Friday, November 21, 2008

डीहक बटबारा - जगदीश प्रसाद मण्डल



अमानतक दिन। चारि बजे भोरेसँ पूड़ी-जिलेबी, तरकारीक सुगंध गामक हवामे पसरि गेल। सौँसे गामक लोककेँ बुझले, तेँ ककरो सुगंधसँ आश्चर्य नै होए। भोरे श्रीकान्तोक पत्नी आ मुकुन्दोक पत्नी फूल तोड़ि, नहा ब्रह्मस्थान पूजा करए गेलि। हलुआइ दू-चुल्हियापर तरकारियो बनबैत आ जिलेबियो छनैत। कुरसीपर बैसल श्रीकान्त मने-मन ब्रह्मबाबाक कबुला केलक जे जँ हमरा मनोनुकूल नापी भेल तँ तोरा जोड़ा छागर चढ़ेबह। तहिना मुकुन्दो। गामक सुगंधित हवामे सबहक मन उधिआइत। चाह बनबैबला चाह बनबैमे व्यस्त। पान लगबैबला पानमे। दुनू दिशि कट्ठा-कट्ठा भरिक टेंट लागल। दड़ी आ जाजीम बिछाओल। एक भागमे गाँजा पीनिहारक बैसार आ दोसर भागमे दारुक। जहिना बुचाइ कूदि कऽ कखनो हलुआइ लग जा देखैत तँ कखनो दारुबलाक बैसारमे जा दू-गिलास चढ़ा दैत। तहिना सरुपो। सभ कथूक ओरियान काल्हिये दुनू गोटे, दुनू दिशि कऽ नेने, तेँ अनतऽ जेबाक जरुरते नहि ककरो, चाह-पानक इत्ता नै। जेकरा जते मन हुअए से तत्ते खाउ-पीबू। जलखैमे पूड़ी-जिलेबी डलना आ कलौमे खस्सीक माँस आ तुलसीफुलक भात। तेँ भरि दिनक चिन्ता सबहक मनसँ पड़ाएल। जीविलाह सभ दुनू दिशि टहलि-टहलि खाइत-पीबैत।

श्रीकान्तो आ मुकुन्दो इंजीनियर। दुनू एक्के वंशक। दुनूक परदादा सहोदरे भाए। पाँच कट्ठाक घरारी, जहिमे दुनू गोटेक अधा-अधा हिस्सा। जहियेसँ दुनू गोटे नोकरी शुरु केलनि, तहियेसँ गाम छोड़ि देलनि। एक पुरिखियाह वंश, तेँ परिवारमे दोसर नहि। पैंतीस सालक नोकरीक बीच कहियो, दुनूमेसँ कियो, गाम नहि आएल। जहिसँ पहिलुका बापक बनाओल घर दुनूक खसि पड़लनि। गामक स्त्रीगण सभ ठाठ-कोरो, धरनिकेँ उजाड़ि-उजाड़ि जरा लेलक। ढ़िमका-ढ़िमकीकेँ सरिया गामक छौँड़ा सभ फील्ड बना लेलक। गामक जते खेलवाड़ी छौँड़ा सभ  छल ओ सभ अपन-अपन खेलक जगह बाँटि लेलक। एकटा फील्ड कबड्डीक, दोसर गुड़ी-गुड़ीक, तेसर चिक्का-चिक्काक, चारिम गुल्ली-डंटाक आ पाँचम रुमाल चोरक बनि गेल। उकट्ठी छौँड़ा सभ एक दोसराक फील्डमे रातिकेँ, झाड़ा फीरि दै। मुदा खेल शुरु करैसँ पहिने दस-बीसटा गारि पढ़ि सभ अपन-अपन फील्ड चिक्कन बना लिअए। ओना दुनू गोटे -श्रीकान्तो आ मुकुन्दो- बाहरे घर बना नेने छथि, मुदा मरै बेरमे दुनूकेँ गाम मन पड़लनि। साले भरिक नोकरी दुनूक बाँचल तेँ तीन मासक छुट्टी लऽ लऽ गाम ऐलाह। गाम अबैसँ पहिने दुनू गोटे, फोनक माध्यमसँ, अबैक दिन निर्धारित कऽ नेने रहथि। किएक तँ परोछा-परोछी नापी करौलासँ आगू झंझटिक डर दुनूक मनमे रहनि।
घरारी नापी होइसँ दस दिन पहिने श्रीकान्त गाम ऐलाह। अपना तँ घरो नहि, मुदा अबैकाल एकटा रौटी, सुतै-बइसैक समानक संग भानसो करैक सभ कुछ नेने ऐलाह। गाम आबि पितिऔत भाइकेँ कहि सभ बेवस्था केलनि। सभ गर लगला बाद भाएकेँ पुछलखिन- ‘बौआ, गाममे के सभ मुहपुरखी करैए?’
भाए कहलकनि- ‘गाममे तँ कियो राजनीति नहिये करैए मुदा बुचाइ आ सरुप सभ धंधा करैत अछि।’
‘की सभ धंधा?’
‘जना कियो खेत कीनैए वा बेचैए, ओहि बीचमे पड़ि किछु कमा लै अए। तहिना गाइयो-महीसमे करैए। भोट-भाँटसँ लऽ कऽ कथा-कुटुमैती धरिमे किछु नहि किछु हाथ मारिये लैत अछि।’
भाएक बात सुनि इंजीनियर सहाएब कने काल गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन सोचि-विचारि कहलखिन- ‘कनी बुचाइकेँ बजौने आबह?’
‘बड़वढ़िया’ कहि भाए बुचाइकेँ बजबए विदा भेल। मने-मन श्रीकान्त सोचए लगलथि जे गाममे तँ सबहक हालत तेनाहे सन अछि। देखै छिऐ जे जेहने घर-दुआर छै तेहने बगए बानि। दू चारिटा जे ईंटो घर देखै छिऐ सेहो भितघरे जेकाँ। तेँ गाममे ओहन घर बना कऽ देखा देबै जे गामक कोन बात, परोपट्टाक लोक देखए आओत। पुरान लोक सबहक कहब छनि जे जेहेन हवा बहै ओहि अनुकूल चली। युग पाइक अछि। जेकरा पाइ रहतै ओ बुधियार। जेकरा पाइ नै रहतै ओ किछु नहि। असकर बिरहसपतियो फूसि। जेकरा पाइ छै वएह नीक घर बनबैत अछि, नीक गाड़ीमे चढ़ैत अछि। ओकरे धिया-पूता नीक स्कूल-कओलेजमे पढ़ैत अछि। ओकरे परिवारक लोक नीक लत्ता-कपड़ा पहिरैत अछि। बेटा-बेटीक विआह नीक परिवारमे होइ छै। आइक जे सुख-सुविधा विज्ञान करौलकहेँ ओकर सुख भोगैत अछि। यएह ने युगक संग चलब थिक। समाजक बीच प्रतिष्ठा बनाएब तँ वामा हाथक काज छी। अधलासँ अधलाह काज कऽ कऽ पाइ कमा लिअ आ समाजकैँ भोज खुआ दिऔ, बस जसे-जस, प्रतिष्ठे-प्रतिष्ठा। हाथमे पाइ अछि, सभ कुछ कऽ कऽ गौँआकेँ देखा देबै। बेटो-बेटीकेँ पढ़ा-लिखा, बिआह-दुरागमन करा कऽ निचेने छी। तखन तँ एकटा काज मात्र पछुआइल अछि, ओ अछि सामाजिक प्रतिष्ठा। सेहो बनाइये लेब।
मने-मन श्रीकान्त विचारिते रहथि आकि बुचाइक संग भाए पहुँचलनि। लगमे अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि बाजल- ‘गोड़ लगै छी कक्का। अहाँ तँ गामकेँ बिसरि गेलिऐ। सरकारक एयर कंडीशन मकान भेटले अछि, तेँ किए थाल-कादोमे आबि मच्छर कटाएब?’
अपनाकेँ छिपबैत श्रीकान्त बजलाह- ‘नै बौआ, से बात नै अछि। जखने नोकरीक जिनगी शुरु केलहुँ तखने दोसराक गुलाम बनि गेलहुँ। जे-जे हुकूम देत से से करै पड़त। तू सभ कम उमेरक छह तेँ नञि देखलहक, मुदा हम तँ अंग्रेजक शासन देखने छी की ने ! शासन तरे-तर चलैत छै, जे सभ थोड़े बुझैए। अंग्रेजक पीठिपोहु छल अइठामक राजा-रजबाड़ आ ओकरा सबहक फाँड़ी थिक जमीनदार सभ। ओ सभ जे एहिठामक लोकक संग बेबहार करैत छल आ करैत अछि से तँ तोहूँ सभ देखते छहक। मुदा अइ सभ गपकेँ छोड़ह। तोरा जे बजौलिअह से सुनह। साले भरि आब नोकरी अछि। नोकरी समाप्त भेला बाद गामेमे रहब। तेँ तीन मासक छुट्टी लऽ कऽ एलहुँहेँ जे घरारीक अमानत करा घर बनाएब। बिना घरे रहब कतऽ।’
बुचाइ- ‘हँ, ई तँ जरुरिये अछि। मुदा हमरा किअए बजेलहुँ?’
पासा बदलैत श्रीकान्त- ‘मुकुन्द जीकेँ सेहो खबरि दऽ देने छिअनि। ओहो काल्हिसँ परसू धरि एबे करताह। ऐठाम तँ दुइये गोटेक घरारी खाली अछि, तेँ दुनू गोटेक रहब जरुरी अछि। तोरा तँ नञि बुझल हेतह, हमर परबाबा आ मुकुन्दक परबाबा सहोदरे भाए छलाह। अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठाक हिस्सा जमीन दुनू गोरेकेँ अछि। तेँ कोनो पेंच लगाबह जे हमरा तीन कट्ठा हुअए।’
श्रीकान्तक पेटक मैल बुचाइ देखि गेल। मुस्कुराइत बाजल- ‘ऐँ, अहीले अहाँ एते चिन्तित छी। ई तँ वामा हाथक काज छी। अमीनकेँ मिला लेब, सभ  काज भऽ जाएत। किएक तँ अमीनक गुनिया-परकालमे पाँच-दस धुर जमीन नुकाएल रहै छै। मुदा अइले खरचा करए पड़त। हम तँ जोगारे ने बैसाएब, खर्च तँ अहींकेँ करए पड़त।’ पाइक गरमी श्रीकान्तकेँ रहबे करनि। मनमे इहो बात रहनि जे भलेहीं मुकुन्दो इंजीनियर छथि, दुनू गोटेक दरमहो एक्के रंग अछि मुदा पाइमे बराबरी कऽ लेता, से कोना हेतै। मुस्की दैत कहलखिन- ‘तोहर मेहनत आ हम्मर पाइ। सएह ने। जते खर्च हएत-हएत। मुदा मैदानसँ जीति कऽ अबैक छह।’
श्रीकान्तक बात सुनि बुचाइ मने-मन खुश भेल। मनमे एलै जे नीक मोकीर हाथ लागल। भरिसक राशि घुमलहेँ। ओह, बहुत दिनसँ अखवारो नै पढ़लौं जे कने राशि देखि लैतिऐ। खैर नहियो पढ़लौं तैयो शुभ बुझि पड़ैए। जोशमे बाजल- ‘कक्का, रुपैया पूत पहाड़ तोड़ैए। ई तँ मात्र अमानते छी। जे चाहबै, से हेतै। मुदा अहाँ कंजूसी नै करबै।’
कंजूसीक नाम सुनि श्रीकान्त कहलखिन- ‘मरदक बात छिऐ। जे बाजि देब ओ बिना पुरौने छोड़ब।’  बैगसँ पाँच हजार रुपैया निकालि श्रीकान्त बुचाइकेँ देलखिन। रुपैया जेबीमे राखि बुचाइ प्रणाम कऽ विदा भेल। गामक पेंच-पाँचमे बुचाइ माहिर, मुदा समाजमे अनुचित हुअए, से कखनो नहि सोचए। जहिया कहियो उकड़ू काज अबै तखन गुरुकक्कासँ पूछि लैत। मने-मन रस्तामे सोचए लगल जे अइबेर हिनका तेहेन सिखान सिखेबनि जे मरै काल तक मन रहतनि। जहिना सरकारी खजानासँ लऽ कऽ ठीकेदार धरिसँ समेटलाहा रुपैया केहेन होइ छै, से सिखताह।
आंगन पहुँचि बुचाइ चारि हजार पत्नीक हाथमे आ एक हजार अपना हाथमे रखलक। जहिना अगहनमे धानक ढ़ेरी देखि, दुनू परानी किसानक मन खुशीसँ गद-गद होइत, तहिना दुनू परानी बुचाइकेँ भेल। मुदा दुनूक खुशीमे अन्तर होइत। किसानक खुशी मेहनतक फल देखि होइत जखैनकि बुचाइक खुशी दलालीक। मुस्की दैत बुचाइ घरवालीकेँ कहलक- ‘खिड़कीपर एकटा शीशी अछि, कने नेने आउ?’
मुँह चमकबैत घरवाली बाजलि- ‘खाइ-पीबै रातिमे शीशी की करब?’
बुचाइ- ‘शीशियो नेने आउ आ खेनाइयो नेने आउ। दुनू संगे चलतै। जाबे भरि मन नै पीअब तावे मूड नै बनत। बहुत बात सोचैक अछि। अहाँ नै ने हमर बात बुझबै?’
पत्नी- ‘अहाँक बात बुझैक जरुरत हमरा कोन अछि। हमरा तँ अपने मन कोनादन करैत अछि। देह भसिआइए।’
‘अच्छा ठीक अछि, अहूँ दू घोट पीबि लेब।’
भोरे बुचाइ चौकपर पहुँचल। गामक बीचमे चौबट्टी। जहि चौबट्टीपर चारु भरसँ तीस-पैंतीसटा छोट-छोट दोकान। दस-बारहटा दू-चारी घर, बाँकी कठघरा। ओना एक्कोटा नमहर दोकान नहि, मुदा सभ कथुक दोकान। जाहिसँ गामक लोककेँ हाट-बजार जेबाक जरुरत कम पड़ैत। जहिया कहियो कोनो परिवारमे नमहर काज होइत-जेना बिआह, सराध इत्यादि, तखने बजार जेबाक जरुरत पड़ैत। ओना भरि दिन चौकक दोकान खुजल रहैत, मुदा गहिकीक भीड़ साँझे-भिनसर होइत। भरि दिन लोक अपन-अपन काज-उदम करैत आ साँझू पहरकेँ दोकानक काज कऽ लैत। खाली चाहे-पानक बिकरी भिनसरु पहरकेँ बेसी होइत। चौकपर पहुँचि बुचाइ दुनू चाहबलाकेँ एक-एक सए रुपैया दऽ दोकानपर बैसलि सभकेँ चाह पीअबै लेल कहलक। गाँजा पिआकक सेहो तीन ग्रुप चलैत। चाह पीबि पान खा बुचाइ चिलमक ग्रुपमे पहुँचि, दू दम लगा, तीनू ग्रुपमे पचास-पचास रुपैया गाँजा लेल दऽ देलक। सबहक मन खुशी भऽ गेलै। मुस्कुराइत बुचाइ अमीन ऐठाम बिदा भेल। गाममे तीनटा अमीन। रामचन्द्र, खुशीलाल आ किसुनदेव। कहै लेल तँ तीनू अमीन मुदा पढ़ि कऽ अमीन रामचन्द्रे टा भेल। मिडिल पास केलाक बाद रामचन्द्र हाइ स्कूलमे नाम नहि लिखा सकल। आब तँ लगेमे हाइ स्कूल खुजि गेल मुदा ओहि समएमे एक्कोटा हाइ स्कूल परोपट्टामे नहि छल, जाहिसँ रामचन्द्र आगू नहि पढ़ि सकल। बाहर पठा बेटा पढ़बैक ओकाइत रामचन्द्रक पिताकेँ नहि। सर्वे अबैसँ दस-पनरह बर्ख पहिने मुजफुरपुरक एकटा अमीन गाममे आबि अमानतक स्कूल खोललक। छह मासक कोर्स। चारि विषएक- पैमाइस, क्षेत्रमिति, कानून आ चकबन्दीक-पढ़ाइ। ओना समानो सभ- गुनिया, परकाल, मास्टर, स्केल, लेन्स, राइटऐंगिल, प्लेन, टेबुल, कंघी, टाँक, थ्याजो रैटर, जंजीर, फीता रखने। पाँच रुपैया महीना फीस लैत। मधुकान्तक दरबज्जेपर स्कूल खोललक। मधुकान्ते खाइयो लेल दै। जेकरा बदलामे मधुकान्तकेँ सेहो पढ़ा देलक। ओना गामोक आ गामक चारु भरक गामक विद्यार्थी सेहो पढ़लक। कुल मिला कऽ पनरह गोरे पढ़लक। मुदा जमीनक नापी-जोखी कम होइत, तेँ रामचन्द्र छोड़ि सभ अमीनी छोड़ि देलक।
सर्वे अबैसँ महीना दिन पहिने बेगूसराएक एक गोटे आबि पाँच-पाँच सौमे अमानतक सर्टिफिकेट बेचए लगल। ओकरेसँ खुशीलालो आ किसुनदेवो सर्टिफिकेट कीनि लेलक।
गामे-गाम सर्वेक काज शुरु भेल। अमीन सबहक चलती आएल। नक्शा बनब शुरु होइतहि दलाली शुरु भेल। पाइ दऽ दऽ लोक अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़बै लगल। लोकक दलाल अमीन आ सरकारक सर्वेयर। खुशीलालो आ किसुनदेवो उठि बैसल। मुदा रामचन्द्र कात रहल। गाए-महीस, गाछ-बिरीछ बेचि-बेचि लोक रुपैया बुकए लगल। रामचन्द्र दबि गेल मुदा खुशीलाल आ किसुनदेव नाम कमा लेलक। जेम्‍हर निकलैत तेम्‍हर लोक सभ चाहो-पान करबैत आ अमीन सहाएब, अमीन सहाएब कहि परनामो करैत। दुनू गोटे सर्वेक नांगड़ि पकड़ि किस्तवारसँ लऽ कऽ तसदीक खानापुरी, दफा-३, दफा-६,८,९ धरि दौड़ि-बड़हा करैत रहल। जाहिसँ मोटर साइकिल मेन्टेन करए लगल।
खुशीलाल ऐठाम पहुँचि बुचाइ श्रीकान्त दिशिसँ नापीक अमीन मुकर्रर कऽ लेलक। नापीक फीसक अतिरिक्त पक्ष लेबाक फीस सेहो गछि लेलक।
दोसर दिन मुकुन्द जी सेहो गाम पहुँचलाह। रहैक सभ ओरियान केनहि ऐलाह। गाम अबिते दूटा जन रखि परती छिलवा रौटी ठाढ़ करौलनि। जखन जन जाइ लगलनि तखन पुछलखिन- ‘गाममे के सभ नेतागिरी करैए?’
मुकुन्दजीक बात सुनि एक गोटे बुचाइक नाम कहलकनि। बुचाइक नाम सुनि बजा अनैले कहलखिन। दुनू गोटे बिदा भेल। दुनू कोदारि लऽ एक गोटे घरपर गेल आ दोसर गोटे बुचाइ एहिठाम। मुकुन्द जी पत्नीकेँ कहलखिन- ‘कने चाह बनाउ?
पत्नी चाह बनबैक ओरियान करै लगली। गैस चुल्हिपर ससपेन चढ़ा बजलीह- ‘ककरा लेल तीन महला मकान बनेलहुँ।’
पत्नीक बात सुनि मुकुन्दजीक करेज दहलि गेलनि। करेजकेँ दहलितहि आँखिमे नोर आबि गेलनि। आँखि उठा पत्नी दिशि देखि आँखि निच्चाँ कऽ लेलनि। रुमालसँ नोर पोछि मुकुन्द जी मने-मन सोचए लगलथि जे अपन हारल ककरा कहबै। सपनोमे नञि सपनाइल रही जे पढल़-लिखल मनुक्ख एत्ते नीच होइत अछि। कत्ते मेहनतिसँ बेटाकेँ पढ़ेलहुँ, नोकरी दिएलहुँ। नीक घर नीक पढ़ल-लिखल कन्याक संग विआह करेलहुँ। मुदा फल उल्टा भेटल। पढ़ल-लिखल लोक जे अपन सासु-ससुरक संग एहेन बरताव करै, तँ लोक जीविये कऽ की करत? अइसँ नीक मरनाइ। मुदा मृत्युओ तँ ओते असान नहि होइत। तखन तँ जे भाग्य-तकदीरमे लिखल अछि, से भोगब। अगर जँ बुढा़ढ़ीमे गनजने लिखल रहत तँ कियो बाँटि लेत। ओ तँ विधाताक रेख छी। के बदलि देत? मूड़ी गोतने मुकुन्द घुनघुना कऽ बजैत। पत्नीक आँखि तँ ससपेनपर रहनि मुदा करेज पीपरक पात जेकाँ, जे बिनु हवोक डोलैत रहैत। आँखिसँ समतल भूमिक पानि जेकाँ नोर टघरैत।
चाह बनल। दुनू गोटे आमने-सामने बैसि चाह पीबए लगलथि। एक घोंट कऽ चाह पीबि दुनू गोटे दुनू गोटेक मुँह दिशि देखैत। मुदा कियो किछु बजैत नहि। जेना दुनूक हृदएक भीतर विरड़ो उठैत। दुइये घोंट चाह पीलनि, बाकी सभ सरा कऽ पानि भऽ गेलनि। तही काल बुचाइ पहुँचल। अबिते बुचाइ दुनू हाथ जोड़ि, दुनू गोटेकेँ प्रणाम कऽ बैसल। बुचाइकेँ देखितहि मुकुन्द मनकेँ थीर करैत पत्नीकेँ कहलखिन- ‘भरि दिनक थकान देहकेँ खण्ड-खण्ड तोड़ैत अछि। मन कोनादन करैए। कने एटैचीसँ एकटा बोतल नेने आउ। जावे पीब नहि ताबे कोनो बाते ने कएल हएत।’
पतिक बात सुनि पत्नी एटैचीसँ एकटा किलो भरिक ब्राण्डीक बोतल आ दूटा गिलास निकालि कऽ आनि आगूमे रखि देलकनि। तीनू गोटे- मुकुन्द, पत्नी राधा आ बुचाइ- त्रिकोण जेकाँ तीनू दिशिसँ बैसल। बीचमे मोड़ुआ टेबुल लोहाक। टेबुलपर गिलास बोतल। बोतलक मुन्ना खोलि मुकुन्द दुनू गिलासमे ब्राण्डी देलखिन। एक गिलास अपनो लऽ एक गिलास बुचाइ दिशि बढ़ौलनि। ब्राण्डी देखि बुचाइक मन तँ चटपटाए लगल मुदा अनभुआर लोकक संग पीबैक परहेज करैत बाजल- ‘कक्का जी, ई सभ हम नै पीबै छी। गाममे हमरा कतऽ ई चीज भेटत। गरीब-गुरवा लोक छी, जँ  कहियो मनो होइए तँ एक दम चीलममे लगा लै छी। नै तँ पीसुआ भाँगक एकटा गोली चढ़ा दै छिऐ।’
जिद्द करैत मुकुन्द कहलखिन- ‘ई तँ फलक रस छिऐ। कोनो की मोहुआ दारु आकि पोलीथिन छिऐ जे अपकार करतह।’
मुकुन्दक मनमे रहनि जे शराब पीआ बुचाइसँ सभ बात उगलवा लेब। जाबे गामक तहक बात नै बुझबै ताबे किछु करब कठिन हएत। दुनू गोरे एक-एक गिलास पीलनि। गिलास रखि मुकुन्द सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकालि, एकटा अपनो हाथमे लेलनि आ एकटा बुचाइयोकेँ देलखिन। दुनू गोटे सिगरेट पीबए लगलाह। सिगरेटक धुँआ मुँहसँ फेकैत मुकुन्द कहलखिन- ‘बुचाइ, हम तँ आब बुरहा गेलहुँ, तू सभ नौजवान छह। तोरे सभपर ने गामसँ लऽ कऽ देश तकक दारोमदार छह। शहरमे रहैत-रहैत मन अकछा गेल। साले भरि नोकरियो अछि। तेँ चाहैै छी जे जल्दी नोकरी समाप्त हुअए जे गाम आबि अपन सर-समाजक बीच रहब। मुदा गाममे तँ अपना किछु अछि नहि। लऽ दऽ कऽ थोड़े घरारी अछि। जेकरा नपा कऽ घर बनबए चाहै छी। तहिमे तूँ कने मदति कऽ दाए।’
बुचाइ- ‘हमरा बुते जे हएत से जरुर कऽ देब। अहाँ तँ अपने तत्ते कमा कऽ टलिया नेने छी जे अनकर कोन जरुरत पड़त?’
मुकुन्द- ‘तूँ तँ जनिते छहक जे सभ दिन नीक एयर कंडीशन घरमे रहै छी, नीक गाड़ीमे चढै़ छी, नीक लोकक बीच आमोद-परमोद करै छी, से कोना हएत?
बुचाइ- ‘अहाँ की कोनो खेती-पथारी करब आकि माल-जाल पोसब, जे तइले खेत-पथार चाही। लऽ दऽ कऽ रहैक घर चाही। से तँ घरारी अछिये।
मुकुन्द- ‘कहलह तँ ठीके, मुदा रहैले तँ घर बनाबै पड़त। बिजली गाममे नञि छै तइले जेनरेटर बैसबै पड़त, पानिक टंकी नै छै तइले कलक संग-संग मोटर सेहो लगबौ पड़त। गाड़ी रखैले घर आ साफ करैले सेहो जगहक जरुरत हएत। पैखाना, नहाइले सेहो घर चाही, घरक आगूमे दसो धुरक फुलवारी, बइसैले चबुतरा सेहो चाही। चारु भर छहरदेवाली बनबए पड़त। सभले तँ जमीने चाही।’
बुचाइ- ‘हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा हमरा की कहए चाहै छी?
मुकुन्द- ‘तोरा यएह कहै छिअह जे अपना अढ़ाइये कट्ठा घरारी अछि, तइमे सभ  कुछ कोना हएत ? कहुनाकेँ दसो धुर बढ़बैक गर लगाबह।’
मुकुन्दक बात सुनि बुचाइक मनमे हँसी उठल। हँसीकेँ दबैत बाजल- ‘देखियौ कक्का, पान-दस धुर जमीन अमीनक हाथमे रहै छै, मुदा ओ तँ तखने हएत जखन पंचो आ अमीनो पक्षमे रहत।’
मुकुन्द- ‘तेहीले ने तोरा बजेलियह। हमरा तँ ककरोसँ जान-पहचान नै अछि। मुदा तोरा तँ सभसँ छह, तेँ, तूँ हमरा अप्पन बुझि मदति करह।’
मने-मन बुचाइ सोचलक जे ई पनहाइल गाए जेकाँ छथि, तेँ सरियाकेँ हिनका सिखबैक अछि, चपाड़ा दैत बाजल- ‘देखियौ कक्का, गामक लोक गरीब अछि, ओ जे पक्ष लेत से ओहिना किअए लेत? गौँआक लिये जेहने अहाँ तेहने श्रीकान्त कक्का। तखन तँ कियो जे नेत घटाओत से बिना मीठ खेने किअए घटौत?’
मुकुन्द- ‘तइले हमहुँ तैयारे छी। जना जे तूँ कहबह से हम देबह।’
बुचाइ- ‘अच्छा हम भाँज-भूज लगबैले जाइ छी। मुदा काल्हि खन श्रीकान्त कक्का सेहो कहने रहथि। ओना हम हुनका कहि देने रहियनि जे अमानतक दिन हमहूँ रहब। तेँ थोड़े दिक्कत हमरा जरूर अछि। मुदा तइयो दिन-देखार तँ हम अहाँक भेँट नहि करब, साँझमे जरूर करब। जना जे हेतै से सभ  बात अहाँकेँ कहैत रहब आ अहूँ ओहि हिसाबसँ अपन गर अँटबैत रहब। ओना गाममे अखन सरूपक संग बेसी लोक छै, तेँ अहाँकेँ ओकरासँ भेँट करा दै छी। ओ जँ तैयार भऽ जाएत तँ कियो ओकरा रोकि नहि सकतै।’
‘बड़बढ़िया’ कहि मुकुन्द बैगसँ दस हजार रूपैया निकालि बुचाइकेँ दऽ देलखिन।
रूपैया गनि बुचाइ बाजल- ‘अइसँ की हएत? हम ने गामक पेंच-पाँच बुझै छिऐ। काजो तँ उकड़ूए अछि।’
‘एते ताबत राखह। जना-जना काज आगू बढै़त जाएत तना-तना कहैत जइहह।’
‘बड़बढ़िया’ कहि बुचाइ प्रणाम कऽ बिदा भेल।
मने-मन मुकुन्द सोचए लगलाह जे भलेहीं श्रीकान्तो इंजीनियरे छथि मुदा जते पाइ हम कमेलहुँ तते हुनकर नन्नो ने देखने हेतनि। भऽ जाए पाइयेक भिड़ंत। मने-मन सोचबो करैत आ खुशियो होइत।
मुुकुन्द ऐठामसँ निकललाक बाद रस्तामे बुचाइ विचारै लगल। आरौ बहिं, आइ धरि एहेन-एहेेन बुढ़बा चोट्टा नञि देखने छलौं। जिनगी भरि पाइये हँसोथति रहल मुदा सबुर नै भेलै। अच्छा, अइ बेर दुनू सिखताह। जइ गामक लोक आइ धरि सहि-मरि अपन बाप-दादाक गाम आ घरारी धेने रहल, समाजक बेर-बिपत्तिमे संगे प्रेमसँ रहल ओहि गाममे जँ एहेन-एहेन चोट्टा आबि कऽ रहत, तँ कए दिन गामकेँ सुख-चैनसँ रहए देत। सभकेँ टीकमे टीक ओझरा नाश करत की नहि?’
दोसर दिन, सबेरे सात बजे बुचाइ सरूप ऐठाम पहुँचल। दुनूकेँ बच्चेसँ दोस्ती, तेँ धियो-पूता भेलोपर दुनूक बीच रउए-रउ चलैत। सरूपकेँ दरबज्जापर नहि देखि बुचाइ सोर पाडैए लगल- ‘दोस छेँ रौ, रौ दोस।’
सरुप अंगनाक दछिनबरिया ओसारपर बैसि दारुक बोतलक मुन्ना खोलैत। बुचाइक अवाज सुनि, कहलक- ‘दोस रौ, आ-आ। अंगने आ।’
घरक कोनचर लग अबितहि बुचाइ सरुपक घरवालीकेँ देखि बाजल- ‘दोस रौ, दोसतिनीक थुथुन बड़ लटकल देखै छियौ। रौतुका झगड़ा अखैन तक फड़िएलौहेँ नञि रौ। हम तँ रौतुका झगड़ा रातियेमे उठा-पटक कऽ फड़िया लै छी आ तू अखैन तक रखनहि छेँ।’
बुचाइक बात सुनि सरुप कहलक- ‘धुर-बूड़ि, सभ दिन एक्के रंग रहि गेलेँ। कहियो तोरा बजैक ठेकान नै हेतौ।’ कहि पत्नीकेँ कहलक- ‘एकटा गिलास नेने आउ? एकटा गिलास आनि पत्नी सरुपक आगूमे रखलक। दुनू गोटे एक-एक गिलास दारु पीलक। बोतलकेँ डोला कऽ देखि सरुप फेर दुनू गिलासमे ढ़ारलक। तहि बीच बुचाइ बाजल- ‘एक गिलास दोसतिनोकेँ दहुन?’
बुचाइक बात सुनि सरुपक पत्नी कला बाजलि- ‘हम नै गाइयक गोत पीबै छी।’
बुचाइ- ‘कनी पी कऽ देखियौ जे केहेन ताव चढै़ए।’
सरुप- ‘भोरे-भोर दोस किमहर एलेँ?’
जेबीसँ पाँच हजार रुपैयाक गड्डी निकालि बुचाइ सरुपक आगूमे रखैत बाजल- ‘ले, ई तोहर हिस्सा छियौ। गाममे दूटा मोकीर फँसलौहेँ। तेँ सरिया कऽ दुनूकेँ सिखबैक छौ। एकटाकेँ हम संग देबै आ दोसरकेँ तूँ देही। जहिना धिया-पूता दूटा मुसरीकेँ नंागड़ि पकड़ि लड़बैत अछि तहिना दुनू गोटे दुनूकेँ लड़ा।’
सरुपक आगूमे रुपैया देखि कलाक मुँहसँ हँसी निकलल। हँसी देखि बुचाइ बाजल- ‘एकटा बात बुझै छिऐ दोसतिनी, लछमी दुइये टा होइत अछि। एकटा घरवाली आ दोसर रुपैया। दोस, तोहर भाग बड़ जोरगर छौ। किएक तँ दुनू तोरा लगेमे छौ।’

