर्भीक भऽ धनिया कहलक- ‘‘एकटा कड़चीक लग्गी बना कऽ सभ दिन तोड़बो करब आ बेचबो करब। अहाँ संगमे रहब।’’
आसिन आबि गेल। बरखा ठमकल। सबारी समए। अधिक बरखा भेने खेत सभमे धान उपरा-उपरी। जत्ते धरि नजरि जाइत तते धरि एकरंग हरिअर धान बुझि पड़ैत। बेर टगिते धानक पातपर ओसक बुन्न चमकए लगैत। जहिना कोनो बाला हरियर साड़ी हरियर आंगी पहिर माथमे मंगटीका पहिर देखबामे लगैत तहिना खेत रुपी बाला देखैमे लगैत। पुरबाक मन्द-मन्द हवा चलए लगल। जेतै बैसू तेत्तै आलस आबि जाइत। बाधमे तीन ठाम पानिक बहावक कटारि। जाहिसँ उपरका खेतक पानि निचला खेत दिशि‍ बहैत। पिचकुन तीनू कटारिकेँ दुनू भागसँ बान्हि अपिआरी बनौलक। अपिआरीक पानि उपछिते अनेरुआ माछ कूदि-कूदि अाबए लगल। धनिया अपिआरियो ओगरै आ माछो बिछै। पिचकुन छिट्टामे लऽ हाटो जा बेचै आ गामोमे घूमि-घूमि बेचए लगल। दोसर-दोसर माछ बेचनिहार पिचकुनकेँ एकटा साइकिल कीन लै लेल कहलक। माथपर माछक छिट्टा लऽ घुमने देहो महकै। साइकिलक नाम सुनि पिचकुनक सुतल मन फुरफुरा कऽ उठल। मुदा साइकिल चढ़ब नहि आबि पिचकुन थतमतमे पड़ि गेल। मने-मन पिचकुन सोचलक जे जखन साइकिल भऽ जाएत तखन चढ़ब सिखबो करब आ जाबे सीखल नै हएत ताबे पैछला सीटपर छिट्टा राखि गुरकाइये कऽ घूमि-घूमि बेचब। हाटसँ घुमैत काल पिचकुन धनियाकेँ कहलक- ‘‘अधपुराने एकटा साइकिल कीनि लेब।’’
  आमदनीक खुशी धनियाकेँ रहबे करै। मुस्कुरा कऽ कहलक- ‘‘जखन साइकिले कीनब तँ अधपुरान किऐक कीनब? नबके कीनि लिअ।’’
जितिआ पावनि। मड़ुआ रोटी माछक पावनि। एक दिन पहिने पिचकुनकेँ माछक बेना लोक सभ दऽ गेल। सुतली रातिमे पिचकुन चहा-चहा कऽ उठै आ घरवाली धनियाकेँ कहै- ‘‘अपिआरीक सभ माछ बीछि लेलक।’’ कहि सपना बुझि फेरि सुति रहै। अन्हरोखे दुनू परानी पिचकुन टौहकी छिट्टा लऽ अपिआरी लग गेल। अन्हार रहने माछ देखबे ने करै। एकटा अपियारी लग पिचकुन बैसल। दोसर लग धनमा। बीड़ी लगा-लगा पिचकुन पीबैत। फरिच्छ होइते एकटा मे पिचकुन आ दोसरमे धनिया माछ बिछए लागलि। माछ हएत की नहि तइ दुआरे लोक-सभ अपिआरिये लग पहुचए लगल। तराजू-बटिखारा नहि रहने पिचकुन अन्दाजेसँ बेचए लागल। छिट्टासँ उपरे माछ बिक गेलै। बचलाहा माछ दुनू परानी आंगन नेने आएल। अधासँ बेसिये अंगनोमे बिकल। पावनिक दिन रहने हाटक भरोसे रहब पिचकुन नीक नहि बुझि धनियाकेँ कहलक- ‘‘झब दे जलखै बनाउ। अखने माछ बेचए जाएब।’’
  हाँइ-हाँइ कऽ धनिया रोटी पका माछक सन्ना बनौलक। साइकिलपर छिट्टा लादि पिचकुन अंगने-अंगने माछ बेचए लगल। बारह बजैत-बजैत सभटा माछ बिक गेलै।
  रउदो तीखर। पिचकुन माछ बेचि पसीखाना पहुँच गेल। पसीखाना ताड़ी पिआकसँ भरल। दुनू परानी पासी गैहिकी सम्हारैमे तंग-तंग रहै। बैसैक जगह नहि देखि पिचकुन पासी लग जा एक बम्मा ताड़ी लऽ ठाढ़े-ठाढ़ पीबि कैंचा दऽ साइकिलपर चढ़ि बिदा भेल। धनियाकेँ भाँज लगि गेलै जे पिचकुन ताड़ी पीबैत अछि। दूरेसँ पिचकुनकेँ साइकिलपर अबैत देखि धनिया ओसारपर ओछाइन ओछा सुजनी ओढ़ि कुहरै लागलि। आंगन अबिते पिचकुन धनियाकेँ कुहरैत देखलक। धनियाक लगमे जा पिचकुन पुछलक- ‘‘की-इ-इ होइ-इ-इ अए-ए-ए?’’