बुचाइक बात सुनि कला पाछु दिशि मुँह घुमा लेलक। कलाकेँ पाछु मुँहे घुरल देखि बुचाइ कहलक- ‘मुँह घुमौने नै हएत दोसतिनी। अहीमे सँ रुपैया लिअ आ दोकानसँ अंडा नेने आउ। भुजल चूड़ा आ अंडाक कोफ्ता खुआउ।’
एकटा पचसटकही लऽ कला अंडा आनै दोकान बिदा भेलि। खाली अंगना देखि बुचाइ सरुपकेँ फुसफुसा कऽ कहए लगल- ‘दोस, दूटा जुएलहा चोर गाम एलौहेँ। दुनू जेहने ‘चोर’ तेहने ‘लोभी’। दुनू अपन-अपन घरारी नपाओत। दुनूकेँ अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठा जमीन छै। जे खतिआनी छिऐ। किएक तँ दुनू एक्के वंशक छी। एक पुरखियाह अछि तेँ दोसर-तेसर नै छै। दुनू चाहैए जे हमरा तीन कट्ठा हुअए तँ हमरा तीन कट्ठा हुअए। दुनूकेँ पाइयक गरमी छै, तेँ एक-दोसरकेँ निच्चाँ देखबै चाहैए। गामक लोक तँ दुनूक नजरिमे, बोन झाँखुर छी। से थोड़े हुअए देबै। पाइयो खा जेबै आ सुपत-सुपत बँटबरो करा देबै।’
कने काल गुम्म रहि सरुप बाजल- ‘आँइ रौ दोस, अपने सभ कोन नीक लोक छेँ रौ। भरि दिन झूठ-फूसि बजै छी, ताड़ी-दारु पीबै छी, तखैन नीक कना भेलौ रौ।’
बुचाइ- ‘धुर बूड़ि, तोरा निशाँ चढ़ि गेलउ, तेँ नै बुझै छीही। तोँही कह जे गाममे कोनो जातिक लोक किए ने हुअए, मुदा जखन मरैए तँ कठिआरी जाइ छिऐ की नै ? गरीबसँ गरीब लोक किए ने हुअए, कियो बिना कफने जराओल गेलहेँ ? अपना हाथमे जँ पाइ नहियो रहल तँ दू-चारि गोरेसँ मांगि-चांगि पुरा दै छिऐ। तेसर सालक गप मन छौ की नै। देखने रही की ने जे मखनाक गाए बाढ़िमे भसल जाइत रहै तँ भरि छाती पानिमे सँ पकड़ि अनलौं। मोतिया बेटीक बिआह कोन पेंचपर करा देलिऐ से बिसरि गेलही। डोम खंजनमाक घरमे जे आगि लगल रहै तँ देखने रही की नञि जे अपन घैलची परक घैल लऽ कऽ सभसँ पहिने आगि मिझबैले गेल रहिऐ। हमरा देखलक तखन पाछुसँ सभ गेल। जइकेँ चलैत माए कते दिन तक गरिअबैत रहल जे तोहूँ छुवा गेलेँ आ घइलो छुबा गेल। आँइ रौ, गाइरियो-फज्झति सुनि कऽ जे सेवा करै छी उ धरम नै भेल रौ।’
मूड़ी डोलबैत सरुप- ‘हँ, से तँ ठीके कहै छेँ।’
बुचाइ- ‘हम श्रीकान्त कक्काक पछ लऽ कऽ रहब आ तूँ मुकुन्द कक्काक संग दहुन। जहिना इलेक्शनमे परचार करैक, आॅफिस चलबैक, चाह-पानक खर्च, लाउडस्पीकर आ सवारीक, बूथपर दसटा कार्यकर्ता रखैक, एजेंटक, नेता सबहक सुआगतक लेल मेहराओ बनबैक खर्च नेतासँ लै छिऐ तहिना अखैनसँ जाबे तक नापी हेतै ताबे तकक खरचा दुनू गोटेसँ दुनू गोटे लेब। हेतै तँ उचिते मुदा ठकसँ ठकब कोनो पाप थोड़े छी।’
सरुप- ‘कना-कना पाइ लेबही से तँ प्लानिंग कऽ लेमे की ने?’
बुचाइ- ‘घबड़ाइ छैँ किए, इलेक्शनोसँ बेसी लेबै। अमीनक घूस, पंचक घूस, चौक-चौराहाक चाह-पान, गाँजा-भाँग, ताड़ी-दारुक, लठैतक, कते कहबौ। जना-जना काज अबैत जेतै तना-तना टनैत जेबै। अखैन जे आएलहेँ ओ सगुन छी। साँझमे जखन खूब अन्हार तेसरि साँझ भऽ जेतै तखन चलिहेँ। तोरा-दुनू गोरेकेँ मुँह-मिलानी करा देबउ। चौकपर दूटा चाहक दोकान छेबे करै, एकटा पर साँझ-भिनसर तूँ बैसिहेँ आ एकटा पर हम बैसब। तूँ मुकुन्द जी दिशिसँ बजिहेँ जे हुनका तीन कट्ठा घरारी छनि आ दोसरपर हम बैसि बाजब। मुदा एकटा बात मन  रखिहेँ जे जखैन श्रीकान्त कक्का चौकपर आबथि, तखन अपने दिशिसँ चाह-पान खुआ, हुनके बात बजिहेँ आ जखन मुकुन्द कक्का औताह तँ हमहूँ बाजब। जइसँ हुनका सभकेँ हेतनि जे सौँसे गौँआ हमरे दिशि अछि। अखैन तँ गैाँआ सभकेँ चाहे-पान, गाँजा, ताड़ी पइर लगतै मुदा नापी दिन पूड़ी-जिलेबी जलखै आ माँस-भात भोजन करा देबै।’
सरुप- ‘बड़बढ़ियाँ प्लानिंग छौ।’
बुचाइ- ‘हम श्रीकान्त कक्का दिशिसँ खुशीलाल अमीनकेँ ठीक केलहुँहेँ, तूँ मुकुन्द कक्का दिशिसँ किसुनदेव अमीनकेँ ठीक करिहेँ। दुनू अमीन तँ दुनू पार्टीक हएत की ने मुदा मध्यस्त अमीन तँ सेहो चाही। तइले रामचन्द्र भायकेँ पकड़ि लेब। तहिना गामक लोक तँ दुनू दिशिसँ बँटाएल रहत की ने मुदा एक्कोटा तँ तेहल्ला पंच चाही। तइले गुरुकक्काकेँ पकड़ि लेब। जखने गुरुकक्का पंच आ रामचन्द्र भाय अमीन रहताह तखने एक्को तिल जमीन इमहर-ओमहर थोड़े हएत।’
दोसर दिन दुनू गोटे -बुचाइयो आ सरुपो- गुरु कक्का लग पहुँचल। गुरुकक्का दलानेपर। दुनू गोटे प्रणाम कऽ बैसल। दुनू गोटेकेँ देखि गुरु कक्का पुछलखिन- ‘की बात छिऐ हौ बुचाइ? दुनू भजारकेँ संगे देखै छिअह?’
बुचाइ- ‘अहीं लग तँ एलौहेँ कक्का। श्रीकान्तो काका आ मुकुन्दो काका घरारी नपौताह। तेहीमे अपनो रहबै।’
गुरुकाका- ‘की करताह ओ सभ  घरारी नपा कऽ। केहेन बढ़िया तँ धिया-पूता सभ खेलाइए।’
सरुप- ‘रिटायर केला बाद गामेमे रहताह। नोकरियो लगिचाइले छनि। तेँ अखने नपा कऽ घरमे हाथ लगौता।’
गुरुकक्का- ‘सुनै छी जे दुनू गोटे शहरेमे घर बनौने छथि, तखन गाममे बना कऽ की करताह। हुनका सभकेँ गाममे थोड़े वास हेतनि। जिनगी भरि तँ बड़का-बड़का होटल देखलखिन, नीक रोडपर नीक सवारीमे चललथि, दामी-दामी वेश्यालय देखलनि, से सभ गाममे थोड़े भेटतनि। अनेरे गाममे आबिकेँ किए थाल-कादोमे चलता आ मच्छर कटौताह।’
गुरुकाकाक बात सुनि लपकि कऽ बुचाइ बाजए लगल- ‘से नै बुझलिऐ कक्का, दुनू गोटे भारी चोट खा चोटाएल छथि। तेँ गाम दिशि झुकलाह।’
‘से की?’ - ओ अकचकाइत गुरुकक्का पुछलनि‍।
बुचाइ कहए लगल- ‘तेसर सालक घटना छिऐ। श्रीकान्त काकाक पत्नी ड्राइवरकेँ संग केने बजार गेली। बजारसँ समान कीनि जखन घुमली तँ दोसर गाड़ी सेहो पछुअबैत रहनि। जखन फाँक-पाँतरमे गाड़ी पहुँचलनि तँ पछिला गाड़ी आगू आबि रोकि देलकनि। गाड़ीसँ चारि गोटे उतरि हिनका गाड़ीमे बैसि ड्राइवरकेँ दोसर रस्तासँ गाड़ी बढ़बैले कहलक। बेचारा की करैत। बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर गाड़ी रोकि, काकीकेँ उतारि ड्राइवरकेँ कहलक- ‘मालिककेँ जा कऽ कहिअनु जे पाँच लाख रुपैया नेने आबथि आ पत्नीकेँ लऽ जाथि। दू घंटाक समए दैत छिअह।’ ड्राइवर बिदा भेल। इमहर काकीकेँ चारि-पाँच ठूसी मुँहमे लगा देलकनि। जहिसँ अगिला चारि टा दाँतो टुटि गेलनि। ठोह फाड़ि कऽ कानए लगली। कनिते काल मोबाइल दऽ कहलकनि जे पतिकेँ कहिअनु जे जल्दी रुपैया लऽ कऽ आउ नञि तँ हम नहि बँचब। तावे ड्राइवरो पहुँचि कऽ कहलकनि। अपना हाथमे दुइये लाख रुपैया, जे हालक आमदनी रहनि, बाकी रुपैया सभ बैंकमे। वएह दुनू लाख रुपैया लऽ कऽ गेला आ पाएर-दाढ़ी पकड़ि कऽ पत्नीकेँ छोड़ा अनलनि।’
बुचाइक बात सुनि ठहाका मारि हँसि गुरुकाका- ‘मुकुन्द किअए औताह?’
मुस्की दैत बुचाइ- ‘हुनकर तँ आरो अजीव बात छनि। एक दिन एकटा ठीकेदारक पार्टी चललै। जते बड़का-बड़का हाकिम आ ठीकेदार सभ  छल, सभ  रहए। मुकुन्द अपन पुरना गाड़ी छोड़ि नवका गाड़ी, जे बेटाकेँ सासुरमे देने रहनि, लऽ कऽ गेला। जखन पार्टीसँ घुमि कऽ ऐला तँ पुतोहू कहलकनि- ‘पुतोहूक गाड़ीपर चढ़ैत केहेन लागल?’ अइ बातक चोट हुनका खुब लगलनि। बेटा-पुतोहूसँ मोह टूटि गेलनि। तेँ गामेमे रहताह।
बुचाइक बात सुनि गुरुकक्का गुम्म भऽ गेलाह। कने काल गुम्म रहि, मने-मन बिचारि कहलखिन- ‘गाम तँ गामे छी। शुद्ध मिथिला। भारत। जे स्वर्गोसँ नीक अछि। मुदा सभ गामक अपन-अपन चरित्र आ प्रतिष्ठा छैक। जे चरित्र आ प्रतिष्ठा गामक कर्मठ, तियागी लोकनि बनौने छथि। अपन कठिन मेहनति आ कर्तव्यसँ सजौने छथि। ओकरा जीवित राखब तँ अखुनके लोकक कान्हपर भार अछि की ने ? नोकरीक जिनगीमे किछु कियो केलनि तइसँ समाजकेँ कोन मतलब। अपनाले केलनि। समाजक एक अंग होइक नाते हुनको सभक कान्हपर किछु भार छलनि जे अखन धरि नहि कऽ सकलाह। मुदा तैयो जँ समाजमे आबि, समाज रुपी फुलवारीमे फूल लगबए चाहताह तँ बढ़िया बात। से तँ लक्षणसँ नहि बुझि पड़ैत अछि। समाजमे रहैक लेल समाजक चरित्रक अनुकूल अपन चरित्र बनौताह, तखने ने समाजमे अँटाबेश हेतनि। ई तँ नहि जे गदहा गेल स्वर्ग तँ छान-पगहा लगले गेलै।’
गुरुकाकाक बात सुनि बुचाइयो आ सरुपो पुछलकनि- ‘कक्का, गामक विषएमे हम सभ किछु ने बुझैत छी, से कने बुझा दिअ?’
गुरुकाका- ‘‘अखन काजक बेर अछि तेँ बहुत बात तँ नहि कहि सकबह, मुदा जखन बुझैक जिज्ञासा छह तँ दूटा जरुर कहबह। देखहक, गामक पढ़ल-लिखल वा बिनु पढ़ल-लिखल लोक, पेट भरैक लेल नोकरी करैक लेल बाहर जाइ छथि, नीक बात। मुदा गामकेँ सोलहन्नी नहि छोड़ि देथि। अखन देखै छी जे अमेरिका, इंग्लैडसँ लोक तीन दिनमे गाम आबि सकै छथि। तेँ सालमे कमसँ कम एक्को बेर, नञि तँ हुनकरो गाम छिअनि, कतेको बेर आबि सकै छथि। जाहिसँ गामक लोक आ खेत-पथारक संग संबंध बनल रहतनि। मुदा से नहि कऽ गामकेँ सोलहन्नी छोड़ि, अनतै घर बना रहए लगै छथि। जे गामक दुर्भाग्य छी। जेकर फल होइत अछि गामक ज्ञान निर्यात भऽ जाइत अछि। जाहिसँ सुतल गाम सुतले रहि जाइत अछि। संगे गामक बेबहार, कला-संस्कृति सभ टुटि जाइत अछि। रिटायर केला बाद वा जिनगीक अंतिम अवस्थामे, जँ कियो गाम आबि रहए चाहता तँ हुनका गाम केहेन लगतनि। डेग-डेगपर टक्कर आ बात-बातमे विवाद हेबे करतनि। दोसर बात सुनह। अपना गाममे वैदिक जी भेल छथि। जिनके पोता शुभकान्त छिअनि। वेदक प्रकाण्ड विद्वान वैदिक जी। नाम तँ छलनि गंगाधर मुदा वैदिक जी नामसँ विख्यात भेलाह। अपनो राजमे आ आनो-आनो राजमे जखन पंडितक बीच शास्त्रार्थ होइ तँ हुनकर जबाव देनिहार कियो ने ठहरैत। अनेको तगमा आ प्रशस्ति पत्र भेटलनि। अखनो परोपट्टाक लोक हुनके नामपर अपना गामक नाम वैदिक जीक गाम बुझैत अछि। हुनके चलाओल अपना गामक पानि छी। पहिने पानिक छुआछुत अपनो गाममे छल, मुदा ओ सभकेँ बैसार कऽ कऽ बुझा देलखिन जे दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सभ मनुक्ख छी, तेँ मनुक्ख-मनुक्खक बीच छुआछुत नै हेबाक चाही। थोपड़ी बजा सभ हुनकर विचारक समर्थन कऽ देलक। ओहि दिनसँ पानिक छुआछुत गामसँ मेटा गेल तहिना दोसर भेल जोगिनदर। भिखारीदासक पक्का चेला। अजीब कला हुनकोमे छलनि। जहिना नचैमे अगिया-बेताल, तहिना गीत गबैमे। जे पार्ट लऽ कऽ स्टेजपर अबैत, धऽ कऽ झहरा दैत। एहेन बिपटा अखन धरि कोनो नाचमे नञि देखलिऐहेँ। ओकरो परसादे गाममे भिखारीदासक नाच कतेको बेर भेल। जखन भिखारीदासक पार्टी छपरासँ पूब मुँहे असाम, बंगाल, नेपाल बिदा होए तँ अपने गाममे रुकै। खाली खेनाइ आ इजोतक खर्च गौँआक होइ। तहिना जब तीन-चारि मासमे घुमै तँ फेर अँटकै। तहिना भेल महावीर। बेचारा बड़ गरीब छल। नोकरी करैले कलकत्ता गेल। मुदा नोकरी नहि कऽ रिक्शा चलबए लगल। अजीब संस्कार ओकरोमे छलै। रिक्शो चलबै आ गीतो-कविता बनबै। पहिने तँ लिखल-पढ़ल नै होइ। मुदा अ-आसँ सीखब शुरु केलक। किछुए दिनक बाद लिखबो आ पढ़बो सीखि लेलक। रिक्शापर जखन चलै तँ अपन बनाओल गीत गाबए। एक दिन एकटा साहित्य प्रेमी रिक्शापर चढ़ल रहथि आ महावीर रिक्शो चलबै आ गीतो गाबै। उतड़ै काल कवि पूछि देलखिन। सभ बात महावीर कहलकनि। ओ एकटा कवि गोष्ठीमे आमंत्रित कऽ देलखिन। ओहि गोष्ठीमे पहुँचि महावीर तीनटा कविता आ दूटा गीत गौलक। तहि दिनसँ कवि गोष्ठीमे आमंत्रित हुअए लगल। बंगाल सरकार दस हजारक पुरस्कार आ प्रशस्तिपत्रसँ सम्मानित केलकनि। तहिना भेल कारी खलीफा। जेकरा इलाकाक लोक खलीफा मानैत। बड़का-बड़का दंगलमे पहँुचि ओ आन-आन जिलाक कतेको खलीफाकेँ पटकलक। ओकरा चलैत गाममे कियो ककरो बहू-बेटीकेँ खराब नजरिसँ नहि देखैत। एक बेर एकटा घटना जमीनदारक सिपाही संग घटलै। एक सौ लाठी सिपाहीकेँ समाजक बीचमे मारलक। तेही दिनसँ जमीनदार दू बीघा खेत ओहिना दऽ देलकै। एहेन-एहेन पंडित, कलाकारक बनाओल गाम छी, तेकरा हम सभ, अपना जीवैत कोना दुइर कऽ देबै। आइ जँ गाम दुइर हएत तँ अगिला पीढ़ी ककरा गारि पढ़तै। तेँ जँ दुनू गोटे मनुक्ख बनि गाममे रहए चाहताह तँ बड़बढ़ियाँ, नहि तँ गाममे रहने कियो समाज तँ नहि बनि जाइत।’
अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहबे नै करै। पाँच कट्ठा कऽ दू भाग केनाइ। बँटवारा करैत रामचन्द्र अमीन कहलखिन- ‘जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ीसँ, वा फीतासँ, वा लग्गीसँ वा डेगसँ भजारि लिअ।’

नवेन्दु कुमार झा- अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व

अस्तित्वक लेल संघर्ष करैत पटनाक विद्यापति स्मृति पर्व
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मिथिलांचलक सांस्कृतिक धरोहर महाकवि विद्यापतिक जयन्तीक प्रतीक्षा मिथिलावासी वर्ष भरि करैत छथि। कार्तिक धवल त्रयोदशीकेँ प्रति वर्ष मनाओल जाएवला एहि वार्षिक उत्सवमे पूरा मनोयोगक संग मिथिलावासी शामिल होइत छथि। एहि क्रममे राजधानी पटनामे आयोजित होमएवाला विद्यापति स्मृति पर्वक प्रतीक्षा सेहो राजधानीक मिथिलावासीकेँ रहैत अछि। मुदा एहि वर्ष एहि आयोजनपर जेना ग्रहण लागि गेल अछि। बढ़ैत संसाधनक बावजूद आयोजक एहि सांस्कृतिक उत्सवक स्वरूप वर्ष-दर-वर्ष छोट कएने जा रहल छथि। ई आयोजन आब इतिहास बनबाक द्वारपर ठाढ़ अछि। पछिला चौबन वर्षसँ प्रति वर्ष आयोजित होमएवाला त्रिदिवसीय कार्यक्रम एहि वर्ष एक दिवसीय होएबाक संवाद अछि। पटनाक हार्डिंग पार्कसँ सचिवालय मैदान आ मिलर हाई स्कूल मैदान होइत ई आयोजन जखन भारत स्काउट मैदान धरि आएल ता धरि ई उम्मीद छल जे ई समारोह अपन पुरान गौरवकेँ फेरसँ प्राप्त करत मुदा जखन एहि समारोहक स्थान परिवर्तित कऽ कापरेटिव फेडरेशन परिसर आबि गेल तऽ स्पष्ट भऽ गेल जे आब आयोजक मात्र खानापूर्ति करबाक लेल एकर आयोजन करैत छथि। आ एहि बेरक सूचनापर गौर करी तऽ स्पष्ट होइत अछि जे आब एहि समारोहक आयोजन मात्र औपचारिकता रहि गेल अछि। कोसी क्षेत्रमे आएल बाढ़ि आयोजक सभकेँ एकटा बहाना बनि गेल अछि आ एहि बहाने एहि समारोहक गौरवपूर्ण इतिहासकेँ समाप्त करबापर लागल छथि।
बाढ़ि मिथिलांचलक नियति अछि। शायदे कोनो वर्ष होएत जखन कि एहि प्राकृतिक आपदाक सामना नहि होइत अछि मुदा एहि बेर कोसीमे आएल बाढ़िसँ आयोजक संस्था चेतना समितिक कर्ता धर्ताकेँ अपन गाम-घर दहाएल तँ हुनक दर्द जागि उठल आ कार्यक्रमक समय-सीमा घटा देलनि। दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आदि मिथिलांचलक कतेको क्षेत्र सभ साल बाढ़िक मारि झेलैत अछि मुदा बिना रुकावट सभ साल तीन दिवसीय विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजन होइत रहल अछि। ओहि क्षेत्र सभक चिन्ता समितिकेँ शायद नहि रहैत छल। ज्यो बाढ़िक समस्याक प्रति एतेक गंभीर छलाह तँ पूर्वमे कतेको बेर आएल बाढ़िक बाद एहि आयोजनकेँ छोट कएल जा सकैत छल से आइ धरि नहि भेल। ज्यो अहू बेर आयोजक एहि समस्याक प्रति गंभीर रहितथि तँ एहि समारोहक माध्यमसँ राजधानीक मिथिलावासीक सहयोग बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल लऽ सकैत छलाह। एहन रचनात्मक डेग संस्था उठाएत से संस्थाक कर्ता-धर्ताक आदति नहि रहलनि अछि। एहिसँ समितिकेँ सामूहिक श्रेय भेटैत से तऽ संस्थाक महानुभाव लोकनिकेँ कतहु मंजूर नहि छलनि। ओ तँ व्यक्तिगत श्रेय लेबापर विश्वास करैत छथि।
दरअसल चेतना समितिक जुझारू पदाधिकारी सभमे आब काज करबाक चेतना नहि बचल अछि। नहि तँ ओ एहिपर जरूर चिन्तन करितथि जे एहि समारोहमे प्रतिवर्ष दर्शकक संख्या किए कम भऽ रहल अछि। जखन संस्थाक स्तरसँ दर्शककेँ जोड़बाक कोनो प्रयास नहि भऽ रहल अछि तँ एहिमे दर्शक दिससँ प्रयास होएबाक बात सोचब निरर्थक अछि। ओना आयोजक कतेको वर्षसँ एहि समारोहकेँ विराम देबाक प्रयासमे छथि। कखनो चुनावक बहाना बना तँ कखनो कानून व्यवस्थाक बहाने एहि कार्यक्रमक स्वरूपकेँ छोट क देलनि। एहि वर्ष तँ कोसीक विभीषिका तँ मानू हुनक सभक मनोनुकूल वातावरण दऽ देलक। प्रारम्भमे त्रिदिवसीय आयोजनक तैयारीक बाद एकाएक एकरा एक दिवसीय करब मात्र औपचारिकता लागि रहल अछि जाहिसँ कि जे किछु मैथिली प्रेमी छथि अगिला वर्शसँ अपनहि एहि कार्यक्रमसँ कटि जाथि आ दर्शकक अनुपस्थितिक बहाना बना कार्यक्रमकेँ बंद कऽ देल जाए। ई विडम्बना कहल जा सकैत अछि जे पटनामे शुरू भेल विद्यापति स्मृति पर्वक देखा-देखी प्रदेश आ देशक आन क्षेत्रमे वर्ष दर वर्ष पूरा उत्साहक संग आयोजित भऽ रहल अछि आ एहि ठामक आयोजनक अस्तित्वपर संकट आबि गेल अछि। वास्तवमे चेतना समिति आब किछु फोटोजेनिक चेहरा सभक अखाड़ा बनि गेल अछि जे एकर कार्यालय विद्यापति भवनकेँ अपन दलान बुझि अपनहिमे कुश्ती करैत रहैत छथि। कोसीक विभीषिकाक दर्द मठाधीश लोकनिक संग-संग सभ मिथिलावासीकेँ अछि। कोसीक बाढ़ि पीड़ितक दर्द एहि आयोजन माध्यमसँ सभ मिथिलावासीकेँ जोड़ि सामूहिक रूपेँ बाटल जा सकैत छल। ज्यो से नहि तऽ बाढ़ि पीड़ितक मदति लेल प्रदेश आ देशक कतेको क्षेत्रमे सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमक कएल गेल आयोजन व्यर्थ छल।
मिथिलाक कतेको महान विभूति सभक प्रयासँ शुरू भेल राजधानीक ई सांस्कृतिक उत्सव पूरा देशमे एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। एहि आयोजनकेँ इतिहास बनेबाक प्रयास करब चिन्ताक विषय अछि। पहिने कार्यक्रमक स्थान छोट करब आ आब एकर समय सीमा घटएलासँ राजधानीक मिथिलावासी मर्माहत छथि। एकरे परिणाम अछि जे छोटे स्तरपर सही राजधानीसँ सटल दानापुर आ राजीवनगरमे किछु वर्षसँ आयोजित भऽ रहल विद्यापति पर्व आब लोकप्रिय भऽ रहल अछि। आब राजधानीक मिथिलावासी चेतना समितिक बदला एहि दुनू स्थानपर होमएवाला आयोजनक प्रतीक्षा करैत छथि। शायद अहूसँ चेतना समिति सचेत होएत आ विद्यापति स्मृति पर्वक अपन पुरान गौरवकेँ पुनर्स्थापित करबाक प्रयास करत।(साभार विदेह www.videha.co.in)

चुनवाली - जगदीश प्रसाद मण्डल



नीन्न टुटितहि मखनी मोथीक बिछान समेटि ओसारक उत्तर-पूब कोनमे ठाढ़ कऽ निच्चाँ उतड़ए लागलि आकि सीढ़ीपर पिछड़ि गेलि। पाएर पिछड़ितहि हाथसँ ओसार पकड़ए चाहलक। मुदा जाबे सरिया कऽ ओसार पकड़ै-पकड़ै ताबे ओलतीमे खसि पड़लि। झलफल रहने कियो दोसर उठल नहि। थोड़बे पहिने एकटा छोटकी अछार भेल। घरक चारसँ ठोपे-ठोप पानि चुबतहि। सीढ़ीपरसँ खसितहि मखनीक दहिना ठेहुनक जोड़ छिटकि गेलै। तत्काल छिटकब नहि बुझलक। एतबे बुझलक जे ठेहुन कट दऽ उठलहेँ। मनमे एलै जे कियो देखलक तँ नहि तेँ हाँइ-हाँइ उठए लागलि। जोशमे उठि तँ गेलि मुदा ठेहुनक कचकबसँ फेर ओसार पकड़ि सीढ़ियेपर बैसि गेलि। बैसितहि मनमे बिचार उठए लागलै- कोना मटकुरियाक बेटाक परबरिस चलतै....ढेरबा बेटी छै बिआह कन्ना करत.... अपना कमाइक कोनो लुरि नहि छैक.... बहुओ धमधुसरिये छै.... अपना खेत-पथार नहि छै.... गामक लोको तेहेन अछि जे ककरो कियो नीक नहि करैत.... हे भगवान कोन बिपत्ति दऽ देलह?
कने काल गुम्म रहि बेटाकेँ जोरसँ सोर पाड़ि कहलक- ‘मटकुरिया, रौ मटकुरिया?
दुनू परानियो आ दुनू धियो-पूतो निन्ने भेर। तेँ ने मटकुरिया उठल आ ने कियो दोसर। पुनः दोहरा कऽ मखनी जोरसँ बाजलि- ‘रौ बौआ, बौआ रौ। हम पिछड़ि कऽ खसि पड़लौं से उठिये ने होइए।’
धड़फड़ा कऽ उठैत मटकुरिया बाजल- ‘माए-माए, अबै छी।’
ताधरि फुलियो, कबुतरियो आ बेटोक नीन टुटल। कहि केवाड़ खोलि मटकुरिया दौगल माए लग आबि पुछलक- ‘कोना कऽ खसलैं ?’
पाछुसँ स्त्रियो आ बेटो-बेटी पहुँचल। बेटा तँ पाँचे बर्खक मुदा तैयो माए-बापक देखा-देखी करैत दादीकेँ पकड़लक। चारु गोटे उठा मखनीकेँ ओसारपर लऽ गेल। बिछान बिछा सुता देलक। कनी-कनी ठेहुन फुलए लगल। फुलब देखि फुलिया पतिकेँ कहलक- ‘अहाँ पहिने डाकडर बजा लाउ। हम ताबे कड़ू तेलसँ ससारि दै छिअनि। बुच्ची घरसँ तेलक शीशी नेने आ।’
मटकुरिया डाॅक्टर ऐठाम बिदा भेल। तेलक शीशी अानए कबुतरी घर गेलि। तहि बीच मंगनिया दादीकेँ कहए लगल- ‘आँइ गै बुढ़िया, एतने उपर से....।’
बेटाक मुँहपर फुलिया हाथ दऽ आगू बाजब रोकि देलक। मुदा पोताक बातसँ मखनीकेँ एक्को मिसिया दुख नहि भेलि। मुस्की दैत बाजलि- ‘बिलाइ खसा देलक।’
शीशीक मुन्ना खोलितहि कवुतरी आएल। दुनू माए-धी तरहत्थीपर तेल लऽ लऽ दुनू हाथमे मिला, दहिना पाएर-जाँघ सहित- मे ओंसइ लागलि। मखनीक ठेहुनक दर्द बढ़िते जाइत। जाहिसँ दुनू गोटेकेँ ससारब छोड़ि दै लेल कहलक। ताबत डाॅक्टरक संग मटकुरियो पहुँचल। मखनीक ठेहुन देखितहि डाॅक्टर कहलखिन- ‘हिनका ठेहुनक जोड़ छिटकि गेल छन्हि। पलस्तर करबए पड़त। ताबत दर्द कम होइ ले इन्जेक्शन दऽ दै छिअनि। पलस्तरक समान सभ मंगबए पड़त।’
एक्के-दुइये गामक जनिजाति पहुँचए लागलि। जनिजातिक संग धियो-पूता। लोकसँ मटकुरियाक आंगन भरि गेल। पलस्तरक समान मंगा डाॅक्टर पलस्तर करैत कहलखिन- ‘चिन्ता करैक बात नहि अछि। पनरह दिनमे ठीक भऽ जेतनि।’ कहि अपन फीस लऽ चलि गेलाह। मुदा लोकक आबा-जाही लगले। रंग-विरंगक गपसँ अंगना गनगनाइत।
भरि दिन सभ तुर मटकुरिया भुखले रहि गेल। ने भानसपर ध्यान गेलै आ ने ककरो भूखे बुझि पड़लै। घरमे चूड़ा रहए। जे मंगनिया खेलक। बेर झुकैत-झुकैत अंगना खाली भेलै। खाली अपने पाँचो गोटे अंगनामे रहल। सबहक मनो असथिर भेलै। सभ -मटकुरियो, फुलियो आ कबुतरियो- अपना-अपना ढ़ंगसँ सोचए लगल। ओना कहियो-काल, सासुकेँ मन खराब भेने वा कतौ गाम-गमाइत गेने, फुलिये चून बेचए जाइत। सभ काज बुझले तेँ मनमे बेसी चिन्ता नहि। चिन्ता खाली एतबे जे कहुना सासु माने माएक परान बचि जाइन। मुदा खुशी बेसी। सोलह बर्खसँ सासुर बसै छी मुदा अखन धरि घरक गारजन नहि बनलहुँ। लोककेँ देखै छिऐ जे सासुर अबितहि अपन जुइत लगबए लगैत अछि। भगवान हमरो दहिन भेलाह। आब हमहूँ गार्जन बनब। घरक गारजन तँ वएह ने होइत जे कमाइत अछि। जे उपारजने नै करत ओ घरक जुतिये-भाँति की लगौत। अगर जँ लगेबो करत तँ चलतै कोना? छुछ हाथ थोड़े मुँहमे जाइत छैक। काजक अपन रस्ता होइत अछि। जे केनिहारे बुझैत। बिनु केनिहार जँ जुतिये लगौत तँ ओ या तँ दुरि हेतै वा गरे ने लगतै। ओना अखन फुलियाक घरोबला आ सासुओ जीविते, तेँ गारजनियो हाथमे आएब कठिन। मुदा तैयो आशा। अखन धरि सिन्नुरो-टिकुली लेल खुशामदे करै छलि, से आब नहि करै पड़तै। तेँ खुशी।
कबुतरीक मनमे एहि दुआरे खुशी होइत जे जते लूरि दादीकेँ अछि ओते लूरि गाममे ककरो नहि अछि। मुदा कमाइक तेहेन भुत लगि गेल छै जे जइ दिन मरत तही दिन छोड़तै। सभ लूरि संगे चलि जेतै। तेँ नीक भेलै जे अवाह भऽ गेल, आब तँ अंगनामे रहत। जखने अंगनामे रहए लगत तखने एका-एकी सभ लूरि सीखए लगब। मुदा दादीएकेँ की दोख देबै। भरि दिन दस सेरक छिट्टा माथपर नेने बुलैत अछि तँ देह-हाथ दुखेबे करतै। साँझखिन कऽ थाकल-ठहिआएल अबैए असुआकेँ पड़ि रहैए। से आब नञि हेतै। निचेनसँ पावनियो-तिहारक विधि-विधान आ गीतो-नाद सीखब। एत्तेटा भऽ गेलौंहेँ, ने अखैन तक एक्कोटा गीत अबैए आ ने विआह-दुरागमनक अड़िपन बनौल होइ अए। कइए दिन मनमे अबैए जे मालतिये जेकाँ हमहूँ अपन गोसाँइ घरक ओसारमे पुरैनिक लत्ती, कदमक गाछ लिखी। से लुरियो रहत तब ने। साँझू पहरकेँ जते खान जतै छिऐ तते खान समयो भेटैए ते नहिये होइए। किएक तँ बिछानपर पड़िते ओंघा जाइए। जँ पुछबो करै छिऐ तँ अइ गीतक पाँति ओइ गीतमे आ अोइ गीतक भास अइ गीतमे कहए लगैत अछि। जाहिसँ किछु सीखि नहि पबैत छी।
मटुकलालकेँ एहि दुआरे खुशी होइत जे बेटा-पुतोहूक रहैत बूढ़ि माए एते खटए से उचित नहि। मुदा कहबो ककरा करबै। हमरा कोनो मोजर दइए। दूटा धिया-पूता भेल। बेटिओ विआह करै जोकर भऽ गेलि मुदा हमरा बच्चे बुझैए। हम की करु। तेँ भगवान जे करै छथिन से नीके करै छथिन। भने आब भारी काज करै जोकर नहि रहलि। जे अपनो बुझत आ मनाही करबै तँ मानियो जाएत। मरैक डर ककरा नै होइ छै। तहूमे बूढ़-बुढ़ानुसकेँ। तेँ मने-मन खुश। लोक हमरा तड़िपीबा बुझि बुड़िबक बुझए। तेँ की हम बुड़िबक छी। कियो बुझैए तँ बुझऽ। जहिया बाबू मुइलाह तहिया जते भार कपारपर आएल, से कियो आन सम्हारि दइए। की अपने करै छी। पसिखन्ने जाइ छी तँ की लुच्चा-लम्पटक संग बैसि पीबै छी जे चोरी-छिनरपन्नी सीखब। या तँ असकरे बैसि कऽ पीबै छी या बड़का लोक लग बैसि कऽ पीबै छी। बड़का लोेकक मुँहमे सदिखन अमृत रहैत छैक। रमानन्द बाबूसँ गियनगर लोक अइ इलाकामे दोसर के अछि। तिनकासँ हमरा दोस्ती अछि। हुनकर ओ बात हम गिरह बान्हि नेने छी जे जहिना कियो जनमैए, बढ़िकेँ जुआन होइए। जुआनसँ बूढ़ भऽ मरि जाइत अछि। ई तँ दुनियाँक नियमे छिऐ। सभकेँ होएत। जे नहि बुझत ओ नहि बुझह। मुदा हम तँ ओएह मानै छी। फेर माए दिशि नजरि घुरलै। मने-मन सोचए लगल जे माइयक पाएर टुटब कोनो अनहोनी थोड़े भेलै। ई तँ भगवानक लीले छिअनि। भगवान कखनो अपना सिर अजस लेताह। कोनो ने कोनो कारण भइये जाइत छैक। तइले हमरा दुखे किए हएत। जहिना एते दिन बीतल तहिना आगुओ बीतत। एते दिन जहिना माएकेँ, बेचि कऽ घुमैत काल, आगूसँ पथिया आनि दै छलिऐ तहिना आब घरोवालीकेँ आनि देबै। कियो हमरा देखा दिअ तँ जे एक्को दिन हमरा काजमे नागा भेल। गोसाँइ डूबै बेर, कतौ रही, कतवो पीबि कऽ बुत्त रही मुदा तेँ की अपन काज कहियो छोड़ैत छी।
मटकुरिया परिवारक खानदानी जीविका चूनक। महिला प्रधान रोजगार। किएक तँ चूनक बिक्री अंगने-अंगने होइत। शुद्ध गमैआ व्यवसाय। ने चून बनबैक समान बाहरसँ अनै पड़ैत आ ने बेचैक असुविधा। गामक अधिकांश परिवारमे चूनक खर्च। कियो पान खाइत तँ कियो तमाकुल। दुनूमे चूनक जरुरत। चून बनाएबो कठिन नहि। डोका जरा कऽ बनैत। अन्नेक कोठी जेकाँ डोको जरबैक कोठी होइत। मुदा अन्नक कोठीमे उपर छोट मुँह, अन्न ढ़ारैक लेल बनाओल जाइत, जखैनकि चूनक कोठीक उपरका भाग खुलल रहैत। निच्चाँक मुँह दुनूक एक्के रंग। कच्चो मालक कमी नहिये। किएक तँ गरीब-गुरबा लोक डोकाक मांस खाइत। मांसो पवित्र। किएक तँ डोका माटि खा जीवन-बसर करैत। डोकेक उपरका भागसँ चून बनैत।
चूनक बजारो गामे-घर। बिरले गोटे घरमे चूनक खर्च नहि होइत, नहि तँ सबहक घरमे होइत। पहिने मटकुरियाक दादी-परदादी चून बेचैत छलि, मुइलाक पछाति माए बेचए लागलि। सात दिनक सप्ताहमे पाँच दिन मखनी भौरी गामे-गामे करैत। एक-एक गाममे एक-एक दिनक पार बनौने। आठ दिन खर्चक हिसाबसँ सभ कियो चून कीनैत। सभ काज अन्दाजेसँ। अन्दाजेसँ चूनो दैत आ अन्दाजेसँ -धान-मड़ुआ- बेचो लैत। कोनो हरहर-खटखट नहि। किएक तँ मनक उड़ान छोट। ने कोठा-कोठीक इच्छा, ने सुख-भोगक। बान्हल मन तेँ मात्र मनुक्ख बनि जीबै टाक इच्छा।
बजारोक प्रतियोगिता नहि। कारोबारमे छीना-झपटी नहि। किएक रहतै। जहिना जातिक शासन तहिना समाजक दंडात्मक रुखि। समाजमे निश्चित जाति निश्चित काजसँ बान्हल। एकक काज दोसर नहि करैत, तेँ लक्कड़-झक्कड़ कम। जेना डोम, नौआ, धोबि, बरही कुम्हार इत्यादिक अपन-अपन जीविकाक धंघा। जे कड़ाइसँ पालन होइत। दुनू बिन्दुपर। कराओलो जाइत आ करबो करैत। सीमित क्षेत्रक बीच कारोबार। कियो अतिक्रमण नहि करैत। जँ कहीं-कतौ अतिक्रमण होइत तँ जातिक बीच ओकर फरिछौट होइत। तेँ सभ अपन-अपन सीमाक भीतर रहैत। हँ, ई बात जरुर होइत जे सीमाक भीतर भैयारीक बँटबारासँ विभाजित होइत। मुदा मटकुरियाक परिवार एक पुरिखियाह, तेँ एहेन प्रश्ने नहि। रोजगारोक लेल तहिना। सभक अपन-अपन सीमित क्षेत्र। एक क्षेत्रमे दोसरक प्रवेश बर्जित। मुदा बेर-बेगरतामे एक-दोसराकेँ भार दऽ समाजक काजमे बाधा उपस्थिति नहि हुअए दैत।
चून बेचि मखनी सिर्फ परिवारे नहि चलबैत। महाजनियो करैत। किएक तँ सोलहो आना श्रमे पूँजी। मेहनत कऽ डोका एकत्रित करैत। डोका जरा कऽ चून बनबैत। आ अन्नसँ चून बदलैत। चूनक कीमतो अलग-अलग। जहिठाम गरीब लोक चुनक कम कीमत दैत तहिठाम सुभ्यस्त किछु बेशिये दैत। पाँचे गोटेक परिवार मखनीक। कते खाएत। तेँ फजिलाहा अन्न सवाइपर लगबैत। सेहो बिना लिखा-पढ़ीक। मुँह जवानी। जहिसँ किछु उपरो होइत किछु बुड़ियो जाइत। पाँच गाममे मखनीक कारोबार। अगर जँ एहिसँ आगू कारोबार बढ़बए चाहत तँ सम्हारले ने होइत। किएक तँ डोका जमा करैसँ चून बनबै धरि, दू दिन समए लगि जाइत। आठे दिनपर बिक्रीक बीट घुमैत। तेँ पाँच गामसँ बेशी गाम सम्हारब कठिन।
टाँग अवाह होइतहि मखनी चून बेचब छोड़ि देलक। मुदा परिवारक रोजगार बन्न नहि भेलै। आब फुलिया बेचए लागलि। चिन्हार गाम चिन्हार गहिकी। तेँ कतौ बाधा नहि। मुदा मखनीक महाजनी बुड़ि गेल। किएक तँ पाँचो गाममे पाँच गोटे ऐठाम अपन धान-मड़ुआ रखैत छलि, ओहि ठामसँ ओहि गाममे सवाइ लगबैत छलि। अपन आवाजाही बन्न भेने बिसरि गेलि। लेनिहारो बिसरि गेल। मुदा तइ लेल मखनीक मनमे दुख नहि भेलै। खुशिये भेलै। खुशी एहि दुआरे भेलै जे जावत देहमे ताकत छलै ताबत अपनो, परिवारो आ दोसरोकेँ खुऔलौं। जिनगीक सार्थकता अइसँ बेशी की हएत। यएह ने धर्म छी। धर्ममय जिनगी बना बुढ़ाढ़ी धरि जीवि लेब, अइसँ बेशी की चाही। तेँ मने-मन खुशी।
समए आगू बढ़ल। कारोबारक रुपो बदलल। कोना नहि बदलैत? समयोक तँ कोनो ठेकान नहि। कोनो साल अधिक बरखा होइत तँ कोनो साल रौदी। अधिक वर्षा भेने तँ अधिक डोकाक वृद्धि होइत। मुदा रौदीमे कमि जाइत। बिसबासु कारोबारक लेल वस्तुक उपलब्धि अनिवार्य। जे आब नहि भऽ पबैत। मुदा समयो तँ पाछु मुहे नहि आगू मुँहे ससरत। पत्थर-चून बजारमे आबि गेल। पर्याप्त वस्तुक उपलब्धि भऽ गेल। बाजारो बढ़ल। जहिठाम उमरदार लोक तमाकुल-पान सेवन करैत छलाह तहिठाम आब स्कूल-कओलेजक विद्यार्थी सेहो करै लगल। ततबे नहि बाल-श्रमिक सेहो करए लगल। गामे-गाम चौक-चौराहा बनि गेल। जाहिसँ चाह-पान खेनिहारो बढ़ल। ओना तमाकुल-पानक अतिरिक्त पान-पराग, शिखर, रंग-विरंगक गुटका सेहो बढ़ि गेल। तेकर अतिरिक्त सार्वजनिक उत्सब सेहो बढ़ल। परिवारक मांगलिक काज विआह, मूड़न, सराध, सेहो नमहर भेल। जहिसँ पान-तमाकुलक खर्च बढ़ल। तेँ चुनोक खर्च कते गुणा बढ़ि गेल।
मखनीक जगह फुलिया लेलक। ओना घरक रोजगार तेँ फुलियोकेँ किछु सीखैक जरुरत नहि। सभ बुझले। सासुक रहितहुँ, कहियो-काल फुलियो बेचए जाइत छलि। किएक तँ जहि दिन मखनी नैहर जाइत तहि दिन फुलिये बेचैयो जाइत आ डोका आनि-आनि चूनो बनबैत। मुदा आब चून बनबैक रुपे बदलि गेल। लोको डोकाक चूनक बदला पत्थर-चून खाए लगल। ओना अखनो बुढ़-पुरान सभ पाथरक चूनकेँ घटिया बुझैत। जे तेजी डोकाक चूनमे होइत ओ पाथरक चूनमे नहि। मुदा हारल नटुआ की करत।
चून बेचैक रुपो बदलल। अखन धरि जे अंदाजसँ बिक्री होइत छल ओ आब तौल कऽ हुअए लगल। बेचक जगह पाइ लेलक। ओना अन्नोक चलनि सोलहन्नी समाप्त नहिये भेलहेँ। आब ओतबे अन्न पड़ैत जे आन ठाम रखैक जरुरत फुलियाकेँ नहि होइत। पाइ बौगलीमे रखैत आ अन्न पथियामे। ओना कर्जखौक सेहो कमल। किएक तँ समएक आगू बढ़ने खाइ-पीबैक उपाए सेहो लोककेँ भेल। बोइन सेहो सुधरल। पाइक आमदनी किसानोकेँ हुअए लगल। लोकक पीढ़ियो बदलल। जाहिसँ विचारोमे बदलाव आएल।
समएक आगू बढ़ने कारोबार असान भेल। जाहिसँ मटकुरियाक परिवार सेहो आगू मुँहे ससरल। मुदा मटकुरिया जहिनाक तहिना रहि गेल। पहिने जे मटकुरिया माएक संग डोका अनैत छल ओ आब एक्के ठाम बजारसँ चून कीनि कऽ लऽ अबैत अछि। सुखल चून। सुखल चूनकेँ गील बनबैमे सेहो अधिक फीरिसानी नहिये।
फागुन मास। शिवरातिक तीनि दिन पछाति। धुरझार लगन चलैत। मेला जेकाँ बरिआती चलैत। अंग्रेजीबाजा आ लाउडस्पीकरक अवाजसँ वायुमंडल दलमलित। आइ सबेरे -आन दिन चारि बजे- मटकुरिया पसिखाना विदा भेल। समइयो सोहनगर। झिहिर-झिहिर हवा चलैत। अकासमे जहिना चिड़ै गीत गबैत तहिना हवामे गाछ-बिरीछ नचैत। पसिखाना पहुँचते मटकुरियाकेँ पासी कहलक- ‘भैया, आइ निम्मन बसन्ती माल अछि, खजुरिया नहि ताड़क।’
पासीक बात सुनि मटकुरियाक मनमे खुशी उपकल। मने-मन सोचलक जे दू गिलास आरो बेसी चढ़ा देबै, बाजल- ‘तब तँ आइ जतरा नीक बनल अछि।’
पासी- ‘अहाँ तँ हमर पुरान अपेछित छी भैया, तेँ दू गिलास ओहिना मंगनिये पिआएब।’
दू गिलास मंगनी सुनि मटकुरिया सोचलक जे पहिल दिन छिऐ तेँ आन दिनसँ कम कोना लेब? यात्रा तँ पहिलुके दिन नीक होइ छै। बेचाराकेँ सगुन कोना दुरि करबै। मुस्की दैत कहलक- ‘बड़बढ़ियाँ। अपनो मिला कऽ नेने आबह।’
वसन्ती ताड़ी, पीबिते मटकुरियाकेँ रंग चढ़ए लगल। ताड़ी पीबि मटकुरिया सोझे, पसिखन्नेसँ, पत्नीकेँ माथ परक पथिया अानए दछिनमुँहे बिदा भेल। गामक दछिनवरिया सीमापर ठाढ़ भऽ आगू तकलक। जते दूर नजरि गेलै तहि बीच कतौ पत्नीकेँ अबैत नहि देखलक। कनी-काल पाखरिक गाछ लग ठाढ़ भऽ सोचए लगला जे आगू बढ़ी वा एतै रुकि जाइ। अंग्रेजी बाजा आ लाउडस्पीकरक फिल्मी गीत कानमे पैसि-पैसि मनकेँ डोलबैत। मन पड़लै अपन विआह। बिआह मन पड़िते फुलियाक रुप आगूमे ठाढ़ भऽ गेलै। गुनधुन करैत सोचलक जे ऐठाम ठाढ़ भऽ कऽ समए बिताएब, तहिसँ नीक जे आरो थोड़े बढ़ि जाइ। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू बढ़लापर पत्नीकेँ अगिला गाम टपि अबैत देखलक। बाधो कोनो नमहर नहि। फुलियाक नजरि सेहो मटकुरियापर पड़ल। दुनूक डेग तेज भेल। तेज होइक दुनूक दू कारण। मटकुरियाक मनमे जे जते जल्दी लगमे पहुँचब तते जल्दी भार उतड़तै। जखैनकि पसीनासँ नहाएल फुलियाक मनमे शान्ति। शान्ति अबितहि पथिया हल्लुक लगए लगलै। दुनूक मनमे कतेको नव-नव विचार अाबए लगलै।
लग अबितहि मटकुरिया धोतीक ढ़ट्ठा सरिऔलक। किएक तँ माथपर भारी एलासँ डाँड़क धोती डाँड़मे बैसि जाइत। ढ़ट्ठा सरिया गमछाक मुरेठा बान्हि दुनू हाथसँ पकड़ि फुलियाक माथ परक पथिया अपना माथपर लेलक। माथपर लैते किछु कहैक मन मटकुरियाकेँ भेल। मुदा किछु बाजल नहि। किएक तँ फेर मनमे एलै जे बेचारी थाकल अछि, तेँ मन अगिआइल होएत। हो ने हो किछु करुआएल बात बाजि दिअए। जखैनकि एकाएक माथ परक भार उतड़लासँ फुलियाक मन हल्लुक भेल। मुदा ओहो किछु बाजलि‍ नहि, ओहिना देह कठिआएल। आगू-पाछू दुनू बेकती घर दिशि बिदा भेल। जते आगू बढ़ैत तते फुलियाक मन हल्लुक होइत आ मटकुरियाक मन भारी। पत्नीसँ किछु कहैक विचार मटकुरियामे कमए लगल। जना मुँह खोललासँ भारी बढ़त। मुदा जना-जना आगू बढ़ैत तना-तना फुलियाक देहो-हाथ सोझ होइत आ पतिकेँ किछु कहैक मन सेहो होइत। मुदा किछु बजैत नहि। किएक तँ पति-पत्नीक बीच गप्पक आनंद तखन होइत जखन दुनूक मन सम -ने बेसी सुख आ ने बेसी दुख- होइत। से अखन धरि दुनूक –-मटकुरिया आ फुलियाक- बीच नहि भेल। एते काल फुलियाक माथपर पथिया रहने मन पीताएल तँ आब मटकुरियाक हुअए लगल। ने फुलिया पतिकेँ किछु कहैत आ ने मटकुरिया पत्नीकेँ। मुदा बीच रस्ता बाध अबैत-अबैत दुनूक मुँहसँ हँसी निकलल। पथिया नेनहि मटकुरिया पाछु घुमि कऽ तकलक तँ देखलक जे फुलिया मुस्किया रहल अछि। फुलियोक नजरि मटकुरियाकेँ मुस्किआइत देखलक। एक टकसँ एक-दोसरपर आँखि गरौने अपन जिनगी देखए लगल।