  पिचकुनक बोली सुनि धनिया आरो जोर-जोरसँ कुहरए लागलि। धनियाक मुँह उघारि पिचकुन फेर पुछलक। नकिआइत धनिया बाजलि- ‘‘मरि जाएब। बड़का दुख पकड़ि लेलक। छाती दुखाइत अछि। जाउ दोकानसँ कड़ू तेल नेने आउ। सगरे देह मालिस करू, तखने छूटत।’’
  लटपटाइते पिचकुन शीशी लऽ दोकानसँ तेल आनि धनियाकेँ मालिस करै लगल। कर घूरि-घूरि धनिया पिचकुनसँ भरि पोख मालिस करौलक। जखन पिचकुनकेँ हाथ दुखा गेलै तखन धनिया बाजलि- ‘‘कन्नी कऽ मन हल्लुक लगै अए।’’
  मन हल्लुक सुनि पिचकुनक मनमे आशा जगै। पुनः मालिस करै लगै। धीरे-धीरे पिचकुनोक निशाँ उतड़ै आ धनियोक तामस कमै। पिचकुन खुशी जे घरवाली बँचि गेलै आ धनिया खुशी जे ताड़ी पीबैक नीक सजा देलिअनि।
आसिन कातिकक आमदनीसँ पिचकुनक जिनगीक नींव पड़ल, पीरारसँ लऽ कऽ माछ तकमे नीक कमेलक। जहि पिचकुनक जिनगी गरीबीसँ जर्जर छल जे जानवरोसँ बत्तर जिनगी जीबैत छल। जहिना मनुख जानवरक विकसित रुप छी तहिना पिचकुनो जानवरक जिनगी टपि मनुखक जिनगीमे प्रवेश केलक। जहिना हमर पूर्वज खोपड़ी बना रहैत छलाह आ धीरे-धीरे आइ नीक मकानमे रहैत छथि तहिना पिचकुन माटिक भीतक देवालक घर बनबैक विचार केलक। ओना पानियोक अपना कोनो उपाए नहि अछि जेकरा लेल आगू साल जोगार करैक विचार दुनू परानी मिलि केलक। सिर्फ घरे आ पानियेक दिक्कत पिचकुनकेँ नहि। ने घरमे सुतैक लेल चौकी आ ने भानस करैले बरतन छलै जे सभ रसे-रसे जोगार करैक विचार केलक।
सौँसे बाधमे धान फुटि लबल। हरियर उज्जर लाल कारी शीशसँ बाध चमकए लगल। दुनू परानी पिचकुन घर-आंगन छोड़ि भरि-भरि दिन बाधेमे रहए लगल। जँ बाधमे नहि रहैत तँ साँढ़-पाड़ाक उपद्रव, घसवहिनीक उपद्रवसँ गिरहस्तक मुँहे फज्झति सुनैत।
साँझू पहरकेँ धनिया सोमनी दादी लग जा खेतमे लुबधल धानक प्रशंसा करैत। सोमनी दादी हृदएसँ धनियाकेँ असिरवाद दैत। सामा पाबनि भऽ गेल। गोट-पङरा खेतक धान सेहो पाकए लगल। बैसारी देखि धनिया पिचकुनकेँ कहलक- ‘‘पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि-कोड़ि कऽ सरिआ दिऔ जे आगू नीक-नहाँति फड़त।’’
  धनियाक बात सुनि पिचकुन बढ़ियाँ जेकाँ पीरारक गाछक जड़िकेँ तामि बकरी भेरारी मिलल छाउर पाँचो गाछमे चारि-चारि पथिया दऽ दू-दू घैल पानि सेहो देलक। पनरहे दिनक बाद पाँचो गाछक रंग बदलि हरियर-कचोर भऽ गेलै। सभ मूड़ीमे नवका कलश सेहो भेलै। जहिना मनुख अपन बच्चाकेँ सेवा करैत, तहिना दुनू परानी पिचकुन पीरारक गाछकेँ करए लगल। अपन सेवा देखि पाँचो पीरारक गाछ हृदएसँ दुनू परानी पिचकुनकेँ असिरवाद देमए लगल।

Saturday, October 4, 2008

बिसाँढ़- जगदीश प्रसाद मण्डल




पछिला चारि सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, अन्नसँ लहलहाइत खेत, पानिसँ भरल इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंगसँ लऽ कऽ गाए महीस आ बकरीसँ भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेकाँ। बीरान। सबहक मनमे एक्केटा विचार अबैत जे आब ई गाम नै रहत। जँ रहबो करत तँ खाली माटियेटा। किएक तँ जहि गाममे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीबैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक की हवा पीबि कऽ रहत? जहि मातृभूमिक महिमा अदौसँ सभ गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदीमे पेटकान लाधि