मुखीलाल चौधरी

मुखीलाल चौधरी
सुखीपुर – १, सिरहा
हाल ः बुटवल बहुमुखी क्या पस बुटवल
दिनाड्ढ २०६५ जेष्ठ २९ गते बुधदिन ।

धीरेन्द्र बाबु,
नमस्कादर
बहुत दिनक बाद अपनेक कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” चिठ्ठी पठारहल छी ।
आशेटा नहि वरण विश्वा स अछि, प्रकाशित होएत ।
दिनाड्ढ २०६५ जेठ १४ गते मंगलदिन जनकपुरधाममें लोकार्पण भेल “समझौता नेपाल”क दोसर प्रस्तुटति गीति एल्व म “भोर” क गीतके संगही समझौता नेपालक निर्देशक नरेन्द्रमकुमार मिश्रजीक साक्षात्का‍र दिनाड्ढ २०६५ जेठ १८ गते शनिदिन कान्तिंपुर एफ़एम़के सर्वाधिक लोकप्रिय कार्यक्रम “हेलौ मिथिलामें” सुनबाक मौका भेटल । संघीय गणतान्त्रि क नेपालक भोरमे समझौता नेपालद्वारा प्रस्तुकत केल गेल गीति एल्बलम भोरके लेल समझौता नेपालक निर्देशन नरेन्द्रदकुमार मिश्रजीके हार्दिक बधाई एवं शुभकामना । आगामी दिनमें समझौता नेपाल मार्फत गीति यात्राके निरन्तनरततासँ गीत या संगीतके माध्यएमसँ मिथिलावासी आ मधेशी संगही सम्पूबर्ण आदिबासी थारु में जागणर लावय में सफल होवय आओर मिथिलावासी, मधेशी, आदिवासी थारु संगही सम्पूहर्ण देशवासीमें सदाशयता, सदभावना, सहिस्णुतता आ स्नेकहमें प्रगाढता बढावमें सफलता प्राप्तू होवय, एकर लेल साधुवाद ।
गीतकार सभहक गीत उत्कृरष्टह अछि, कोनो गीत वीस नहि सभटा एकाईस । एकसँ बढी कय एक । गीतकार सभहक गीतके सम्वयन्धगमें छोटमें अलग अलग किछु कहय चाहैत अछि
रुपा झाजीक गीत शिक्षा प्रति जागरुकता आ चेतानक सन्दे श द�रहल अछि । ज्ञान प्रकाश अछि आओर अज्ञान अन्धगकार । अन्धरकारसँ वचवाक लेल ज्ञान प्राप्त केनाइ आवश्यरक अछि । “केहनो भारी आफत आवौ, ज्ञानेसँ खदेड” पाति कोनो समस्याध किएक नहि विकराल होय ज्ञान आ वुद्धि सँ समाधान करल जा सकैत अछि ।
पुनम ठाकुरजीक गीत सब सन्तातन समान होइछ, बेटा—बेटीमे भेदभाव नहि होयबाक आ करबाह चाहि सन्देठश द�रहल अछि । “मुदा हो केहनो अबण्डर बेटा, कहता कुलक लाल छी ” सिर्फ एक पातिस आजुक समाजमें बेटा—बेटी प्रति केहन अवधारणा अछि, बतारहल छथि ।
मिथिलाके माटि बड पावन छै । संस्काणर आ अचार–विचार महान छै । आओर वएह माटिक सपुत साहिल अनवरजी छथि । जई माटिमें साहिल अनवरजी जकाँ मनुक्‍ख छथि ओही माटिमे सम्प्र दायिकताक काँट उगिए नहि सकैछ । उगत त मात्र सदभावना, सदाशयता, माया—ममता, स्नेकहक गाछ । जेकर गमकसँ सभकेओ आनन्दिहत रहत आ होएत ।
“जतय हिन्नुतओ राखि ताजिया, मान दिअए इसलामके
छठि परमेसरीक कवुलाकय मुल्लो जी मानथि रामके”
सँ इ नहि लागि रहल अछि ? कि मिथिलाके पावन माटिमें सहिश्णु ताक सरिता आ बसन्तेक शीतल बसात बहिरहल अछि । धन्य छी हम जे हमर जनम मिथिलाक माटिमें भेल अछि ।
धीरेन्द्रि प्रेमर्षिजीक गीत सकारात्मथकतासँ भरल अछि । समस्याे किएक नहि बडका होबय आ कोनो तरहके होय निरास नहि होयवाक चाहि आओर सदिखन धैर्य—धारणकय सकारात्मेक सोच राखिकय आगाँ बढवाक चाहि । संगहि जाहि तरहसँ माँ–बाप अपन सन्ताकनक लेल सदिखन सकारात्मकक दृष्टिँकोण राखैत छथि, वएह तरहसँ संतानक कर्तव्यत होइछ जे ओ सभ अपन वुढ माँ–बाप प्रति वहिनाइते दृष्टिककोण अपनावैत । गीतके शुरुके जे चार पाति
“संझुका सुरजक लाल किरिनिया, नहि रातिक इ निशानी छै
छिटने छल जे भोर पिरितिया, तकरे मधुर कहानी छै” ।
सकारात्मेकताक द्योतक अछि । एकर संगहि
“सोना गढीके इएह फल पौलक, अपने बनि गेल तामसन
वाह बुढवा तैओ वाजैए, हमर बेटा रामसन” इ पातिसँ मा–बापके अपन सन्तादनक प्रति प्रगाढ माया ममताक बोध करारहल अछि ।
नरेन्द्र कुमार मिश्राजीक गीत इ बतारहल अछि कि संसारमे प्रेम, स्नेबह, माया–ममता अछि तएँ संसार एतेक सुन्द र अछि । यदि प्रेम, स्नेंह, माया–ममता हटा देल जाय त संसार निरस भ�जाएत आ निरस लाग लागत । तएँ हेतु एक दोसरक प्रति प्रेम, स्नेंहक आदन–प्रादान होनाइ आवश्याक अछि ।
“आखि देखय त सदिखन सुन्द्र सृजन
ठोर अलगय त निकलय मधुरगर बचन”
पाती सँ प्रेम आ स्नेरह वर्षा भ�रहल अछि, लागि रहल अछि ।
वरिष्टँ साहित्यगकार, कवि, गीतकार द्वय डा़ राजेन्द्रो ॅविमल� जी आ चन्द्रिशेखर ॅशेखर� जीके गीत अपने अपनमे उत्कृरष्टर आ विशिष्ट अछि । हिनका सभक गीत सम्बनन्धॅमे विशेष किछु नहि कहिके हिनका सभक गीतक किछु पाति उधृत कयरहल छी, सबटा बखान कैय देत ।
डा़ राजेन्द्री विमल जीक पातिक
“जगमग ई सृष्टिृ करए, तखने दिवाली छि
प्रेम चेतना जागि पडए, तखने दिवाली छि
रामशक्ति आगुमे, रावण ने टीकि सकत
रावण जखने डरए, तखने दिवाली छि”
अपने अपनमे विशिष्टडता समाहित केने अछि ।
ओही तरहे चन्द्रषशेखर ॅशेखर� जीक गीतक निम्न। पाति अपने अपनमे विशिष्ट अछि
“साँस हरेक आश भर, फतहक विश्वा सकर
बिहुँसाले रे अधर, मुक्त हो नैराश्य‍–डर
रोक सब विनाशके, ठोक इतिहासके
दग्धसल निशाँसके, लागल देसाँसके”
हमर यानी मुखीलाल चौधरीक गीतके सम्बिन्धामे चर्चा नहि करब त कृतघ्ननता होएत । हमरद्वारा रचित गीत भोरक संगीतकार धीरेन्द्रक प्रेमर्षिद्वारा परिमार्जित आ सम्पातदित केल गेल अछि । तएँ एतेक निक रुपमे अपने सभहक आगाँ प्रस्तु त भेल अछि । हमर गीतके इएह रुपमे लाबएमे धीरेन्द्रत प्रेमर्षिजीक उदार या गहन भुमिका छैन्हआ । एकर लेल प्रेमर्षिजीके हम मुखीलाल चौधरी हार्दिक धन्यरवाद ज्ञापन करए चाहैत छी ।
सभटा गीतके संगीत कर्णप्रिय लगैत अछि । सुनैत छी त मोन होइत अछि फेर–फेर सुनी । कतबो सुनलाक वादो मोन नहि अगहाइत अछि । एतेक निक संगीतक लेल धीरेन्द्रइ प्रेमर्षिजीके हार्दिक बधाई आओर अगामी दिन सभमे एहोसँ निक संगीत दय सकैत, एकर लेल शुभकामना आ साधुबाद ।
सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका इत्याादिक संयोजन कय बड सुन्दगर आ हृदयस्पछर्शी गीति एल्बीम “भोर ” जाहि तरहसँ हमरा सभहक आगाँ परोसने छथि, एकर लेल भोरक संयोजक रुपा झा जीके हार्दिक बधाई । अन्तनमे सभ गीतकार, संगीतकार, गायक–गायिका, संयोजक आ समझौता नेपालक निर्देशकके हादिक वधाई ।(साभार विदेह www.videha.co.in)

रिक्साबला - जगदीश प्रसाद मण्डल



‘ओ रिक्शा, ओ रिक्शा।’ - कने फड़िक्केसँ जीबछ जोरसँ बाजल। हाथमे बम्बैया बैग, जिन्स पेन्ट आ शर्ट पहीरिने, दहिना हाथमे चौड़गर घड़ी। फुल जुत्ता, मौजा सेहो लगौने। बम्बैये हिप्पी कट केश, बुच्चा मोछ आ आँखिपर चश्मा। बचनू रिक्शाबला अपन ताशक संगीक संग ताश खेलाइत। ताशो ओहिना नहि खेलैत, एक सेटपर चारु गोटेक चाह-पान खर्च, हरलाहा पार्टीकेँ देमए पड़ैत। पाँचटा लाल बचनूक जोड़ाकेँ। तेँ एक्केटा सेठ होइमे बाकी। एकटा लाल हएत, चाह-पानक जोगार लगत। तेँ एकाग्र भऽ बचनू लालक पाछु दिमाग लगौने। ताशक चौखड़ी लग आबि जीवछ दुइभेपर बैग रखि रुमालसँ मुँह लग हौंकए लगल। कने काल हौंकि रिक्शाबलाकेँ चड़िअबैत कहलक- ‘हौ भाय, हमरा बहुत दूर जाइक अछि, झब दे चलह?’
ताश परसँ नजरि उठा, जीबछ दिशि देखि बचनू बाजल- ‘भाय, केहेन सुन्दर ठंढ़ा छै, कनी सुसता लाए। तोरो देखै छिअह जे पसीनासँ तड़-बत्तर भेल छह। हमरो एक्केटा लाल बाकी अछि, दू-तीन खेपमे भइये जाएत। अगर जँ अपन लाल नहियो हएत आ विरोधियेकेँ दूटा कारी भऽ जेतै, तैयो जीत हेबे करत।
बचनूक बात सुनि जीबछ शर्टो आ गंजिओ निकालि कऽ रौदमे पसारि देलक। आसीन मास। तीख रौद। तइ परसँ गुमकी सेहो। रेलबे स्टेशनसँ जीबछ पएरे आएल। किएक तँ स्टेशनक बगलेमे तेहेन खच्चा बाढ़िमे बनि गेल जे रिक्शो आ टमटमोक रास्ता बन्न भऽ गेलै। पएरे लोक कहुना कऽ थाल-पानिमे टपैत। बाढ़ि तँ तेहेन आएल छल जे जँ स्टेशन ऊँचगर जमीनपर नहि रहैत तँ ओहो भसि कऽ कतए-कहाँ चलि जाइत। मुदा तैयो स्टेशनक पूबरिया गुमती, पुल आ आध किलोमीटर रेलबे लाइन दहाइये गेल। रेलवेक दछिन तेहेन मोइन फोड़ि देलक जे गाड़िओ बन्न भऽ गेल। डेढ़ मासमे पुलो बनल आ गाड़ियो चलब शुरु भेल।
गाममे रिक्शा बचनुएटा केँ। जाहिसँ कोनो तरहक प्रतियोगिता नहि। प्रतियोगिता तँ शहर-बजारमे होइत, जहिठाम सैकड़ो-हजारो रिक्शा रहैत। अनेरो रिक्शाबला सभ रिक्शापर बैसि, इमहरसँ उमहर घुमबैत आ बजैत- ‘कोट-कचहरी......बैंक.......पोस्ट आॅफिस....... कओलेज.... स्कूल..... स्टेशन..... बस स्टेण्ड...... अस्पताल.... बड़ा बजार..... सिनेमा चौक...... डाकबंगला..... भगतसिंह चौक..... आजाद चौक।
मुदा से तँ गाममे नहि। मुदा तेँ कि गामक रिक्शाबलाकेँ कमाइ नहि होइत। खूब होइत। एक तँ गामक कच्ची रस्ता, तइ परसँ जहाँ-तहाँ टूटलो आ गहूम पटौनिहार सभ कटनौ। एहेन सड़कमे दोसर कोन इंजनबला सवारी सकत। तेँ गामक सवारी रिक्शा। जाहिसँ गामक बेटी-पुतोहूक विदागरी निमहैत। धन्यवाद तँ रिक्शेबलाकेँ दी जे बेचारा छातीपर भार उठा, कखनो चढ़ि कऽ तँ कखनो उतरि कऽ पार लगबैत। कठिन मेहनतक पाइ कमाइत।
अखन धरि ताशक खेल नहि फड़िआइल। किएक तँ कखनो लाल कमि जाए तँ कखनो कारी। अगुताइत जीबछ बाजल- ‘भाय, ताश नै फड़िऐतह। बहुत दुरस्त जाइक अछि। झब दे चलह। नञि तँ अन्हार भेने तोरो दिक्कत हेतह आ हमरो अबेर भऽ जाएत। कहुना-कहुना तँ ऐठामसँ सुग्गापट्टी पाँच कोस हएत।’
बचनू- ‘हँ, से तँ पाँच कोससँ कम नहिये हएत। मुदा तइसँ की? ई की कोनो शहर-बजार छिऐ जे रातिक कोन बात जे दिने देखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण होइ छै। ने रस्तामे भीड़-भड़क्का आ ने कोनो चीजक डर। निचेनसँ जाएब।’
गामक बीचमे चौबट्टी। जहिठाम पान-सातटा छोट-छोट दोकान। जहिसँ गामोक आ आनो गामक लोक चौक कहए लगल। चौकक पछबरिया कोनपर एकटा खूब झमटगर पाखरिक गाछ। जहिपर हजारो चिड़ैक खोँता। दिन भरि चिड़ै सभ चराउर करए बाहर जाइत आ गोसाँइ निच्चा होइतहि पतिआनी लगा-लगा गाछपर अबए लगैत। कतेको रंगक चिड़ै तेँ सभ जातिक चिड़ै अपन-अपन संगोर बना-बना अबैत। ततबे नहि, गाछक डारियो बाँटि नेने अछि। एक जातिक चिड़ै एक डारिपर खोँता बनौने अछि। तेँ एक जातिक चिड़ैसँ दोसर जातिक चिड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने झगड़ा-झंझट। मुदा अपनामे एक जातिक बीच नीक-अधलाक गप-सप्‍प जरुर होइत। कथा-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ रामायण-महाभारतक किस्सा-पिहानी जरुर होइत। पान-पुनक चरचा सेहो करैत। अधला काज केनिहारकेँ डाँटो-फटकार दैत आ जुरमिनो करैत। ओहि गाछक निच्चाँमे बाटो-बटोही रौदमे ठंढ़ाइत आ पाि‍न-बुनीमे सेहो जान बँचबैत। ताशक चौखड़ी सेहो जमैत।
बचनुक बात सुनि जीबछ पेन्टक पैछला पौकेटसँ सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकाललक। एकटा सिगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनुओकेँ देलक। दुनू गोटे सिगरेट लगा, रिक्शापर चढ़ि बिदा भेल। कनिये आगू बढ़ल आकि बचनू जीबछकेँ पूछलक- ‘भाय तूँ बम्बैमे रहै छह?’
  ‘हँ’
  ‘मन तँ हमरो बहु दिनसँ होइए मुदा पलखतिये ने होइए जे जाएब।’
  ‘ओइ ठीन मन तँ खूब लगैत हेतह?’
  ‘एँेह भाय मन। की कहबह? जखैनिये डेरासँ निकलबह आकि रंग-बिरंगक छौँड़ी सभकेँ देखबहक। उमेरगरो सभ जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक तँ बुझि पड़तह जे कुमारिये अछि। मुदा छउरो सभ की ओइसँ कम अछि। एक तँ ओहिना जे छउरी सभ दामी-दामी कपड़ा पहीनने अछि आ सौँसे देह झक-झक करै छै। तइपरसँ छउरो सभ करिक्का चश्मा पहीन लेतह आ निङहारि-निङहारि देखैत रहतह। चश्मो की कोनो एक्की-दुक्की रहै छै। जखैनिये आँखिमे लगेबह आकि देहपर कपड़ा बुझिये ने पड़तह।’
  ‘ओहन चश्मा हमरा सभ दिशि कहाँ छै, हौ।’
  ‘ऐँह, ओइ ठीन विदेशी चश्मा सभ बिकाइ छै की ने। देहातमे ओहन चश्मा के कीनत।’
चौकसँ कनिये उत्तर एकटा ताड़ीक दोकान। चारि-पाँच कट्ठाक खजुरबोनी। बीच-बीचमे ताड़क गाछ सेहो। उत्तर-दछिने रास्ता। पछबारि भाग ताड़ीक दोकान। ताड़ीक दोकान देखि जीबछ बचनुक पीठमे आगुरसँ इशारा करैत रोकैले कहलक। बचनुक मनमे भेलै जे भरिसक पेशाब करत। रिक्शा रोकि उतरि गेल। जीबछ बाजल- ‘भाय, ताड़ी दोकान देखै छिऐ। चलह दू घोंट पीबि लेब, तखन चलब। हमहीं पाइयो देबै।’
ताड़ीक नाम सुनि बचनू कहलक- ‘ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी मुदा ताड़ी पीबि कऽ ने रिक्शा चलबै छी आ ने ताड़ी पीनिहारकेँ रिक्शापर चढ़बै छी। तेँ अखैन ताड़ी-दारु बन्न करह। जखैन घरपर पहुँचबह तखैन जे मन हुअह से करिहह।’
  ‘भाय, ओतऽ भेटत की नै भेटत, अखैन तँ आगूमे अछि।’
  ‘तब अखैन नै जाह। ताड़ी कीनि कऽ नेने चलह। गामेपर दुनू गोटे पीबि लेब आ रातिमे रहि जइहह।’
  ‘अइठीन कतऽ रहब?’
  ‘से की हमरा घर-दुआर नै अछि। ओतै रहि कऽ राति बीता लिहह। भोरे पहुँचा देबह।’
  ‘अच्छा, ठीक छै, चलह।’
  दुनू गोटे ताड़ी दोकान दिशि बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घैलक-घैल ताड़ी फेनाइत देखलक। घैलक पतिआनी देखि मने-मन सोचए लगल जे हमरा होइ छलए जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबैए। मुदा से नहि गामो-घरक लोक खूब पीबैए। पच्चीस-तीस गोटे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाइपर बैसि ताड़िओ पीबैत आ चखनो खाइत। कियो-कियो असकरे पीबैत तँ कियो-कियो दू-दू, तीन-तीन, चारि-चारि गोटेक संगोरमे। कियो खिस्सा कहैत तँ कियो गीत गबैत। कियो अन्हागाहिस गारियो पढ़ैत। सभ उमंगमे। जहिना ताड़ीक फेन उधिआइत तहिना सबहक मन। ताड़ीक खटाइन गंध लगिते जीबछकेँ होए जे कखैन दू गिलास चढ़ा दिऐ।
ताड़ी दोकानसँ कने हटि दूटा बुढ़िया चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकानमे मुरही, घुघनी बदामक कचड़ी आ दोसरमे चारि पाँच रंगक माछक तरुआ। ओंगरिक  इशारासँ मझोलका डाबा देखबैत जीबछ बचनूकेँ कहलक- ‘भाय, दुइये गोरे पीनिहार छी, तेँ वएह डाबा लऽ लाए।’
बचनू- ‘पहिने दाम पूछि लहक?’
डाबाक कान पकड़ि जीबछ पासीकेँ दाम पुछलक। तोड़-जोड़ करैत पैंतीस रुपैयामे पटि गेलै। पेन्टक जेबीसँ नमरी निकालि ओ जीबछकेँ देलक। नमरी पकड़ैत दोकानदार कहलकै- ‘तारिये टाक दाम कटै छिअह। डाबा घुरा दिहह।’
‘बड़बढ़ियाँ’ कहि बचनू डाबा उठा लेलक। डाबाकेँ चखना दोकानक आगूमे रखि बचनू मने-मन सोचए लगल जे औझुका तँ कमाइयो ने भेल। धिया-पूता की खाएत? से नञि तँ तेना कऽ मुरही-कचड़ी कीनि ली जे सभ तुर खाएब। जेहने झुर कऽ कऽ कचड़ी बनौने तेहने माछक कुटिया। एकदम लाल-बुन्द। माछक कुटिया देखि जीबछक मुँहमे पानि अबए लगल। मन चटपटाए लगल। बचनूकेँ कहलक- ‘भाय, कते चखना लेबह?’
मने-मन बचनू हिसाब जोड़ए लगल। दू-दूटा कचड़ी आ दू-दूटा माछ दुनू बच्चाले आ अपना सभले चारि-चारिटा। किएक तँ गरम चीज होइ छै, तेँ बेसी खराब करतै। बाजल- ‘भाय, एक किलो मुरही, एक किलो घुघनी, सोलहटा कचड़ी आ सोलहटा माछक कुटिया लऽ लाए।’
सएह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ विदा भेल। रिक्शा लग आबि बचनू चखनाक मोटरी सेहो जीबछेकेँ दऽ देलक।
चौकक रस्ता छोड़ि बचनू घर परक रस्ता धेलक। लगेमे घर। दुइयेटा घर बचनूकेँ। रिक्शा रखैले एकचारी भनसे घरक पँजरामे देने। एकटा घरमे भानसो करै आ जरनो-काठी रखै। दोसरमे सभतुर सुतबो करै आ चीजो-बौस रखै। अपना दरबज्जा नहि। मुदा घरक आगूमे धुर दसेक परती, जइपर सरकारी चबूतरा बनल। घर लग अबिते बचनू रिक्शा ठाढ़ कऽ आंगन बाढ़नि अनए गेल। बचनूकेँ देखि घरवाली कहलकै- ‘आइ जे भाड़ा नै कमेलौं, तँ राति खएब की? अपने दुनू गोरे तँ ओहुना सुति रहब मुदा बच्चा सभ कना रहत?’
बिना किछु उत्तर देनहि बचनू बारहनि लऽ अंगनासँ निकलि गेल। चबुतराकेँ देहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुन्दर, तेँ बहारितहि चमकए लगल। चबुतराक चमकी देखि जीबछ बाजल- ‘भाय, जेहने मजगूत चबुतरा छह तेहने सुन्दर। संगमरमर जेकाँ चमकै छह।’
जीबछक बात सुनि बचनुकेँ ओ दिन मन पड़लै जइ दिन ओ ठीकेदारकेँ गरिऔने रहए। मुस्कुराइत कहलकै- ‘भाय, ओहिना एहेन सुन्दर बनल अछि। जे ठीकेदार बनबाबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नम्बर ईंटा आ कोसीकातक बाउलसँ बनबए चाहैत रहए। हम गामपर नै रही। जखैन एलौं तँ देखलिऐ। देखिते सौँसे देह आगि लगि गेल। मुदा ऐठाम रहए क्यो ने। दोसर दिन नाओ कोड़ए ठीकेदारो आ जनो एलै। हमरा तँ गरमी चढ़ले रहए। जखने कोदारि लगौलक आकि जऽनक हाथसँ कोदारि छीनि ठीकेदारकेँ गरिअबै लगलौं। जहाँ गारि पढ़लिऐ आकि ठीकेदारो गहुमन साँप जेकाँ हुहुआ कऽ उठल। जहाँ ओ जोरसँ बाजल आकि हमहूँ गरिअबिते दुनू हाथे कोदारिक बेंट पकड़ि कहलिऐ, सार नाओ लइसँ पहिने तोरे काटि देबह। मुदा सभ पकड़ि लेलक। डरे ठीकेदारो थर-थर कँपए लगल। तखन जा कऽ एक नम्मर सभ किछु -ईंटा, सिमटी, बालु आनि बनौलक।’
‘जीबछ बाजल- ‘बाह।’
बचनू- ‘कनी उपर आबि कऽ देखहक जे की सभ बनबौने छी। देखहक ई खेलाइ लऽ पच्चीसी घर छी, कौड़ीसँ खेलाएल जाइए। मुदा ई खेल समैया छी। एकर चलती सिर्फ आसिने टामे रहैए। कोजगरा दिन तँ लोक भरि राति खेलते रहैए।’
दोसरकेँ देखबैत- ‘ई मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाममे लोक एकरा मुगल-पैठान कहै छै मुदा आन-आन गाममे एकरा कौआ-ठुट्ठी कहै छै। गोटीसँ खेलाइल जाइ अए।’
तेसर घर देखबैत- ‘ई बच्चा सभक छिऐ। एकरा चैरखी-चैरखी घर कहै अए। झुटकासँ खेलल जाइए।’
जीबछ- हौ भाय, तू तँ बड़ खेलौड़िया बुझि पड़ै छह।’
बचनू- ‘हौ, जिनगीमे आउर छै की? खाइत-पीबैत, हँसी-चौल करैत बिता ली। सभ दिन कमेनाइ, सभ दिन खेनाइ। कोनो हर-हर, खट-खट नै। धिया-पूताले तँ हम अपने इस्कूल खोलि देने छिऐ। खेती-पथारीक काजसँ लऽ कऽ रिक्शा चलौनाइ, ईंटा बनौनाइ सभ लूरि हमरा अछि। धिया-पूता तँ देखिये कऽ सीखि लेत।’
ओना जीबछ बचनुक गप सुनैत मुदा मन ताड़ीक खटाइन गंधपर अँटकल। होइ जे कखन दू गिलास चढ़ाएब। नै तँ कमसँ कम आंगुरमे भिड़ा नाकोक दुनू पूरामे लगा ली। जीबछकेँ बचनू कहलक- ‘भाय, ताबे तूँ सभ कुछ सरिआबह, हम घरमे रिक्शा रखि दइ छिऐ। काजसँ निचेन भऽ जाएब।’
जीबछ सभ समान सरिअबए लगल। रिक्शाकेँ गुरकौने बचनु एकचारीमे रखि आंगन जा दुनू बच्चो आ पत्नियोकेँ कहलक- ‘दुनू बाटिओ आ दुनू छिपलियो नेने चलू।’
कहि बचनू आगू बढ़ि गेल। पत्निक मन खुशीसँ झुमि उठल। दुनू बच्चा दुनू बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू छिपली नेने पत्नी डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ मुँहपर नुआ नेने कनडेरिये आँखिये दुनूकेँ देखैत। अपना दुनू गोटेले बचनू चारि-चारि पीस माछ, चारि-चारि कचड़ी आ अधा किलो करीब मुरही-घुघनी मिला कऽ रखि, दुनू बच्चाकेँ एक-एक कचड़ी, एक-एक माछक कुटिया आ दू-दू मुट्ठी मुरही-घुघनी मिला कऽ देलक। दुनू बच्चा देखि कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी वामा हाथे उठा दहिना हाथे खाइत बिदा भेल। माए लग पहुँच दुनू बच्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटीमे घुघनीक मिरचाइक टुकड़ी आ कचड़ीमे सटल मिरचाइकेँ देखि माए कहलक- ‘बौआ, मिरचाइ बीछि कऽ रखि दिहए। तोरा सभकेँ करु लगतौ।’
तहि बीच बचनू गमछाक एक भागमे मुरही-घुघनीकेँ मिला, चारि-चारिटा कचड़ी आ चारि-चारिटा माछक कुटिया फुटा, दुनू गोटेले रखलक। चबुतरे परसँ बचनू घरवालीकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘ई सभ लऽ जाउ।’
अदहा मुँह झपने बचनुक पत्नी सरधा चबुतरापर पहुँच दुनू छिपली बचनुक आगूमे रखि देलक। एकटा छिपलीमे मुरही कचड़ी आ दोसरमे घुघनी-माछ बचनू दऽ देलक। झुर माछक तरुआ देखि सरधाक मन हँसए लगल। मनमे एलै जे कल्हुका जलखै तकक ओरियान भऽ गेल। दुनू छिपली तरा-उपरी रखि दुनू हाथसँ पकड़ि आंगन बिदा भेलि।
दुनू गोटे –जीबछ आ बचनू- दुनू भाग बैसि बीचमे ताड़ीक डाबा, गिलास आ चखना रखलक। दुनू गिलासमे जीबछ ताड़ी ढ़ारि, आगूमे रखि आँखि मुनि, ठोर पटपटबैत मंत्र पढ़ए लगल। कनी काल मंत्र पढ़ि, आँखि खोलि तीन बेर ताड़ीमे आंगुर डुबा निच्चाँमे झाड़ि बाजल- ‘हुअह भाय, आब पीबह।’
छगाएल दुनू, तेँ एक लगाइते तीन-तीन गिलास पीबि लेलक। मन शान्त भेलै। मन शान्त होइतहि जीबछ सिगरेट निकालि एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनुओक हाथमे देलक। दुनू गोटे सिगरेट धरा पीबए लगल। सिगरेट पीबैत-पीबैत दुनूकेँ निशाँ चढ़ए लगल। निशाँ चढ़िते गप-सप्‍प करैक मन दुनू गोटेकेँ हुअए लगलै। एक मुट्ठी मुरही आ एक टुकड़ी माछ तोड़ि जीबछ मुँहमे लेलक। बचनुओ लेलक। मुँह महक घांेटि जीबछ बाजल- ‘भाय, तोरा रिक्शा चला कऽ परिवार चलि जाइ छह?’
कचड़ी तोड़ि मुँहमे लैत बचनू उत्तर देलक- ‘किअए ने चलत। हमरा की कोनो कोठा बनबैक अछि जे गुजर नै चलत। तहूमे की हम रिक्शा बारहो मास थोड़बे चलबै छी। भरि बरसात चलबै छी। जहाँ बरखा बन्न भेलै आकि महाकान्त भाइयक चिमनीमे काज करै छी।’
‘नोकरियो करै छह?’
‘एहेन नोकरी तँ भगवान सभकेँ देथुन।’
अलबेला लोक छथि महाकान्त भाय। हुनकर खाली पूँजी टा छिअनि। असली कारबारी हम दू गोटे छी। सरुप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-बिकरीसँ लऽ कऽ कोइला मंगौनाइ, ओकर हिसाब बारी केनाइ हुनकर काज छिअनि। आ हमर काज पथेरीक देखभाल केनाइ, समएपर ओकरा दमकल चला, खाधिमे पानि देनाइसँ लऽ कऽ बजारसँ समान कीनि कऽ अननाइ आ चिमनी परसँ घर-परक दौड़-बरहा केनाइ रहैए।’
‘तब तँ खूब कमाइ होइत हेतह?’
‘कमाइ जँ करए चाही तँ ठीके खूब हएत। मुदा से नै करै छी। एक सए रुपैया रोज होइए। ओ घरवालीक हाथमे दऽ दै छिऐ। बाकी खेलौं-पीलांै। किएक तँ नजाइज पाइ जँ घरमे देबै तँ ओइसँ भाभन्स नै हएत।’
दुनू गोटे डबो भरि ताड़िओ आ चखनो खा-पीबि गेल। एक दिशि निशाँसँ दुनूक देह भसिआइत, दोसर दिस जोरसँ पेशाब लगि गेलै। उठैक मने ने होइ। मुदा पेशाबो जोेरे होइत जाइत। दुनू गोटे उठि कऽ पेशाब करै गेल। जाबे पेशाब करै लऽ बैसै ताबे बुझि पडै़ जे कपड़ेमे भऽ जाएत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्हारि पेशाब करए बैसल। पेशाब बन्ने ने होइ। बड़ी कालक बाद पेशाबो बन्न भेलै आ भक्को खुजलै।
चबुतरापर दुनू गोटे आबि कऽ बैसल। जीबछ कहलकै- ‘भाय, हमरा डान्स करैक मन होइए।’
जीबछक बात सुनि बचनू पल्था मारि बैसि, ठेहुनपर दुनू हाथसँ बजबए लगल। मुदा ओहिसँ अबाज नै निकलै। अबाज निकलै मुँहसँ। जहिना-जहिना मुँहसँ बोल निकलइ तहिना-तहिना दुनू ठेहुनपर हाथ चलबै। तहि बीच दुनू बच्चो चबुतरापर आबि थोपड़ी बजबए लगल। अंगनाक मुहथरिपर सरधा बैसि देखए लगली। जीबछ डान्स करए लगल। थोड़े कालक बाद बचनुक मुँह दुखा गेलै। मुदा जीबछ डान्स करिते। दुनू बच्चो थोपड़ी बजबिते। जहिना बाढ़िक रेतपर हेलनिहार चीत गरे सुति कतौसँ कतौ भसिया कऽ चलि जाइत तहिना बैसल बैसल सरधाक मन भसिआइत। तहि बीच बचनु उठि कऽ आंगन गेल। घैलची परक घैलसँ पानि फेकि नेने आएल। उल्टा कऽ घैल रखि, हाथमे औँठी रहबे करै, दुनू हाथे घैलक पेनपर बजबए लगल। लाजबाब बाजा। नचैत-बजबैत दुनू गोटे थाकि गेल। सुति रहल।
भोर होइते दुनू गोटे उठि, मुँह-हाथ धोए चलि देलक।
अइ बेर आसिन अपन चालि बदलि लेलक। किएक तँ आन साल अधहा आसिनक उपरान्त हथिया नक्षत्र अबैत छल। से अइ बेर नञि भेलै। पहिने हथिये चढ़ल। दू दिन हथिया बितलाक बाद आसिन चढ़ल। ओना बूढ़-बुढ़ानुसक कहब छनि जे दुर्गापूजामे हथिया पड़िते अछि, मुदा से नञि भेलै। आसिनक इजोरिया पखक परीबकेँ दुर्गा पूजा शुरु होइत। अइ बेर अमबसिये दिन हथिया चलि गेल। तहिना बरखोक भेल। जइ दिन आसिन चढ़ल ओहि दिन घनघनौआ बरखा भेल आ तेकर बाद फुहियो ने पड़ल। झाँटक कोन गप। हथियाक लेल ओरिआओल जरनो-काठी आ अन्नो-पानि सबहक घरमे रहिये गेल। मुदा तैयो किसान सबहक मनमे खुशी नै कमल। किएक तँ जँ हथियामे धानक खेतमे ठेंगाक हूर गरत तँ धान हेबे करत। मुदा किछु गोटेक मनमे शंका जरुर होइ जे निचला खेतमे ने पानि लगल अछि मुदा उपरका खेतक धान कोना फुटत? किएक तँ उपरका खेतक पानि टघरि कऽ निचला खेतमे चलि गेल। किछु खेतक पानि काँकोड़क बोहरि देने तँ किछु खेतक पानि मूसक बिल देने बहि गेल। जहिसँ बरखाक तेसरे दिन उपरका खेत सभ सुखि गेल। ओना दसमीक मेलो देखिनिहारक आ मेलामे दोकानो-केनिहारक मनमे खुशी। किएक तँ रुख-सुखमे नाचो-तमाशा जमत आ देखिनिहारोक भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक सभ छगाएल। किएक तँ जइ दिन सतमी मेला शुरु भेल ओहि दिन तेहेन झाँट आ पानि भेल जे मेलाक चुहचुहिये चलि गेलै।
सुखाड़ समए रहने महाकान्त ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल सोचए लगल। जहियासँ चिमनी शुरु केलहुँ तहियासँ एहेन समए नहि पकड़ाएल छल। आन साल दिआरीक पछाति चिमनीक काजमे हाथ लगबै छलहुँ, से अइ बेर भगवान तकलनि। कहुना-कहुना तँ दिआरी अबैत-अबैत दू खेप भट्ठा जरुर लगि जाएत। सरकारोक योजना नीक पकड़ाएल। एक दिशि खरन्जाक स्कीम तँ दोसर दिशि इन्दिरा आबासक घर। ततबे नहि स्कूल आ अस्पताल सेहो बनत। ई सभ तँ अपने गामटा मे बनत से नहि, आनो-आन गाममे बनत। सालो भरि ईंटाक महगीये रहत। ओते पुराइये ने पाएब। एते बात मनमे अबिते मुँहसँ हँसी निकलल। तहि काल पत्नी रागिनी बेड टी नेने आबि चुप-चाप सिरमा दिशि ठाढ़ भऽ पतिकेँ मुस्कुराइत देखलनि। पतिक मुस्की देखि रागिनी मने-मन सोचए लागलि जे की बात छिऐ जे ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल मुस्करा रहल छथि। मुदा बिना किछु बजनहि टेबुलपर चाह रखि, ओरिया कऽ नाक पकड़ि डोला देलक। नाक डोलबितहि महाकान्त उठि कऽ बैसि रहल। आगूमे रागिनीकेँ ठाढ़ देखि चौबन्निया मुस्की दैत आँखिक इशारासँ पलंगपर बइसैले रागिनीकेँ कहलक। पतिक मूड देखि रागिनी ससरिये जाएब नीक बुझलक।
महाकान्त आ रागिनी, संगे-संग कओलेजमे पढ़ने। जहिये दुनू गोटे बी.ए.मे पढ़ैत छल तहिये दुनूक बीच प्रेम भऽ गेल। दुनू सम्पन्न परिवारक। ओना पढ़ैमे दुनू ओते नीक नहि जते दुनूक रिजल्ट नीक होए। दुनूकेँ मैट्रिको आ इन्टरोमे फस्ट डिविजन भेल रहै। तेकर कारण मेहनत नहि पैरबी रहए। नीक रिजल्टक दुआरे संगियो-साथीक बीच आ शिक्षकोक बीच दुनूक आदर होइ। दुनूक बीच संबंध बी.ए. आनर्सक क्लासमे भेलै। किएक तँ आनर्समे कम विद्यार्थी रहने गप-सप्‍प करैक अधिक समए भेटै। दुनूक बीच संबंध गप-सपसँ शुरु भेल। तेकर बाद किताबक लाथे डेरोमे एनाइ-गेनाइ शुरु भेल। संबंध बढ़िते गेलै। संगे बजार बुलनाइ, किताब-कापी खरीदनाइसँ लऽ कऽ कपड़ा, जुत्ता-चप्पल खरीदनाइ धरि संगे हुअए लगलै। सिनेमा तँ मेटनियो शोमे देखए लगल। जाहिसँ आंगिक संबंध सेहो शुरुह भऽ गेलै। एकटा डबल रुम लऽ दुनू गोटे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक संबंधक चरचा सिर्फ विद्यार्थिये आ शिक्षके धरि नहि रहि दुनूक पिता धरि पहुँचि गेलै। मुदा दुनूक पिताक दू विचार। तेँ बुझियो कऽ दुनू अनठा देलक। महाकान्तक पिता सुधीर जुआन-जहानक खेल बुझैत तँ रागिनीक पिता रमानन्द सम्पन्न परिवार आ पढ़ल-लिखल लड़का बुझि बेटीक भार उतड़ब बुझैत।
एम.ए. पास केलापर दुनूक विआह भऽ गेलै। सुधीरक परिवार एक पुरखियाह। अपनो भैयारीमे असकरे आ बेटो तहिना। ओना बेटी चारिटा, जे सासुर बसैत। परिवारक काजसँ महाकान्तकेँ कम्मे सरोकार। तेँ भरि-भरि दिन चौखड़ी लगा जुओ खेलैत आ शराबो पीबैत। जे पितो बुझैत। महाजनीक कारोबार, तेँ भरि दिन सुधीर रुपैयेक हिसाब-बारी आ धानेक लेन-देनमे व्यस्त रहैत। महाकान्तक क्रियाकलाप देखि एक दिन खिसिया कऽ सुधीर कहलखिन- ‘बौआ, बड़ कठिनसँ धन होइ छै। एना जे भरि-भरि दिन बौआइल घुमै छह, तइसँ कैक दिन लछमी रहतुहुन। तेँ किछु उद्यम करह।’
पिताक बात महाकान्त चुपचाप सुनि लेलक। किछु बाजल नहि। बेटाकेँ चुप देखि फेर कहलखिन- ‘पाँच लाख रुपैया दै छिअह, चिमनी चलाबह। उत्तरबरिया बाधमे अपने बीस बीघा ऊँच जमीन छह, ओहिमे चिमनी बना लाए।’
‘बड़बढ़ियाँ’ कहि महाकान्तो चुप भऽ गेल। पिताक मनमे जे जखने काजमे लगि जाएत तखने चालि-ढ़ालि बदलि जेतै। किएक तँ काज ओहन कारखाना होइत, जहिमे मनुष्य पैदा लैत।
आने साल जेकाँ अपन काज बचनू करए लगल। पथेरीक देखभालसँ लऽ कऽ हाट-बजार आ महाकान्तक घरपर जा रागिनीकेँ ब्राण्डीक बोतल पहुँचबै धरि। महाकान्तो अपन आने साल जेकाँ नियमित काज करए लगल। सबेरे आठ बजेमे जलखै खा मोटर साइकिलसँ चिमनीपर चलि अबैत। चिमनीपर आबि तीनू गोटे -महाकान्त, सरुप, बचनू- भरि मन गाँजा पीबि महाकान्तक चिमनीक कार्यालयमे सुति रहैत। बारह बजेमे बचनू उठा दैत। उठितहि महाकान्त मुनसीसँ रुपैया मांगि बचनुएकेँ ब्राण्डी कीनैक लेल बजार पठा दैत आ अपने मुँह-हाथ धोए खाइले घरपर बिदा होइत। घरपर पहुँचि धड़-फड़ कऽ खाइत आ चोट्टे घुरि कऽ चिमनीपर आबि सुति रहैत, जे चारि बजे उठैत। बचनुओ बजारसँ शराब खरीद महाकान्तक घरपर जा रागिनीकेँ दऽ दैत। कओलेजे जिनगीसँ दुनू गोटे -महाकान्तो आ रागिनियो- शराब पीबैत। ओना रागिनी ब्राण्डीये टा पीबैत मुदा महाकान्त सभ कुछ खाइत-पीबैत। गाँजा, भाँग, इंग्लीस, पोलीथिन, अफीम, ताड़ी सभ कुछ। जखन जे भेटल तखन सएह।
आइ जखन बचनू ब्राण्डीक बोतल लऽ रागिनी लग पहुँचल तँ रागिनीक नजरिमे नव विचार उपकलै। आन दिन रागिनी बचनूसँ बोतल लऽ रखि लैत। मुदा आइ आदरसँ बचनूकेँ हाथक इशारासँ पलंगपर बइसैक इशारा केलनि। दुनू गोटे, पलंगपर आमने-सामने बैसि गेल।
रागिनी बाजलि- ‘बहुत दिनसँ मनमे छल जे अहाँसँ भरि मन गप करितहुँ। मुदा अहाँ तते धड़फड़ाएल अबै छी जे किछु कहैक मौके ने भेटैए।’
बचनू- ‘गिरहतनी, हम तँ मूर्ख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी। अहाँक गप्पक जबाव हमरा बुते थोड़े देल हएत।
रागिनी- ‘कोनो की हम अहाँसँ शास्त्रार्थ करब जे जबाव देल नञि होएत। अपन मनक व्यथा कहब। जे सभकेँ होइ छै।’
मनक व्यथा सुनि बचनू मने-मन सोचए लगल जे हम सभ गरीब छी, हरदम एकटा ने एकटा भूर फूटले रहैए। मुदा रागिनी तँ सभ तरहे सम्पन्न छथि। नीक भोजन, दुनू परानी पढल-लिखल। तखन की मनमे बेथा छनि जे हमरा कहती। मुदा तैयो मनकेँ असथिर कऽ रागिनी दिशि देखए लगल। मनमे उत्सुकता बढै़। मुदा रागिनीक चेहरामे, डूबैत सूर्य जेकाँ, मलिनता बढ़ैत।
रागिनी- ‘हमरासँ अहाँ बहुत नीक जिनगी जीबै छी।’
अपन प्रशंसा सुनि बचनू गद-गद भऽ गेल। आँखि चौकन्ना हुअए लगलै। मनमे ओहन-ओहन विचार सेहो उपकए लगलै जेहेन आइ धरि मनमे नहि आएल छलै। मुदा किछु बाजै नहि।
बचनूकेँ चौकन्ना होइत देखि रागिनी कहए लागलि- ‘जहिना अकासमे चिड़ैकेँ उड़ैत देखै छिऐ, तहिना अहूँ छी। मुदा हम पिजरामे बन्न चिड़ै जेकाँ छी। जखन पढ़ै छलहुँ तखन यएह सोचै छलहुँ जे कोनो कओलेजमे प्रोफेसर बनि जिनगी बिताएब। से सभ मनेमे रहि गेल। भरि दिन अंगनामे घेराएल रहै छी। ने ककरोसँ कोनो गप-सप्‍प होइए आ ने अंगनासँ निकलि कतौ जा सकै छी। तहूमे असकरुआ परिवार अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा सासु छथि। ने दोसर दियादनी आ ने कियो दोसर। भरि दिन पलंगपर पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइए। जाधरि पढ़ै छलहुँ ताधरि दुनियाँ किछु आरो बुझाइत छल। मुदा आब किछु आर बुझाइत अछि। कखनो मन होइए तँ किछु पढ़ै छी नै तँ टी.बी. देखै छी। पढ़िये कऽ की हएत। ने दोसरकेँ बुझा सकै छी आ ने अपना कोनो काज अछि, जहि लेल सीखब। जानवरोसँ बत्तर जिनगी बनि गेल अछि। जहिना गाए-महीस भरि पेट खेलक आ खूँटापर बान्हल रहल तहिना भऽ गेल छी। मुदा मनुक्ख तँ मनुख छी। जाधरि अपना मनक बात दोसरकेँ नहि कहबै आ दोसरक पेटक बात नहि सुनबै, ताधरि नीक लगत। अनेरे लोक किअए पढ़ैए। जँ लकीरक फकीरे बनि जीबैक छैक।
सुखल मुस्की दैत बचनू बाजल- ‘गिरहतनी, अहाँकेँ कोन चीजक कमी अछि जे कोनो तरहक दुख हएत?’
रागिनी- ‘अहाँ जे कहलहुँ ओ ठीके कहलौं। किएक तँ एहनो बुझिनिहारक कमी नञि अछि। एहनो बहुत लोक अछि जे धनेकेँ सभ कुछ बुझैत अछि। मुदा धन तँ खाली शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैत अछि, मनक तँ नहि। तीन सालसँ बेसी ऐठाम ऐला भऽ गेल मुदा ने एक्कोटा सिनेमा देखलहुँ आ ने एक्को दिन कतौ घुमै-फिरैले गेलहुँ। जाधरि बेटी माए-बाप लग रहैए ताधरि सभ कुछ -धन-सम्पत्ति कुटुम्ब-परिवार- अपन बुझि पड़ै छै, मुदा सासुर पाएर दैतहि सभ बीरान भऽ जाइ छै। तहिना माए-बापक बीच जे आजादी बेटीक रहै छै ओ सासुर ऐलापर एकाएक बन्न भऽ जाइ छै।
बचनू- ‘जँ कतौ जाइक मन होइए वा देखैक मन होइए तँ नैहर किअए ने चलि जाइ छी?’
रागिनी- ‘जहिना सासुर तहिना नैहरो भऽ गेल। जहिना सासुरमे पुतोहू बनि जीबैत छी तहिना नैहरोमे पाहुन बनि जाइ छी। जना हम्मर किछु एहि घरमे अछिये नहि। जे घर अप्पन नञि रहत ओहि घरमे ककरा कहबै जे हम फल्लाँ ठीन जाएब। जन्म देनिहारि माइयो आने बुझैए। तइ परसँ भाए-भौजाइक जुइत। ई तँ नञिहरक गप कहलौं आ अहिठामक जे होइए से हमहीं बुझै छी। बुरहा ससुर जखन आंगन औताह तँ बुझि पड़त जे जना अस्सी मन पानि पड़ल छनि। बूि‍ढ़ सासुसँ तँ कने हँसियो कऽ गप्प करताह मुदा हमरा देखिये कऽ झड़कबाहि उठि जाइत छनि। जँ कहियो माथपर नुआ नहि देखलनि तँ बुढ़ीकेँ अगुआ कऽ की कहताह की नहि, तेकर कोनो ठेकान नहि। भरि-भरि दिन, पहाड़ी झरना जेकाँ, आँखिसँ नोर झहरैत रहैए। कियो पोछनिहार नहि।’
बचनू- ‘गिरहतनी, हमरा बड़ देरी भऽ गेल। महाकान्त भाय बिगड़ताह।’
रागिनी- ‘अच्छा, चलि जाएब। कहै छलौं जे सदिखन तरे-तर मन औंढ़ मारैत रहै अए जे लछमी बाइ जेकाँ तलवार उठा परदा-पौसकेँ तोड़ि दी, मुदा साहस नै होइए। केरा भालरि जेकाँ करेज डोलए लगैए। आइ जखन अपन मनक बात अहाँकेँ कहलौं तँ मन कने हल्लुक बुझि पडै़ए।’
बचनू- ‘तखन तँ गिरहतनी हमहीं नीक छी।’
रागिनी- ‘बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहाँसँ गप केलहुँ से जना बुझि पड़ैए जे जना पाकल घाबक पीज निकललापर जे सुआस पड़ै छै तहिना भऽ रहल अछि। आब सभ दिन एक घंटा गप्प कएल करब। अहाँ कियो आन छी। घरेक लोक छी की ने।’
एक टकसँ बचनू रागिनीक आँखिपर आँखि दऽ हृदए देखए लगल। तहिना रागिनियो बचनुक हृदए पढ़ैए लागलि।