देलक। मुदा तैयो लोकक टूटैत आशाक वृक्षमे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किएक तँ आखिर जनकक राज मिथिला छियै की ने। जहि राज्यमे बारह-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राजमे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेर भेटए। एक दिशि रौदीक सघन मृत्युवाण चलैत तँ दोसर दिशिसँ आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकाबला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। एहनो स्थितिमे दुनू परानी डोमनक मनमे जीबैक ओहने आशा बनल रहल, जेहने सुभ्यस्त समएमे। कान्हपर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथपर सिंगही माछ आ बिसाँढ़सँ भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरिसँ आंगन, जिनगीक गप-सप्पा करैत अबैत। चानिक पसीना दहिना हाथसँ पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’’, पत्नीक बात सुनि डोमन पाछू घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चाँ केने आगू डेग बढ़बए लगल। किएक तँ खाइक ओते चिन्ता मनमे नहि, जते पानि पीबैक।
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डोमनकेँ अपन खेत-पथार नहि। मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सभ काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्तसँ बन्हाएल नहि, ओना समए-कुसमए अपना काज नहि रहने बोइनो कऽ लैत। अपना खेत नहि रहने खेती तँ नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ सभ साल बटाइ रोपि लैत, जाहिसँ पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबैमे बेसी मिहनत होइत अछि। सभ दिन बीआ पटबए पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणिमे बड़की पोखरिक किनछरिमे डोमन बीआ पाड़ि लैत। लगमे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिनमे बीआ रोपाउ भऽ जाइत। मिरगिसियामे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लैत। मुदा एहि बेर से नञि भेलै। बरखा नहि भेने बीआ बीरारेमे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाममे नहि भेलै। आ ने कियो अखन धरि धानक बीरारक खेत जोतलक आ ने बीआ बाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मनमे हुअए लगल। मुदा तैयो ककरो मनमे अन्देशा नहि! किएक तँ ढ़ेनुआर नक्षत्र सभ पछुआइले अछि।
  जहिना रोहणि-मिरगिसिया फांेक गेल तहिना अद्रो। समए सेहो खूब तबि गेलै। दस बजेसँ पहिनहि सभ बाधसँ आंगन आबि जाएत। किएक तँ लू लगैक डर सबहक मनमे। मड़ुआ खेती नहि भेने दुनू परानी डोमनक मनमे चिन्ता पैसए लगल। बड़की पोखरिसँ दुनू परानी पुरैनिक पातक बोझ माथपर नेने अंगना अबैत। बाटमे सुगिया बाजलि- ‘‘अइ बेर एक्को कनमा मड़ुआ नञि भेल। बटाइयो केने आन साल ओते भऽ जाइत छल जे सालो भरि जलखै चलि जाइ छलाए। अइ बेर तँ जलखइओ बेसाहिये कऽ चलत।’’
  माथ परक पुरैनिक पातक बोझसँ पानि चुबैत। जे डोमनो आ सुगियोकेँ अधभिज्जु कऽ देने। नाक परक पानि पोछैत डोमन उत्तर देलक- ‘‘कोनो कि हमरेटा नञि भेल आकि गामेमे ककरो नै भेलै। अनका होइतै आ अपना नै होइत तखन ने दुख होइत। मुदा जब ककरो नै भेलै तँ हमरे किअए दुख हएत। जे दसक गति हेतै से हमरो हएत। अपना तँ पुरैन-पातक बिक्रीक रोजगारो अछि आ जेकरा इहो ने छै?’’
  डोमनक उत्तर सुनि मिरमिरा कऽ सुगिया बाजलि- ‘हँ, से तँ ठीके। मुदा ठनका ठनकै छै तँ कियो अपने माथपर ने हाथ दै अए। तखन तँ ई रौदी इसरक डाँग छी, लोकक कोन साध।’’
अखन धरिक समए कियो रौदी नहि बुझलक। सबहक मनमे यएह होइत जे ई तँ भगवानक लीले छियनि। जे कोनो साल अगतेसँ पानि हुअए लगैत तँ कोनो साल अंतमे होइत। कोनो साल बेसिओ होइत तँ कोनो साल कम्मो। कोनो-कोनो साल नहिये होइत। जहि साल अगते बिहरिया हाल भऽ जाइत ओहि साल समएपर गिरहस्ती चलैत मुदा जहि साल पचता पानि होइत तहि साल अधखड़ू खेती भऽ जाइत। मुदा जखन हथिया नक्षत्र धरि पानि नहि भेल तखन सबहक मनमे अाबए लगल जे अइ बेर रौदी भऽ गेल। ओहिना जोतल- बिनु जोतल खेतसँ गरदा उड़ैत। घास-पातक कतौ दरस नहि। मुदा तेँ कि लोक हारि मानि लेत। कथमपि नहि। सभ दिनसँ गामक लोकमे सीना तानि कऽ जीबैक अभ्यास बनल अछि ओ पीठ कोना देखाओत? भऽ सकैत अछि जे इन्द्र भगवानकेँ कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि। जाहिसँ बिगड़ि कऽ एना केलनि। तेँ हुनका बौँसब जरुरी अछि। जखने फेर सुधरि जेताह तखनेसँ सभ काज सुढ़िया जाएत। यएह सोचि कियो भुखल दुखलकेँ अन्न दान तँ कियो कीर्तन-अष्टयाम-नवाह तँ कियो यज्ञ-जप चंडी, विष्णु तँ कियो महादेव पूजा लिंग इत्यादि अनेको रंगक बौँसैक ओरियान शुरु केलक। जनिजाति सभ कमला-कोशीकेँ छागर-पाठी कबुला सेहो करए लगलीह। किएक तँ जँ हुनकर महिमा जगतनि तँ बिनु बरखोक बाढ़ि अनतीह। बाढ़ि आओत पोखरि-झाखड़िसँ लऽ कऽ चर-चौरी, डीह-डाबर सभ भरत। रौदी कमत। अधा छिधा उपजो हेबे करत।
  बरखाक मकमकी देखि नेङरा काका महाजनी बन्न कऽ लेलनि। ओ बुझि गेलखिन जे अइ बेरक रौदी अगिला साल बिसाएत। मुदा सोझमतिया बौकी काकीक सभ चाउर सठि गेलनि। ओना बौकी काकीक लहनो छोट। सिर्फ चाउरेक। सेहो पावनिये-तिहार धरि समटल। हुनकर महाजनी मातृ-नवमी, पितृपक्षसँ शुरु होइत। पाहुन-परकक लेल दुर्गापूजा, कोजगरा होइत दिवाली परेब, गोवर्धनपूजा, भरदुतिया, छठि होइत सामा धरि अबैत-अबैत सम्पन्न भऽ जाइत छलनि। किएक तँ सामाकेँ सभ नवका चूड़ा खुआबैत। खुएबे टा नहि करैत संग भारो दैत। ताधरि कोला-कोली धानो पकि जाइत। मुदा से बात बौकी काकी वुझबे ने केलखिन जे अइ बेर रौदी भऽ गेल। तेँ अपनो खाइ ले किछु नहि रखलथि। जहिना बोनिहार, किसान तहिना महाजन बौकियो काकी भऽ गेलीह।