Tuesday, November 11, 2008

विद्यापति स्मृति दिवस (११ नवम्बर २००८) पर विशेष-यशस्वी कवि छलाह महाकवि विद्यापति -नवेन्दु कुमार झा, समाचारवाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना

नवेन्दु कुमार झा, समाचारवाचक सह अनुवादक (मैथिली), प्रादेशिक समाचार एकांश, आकाशवाणी, पटना
विद्यापति स्मृति दिवस (११ नवम्बर २००८) पर विशेष-यशस्वी कवि छलाह महाकवि विद्यापति
मिथिलांचलक पावन भूमि कतेको महापुरुषकेँ जन्म देलक अछि जकर यश अपना देशक अलावा विदेशमे सेहो पसरल। एहने महान विभूतिमे सऽ एक छलाह “महाकवि विद्यापति” जिनक रचनामे कल्पनाक बदला यथार्थक दर्शन होइत अछि। ओ ओहि गीतकारमे सऽ एकटा छलाह जिनक रचित गीतकेँ मिथिलांचलेमे नहि अपितु बंगाल, आसाम, उत्तर प्रदेश आदिक संगहि सम्पूर्ण विश्वक रसिक मंडली सम्मान देलक अछि। उत्तर भारतमे प्रचलित आर्यभाषा क्षेत्रमे विद्यापति सनक सम्मान प्रायः ककरो नहि भेटल अछि। असमिया, हिन्दी, बंग्ला आ मैथिली एहि चारि टा भाषाकेँ हिनक गीत एकटा नव प्रेरणा देलक अछि। महाकवि विद्यापति एकटा सुयोग्य कवि, लेखक, भक्त, राजनयिक, समाज सुधारक, स्मृतिकार, संगीतज्ञ आ ज्योतिषविद् छलाह। एहि सभ गुणक कारण आइयो हुनक नाम एहि तरहे लेल जाइत अछि जेना ओ आईयो हमरा सभक मध्य उपस्थित छथि। छह सहस्त्राब्दीक बादो आईयो हुनक विद्वता आ गुणक प्रसिद्धि मिथिलांचलक संगहि सम्पूर्ण भारत आ विश्वमे पसरल अछि।
महाकविक जन्म दरभंगा जिलान्तर्गत बिस्फी गाममे भेल छल। ओ सम्पन्न परिवारक छलाह। हुनक जन्मक सम्बन्धमे विद्वान सभक मध्य मत भिन्नता अछि। विभिन्न उपलब्ध सामग्रीक आधारपर विद्वान लोकनि हुनक जन्मक संबंधमे अनुमान लगबैत छथि। स्व. नागेन्द्रनाथ गुप्तक अनुसार महाकविक जन्म १३५७ ई. मे भेल छल। जखन कि स्व. हर प्रसाद शास्त्री हुनक जन्म १३५० ई. मानैत छथि। मुदा मिथिलांचलक विद्वान् महाकविक जन्म अनुसंधानक आधारपर १३६० ई. मानैत छथि तथापि बहुमत अछि जे महाकवि १३६० ई. सँ १४४८ ई. क मध्य विराजमान छलाह।
कहल जाइत अछि जे ओ पैघ आयु पएने छलाह। कतेको राजघरानाक उतार-चढ़ावकेँ ओ अपना आँखिसँ देखने छलाह। बुढ़ राजा-रानीसँ लऽ कऽ राजकुमार-राजकुमारी सभक संग हुनक निकटवर्ती संबंध रहल। हुनक पिता गणपति ठाकुर दरभंगा राजक राज मंत्री छलाह। हुनक पितामह जयदत्त पैघ विद्वान आ उच्च कोटिक संत छलाह। स्वयं विद्यापति सेहो जन्महिसँ ओइनवार वंशक राजा सभपर आश्रित छलाह। ओ महाराजा शिव सिंहक प्रधान पार्षद आ विश्वसनीय अमात्य छलाह। महाराज शिव सिंह अपन राज्याभिषेकक समय हुनक जन्मभूमि “बिस्फी” गाम हुनका दानमे दऽ देने छलाह। शिव सिंहक बाद सेहो विद्यापति, महारानी विश्वास देवी, महाराजा नरसिंह तथा महाराजा धीर सिंहक दरबारमे प्रधान राज पण्डितक रूपमे छलाह।
अपन दीर्घकालिक जीवनमे महाकवि कतेको ग्रन्थक रचना कएलनि। हुनक एहि ग्रन्थ सभक अध्ययन कएलासँ हुनक बहुमुखी प्रतिभा स्पष्ट होइत अछि। हुनक समयमे आबा जाहीक अतेक सुविधा नहि छल एकर बावजूद ओहि समयक मिथिलांचलक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल सभक विवरण “भू परिक्रमा” नामक ग्रन्थमे प्रस्तुत कऽ आबए बाला पीढ़ीक लेल पैघ उपकार कएलनि। संस्कृत भाषामे सेहो हुनक लेखनी चलल जाहिमे “शैव सर्वस्वसार”, “शैव सर्वस्वसार प्रमाण”, “पुराण संग्रह”, “दान वाक्यावली” आ “वर्षकृत्य” आदि प्रमुख अछि। संस्कृतमे ओ “मणिमञ्जरी” नामक नाटक सेहो ओ लिखलनि। “गोरक्ष विजय” नामक दोसर नाटक जे नेपालसँ भेटल अछि, ओहिमे संस्कृतसँ अलग मैथिली भाषामे सेहो गीत अछि। एकर अलावा अपभ्रंशमे ओ “कीर्तिलता” आ “कीर्ति पताका” नामक ग्रन्थक रचना कएलनि। कीर्तिलता हुनक पहिल रचना मानल जाइत अछि।
अपभ्रंश आ संस्कृतक अतिरिक्त हुनक काव्यक विशाल भण्डार मैथिली भाषामे सेहो विद्यमान अछि। हुनक यश मुक्त रचनामे सुरक्षित अछि, जकर प्रचार-प्रसार हुनक मरलाक बाद आइयो घरे-घर अछि। हुनक मृत्युक संबंधमे सेहो विद्वान सभ एकमत नहि छथि। जनश्रुति ई अछि जे हुनक मृत्यु १४५० ई. मे भेल मुदा नेपालक दरबार पुस्तकालयमे उपलब्ध “ब्राह्मण सर्वस्व” नामक ग्रन्थक आधारपर हुनक मृत्यु १४६० ई. मानल जाइत अछि। ओना सम्पूर्ण मिथिलांचलमे ई कहबी प्रचलित अछि जे-
“विद्यापतिक आयु अवसान
कार्तिक धवल त्रयोदशी जान”
उपेक्षित अछि सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला
अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर बिहारक पहचान देएबामे सोनपुर प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र मेलाक महत्वपूर्ण स्थान अछि। प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमासँ शुरू भऽ ई मेला एक मास धरि चलैत अछि। ई मेला देशमे जानवरक सभसँ पैघ मेला अछि। एहि ठाम जानवरक अलावा दैनिक उपयोगी वस्तुक बिक्री सेहो होइत अछि। मेलामे मनोरंजनक विशेष व्यवस्था सेहो रहैत अछि। चारूकात नदी आ जलाशयसँ वेष्ठित एहि ठामक बाबा हरिहर नाथक मंदिरक सभसँ पैघ विशेषता ई अछि जे हरि आ हरक एक संग पुण्य दर्शन भक्त सभकेँ होइत अछि।
ई क्षेत्र पौराणिक आ धार्मिक महत्व बाला होएबाक संगहि ऐतिहासिक सेहो अछि। एहि ठामक माटिमे संगम आ समन्वयक भावना सेहो अछि। हरिहर क्षेत्रक स्वर्णिम इतिहास आइयो पूर्ण रूपेण जन साधारणक सोंझा नहि आबि सकल अछि। आइयो ई शोध आ अनुसंधानक अभावमे भूगर्भमे पड़ल अछि। एकर उज्जवल भविष्यक स्मृति चिन्ह आइयो एहि ठाम जमानासँ गौरव स्तम्भ आ प्रकाश कुंजक रूपमे विद्यमान अछि। कतेको ऋषि-महर्षिक साधनाक ई भूमि ज्ञानक तपोभूमि अछि। एकर पौराणिक गौरव गाथा पद्मपुराण सहित आन ग्रन्थमे सेहो सगौरव वर्णित अछि। बाबा हरिहरनाथक मन्दिर अति प्राचीन अछि जकर स्थापना स्वयं ब्रह्माजी अपना हाथे हरि आ हरक एकीकार लिंगक रूपमे एहि ठाम स्थापित कएने छलाह। हरि आ हरक एहन एकाकार संगम भारतवर्षमे कतहु नहि भेटैत अछि। एहि ठाम गंगा आ गंडक नदीक अभूतपूर्व संगम सेहो अछि।
हरिहर क्षेत्रक महातम्यक संदर्भमे कतेको कथा लिखल गेल अछि। पुराणक अनुसार एक बेर ब्रह्मा जीक पुरोहितीमे देवता सभ एकटा यज्ञक आयोजन कएलनि। कतेको कारणसँ ई यज्ञक विध्वंश भेल, तखन देवता सभ “हर”क स्थापना कएलनि आ यज्ञकेँ सफल बनौलनि। तखनसँ हरिहर क्षेत्र लोक विश्रुत भेल। पद्म पुराणमे व्व्हो वर्णन अछि जे शालग्रामीसँ उत्तर हिमालयसँ दक्षिण पृथ्वी महाक्षेत्र अछि। एहि ठाम बाबा हरिहरनाथक मंदिर अछि। ओहि स्थानपर भगवती शालिग्रामीक पतित-पावनि गंगामे आबिकऽ मिलन भेल अछि। संगम क्षेत्र होएबाक कारण एहि क्षेत्रक माहात्म्य बहुत बढ़ि गेल अछि। इहो कथा अछि जे शालिग्रामी तथा गंगाक संगम होएब आ महाक्षेत्रक अंतिम भाग होएबाक कारण एहि ठाम “हरि” आ “हर”क स्थापना भेल।
सोनपुरमे एहि स्थानपर कतेको मठ आ मन्दिर अछि जे स्थानीय प्रशासन आ सरकारक उफॆख्षाक शिकार बनल अछि। गंडक नदीक किनारपर ठीक सामने अछि गोटेक अढ़ाई सौ गज पश्चिम बाबा हरिहरनाथक मुख्य मन्दिर। कार्तिक पूर्णिमाक अवसरपर कतेको लाख श्रद्धालु प्रति वर्ष संगम स्नान कऽ बाबाकेँ जल चढ़ा श्रद्धा सुमन अर्पित करैत छथि। मन्दिरक प्रांगणमे कतेको आन छोट-छोट मन्दिर सेहो अछि जाहिमे विभिन्न देवी-देवता सभक मूर्ति स्थापित अछि। एहि मन्दिरक ठीक सोझाँ अछि एकटा महावीर मन्दिर जाहिमे उज्जर संगमरमरक गोटेक दस फीटक विशाल राम भक्त हनुमानक मूर्ति स्थापित अछि। हरिहरनाथ मन्दिरक पाछाँ मुगल बाड़ी अछि जाहिमे सेहो मन्दिर बनल अछि। मंदिरसँ सटल दक्षिण भागमे पुरान ठाकुरबाड़ी मन्दिर अछि, जखन कि मुख्य मन्दिरक सोझाँ पूरब दिश एकटा ऐतिहासिक तालाब अछि जकर निर्माण च्यवन ऋषि कुष्ठ रोगक निवारण लेल करबैत छलाह, मुदा किछु बाधा आबि गेलासँ एकर निर्माण नहि भऽ सकल। एकरा च्यवन ऋषिक तपस्थल अथवा च्यवन तालाबक नामसँ जानल जाइत अछि।
मन्दिरसँ भरल एहि क्षेत्रमे गंडक किनारमे अछि प्रसिद्ध ऐतिहासिक मन्दिरमे दक्षिणमुखी माँ कालीक प्रचण्ड रूप वाला दुर्लभ मूर्ति। एहि मूर्तिक ठीक सोझाँ सत्ताइस हाथपर शिवलिंग विराजमान अछि। मन्दिरक दक्षिणमे श्मसान अछि। मान्यता अछि जे ई काली मन्दिर सिद्धपीठ अछि जतए पहिने तंत्र-मंत्रक सिद्धि कएल जाइत छल। एहि काली मन्दिरक पाछाँ एकटा पुरान मन्दिर अछि जाहिमे कतेको मूर्ति विराजमान अछि। मन्दिरक प्रांगणमे पाल कालक कतेको महत्वपूर्ण अवशेष देखल जाऽ सकैत अछि। गीता बाबाक एहि मन्दिरमे हुनक जीवन कालमे रौनक रहैत छल, परञ्च बाबाक मृत्युक बाद सभ परम्परा ध्वस्त भऽ गेल। काली मन्दिरक उत्तर दिस अति प्राचीन गौरी शंकर मन्दिर अछि जाहिमे भगवान शिव आ माँ पार्वतीक सुन्दर आ ऐतिहासिक दक्षिण रुखक मूर्ति अछि। तंत्र साधक सभक मानब छनि जे एहि ठाम लागल मूर्ति काम विजय मुद्रामे अछि। एहि मन्दिरक प्रांगणमे एकटा विष्णु मन्दिर सेहो अछि जकर गुम्बदपर पाल काल आ मौर्य कालक कलाकृति उत्कीर्ण अछि। हरिहर नाथक मुख्य मन्दिरसँ पश्चिम गोटे दू सौ गजक दूरीपर विशालनाथ आ बालनाथक समाधि स्थल अछि जकर भीतरक भागमे अद्भुत कलाकृति अंकित अछि। महान तपस्वी स्वामी त्रिदण्डीजी महाराज द्वारा गजेन्द्र मोक्ष देव स्थानपर आकर्षण मन्दिरक नव निर्माण कराओल गेल अछि। भगवान विष्णुक ई मन्दिर हरिहर क्षेत्रक अद्भुत नमूना अछि।
ऐतिहासिक हरिहर क्षेत्र आ ओकर लगपास स्थित मन्दिर आ मठ लोक सभक आस्थाक केन्द्र अछि मुदा देखभाल उचित रख-रखावक अभावमे जीर्ण-शीर्ण भऽ रहल अछि। सभ साल हरिहर क्षेत्र मेलाक अवसरपर किछु साफ सफाई होइत अछि आ स्थानीय प्रशासन आ लोक सभ सेहो सक्रिय होइत छथि, मुदा एकर बाद ई अपेक्षित रहैत अछि। प्रतिवर्ष एहि मेलाक घटैत स्वरूप आ लोकक घटैत आकर्षणसँ एहि क्षेत्रक ऐतिहासिक आ पौराणिक स्वरूप संकटमे पड़ल जाऽ रहल अछि। एहि मेलाक विकासक लेल सरकार द्वारा मेला प्राधिकरणक घोषणा मात्र बयानबाजी साबित भेल अछि। पछिला वर्षसँ एहि मेलामे खरीदल जानवर सभक प्रदेशक बाहर लऽ जयबासँ प्रतिबन्धक कारण व्यापारपर असरि पड़ल अछि। सभ वर्ष उद्घाटन आ समापनपर मेलाक विकासक लेल भाषण होइत अछि जे मेलाक समाप्तिक बाद बिसारि देल जाइत अछि।
औद्योगिक रूपसँ पिछड़ल बिहारमे आय अर्जित करबाक लेल पर्यटन उद्योग संभावनासँ भरल अछि। एहि ठाम कतेको ऐतिहासिक, पौराणिक आ प्राकृतिक स्थल अछि जे पर्यटककेँ अपना दिस खिचि सकैत अछि। एहिमेसँ सोनपुर आ हरिहर क्षेत्र मेला सेहो एकटा अछि। जरूरत अछि जे एकर योजनाबद्ध विकास कऽ एकरा देशक पर्यटनक मानचित्रपर आनल जाए आ ई भाषण आ घोषणासँ नहि होएत एहि वास्ते सरकार, स्थानीय प्रशासन आ स्थानीय जनताकेँ एक संग प्रयास करक होएत।(साभार विदेह www.videha.co.in)