  अगहन अबैत-अबैत सभकेँ बुझि पड़ए लगलैक जे अपने की खाएब आ माल-जालकेँ की खुआएब। किएक तँ कातिक धरिक ओरियान -अपनो आ मालो-जालक लेल- तँ अधिकांश लोक पहिनहि सँ कऽ कऽ रखैत। जे नेङरा काका छोड़ि सबहक सठि गेलनि। धानोक बीआ सभ कुटि-छाँटि कऽ खा गेल। धानक कोन गप जे हालक दुआरे रब्बियो-राइ हएब कठिन। सबहक भक्क खुजल। भक्क खुजितहि मनमे चिन्ता समाइ लगल। जेना-जेना समए बीतैत तेना-तेना चिन्तो फौदाइत। एक तँ ओहिना चुल्हि सभ बन्न हुअए लगल तइ परसँ सुरसा जेकाँ समए मुँह बाबि आगूमे ठाढ़। चिन्तासँ लोक रोगाइ लगल। भोर होइतहि धिया-पूताक बाजा सौंसे गाम बाजए लगैत। मौगी पुरुखकेँ करमघट्टू तँ पुरुख मौगीकेँ राक्षसनी कहए लगल। जाहिसँ धिया-पूताक बाजाक संग दुनू परानीक नाच शुरु भऽ जाइत। मुदा एहन समए भेलोपर दुनू परानी डोमनक मनमे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। किएक तँ जूरे-शीतलसँ पुरैनिक पातक कारोबार शुरु केलक। कारोबार नमहर। बावन बीघाक बड़की पोखरि। जहिमे सापर-पिट्टा पुरैनिक गाछ। बजारो नमहर। निरमली, घोघरडिहा, झंझारपुर स्टेशनो आ पुरनो बजार। असकरे सुगिया कते बेचत। पुरैनिक पात कीननिहार हलुआइसँ लऽ कऽ मुरही-कचड़ीवाली धरि। तइपर सँ भोज-काजमे सेहो बिकाइत। तेँ आठ दिनपर पार लगौने रहए। भरि दिन डोमन पत्ता तोड़ि-तोड़ि जमा करैत। एक दिनकेँ सुगिया पत्ता सरिअबैत, गनि-गनि तेसरा दिन भोरुके गाड़ीसँ बेचैले जाइत। जे पात उगड़ि जाय ओकरा डोमन सुखा-सुखा रखैत। किएक तँ सुखेलहो पातक बिक्री होइत।
निरमलीसँ पात बेचि कऽ सुगिया आबि पतिकेँ कहलक- ‘‘रौदी भेने अपन चलती आबि गेल।’’
  चलतीक नाम सुनि मुस्की दैत डोमन पुछलक- “से की? ’’
    ‘‘सभ पात बेचिनिहार बेपारी थस लऽ लेलक। सभ गामक पोखरि सुखि गेलै जाहिसँ सबहक कारेबार बन्न भऽ गेलै। अपने टा पात बजार पहुँचैए। आइ तँ जहाँ गाड़ीसँ उतड़लहुँ आकि दोकानदार सभ सभ-पात छानि लेलक। टीशनेपर छुहुक्का उड़ि गेल।’’
  डोमन- ‘‘अहाँकेँ लूरि नञि छलए जे दाम बढ़ा दितिऐ, एकक दू होइत।’’
  सुगिया- ‘‘अगिला खेपसँ सएह करब। आब तँ बड़िड़यो जुआइत हएत की ने?’’
  डोमन- ‘‘गोटे-गोटे जुआएलहेँ। मुदा बीछि-बीछि तोड़ए पड़त। तेँ पाँच दिन आरो छोड़ि दै छिऐ।’’
तेसर साल चढ़ैत-चढ़ैत गामक एकटा बड़की पोखरि आ पाँचटा इनार छोड़ि सभ सुखि गेल। नमहर आँट-पेटक बड़की पोखरि। किएक तँ दैतक खुनल छी की ने? लोकक खुनल थोड़े छिऐ। देव अंश अछि। तेँ ने गामक सभ अपन बेटाकेँ उपनयनो आ बिआहोमे ओही पोखरिमे नहबैए। ततबे नहि छठिमे हाथो उठबैए। हमरा इलाकाक पृथ्वी ओक बनाबटि अजीब अछि। बुझू तँ माटिक पहाड़। पाँच फुटसँ निच्चाँ धरि ने बाउल अछि आ ने पानि। शुद्ध माटि। जाहिसँ ने एक्कोटा चापाकल आ ने बोरिंग गाममे। पानिक दुआरे गामक-गाम लोककेँ पराइन लगि गेल। माल-जाल उपटि गेल। चाहे तँ लोक बेचि लेलक वा खढ़ पानिक दुआरे मरि गेल। अधासँ बेसी गाछो-बिरीछ सुखि गेल। चिड़ै-चुनमुनी इलाका छोड़ि देलक। जे मूस अगहनमे अंग्रेजी बाजा बजा सत-सतटा विआह करैत छल ओ या तँ बिलेमे मरि गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि। हमरो गामक अधासँ बेसिये लोक पड़ा गेल। मुदा तैयो जिबठगर लोक गाम छोड़ैले तैयार नहि। पुरुख सभ गाम छोड़ि परदेश खटैले चलि गेल। मुदा बालो-बच्चा आ जनि-जातियो गामेमे रहल। पोखरि-इनारकेँ सुखैत देखि, पानि पीबैक लेल बड़किये पोखरिक कतबाहिमे कुप खुनि-खुनि लेलक। अपन-अपन कुप सभकेँ। पानिक कमी नहि। तीन सालक जे रौदी परोपट्टाक लेल वाम भऽ गेल वएह डोमनक लेल दहिन भऽ गेल। काज तँ आने साल जेकाँ मुदा आमदनी दोबर-तेबर भऽ गेलै। गामक जमीनोक दर घटल। जाहिसँ डोमन खेत कीनए लगल। ओना सुगियाक इच्छा खेत कीनैक नहि। किएक तँ मनमे होए जे एहिना रौदी रहत आ खेत सभ पड़ता रहत। तेँ अनेरे खेत लऽ कऽ की करब। मुदा मालो-जाल तँ घास-पानिक दुआरे नहिये लेब नीक हएत। डोमनक मनमे आशा रहए जे जहिना लुल्हियो कनियाँ बेटा जनमा कऽ गिरथाइन बनि जाइत, तहिना तँ पानि भेने परतियो खेत हएत की ने।
  योगी-तपस्वीक भूमि मिथिला अदौसँ रहल। जे अपन देह जीव-जन्तुक कल्याणक लेल गला लेलनि। ओ कि एहि बातकेँ नहि जनैत छलथिन। जनैत छलथिन। तेँ ने गाममे अट्ठारह गण्डा माने ७२ टा पोखरि, सत्ताइस गण्डा माने १०८ टा इनारक संग-संग चौरीमे सैकड़ो कोचाढ़ि-बिरइ खुनि पानिक बखारी बनौने छलाह। सोलहो आना बरखे भरोसे नहि, अपनो जोगार केने छलाह।
  तीन साल तँ दुनू परानी डोमन चैनसँ बितौलक। मुदा चारिम साल अबैत-अबैत बेचैन हुअए लगल। गामक सभ पोखरि-इनार तँ पहिनहि सुखि गेल छल। लऽ दऽ कऽ बड़की पोखरि टा बँचल। तहूमे सुखैत-सुखैत मात्र कठ्ठा पाँचेमे पानि बचल। सुखल दिशि पुरैनियो उपटि गेल। बीचमे जे पानि, ओहीमे पुरैनिक गाछ रहए, मुदा जाँघ भरिसँ उपरे गादि। पैसब महा-मोसकिल। पाएर दइते सरसरा कऽ जाँघ भरि गड़ि जाइत। के जान गमबए पैसत। निराशाक जंगलमे डोमन बौआ गेल। मनमे हुअए लगलै जे जहिना गामक लोक चलि गेल तहिना हमहूँ चलि जाएब। जानि कऽ परानो गमाएब नीक नहि। जिनगी बचत, समए-साल बदलतै तँ फेर घुरि कऽ आएब नहि तँ कतौ मरि जाएब। जहिना गामक सभ कुछ बिलटि गेल, समाजक लोक बिलटि गेल, तहिना हमहूँ बिलटि जाएब।
  पतिकेँ चिन्तित देखि सुगिया पुछलक- ‘‘किछु होइए? एना किअए मन खसल अछि?’’