जीविका - जगदीश प्रसाद मण्डल



शिवरात्रिक प्रात। मध्य मास। जइ डेढ़ मासक शीतलहरीमे सूर्य मरनासन्न भऽ गेल छलाह तइमे जीबैक नव शक्ति सेहो आबि गेलनि। तेँ रौदमे धीरे-धीरे गरमी अबैत। चारि बजे भोरमे उमाकान्तक नीन टुटल। निन्न टुटितहि देवाल घड़ीपर नजरि देलक। चारि बजैत। ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल अपन आगूक जिनगी दिशि नजरि देलक। ओना काल्हिये दिनमे दुनू दोस्त विचारि नेने छल। विचारि नेने छल जे दुनू गोटे टेम्पू कीनए भोरुके गाड़ीसँ दरभंगा जाएब। बदलैत जिनगीक संकल्प उमाकान्तक मनमे। किएक तँ जिनगी मनुष्यकेँ किछु करैक लेल भेटैत अछि। मनमे एलै जे पाँच पचपनमे गाड़ी अछि तेँ पाँच बजे घरसँ निकलब। ओना अधे घंटाक रस्ता स्टेशनक अछि मुदा किछु पहिनहि पहुँचब नीक रहत। ओना काहियो कोनो गाड़ी अपना समएपर नहिये अबैए, एकाध घंटा लेट रहिते अछि मुदा तइसँ हमरा की? हम समएपर जाएब। शुभ काज सदिखन समएसँ पहिनहि करैक कोशिश करक चाही। एते बात मनमे अबितहि उमाकान्त ओछाइन छोड़ि उठि गेल। उठितहि मनमे एलै जे हमर ने नीन टुटि गेल मुदा जँ दोस शोभाकान्तक नीन नहि टुटल होए, तखन तँ गड़बड़ होएत। से नहि तँ पर-पैखाना जाइसँ पहिने ओकरो जा कऽ उठा दिऐ। फेर मनमे एलै दतमनि करिते जाए। किएक तँ एकटा काज तँ अगुआइल रहत। हाथमे दतमनि लैतहि मनमे एलै जे किछु खा-पी कऽ घरसँ निकलब। रास्ता-बाटक कोन ठेकान। तहूमे लोहा-लक्कड़क सवारी। कखन नीक रहत कखन बगदि जाएत, तेकर कोन ठेकान। एक बेर एहिना भेल रहए की ने। दरभंगे जाइत रही आकि मनीगाछी लोहनाक बीच गाड़ीक इंजिन खराब भऽ गेलै। भोरुके गाड़ी, तेँ सोचने रही जे दरभंगे पहुँचि किछु खाएब-पीब। ले बलैया, दू बजे तक गाड़ी ओतए अटकि गेलै। कखनो गाड़ीक डिब्बामे जा बैसी तँ कखनो उतरि कऽ इंजिन लग पहुँचि ड्राइवरकेँ पूछिऐ। ओहू बेचाराक मन घोर-घोर भेल। हमहूँ आशा-बाटीमे रहि गेलहुँ। से जँ पहिने बुझितिऐ तँ गाड़ी छोड़ि बिदेसर चौकपर चलि जैतहुँ आ बस पकड़ि सबेर सकाल दरभंगा पहुँचि जैतहुँ। सेहो नै केलहुँ। तेकर फल भेल जे भूखे-पियासे खूब टटेलहुँ। तेँ बिना किछु मुँहमे देने घरसँ नै निकलब। ई बात मनमे अबिते उमाकान्त पत्नीकेँ उठबैत कहलक- ‘जाबे हम दोस शोभाकान्तक ऐठामसँ अबै छी ताबे अहाँ चारिटा रोटी आ अल्लूक भुजिया बना लेब।’
कहि उमाकान्त शोभाकान्तक ऐठाम दतमनि करैत बिदा भेल। दाँतमे घुस्सो दिअए आ मने-मन बिचारबो करए। मनमे एलै जे काजे एहेन छी जे मनुक्खकेँ मनुक्खो बनबैए आ जानवरो। दुनियाँक सभ मनुक्ख तँ किछु नहि किछु करितहि अछि। मुदा कियो देव बनि जाइत अछि तँ कियो दानव। तेँ काजकेँ परिखब सभसँ मूल बात छी। शोभाकान्त ऐठाम पहुँचिते उमाकान्त रस्तेपर सँ बोली देलक- ‘दोस छेँ रौ, रौ दोस।’
ओछाइनपरसँ उठैत शोभाकान्त बाजल- ‘हँ। दोस छिऐ रौ, हमरो नीन टुटले अछि। अखन तँ अन्हारे छै।’
उमाकान्त- सवा चारि बजै छै। तैयार होइत-होइत पाँच बजिये जाएत। कने पहिले स्टेशन जाएब।’
उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्के बतारी। दुनूमेे उमेरक हिसाबसँ के छोट के पैघ, से तँ ने अपने दुनू गोरे बुझए आ ने कियो टोले-पड़ोसक। किएक तँ टिपनि दुनूमेसँ ककरो नहि। बच्चेसँ दुनू गोटे, बेसी काल, एक ठाम रहैत तेँ समाजोक लोक बिसरि गेल। अपना दुनू गोटेक माइयो-बाप मरिये गेल, आन मने किएक राखत। मुदा दुनू गोटे एहि मौकाक लाभ उठबैत। लाभ ई उठबैत जे दुनू, दुनू गोटेक स्त्रीसँ हँसी-चौल करैत। तइले दुनूमेसँ ककरो मलाल नहि। मुदा गामक बूढ़ो-बुढ़ानुस आ नवकियो कनियाँ दुनू स्त्रीगणकेँ निरलज कहैत। तेकर गम दुनूमे सँ ककरो नहि। किएक तँ सभ स्त्रीगणकेँ होइत जे अधिक सँ अधिक पुरुखक संग गप-सप्‍प, हँसी-मजाक हुअए।
बच्चेसँ दुनू गोटे- उमाकान्त आ शोभाकान्त- एक्के ठाम गुल्लियो-डंडा खेलए आ गामेक स्कूलमे पढ़बो करए। बच्चामे दुनू गोरे दुनूकेँ नामे धऽ-धऽ बजैत। मुदा चेष्टगर भेलापर, कनगुरिया ओंगरीमे ओंगरी भिरा दोस्ती लगा लेलक। मिडिल तक गामेक स्कूलमे दुनू गोटे पढ़लक। मुदा हाइ स्कूलमे उमाकान्तेटा नाओ लिखेलक। शोभाकान्त गरीब, तेँ पढ़ाइ छोड़ि देलक। मुदा उमाकान्तकेँ दू-तीन बीघा खेतो आ पितो गामेक स्कूलमे नोकरी करैत। ओना शोभाकान्त उमाकान्तसँ बेसी चड़फड़ो आ पढ़ैइयोमे नीक। तेँ अपना क्लासक मुनिटिराइयो करैत। मुनीटरक बात शिक्षको अधिक मानैत आ चट्टियाक बीच धाखो। पढ़ाइ छोड़लाक बाद शोभाकान्त नोकरी करए पटना गेल। गामसँ तँ यएह सोचि निकलल जे जएह काज भेटत सएह करब। मुदा रस्तामे बिचार बदलि गेलै। विचार ई बदलल जे ने चाहक दोकानमे नोकरी करब आ ने होटलमे। ने कोठीमे काज करब आ ने तारी-दारुक दोकानमे। अगर जँ नोकरी नै हएत तँ रिक्शे चलाएब वा मट्टियेमे काज करब। सरकारी नोकरीक तँ कोनो आशे नहि। किएक तँ उमेरो नै भेलहेँ।
गामसँ शहर शोभाकान्त पहिले-पहिल पहुँचल। मुदा जे आकर्षण शहर-बजार देखि लोककेँ होइत ओ आकर्षण शोभाकान्तकेँ नै होइत। जहिना सोना-चानीक दोकान दिशि गरीबक नजरि नहि पड़ैत, तहिना। स्टेशनसँ उतरि ओ उत्तर दिशक रस्ता धेलक। कोठा-कोठीपर नजरि पड़बे ने करै। किछु दूर गेलापर एकटा साइकिल मिस्त्रीक दोकान देखलक। रस्तापर ठाढ़ भऽ दोकान हियासए लगल। दोकानदारोक नजरि पड़ल। शोभाकान्तपर नजरि पड़ितहि दोकानदारक मनमे आएल जे छोटो-छोटो काजमे अपने बरदा जाइ छी, जाहिसँ नमहर काज पछुआ जाइए। से नञि तँ अइ बच्चाकेँ पूछिऐ जे नोकरी रहत। जँ रहत तँ रखि लेब। हाथक इशारासँ सोर पारि मिस्त्री पुछलक- ‘बाउ, की नाम छी?
  ‘शोभाकान्त।’
  ‘कत्तऽ घर छी?’
  ‘मधुबनी जिला।’
  ‘कत्तऽ जाएब?’
  ‘नोकरी करए एलहुँ।’
  ‘ऐठाम रहब?’
  ‘हँ। रहब।’
जहिना अतिथि-अभ्यागतकेँ दुआरपर अबितहि घरबारी लोटामे पानि आनि आगूमे दैत, खाइक आग्रह करैत, तहिना शोभाकान्तकेँ मिस्त्री केलक। आठ आना पाइ दैत, आंगुरक इशारासँ मुरही-कचड़ीक दोकान देखबैत कहलक जे ओहि दोकानसँ जलखै केने आउ। झोरा रखि शोभाकान्त बिदा भेल। ओना गाड़ीक झमारसँ देहो-हाथ दुखाइत आ भूखो लागल, मुदा नोकरी पाबि देहक दरदो आ भूखो कमि गेलै। मुरही-कचड़ीक दोकानपर बैसितहि, बगए-बानि देखि दोकानदार पुछलक- ‘बौआ, अहाँक घर कत्तऽ छी?’
  शोभाकान्त- ‘मधुबनी जिला।’
  ‘गामक नाम कहू।’
  ‘लालगंज।’
  ‘हमरो घर तँ अहाँक बगलेमे अछि, रुपौली। बीस-पच्चीस बर्खसँ हम ऐठाम रहै छी।’
  बिना पाइ नेनहि दोकानदार शोभाकान्तकेँ भरि पेट खुआ देलक। खा कऽ शोभाकान्त साइकिलक दोकानपर आबि मिस्त्रीकेँ पाइ घुमबैत कहलक- ‘दोकानदार पाइ नञि लेलक।’ मुदा गहिकीक झमेल दुआरे मिस्त्री आगू किछु नहि पुछलक।
साइकिल ट्यूबक पनचर बनौनाइ, छोट-छोट भंगठीसँ शोभाकान्त अपन जिनगी शुरु केलक। छोट-छोट काज भेने दोकानदारोकेँ आगू बढ़ैक अवसर हाथ लगल। साइकिल, रिक्शाक संग मोटर साइकिल आ टेम्पूक मरम्मत केनाइ सेहो शुरु केलक। शोभाकान्तोकेँ मौका भेटलै। उपारजनक लूरि अबए लगलै। दुनियाँकेँ बिसरि शोभाकान्त रिन्च-हथौरीमे मगन भऽ गेल।
छह मास बीतैत-बीतैत शोभाकान्त साइकिल-रिक्शाक मिस्त्री बनि गेल। संगहि मोटर साइकिल आ टेम्पू चलाएब सेहो सीखि लेलक। मेहनत केने शरीरो फौदा गेलै। साले भरिमे जवान भऽ गेल।
ड्राइवरीक लाइसेंस शोभाकान्त बना लेलक। ड्राइवरीक लाइसेंस बनबितहि शोभाकान्तक मनमे द्वन्द्व उत्पन्न हुअए लगल जे ड्राइवरी करी आकि अपन दोकान खोलि मिसतिरिआइ करी। मुदा अपन दोकान खोलैक लेल घर भाड़ाक संग मरम्मत करैक सामानो लिअए पड़त। फेर मनमे एलै जे एक तँ मेनरोडमे घर नै भेटत दोसर पाइयो ओते नञिए जे सामानो कीनब। तइसँ नीक जे ड्राइवरिये करी। सएह केलक। ड्राइवरीमे दरमहो नीक आ बाइलियो आमदनी। महीना दिन तँ अव्यवस्थिते रहल मुदा दोसर मास बीतैत-बीतैत असथिर भऽ गेल। दरमाहा जमा करए लगल आ बाइली आमदनी घर पठबए लगल।
सालभरिक दरमाहासँ शोभाकान्त टेम्पू कीनि लेलक। टेम्पू कीनि, अपन सभ सामान लादि, शोभाकान्त सोझे गाम चलि आएल।
सेकेण्ड डिबीजनसँ उमाकान्त बी.ए. पास केलक। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम मुदा ओहूसँ कम नोकरी। खेती-पथारी आ कारोवार कियो पढ़ल-लिखल करै नहि चाहैत। जाहिसँ गाम-सबहक दशा दिनो-दिन पाछुए मुँहे ससरैत। गामक लोको तेहने जे पढ़ल-लिखल लोककेँ खेती करैत देखि, दिल खोलि कऽ हँसबो करैत आ लाख तरहक लांछना सेहो लगबैत। जाहिसँ गामक पढ़ल-लिखल लोककेँ नोकरी करब मजबूरी भऽ जाइत।
नोकरीक भाँजमे उमाकान्त दौड़-धूप करए लगल। मुदा मनमे संकल्प रखने जे घूस दऽ कऽ नोकरी नञि करब। चाहे नोकरी हुअए वा नहि। दौड़-धूपसँ मन विचलित हुअए लगलै। संकल्प डोलए लगलै। मनमे अनेको प्रश्न औंढ़ मारए लगलै। कखनो मनमे होए जे पाँच कट्ठा खेत बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लेब। फेरि मनमे होए जे जखन घूस दऽ कऽ नोकरी लेब तँ घूस लऽ कऽ लोकक काज किअए ने करबै? फेर मनमे होए जे तखन जिनगी केहेन हएत? अछैते जिबने मुरदा बनल रहब। लोक शरीर तियागक बाद मृत्यु धारण करैत अछि आ हम जीबितेमे मरल रहब। फेर मनमे एलै जे पत्नी तँ जीवन-संगिनी छी तेँ एक बेर हुनकोसँ पूछि लिअनि। मनमे कने शान्ति एलै। पत्नीसँ पुछलक- ‘बिना घूस-घासक नोकरी भेटब कठिन अछि, से अहाँक की विचार?’
मुस्की दैत पत्नी बाजलि- ‘आइक युगमे नोकरी भेटब जिनगी भेटब छी। तेँ हमरो गहना-जेबर अछि आ जँ ओहिसँ नञि पूड़ै तऽ थोड़े खेतो बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लिअ। देखते छिऐ जे साले भरिमे लोक की सँ की कए लैत अछि।’
एक तँ ओहिना उमाकान्तक मन घोर-घोर होइत, तइपरसँ पत्नीक बात आरो मरनासन्न बना देलक। जिनगीक आशा टूटए लगल। आँखिक रोशनी क्षीण हुअए लगल। आशाक ज्योति कतौ बुझिये ने पड़ैत। जहिना अन्हारमे सगतरि भूते-प्रेत, चोरे-डकैत, साँपे-छुछुनरि बुझि पड़ैत, तहिना उमाकान्तकेँ हुअए लगल। डूबैत जिनगीक आशामे कने टिमटिमाइत इजोत बुझि पड़लै। इजोत अबिते शक्तिक संचार हुअए लगलै। मनमे संकल्पक अंकुर अंकुरित हुअए लगलै। जाहिसँ दृढ़ताक उदए सेहो हुअए लगलै। मने-मन विचार करए लगल। विचार केलक जे जिनगीक किछु लक्ष्य हेबाक चाही। मनुष्य तँ चुट्टी-पिपरी नहि होइत जे साधारण ककरो पाएर पड़लासँ मरि जाएत। मनुष्य तँ ब्रह्मक अंश छी। ओकरामे विशाल शक्ति छिपल छै। जिनगीमे एहिना हवा-बिहाड़ि अबै छै, तहिसँ की मनुष्य मनुष्यता गमा लेत। मनुष्यते तँ मनुष्यक धरोहर सम्पति छी। जेकरा लोक ओहिना कतौ फेकि देत। कथमपि नहि। मने-मन विचारलक जे हमरा नोकरी नै भेटत। तेँ कि हाथपर हाथ दऽ कऽ बपहारि काटब। एते कमजोर छी। की हमरामे मनुष्यक सभ गुण मरि चुकल अछि। हमरा बुते किछु कएल नै हएत? जरुर हएत।
नोकरी दिशिसँ नजरि हटा उमाकान्त राशनक दोकान चलबैक विचार केलक। विचार एहि दुआरे केलक जे जीबैक लेल अर्थक उपार्जन जरुरी होइत। जिनगीक अधिकांश काज अरथेसँ चलैत। तेँ बिना अर्थे जिनगी जिनगी नहि रहि जाइत। हँ ई बात जरुर जे अर्थक उपार्जन आ उपयोगक ढ़ंग नीक हेबाक चाही। राशनक दोकानक जरुरत सभ गाममे अछि, सरकार आ समाजक बीचक कड़ी सेहो छी। ओना डीलरीक लाइसेंसो बनबैमे पाइयेक खेल चलैत। मुदा तइयो जी-जाँति कऽ उमाकान्त लाइसेंस बनबै दिशि बढ़ल।
डीलरीक लाइसेंस बनौलाक उपरान्त उमाकान्त समान उठबैसँ पहिने मिश्रीलालसँ कारोबारक तौर-तरीका बुझैक लेल गेल। मिश्रीलाल पुरान डीलर। मुदा जहिना गाममे अपन इज्जत बनौने तहिना सरकारियो आॅफिसमे। इज्जत बनबैक अपन तरीका। तेँ ब्लौकक पैंतालिसो डीलर मिलि ओकरा यूनियनक सेक्रेट्री बनौने। जहिना सभ डीलर मिश्रीलालकेँ मानैत तहिना मिश्रीलालो सभकेँ। यएह बुझि उमाकान्त भेँट करब आवश्यक बुझलक। मिश्रीलाल ऐठाम उमाकान्त पहुँचल तँ देखलक जे चारि-पाँचटा धिया-पुता रजिस्टरपर दसखतो करैए आ निशानो लगबैए। किएक तँ पछिला मासक समान बँटबारा भऽ गेल छल। तेँ बिना रजिस्टर तैयार भेने अगिला समान कोना उठत? जरुरी काज बुझि मिश्रीलाल मगन भऽ अपन काज करैत। उमाकान्तकेँ देखतहि मिश्रीलाल रजिस्टरक बीचहिमे, जइ पेजमे निशान आ हस्ताक्षर करबैत, पेनो आ कार्बनो रखि मोड़ैत बेटाकेँ कहलक- ‘बौआ, चाह बनबौने आबह?’ उमाकान्त दिशि होइत पुछलक- ‘किमहर किमहर एनाइ भेलै बौआ।’
निर्बिकार भऽ उमाकान्त बाजल- ‘भैया, अहाँ पुरान डीलर छी। डीलरीक सभ कुछ जनै छिऐ। बी.ए. केलाक बाद हम दू साल नोकरीक पाछु बौऐलहुँ मुदा कतौ गर नै धेलक। आब तँ नोकरीक उमेरो लगिचाइले अछि, तेँ नोकरीक आशा तोड़ि डीलरीक लाइसेंस बनेलहुँहेँ।’
नोकरीक गर नहि लागब सुनि मिश्रीलाल कहलक- ‘बौआ, जहिना कोनो परिवारमे चारि-पाँच भाँइक भैयारी रहैत अछि। सभ कुछ सामिले रहै छै। मुदा सभ भाइक पत्नीकेँ अप्पन-अप्पन सम्पत्ति सेहो छै। जहिमे भाइयो सभ चोरा-नुका शामिल भऽ जाइत अछि। जेकर फल होइ छै घरमे आगि लागब। तहिना नोकरियो सभमे भऽ गेल अछि। जे कुरसीपर अछि ओ अपने सार-बहिनोइक जोगारमे रहैए। कहीं कतौ बिकरियो होइ छै। जेकर परिणाम बनि गेल अछि जे नाेकरी केनिहारोक बंश बनि गेल अछि। देशक विकास केहेन अछि से तँ तू पढ़ले-लिखल छह, सभ कुछ जनिते छहक। जँ कनी-मनी एक रत्ती आगूओ बढ़ि रहल अछि तँ ओहिसँ बेसी ओहि नोकरिहाराक वंशमे नोकरी केनिहार बढ़ि रहल अछि। तेँ देखबहक जे डाक्टरक बेटा डाक्टरे बनत। इंजीनियरक इंजीनियरे। कते कहबह। जे जत्ते अछि ओ बपौती बुझि ओकरा पकड़ने अछि। तहि बीच तेसरक- जे ओहिसँ अलग अछि- जे गति हेबाक चाही सएह तोरो भेलह। तहूसँ बेसी जुलुम अछि जे किछु गनल-गूथल लोक अछि जे नोकरियो करैत अछि, खेतो हथिऔने अछि आ जे कोनो सरकारी योजना बनै छै ओकरो हड़पैत अछि। जइसँ देखबहक जे ककरो सम्पत्ति राइ-छित्ती होइए आ कियो सम्पत्ति लेल लल्ल अछि।’
उमाकान्त- ‘भैया, दुनियाँ-दारीक गप छोड़ू। अपना काजक विषएमे कहू।’
मिश्रीलाल- ‘बौआ, अखन तू जुआन-जहान छह। मुदा जे काज कऽ अपना जीबए चाहै छह ओ गलती भेलह। तोरा सन आदमीकेँ डीलरी नञि करक चाही। हम तँ सभ घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी। की नीक की अधला, से बुझिते ने छिऐ। बुझह तँ नढ़ड़ा-हेल हेलैत छी। तेँ हमर कारबार ठीक अछि। मुदा तोरा बुते नै हेतह?
उमाकान्त- ‘किए?’
तहि बीच चाह एलै। दुनू गोटे हाथमे गिलास लेलक। एक घोंट चाह पीबि मिश्रीलाल- ‘देखहक, डीलरी दू दुनियाँक सीमा परक काज छी। एक दिशि सत्ताक दुनियाँ अछि आ दोसर दिशि आम लोकक। गड़बड़ दुनू अछि।’
उमाकान्त- ‘से की?’
मिश्रीलाल- ‘पहिने पब्लिकेक बात कहै छिअह। राशनक वस्तु चीनी मटियातेल, तँ हिसाबेसँ भेटैत अछि। नामे छिऐ कोटा। जँ मनमाफित भेटिते तँ खुल्ला बजार होइतै। से तँ नञि अछि। गाममे किछु एहेन-एहेन रंगबाज सभ बनि गेल अछि जेकरा खाइ-पीबैले नै देबहक तँ भरि दिन अपनो आ अनको उसका-उसका रग्गड़े करैत रहतह। रग्गड़केँ तँ कोनो सीमा नै होइ छै। जँ कहीं गोटे दिन लाठिये-लठौबलि भऽ जेतह तखन तँ लेनीक देनी पड़ि जेतह। दू पाइ कमाइले धंधा करबह आकि कोट-कचहरीक फेरमे पड़बह। बुझिते छहक जे कोट-कचहरी लोकेक पाइपर ठाढ़ अछि। ओइ साला रंगबाज सभकेँ की अछि। अपने किछु करतह नहि आ अनका काजमे सदिखन टांगे अड़ौतह। गामक उत्पातसँ लऽ कऽ थाना-पुलिस, कोट-कचहरीक दलाली भरि दिन करैत रहतह। आब तोंही कहह जे बरदास हेतह? नीक लोकक लेल अइ दुनियाँमे कतौ जगह नहि अछि। ओइ साला सभकेँ की छै, भरि दिन ताड़ी-दारु पीबि ढ़हनाइत रहतह। ने छोट-पैघक विचार करतह आ ने गाड़ि मारिक। तइपरसँ पंचायत मुखियो आ वार्डो-मेम्बर सभकेँ कमीशन चाहबे करियै। पब्लिको तेहने अछि। देखबहक जे कतेक एहेन परिवार अछि जेकरा कोटाक वस्तुक जरुरत नै छै जेना चीनी। मुदा ओहो कोटासँ चीनी उठा दोकानमे किछु नफा लऽ कऽ बेचि लेतह। जखनिकि किछु परिवार एहेन अछि जेकरा कोटाक वस्तुसँ खर्च नै पूड़ै छैक। अपनो आँखिसँ देखबहक जे दस-बीस कप चाह आने पीबैत अछि। की ओकरा सभकेँ फाजिल नै देबहक। जखने एक गोटेकेँ फाजिल देबहक तँ दोसराक हिस्सा कटबे करत। एहेन स्थितिमे डीलरे की करत? आखिर ओहो तँ समाजेक लोक छी।’
उमाकान्त- ‘सभ गोटे तँ कोटा उठबितो नै हेतै?’
मिश्रीलाल- ‘हँ, सेहो होइए। मुदा ओ तखन होइए जखन कोटाक वस्तुक दाम आ खुल्ला बजारक दाममे अन्तर नै रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक दाममे अन्तर रहैत अछि तखन जेकरो ने अपना पाइ रहै छै ओहो दोकानदार सभसँ, अधा-अधी नफापर, पाइ लऽ कऽ समान उठा लै अए आ बेचि लै अए। ततबे नै ओहो चाहतह जे किछु फाजिले कऽ समान भेटए।’
मुँह बिजकबैत उमाकान्त- ‘तब तँ बड़ ओझरी अछि।’
उमाकान्तक सोचकेँ गहराइ दिशि जाइत देखि मुस्की दैत मिश्रीलाल- ‘बौआ, एतबेमे छगुन्ता लगै छह। ई तँ एक दिसक बात कहलिहह। अहूमे कते ओझरी छुटिये गेलह। जँ सरिया कऽ सभ बात कहबह तँ सैकड़ो ओझरी आरो अछि। आब सुनह आॅफिस, बैंक, एफ.सी.आइ.क गोदामक संबंधमे। दौड़-बरहा जे करै पड़तह ओकरा छोड़ि दै छिअह। किएक तँ मोटा-मोटी यएह बुझह जे एक दिनक काजमे पनरहो दिनसँ बेसिये लगतह। जइमे समएक संग पच्चीस-पचास पौकेटो खर्च हेबे करतह।’
उमाकान्त- ‘तब तँ बड़ लफड़ा अछि?’
मिश्रीलाल- ‘लफड़ा की लफड़ा जेकाँ अछि। जखने ब्लौक पाएर देबहक आकि गीध जेकाँ चारु भरसँ, अफसरसँ लऽ कऽ चपरासी धरि, नोंचए लगतह। कियो कहतह जे चाह पिआउ तँ कियो कहतह पान खुआउ। कियो कहतह सिगरेट पिआउ तँ कियो मिठाइ खुआउ। सुनि-सुनि मन मोहरा जेतह। मुदा की करबहक? भीखमंगोसँ गेल-गुजरल चालि देखबहक। जेना अपना दरमाहा भेटिते ने होए। मुदा डीलरे की करत? अगर जँ सभकेँ खुशी नै राखत तँ काजे लटपटेतै। काजो तेहेन अछि जे एक्के टेबुलसँ नञि होइ छै। जत्ते टेबुल तते खर्च। अखन हमहू अगुताइल छी, तेँ नीक-नहाँति नहि कहि सकबह। देखते छहक जे रजिस्टर तैयार करै छी। ब्लौक जाएब। मुदा तैयो एक-दूटा बात कहि दै छियह। सबहक तड़ी-घटी ने हम बुझै छिऐ।’
उमाकान्त- ‘कनी-कनी सबहक बात कहि दिअ?’
मिश्रीलाल- ‘अगुताइलमे की सभ बात मनो पड़ै छै। मुदा जे मन पड़ैए से कहि दै छिअह। पहिने बैंकक सुनह। कोरियापट्टीमे दुनियाँलाल डीलर अछि। बेचारा बड़ मुँह सच। जहिना-जहिना समान बिकाइल रहए तहिना-तहिना पाइ रखने रहए। खुदरा समानक बिक्री तेँ खुदरा पाइ। जखन बैंकमे जमा करए गेल अगिला कोटाक लेल, तँ खुदरा पाइ देखि बैंकमे लेबे ने केलकै। कहलकै जे ओते हमरा छुट्टी अछि जे भरि दिन तोरे पाइ गनैत रहब। भरि दिन बेचारा छटपटा कऽ रहि गेल। बैंकसँ निकलबो ने करए जे पौकेटमार सभ ने कहीं पाइ उड़ा दिअए। दोसर दिन आबि कऽ हमरा कहलक। तामस तँ बड़ उठल। किएक तँ जेना मोटका पाइ सरकारक होए आ खुदरा नै होए, तहिना। जखन पाइयेक लेन-देन बैंकमे होइ छै तँ गनै ले स्टाफ राखह। मुदा की करितियै। दोसर दिन गेलौं। मनेजरकेँ कहलियै। तखन दू प्रतिशत कमीशनपर फड़िआइल। आब तोंही कहह जे ई दू प्रतिशत कोन बिलमे चलि गेल। तहिना दोसर बात लाए, सप्लाइ इन्सपेक्टरक। इन्सपेक्टर बदली भेलै। नव इन्सपेक्टर बुझि पनरह-बीस गोटे डीलर ओकरा पाइ नै देलकै। ओना पचास रुपैये प्रति डीलर प्रति मास इन्सपेक्टरकेँ दैत अछि। सभकेँ मनमे भेलै जे नव हाकिम छथि तेँ छओ मास तँ इमानदारी रखबे करताह। ले बलैया, जहाँ डीलर दोसर कोटाक सभ समान उठौलक आकि दोसर दिन भेने विश्वनाथ डीलर ऐठाम पहुँचि गेल। विश्वनाथोकेँ कोनो डर मनमे नहि। किएक तँ समान ओहिना रहए। विश्वनाथकेँ इन्सपेक्टर चीनी काँटा करैले कहलक। ओहो तैयार भऽ काँटा करै लगल। पाँचो बोरा मिला कऽ चौदह किलो चीनी कमि गेलै।
बिच्चहिमे उमाकान्त कहलक- ‘चीनी तौलि कऽ नञि नेने रहए?’
मिश्रीलाल- ‘ई एफ.सी.आइ. गोदामक खेल छी। एफ.सी.आइ. गोदाम तँ ब्लौके-ब्लौके नै अछि। तेँ देखबहक जे डीलर सबहक नम्बर लगल अछि। सभकेँ धड़फड़ करैत देखबहक। किएक तँ अपन टाएर गाड़ी तँ सभ डीलरक रहै नै छै। अधिक डीलर भड़ेपर गाड़ी लऽ जाइए। तेँ मनमे होइत रहै छै जे जते जल्दी समान हएत तते कम भाड़ा लगत। तेँ कियो समान तौलबै नै अछि। जे कियो पच्चीस रुपैइये बोरा मनेजरकेँ दऽ देने रहलै ओकरा तँ नीक समानो आ पुरल बोरो देलक। जे पाइ नञि देने रहल ओकरा समानो दब आ घटल बोरो देलक। चोरपर चोर अछि।’
छुब्ध होइत उमाकान्त- ‘हद लीला सभ अछि।’
मिश्रीलाल- ‘आब मार्केटिंग अफसर एम.ओ.क बात सुनह। अखुनका जे एम.ओ. अछि ओ पीआक अछि। ओना काज करैमे भुते अछि। रस्तो-पेरामे मोटर साइकिल लगा फाइलपर लिखि दैत अछि। मुदा ओहिना नहि। पहिले एक बोतल पीआ देबहक, तखन।’
उमाकान्त- ‘अफसर भऽ कऽ रस्ता-पेरापर बोतल पीबैए?’
ठहाका मारि हँसि मिश्रीलाल- ‘बौआ, तूँ गाम-घरक बात बुझै छहक। गाम-घरमे जे छोट-पइघीक, इज्जत-आबरुक विचार अछि ओ कत्तऽ पेबह। मुदा तइओ ओकरामे दूटा गुण जरुर छलैक। पहिल गुण छलैक जे आन कोनो स्त्रीगण दिशि नहि तकितह। आ दोसर गुण छलै जे ककरोसँ एक्को पाइ नञि लइतह। मुदा एहिसँ पहिलुका एम.ओ. जे रहए ओ भारी पाइखौक। सभ काजक रेट बनौने रहए। जे सभ बुझै। तेँ जेकरा जे काज रहै ओ ओइ हिसाबसँ पाइ दऽ दै आ लगले काज करा लिअए।’
मुस्कुराइत उमाकान्त- ‘तब तँ पक्का नटकिया सभ अछि।’
मिश्रीलाल- ‘नटकिया की नटकिया जेकाँ अछि। रंग-बिरंगक चोर सभ पसरल अछि। कियो धनक चोर अछि तँ कियो धरमक। कियो बुइधिक चोर अछि तँ कियो विवेकक। कते कहबह। तेसराक सुनह। अंदाज करीब पचपन छप्पन बर्खक उमेर ओकर रहए। मुदा फीट-फाटमे जुआनक कान कटैत। जेहने हीरोकट कपड़ा पहिरैत तेहने हिप्पीकट केश रखैत। रंग-बिरंगक तेल आ सेंट लगबै। सदिखन उपरका जेबीमे ककही देखबे करितहक। रातियोमे कैक बेर केश सीटै। चौबीस घंटामे दू बेर दाढ़ी बनबै। ओ एम.ओ. भारी नंगरचोप जेहने अपने तेहने बहुओ। दिन भरिमे पच्चीसो बेर कपड़ा साड़ी-ब्लाउज आ जूत्ता-चप्पल बदलै। केशमे कते रंगक क्लीप लगबै तेकर ठेकान नहि। भरि दिन रिक्शापर अइ डेरासँ ओइ डेरा, अइ बजारसँ ओइ बजार घुमिते रहैत छलि। संयोगो ओकरा नीक भेटलै। एक्के बेर बी.डी.ओ., सी.ओक बदली भऽ गेलइ। ओकरे दुनू गोटे चार्ज दऽ कऽ गेल। ओही बीच शिक्षा मित्रक भेकेन्सी भेल। लड़की सभकेँ आरक्षण भेटलै। जहिमे जाति प्रमाणपत्रक जरुरत पड़ल।’
अपसोच करैत- ‘बौआ की कहबह, ओइ सालाक डेरा बेश्यालय बनि गेल। कखनो ब्लौक आॅफिसमे नञि बैइसै। जखन बैसबो करै तँ आन-आन कागज देखए मुदा एक्कोटा जाति प्रमाणपत्रपर हस्ताक्षर नञि करए।’
उमाकान्त- ‘परिवारक कियो किछु ने कहए?’
मिश्रीलाल- ‘स्त्रीक विषएमे तँ कहिये देलियह। जेठकी बेटी बी.ए. मे पढ़ैत रहए। ओकरो चालि-ढ़ालि बापे-माए जेकाँ। कओलेजेक एकटा छौंड़ा आदिवासी क्रिश्चन संग चलि गेलै।’
उमाकान्त- ‘बाप-माएकेँ लाज नै भेलै?’
मिश्रीलाल- ‘लाज तँ तेहेन भेलै जे राता-राती अइठीनसँ भागल।’
उमाकान्त- ‘अहूँकेँ बहुत काज अछि आ हमरो मन भरि गेल। आखिरीमे एकटा बात बुझा दिअ।’
मिश्रीलाल- ‘की?’
उमाकान्त- ‘अहाँ कोना अप्पन प्रतिष्ठा समाजो आ आॅफिसोमे बना कऽ रखने छी?’
मिश्रीलाल मुस्कुराइत बजलाह- ‘समाजमे जकरा ऐठाम सराध, बिआह, उपनैन, मूड़न, भनडारा वा आन कोनो तरहक काज होइ छै तँ ओकरा हम जरुर चीनियो आ मट्टियो तेलक पूर्ति कइये दैत छिऐ। भलेहीं अपना लग नहियो रहल तैयो जहाँ-तहाँसँ आनि पुराइये दैत छिऐ। जइसँ समाजक सभ खुशी रहैए। आॅफिसक बात तँ पहिने कहि देलियह।’
उमाकान्त- ‘हमरा की करक चाही? किएक तँ जइ हिसाबे अहाँ कहलौं तइसँ हम्मर मन भटकि रहल अछि।’
मिश्रीलाल- ‘बौआ, जखन लाइसेंस बना लेलह तखन कमसँ कम एक खेप समान उठा कऽ बाँटि लाए। जइ सँ समाजोक चालि-ढ़ालि आ आॅफिसोक चालि-ढ़ालि देखि लेबहक। बेबहारिक ज्ञान भऽ जेतह। व्यवहारिके ज्ञान असली ज्ञान छिऐ। अखन हम एते मदति जरुर कऽ देबह जे तोरा कतौ अड़चन नै हेतह। मुदा दोसर खेपक भार हम नै लेबह। किएक तँ बुझिते छहक जे बिलाइ जे मूससँ दोस्ती करत तँ खाएत की? तोरो सीखैक अवसर भेटि जेतह।’
उमाकान्त- ‘बड़बढ़िया! जहिना अहाँ कहलौं तहिना हम करब।’
मिश्रीलाल- ‘बाउ, आब तँ हम बूढ़ भेलहुँ। जहिया हम सोलहे बरखक रही तहियेसँ डीलरी करै छी। मुदा पहिलुका आ अखुनकामे अकास-पतालक अंतर भऽ गेल अछि। जते धन आ शिक्षाक प्रसार भेल जा रहल छै ओते घटिया मनुक्ख सेहो बढ़ि रहल अछि। पहिने इमानदार लोक बेसी छल मुदा आब आंगुरपर गनए पड़तह। हम तँ डीलरीमे रमि गेलौं। सभ घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी, तेँ नीक छी।’
उमाकान्त- ‘चलैत-चलैत किछु........।’
मिश्रीलाल- ‘जहिना आमक गाछ होइ छै जे आमक आँठीसँ जनमैत अछि। तहिना तँ मनुक्खोक होइ छै। दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सभ तँ मुरुखे भऽ कऽ जन्म लैत अछि। मुदा एहिठाम जकरा जेहेन परिवार, समाज, वातावरण भेटैत छैक ओ ओहन बनैत अछि। जहिना आमक छोट-छोट सरही गाछकेँ नीक-नीक कलमी आमक गाछक डारिमे बान्हि कलम लगा नीक-नीक आम बना लैत, तहिना मनुक्खोक होइत। मुदा नीक परिवार, नीक समाज अछिये कतेक। अधिकांश तँ गेले-गुजरल अछि। ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छै आ ने नीक बात-विचार। तखन नीक मनुष्य बनत कोना? जाधरि नीक मनुष्य नहि बनत ताधरि नीक समाज कोना बनत? तखन तँ जएह अछि तेहिमे अपनाकेँ जते नीक बना जीबि सकी, वएह संतोषक बात। तोहूँ अखन सादा कागज जेकाँ साफ छह, तेँ हम चाहब जे गन्दा नहि हुअ। जेहेन विचार, हाथ होइत कर्म निकलतह तेहेन जिनगी हेतह। कियो शरीरांतकेँ मृत्यु बुझैत अछि आ कियो आत्माक हननकेँ। मनुष्यमे असीम शक्ति छिपल छैक, ओकरा जगबैक अछि। जे हमहूँ सरिया कऽ नहिये बुझै छिऐ।’
जहिना तेज हथियार हाथमे एलासँ सक्कत-सक्कत वस्तु कटैक हूबा बनि जाइत तहिना उमाकान्तोकेँ भेल।
ओ विचार केलक जे आब बैलगाड़ीक युग नञि रहल। मशीनक युग आबि गेल। तेँ हमहूँ अपना हाथसँ इन्जिने चलाएब।’