  पत्निक प्रश्न सुनि डोमन आँखि उठा कऽ देखि पुनः आँखि निच्चाँ कऽ लेलक। आँखि निच्चाँ करितहि सुगिया दोहरा कऽ पुछलक- ‘‘मन-तन खराब अछि?’’
  नजरि उठा डोमन उत्तर देलक- ‘‘तन तँ नहि खराब अछि मुदा तनेक दुख देखि मन सोगाएल अछि। जइ आशापर अखन धरि खेपलहुँ ओ तँ चलिये गेल। जे अगिलोक कोनो आशा नहि देखै छी। की करब आब?’’
  सुगिया- ‘‘अपना केने किछु ने होइ छै। जे भगवान जनम देलनि, मुँह चीड़ने छथि अहारो तँ वएह ने देताह। तइ लेल एत्ते चिन्ता किअए करै छी?’’
  डोमन- ‘‘गामक सभ कुछ बिलटि गेल। एहेन सुन्दर गाम छल, सेहो उपटि रहल अछि। सिर्फ माटि टा बँचल अछि। की माटि खुनि-खुनि खाएब? बिना अन्न-पानिक काए दिन ठाढ़ रहब?’’
  ‘‘चिन्ता छोड़ू। जहिया जे हेबाक हेतै से हेतै। अखन तँ पानियो अछिये आ अन्नो अछिये। जाधरि एहि धरतीपर दाना-पानी लिखल हएत ताधरि भेटबे करत। जहिया उठि जाएत तहिया ककरो रोकने रोकेबै। तइ लेल एत्ते चिन्ता किअए करै छी।’’
  कहि सुगिया भानसक ओरियान करए लागलि। पत्नीक बात सुनि डोमन मने-मन सोचए लगल जे हमरा तँ मरैयोक डर होइए मुदा ओकरा कहाँ होइ छै। ओ तँ मरइयो लेल तैयारे अछि। फेर मनमे उठलै जे जीवन-मृत्युक बीच सदासँ संघर्ष होइत आएल अछि आ होइत रहत। तहिसँ पाछू हटब कायरता छी। जे मनुष्य कायर अछि ओ कोन जिनगीक आशामे अनेरे दुनियाँकेँ अजबारने अछि। पुनः अपना दिश तकलक। अपना दिश तकितहि मनमे एलै जे जीबैक बाट हरा गेल अछि। तेँ एते चिन्ता दबने अछि। तमाकुल चुना कऽ मुँहमे लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते अपन माए-बापसँ लऽ कऽ पछिला पुरखा दिशि घोड़ा जेकाँ नजरि दौड़लै। मुदा कतौ रुकलै नहि। जाइत-जाइत मनुष्यक जड़ि धरि पहुँचि गेल। पुनः घुमि कऽ आबि नजरि माए लग अटकि गेलै। मन पड़लै माएक संग बितौलहा जिनगी। मन पड़लै माइयक ओ बात जे दस बर्खक अवस्थामे रौदी बितौने छल। रौदी मन पड़ितहि बड़की पोखरिक बिसाँढ़ आ अन्है माँछ आँखिक सोझमे आबि गेलै। कने काल गुम्म भऽ मन पाड़ए लगल।
  मन पड़लै, अही पुरैनिक जड़िमे तँ बिसाँढ़ो फड़ैत अछि। अल्हुए जेकाँ। जहिना माटिक तरमे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ रहै छै तहिना पुरैनिक जड़िमे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनायास मुँहसँ निकललै- “बाप रे, बाबन बीघाक पोखरिमे तँ कते ने कते बिसाँढ़ हेतै। ओकरे खुनैमे माछो भेटत। खाधि बना-बना सिंही-मांगुर रहैए। एक पंथ दू काज। मनमे खुशी अबिते पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘भगवान बड़ी टा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीव-जंतुकेँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।’’
पतिक बात सुनि सुगिया अकबका गेल। बुझबे ने केलक। मुँह बाबि पति दिशि देखैत रहलीह। पुनः डोमन कहलक- ‘‘चुल्हि मिझा दिऔ। घुरि कऽ आएब तखन भानस करब।’’
  पतिक उत्साह देखि सुगिया मने-मन सोचए लगली जे मन ने तँ सनकि गेलनिहेँ। अखने मुरदा जेकाँ पनिमरु छलाह। आ लगले की भऽ गेलनि। दोसर बात परखैक खियालसँ चुप-चाप ठाढ़ रहली।
  डोमन फेर बाजल- ‘‘की कहलौं ? पहिने आँच मिझा दिऔ। फटक लगा छिट्टा लऽ कऽ संगे चलू।’’
  सुगिया पुछलक- ‘कत्तऽ।’
  ‘‘बड़की पोखरि।’’
  ‘किअए?’
  ‘‘एहन-एहन सइओ रौदी कटैक खेनाइ पोखरिमे दाबल अछि। आनैले चलू।’’
  सवाल-जबाव नहि कऽ सुगिया आगि पझा, फटक लगा छिट्टा लऽ तैयार भेलि। घरसँ कोदारि निकालि डोमन बिदा भेल। आगू-आगू डोमन आ पाछु-पाछु सुगिया। बड़की पोखरिक महारपर पहुँचि डोमन हाथक इशारासँ पत्नीकेँ देखबैत बाजल- ‘‘जते पोखरिक पेट सुखल अछि ओहिमे तते खाइक वस्तु गड़ाएल अछि जे ने खाइक कमी रहत आ ने पीबैक पानिक। जेना-जेना पानि सुखैत जेतै तेना-तेना कुपकेँ गहींर करैत जाएब। जते पुरैनिक गाछ सुखाएल अछि ओहिमे घुरछा जेकाँ बिसाँढ़ फड़ल हएत।’’
  पोखरि धँसि डोमन तीन डेग उत्तरे-दछिने आ तीन डेग पूबे पछिमे नापि कोदारिसँ चेन्ह देलक। एक धुर। उत्तरबरिया पूबरिया कोनपर कोदारि मारलक। माटि तते सक्कत जे कोदारि धँसबे ने कएल। दोहरा कऽ फेर जोरसँ कोदारि मारलक। कोदारि फेर नै धँसल। आगू दिशि देखि हियाबए लगल जे किछु दूर आगूक माटि नरम हएत। खुनैमे असान हएत। मनक खुशी उफनि कऽ आगू खसल- ‘‘अए ढ़ोरबा माए, हम पुरुख नञि छी। देखियौ हमरा माटि गुदानबे ने करैए। अहाँ हमरासँ पनिगर छी, दू छअ मारि कऽ देखियौ।’’
  सुगिया- ‘‘हमर चूड़ी-साड़ी पहीर लिअ आ हमरा धोती दिअ। तखन कोदारि पाड़िकेँ देखा दै छी।’’
  मुस्की दैत दुनू आगू मुँहे ससरल। एक लग्गा आगू बढ़लापर माटि नरम बुझि पड़लै। कोदारि मारि कऽ देखलक तँ माटि सहगर लगलै। एक धुर नापि डोमन खुनए लगल। पहिले छअमे एकटा बिसाँढ़क लोली जगलै। लोल देखितहि उछलि कऽ बाजल- ‘‘हे देखियौ। यएह छी बिसाँढ़।’’
  सुगिया- ‘‘लोल देखने नञि बुझब। सौँसे खुनि कऽ देखा दिअ।’’
  पत्नीक बात सुनि डोमनकेँ हुअए लगल जे हो न हो कहीं अधेपर सँ ने कटि जाए। से नहि तँ लोल पकड़ि डोला कऽ उखाड़ि लै छी। मुदा नै उखड़ल। कने हटि दमसा कऽ दोसर छअ मारलक। छअ मारितहि एक बीतक देखलाहा आ चारि-चारि ओंगरीक दूटा आरो देखलक। तीनूकेँ खुनि दुनू परानी निङहारि-निङहारि देखए लगल।
  उज्जर-उज्जर। नाम-नाम। लठिआहा बाँस जेकाँ गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेकाँ चिक्कन, बीत भरिसँ हाथ भरिक। पाव भरिसँ आध सेर धरिक।
  सुगिया दिशि नजरि उठा कऽ डोमन देखलक तँ पचास वर्षक आगूक जिनगी बुझि पड़लै। पति दिशि नजरि उठा कऽ सुगिया देखलक तँ चूड़ीक मधुर स्वर आ चमकैत मांगक सिनदुर देखलक।’’
  छिट्टा भरि विसाँढ़ आ सेर चारिएक सिंही माछ नेने दुनू परानी विदा भेल।