Saturday, November 8, 2008

जितेन्द्र झा विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी

जितेन्द्र झा
विदेशमे भविष्य देखैत अछि विद्यार्थी
जितेन्द्र झा काठमाण्डू पढबालेल विदेश गेनिहार नेपाली विद्यार्थीक सँख्या बढिरहल अछि । पश्चिमी जीवनशैली स्वतन्त्रता आ विलासिता भोगऽलेल सेहो नपाली विद्यार्थी विदेश दिन आकर्षित भऽ रहल अछि । आइटी होटल म्यानेजमेन्ट व्यबस्थापन इन्जिनियरिंग विज्ञान सहित विषयदिस रुचि रहल विद्यार्थी विदेश जएबाक लेल बाध्य सेहो अछि कियाक त नेपालमे एहन विषयक उत्कृष्ट अध्ययन सँस्थानक कमी अछि ।
विज्ञान आ व्यवस्थापन संकायमें रुचि रहल विद्यार्थी खास कऽ विदेश जाइत अछि । दोसर दिस नेपालमेँ लोडसेडिंग आ पाबनि तिहार जकँ होबऽ बला बन्द हडतालक कारण सेहो विद्यार्थीसभ विदेशमेँ अपन सुरक्षित भविष्य देखैत अछि । एहि वर्ष मात्रे नेपालमें एगारह घण्टाधरि लोडसेडिंग भेल छल तहिना राजनीतिक दल आ सशस्त्र निशस्त्र समूह बन्द हडताल आहवान करिते रहैत अछि । विदेश गेनिहार विद्यार्थीमेँ निजी विद्यालय तथा कलेजमेँ अध्ययनरत विद्यार्थी सभ बेशी अछि । सरकारी क्याम्पस पढाइसँ बेशी राजनीतिके केन्द्र बनल अछि तेँ लगनशील आ मेहनती विद्यार्थी ओम्हर ताकहो नहि चाहैत अछि । नेपालक कन्सल्टयान्सीसभ विद्यार्थीके निजी खर्चमेँ विदेश पढऽ जाएलेल सहज बाट बना देने अछि । शैक्षिक परामर्शदातासभ विद्यार्थीके विदेशमेँ पढाईके जानकारीक सँगहि विदेश जएबालेल विद्यार्थीके प्रेरित सेहोे करैत अछि । शैक्षिक परामर्शदाता ममता उपाध्यायके अनुसार नेपालमें प्रयोगात्मक शिक्षा नहि अछि तें एत्त गुणस्तरीय पढाई सम्भव नहि अछि । तें नेपालमें एम. ए. आ पिच एच डी कएल विद्यार्थीसेहो गुणस्तरहीन होइत अछि ममताक कहब छन्हि । नेपालमें पढलाक बाद नोकरीक अवसर कम अछि ताहिलेल सेहो विद्यार्थी विदेश दिस आकर्षित भऽ रहल अछि ।
नेपालक आम विद्यार्थीक लेल विदेशक पढाइ सपना सेहो अछि कम आय भेल अभिभावकके धीयापुतासभके त नेपालेमे चित्त बुझएबाक स्थिति छै । विदेशमेँ उच्च शिक्षा अध्ययन करबाक लेल परामर्श लेबऽ आएल विद्यार्थी नेपालोमेँ अध्ययनकऽ कऽ भविष्य बनाओल जा सकैत अछि ताहिमेँ विश्वस्त अछि । सरकार पढबालेल विदेश पलायनकेँ रोकबालेल कोनो खास पहल एखनधरि नइ कएलक अछि नेपाली विद्यार्थी सँगहि प्रतिभा आ देशक पाइसेहो विदेश जाइत अछि से बुझब आबश्यक अछि । शिक्षामन्त्रालय एहिप्रति गम्भीर रहल दाबी शिक्षामन्त्री सर्र्वेन्द्रनाथ शुक्लके छन्हि । नेपालक विद्यालयके गुणस्तरीय बनाओल जाए तऽ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या कम भ सकैया शुक्लके कहब छन्हि । विज्ञान आ व्यवस्थापन अध्ययन होबऽ बला ९० विद्यालयकें सरकार गुणस्तरीय बनाएबालेल सहयोग कऽ रहल शुक्ल जनतब देलनि । विद्यालयके क्षमता पाठयक्रम शिक्षक शैक्षिक सामग्री जेहन विषयवस्तु दिस सुधारके आवश्यकता अछि । नेपालमेँ एक तथ्यांकअनुसार ४० हजार विद्यार्थी प्रतिवर्ष स्नातक उत्तीर्ण करैत अछि जाहिमेँसँ नेपालमेँ मात्र दू हजारके रोजगारी भेटैत छैक । राजनीतिक अबस्था बन्द हडताल जेहन कारणसँ वार्षिक २० हजारसँ बेशी विद्यार्थी उच्च शिक्षा बास्ते विदेश जाइत अछि । ई त सरकारी तथ्यांक अछि । विदेश जाएलेल शिक्षा मन्त्रालयसँ सिफारिस लेनिहार विद्यार्थीक सँख्या मात्र ई अपना निजी खर्चमेँ विदेश गेनिहार विद्यार्थीक संख्या आओर बेशी अछि । विदेशमेँ मात्रे उत्कृष्ट शिक्षा भेटैत छैक से भ्रम चिरबादिस सम्बन्धित सभ पक्षके लागक चाही । राजनीतिक दलके सेहो शिक्षा क्षेत्रके बन्द हडताल मुक्त बनएबामेँ सहयोग करबाक चाही । विद्यार्थी देशक भविष्य होइत अछि भविष्यके अन्धकारमेँ धकेलबाक काज ककरोसँ नहि हुअए । (साभार विदेह www.videha.co.in)

ठेलाबला - जगदीश प्रसाद मण्डल



टाबरक घड़ीमे बारह बजेक घंटी बजितहि भोलाक निन्न टूटि गेलनि। ओछाइन परसँ उठि सड़कपर आबि हियासए लगला तँ देखलनि जे डंडी-तराजू माथसँ कनिये पछिम झुकल अछि। मेघनक दुआरे सतभैयाँ झँपाएल। जेम्‍हर साफ मेघ रहए ओम्हुरका तरेगण हँसैत मुदा जेम्‍हर मेघोन रहए ओम्हुरका मलिन। गाड़ी-सबारीसँ सड़क सुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीक सिपाही टहलैत। सड़क परसँ भोला आबि ओछाइनपर पड़ि रहला। मुदा मन उचला-चाल करैत रहनि। सिनेमाक रील जेकाँ पैछला जिनगी मनमे नचैत। जहिना चुल्हिपर चढ़ल बरतनक पानि तरसँ उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुशी हृदएसँ निकलि चिड़ै जेकाँ अकासमे उड़ैत। किएक नहि खुशी अओतैक? हराएल वस्तु जे भेटि गेलैक। मन गेलनि परसुका पत्रपर। जे गामसँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बुझि विश्वासे नहि होइत रहनि। पत्र तँ नहि पढ़ल होइत रहनि मुदा पढ़बै काल जे पाँती सभ सुनने रहथि, ओहिना आँखिक आगू नचैत रहनि। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखए लगलथि। ‘‘बाबू, पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। इच्छा अछि जे घरसँ विदा हेबा काल अहाँकेँ गोर लागि घरसँ निकली। तेँ पाँच तारीखकेँ दस बजेसँ पहिनहि अपने गाम पहुँचि जाइ।’’ पत्रक बात मनमे अबितहि भोला गाम आ शहरक बीचक सीमापर लसकि गेलाह। मनमे ऐलनि, समाजसँ निकलि छातीपर ठेला घीचि, दूटा शिक्षक समाजकेँ देलिऐक, की ओहि समाजक आरो ऋण बाकी छैक? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जहिसँ मनमे खुशी उपकलनि जे जहिना गामसँ धोती गोल-गोला आ दू टाका लऽ कऽ निकलल छलहुँ, तहिना देहक कपड़ा,  सनेस,  चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि एहिठाम लऽ जाएब। चिड़ै टाँहि देलकै, फेर ओछाइन परसँ उठि निकललाह, तँ देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आबि गेल अछि। चोट्टे घुरि कऽ आबि संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन, अपनाले खाली टिकटक खर्च,  सनेस आ पाँकेट खर्च मिला सए रुपैआ राखि, कपड़ा पहीरि,  धर्मशालाकेँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेलाह।
जखन आठे बर्खक भोला रहथि तखनहि माए मरि गेलखिन। तीनिये मासक पछाति पिता रघुनी चुमाओन कऽ लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नीसँ चारि सन्तान भेल रहनि। मुदा खाली भोलेटा जीवित रहल। सत्माएकेँ परिवारमे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलनि। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखोकेँ होइत जे सत्माए भोलाकेँ अलबा-दोलबा कऽ घरसँ भगा देतैक, नहि तँ परिवारमे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सबहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घरसँ सोलहन्नी फ्री भऽ गेलाह। फ्री सिर्फ काजे टामे भेला,  मान-दान बढ़िये गेलनि। दुनू साँझ भानस होइतहि माए फुटा कऽ भोलाले सीकपर थारी साँठि कऽ राखि दैत छलीह। भलेहीं भोला दिनुका खेनाइ साँझमे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाथि।
  परोपट्टामे जालिम सिंह आ उत्तम चन्दक नाच जोर पकड़ने। सभ गाममे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाममे नाच भेने चारि कोसक लोक देखए अबैत।
  भोलाक गामक विशौलक नाच पार्टी सभसँ सुन्दर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जाहिसँ पार्टीक प्रतिष्ठा दिनानुदिन बढ़ितहि जाइत। घरसँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भऽ गेलाह। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीन घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी, तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ छौँड़ा-मारड़ि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ता। ने नाच पार्टीकेँ रुपैआ दिअ पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चौदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयोले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनिकेँ दैत छलखिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल, डिग्री सेदैक जिम्मा भेटि गेलैक। डिग्री सेदैक जिम्मा भेटितहि काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करए पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्त रहए लगल। मुदा एतबेसँ ओकर मन शान्त नहि भेलैक। काजक सृजन ओ अपनोहु करए लगल। स्टेजक आगूमे जे छोटका धिया-पूता बैसि पी-पाह करैत,  ओकरो सभपर निगरानी करए लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमि कऽ महफिलोक निगरानी करए लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सेहो लगबए लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीब सीखि लेलक। किछुए दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भऽ गेल। किएक तँ एक्के-दू दम जँ पीबए तैयो भरि रातिमे तीस-पैंतीस दम भऽ जाइत छलैक। जहिसँ भरि राति मूड बनल रहैत छलैक।
बीड़ीक कसगर चहटि भोलाकेँ लागि गेलै। रातिमे तँ नटुऐ सभसँ काज चलि जाइत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत तँ मन छटपटाए लगैत छलैक। मूडे भंगठि जाइत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबए लगल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खाइत। एक दिन एक्केटा बीड़ी रघुनीकेँ रहनि। भोला चोरा कऽ पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गामपर अएलाह तँ बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया परसँ अानए गेलाह तँ बीड़ी नहि देखलनि। चोटपर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रघुनी भोलापर उताड़ि देलखिन। मारि खाए भोला कनैत उत्तर मुँहेक रास्ता पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल आकि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलाक कानब सुनि ओ बुझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागल छै। पुचुकारिकेँ पुछलखिन- ‘‘की भेलौ रौ भोला?’’
  करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कानए लगल। हिचुकैत भोला कनिये जोरसँ काकाकेँ कहलकनि, जे कानबक अवाजमे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि,  दहिना डेन पकड़ि रघुनीकेँ कहए बढ़लथि। काकाकेँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- ‘‘रघुनी,  भोला बच्चा अछि किऐक तँ विआह नञि भेलैए। तेँ नीक हेतह जे विआह करा दहक। अपन भार उतड़ि जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोषी हेबह, समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैत छैक। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक  ओ कहतह जे ‘‘माए मुइने बाप पित्ती।’’
करिया काकाक विचार रघुनीक करेजकेँ छेदि देलक। आँखिमे नोर आबि गेलैक। अखन धरि जे आँखि रघुनीक करिया काकापर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघारपर पहुँचि अटकि गेलैक। मारिक चोट भोलाक देहमे निजाइये गेलैक जे संग-संग विआहक बात सुनि मनमे खुशियो उपकलै। बुद्धिक हिसाबसँ भलेहीं भोला बुड़िबक अछि मुदा नाचमे मेल-फीमेल गीत तँ  गबितहि अछि।
  पिताक हैसियतसँ रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- ‘‘काका, हम तँ ओते छह-पाँच नहि बुझैत छिऐ, काल्हिये चलह कतौ लड़की ठेमा कऽ विआह कइये देबै।’’
  ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि करियाकाका रास्ता घेलनि।
  भोलाक विआह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनीकेँ कहलकनि- ‘‘विआहसँ पहिने हम सभ नहि बुझलिऐक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टीमे रहैए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाए देब। तेँ  ई संबंध नहि रहत। अपना सभमे तँ खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ बियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीक दोसर विआह कऽ देब।’’  कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह।
  ससुरक बात सुनि भोलाक बुद्धिये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिरड़ो उठलापर सभ किछु अन्हरा जाइत छैक तहिना भोलोक मन अन्हरा गेल। दुनियाँ अन्हार लगए लगलैक। ओना तीन मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलैक। एकटा नटुआ एकटा लड़की लऽ कऽ पड़ा गेल छलैक, जाहिसँ गाम दू फाँक भऽ गेलैक। दू ग्रुपमे गाम बँटा गेलैक। सौँसे गाममे सनासनी चलै लगलैक। ताहि परसँ भोला आरो दू फाँक भऽ गेल।
पाण्डु रोगी जेकाँ भोलाक देहक खून तरे-तर सुखए लगलैक। मुदा की करैत बेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्लानिसँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्कारए लगल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्म देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे एहि गामसँ कतौ चलिये जाएब नीक होएत।
घरसँ भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँहसँ दिल्ली,  कलकत्ता,  बम्बइक विषएमे सुननहि रहए। जहिसँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहए। ने जेबीमे पाइ रहए, ने बटखरचा। सिर्फ दुइयेटा टाका संगमे रहए। अबधारि कऽ कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक।
  हबड़ा स्टेशन गाड़ी पहुँचते भोला उतड़ि बिदा भेल। टिकट नहि रहनहुँ एक्को मिसिया डर मनमे नहि रहैक। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेर पनरह अगस्तकेँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि आएल रहए। प्लेटफार्मक गेटपर दूटा सिपाहीक संग टी.टी. टिकट ओसुलैत। भोलाकेँ देखि टी.टी.क मनमे भेलै जे दरभंगिया छी भीख मंगए आएल अछि। टिकट नहि मंगलकै। सिपाहियोकेँ बुझि पड़लै जे जेबीमे किछु छैक नहि। टिकटेबला यात्री जेकाँ भोलो गेट पार भऽ गेल।
  सड़कपर आबि आँखि उठा कऽ तकलक तँ नमहर-नमहर कोठा चौरगर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखिमे ने किछु भऽ गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्के चान सात बुझि पड़ैत  तहिना। दुनू हाथे दुनू आँखि मीड़ि फेर देखलक तँ ओहिना। भीड़ देखि मनमे एलै जे जखन एत्ते लोकक गुजर-बसर चलैत छै तँ हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानए लगल। मुदा ककरो बाजब बुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाए-महीस सभ ठाम एक्के रंग बजैत अछि तहिना ने मनुक्खो बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलैक जे भरिसक हम मनुक्खक जेरिमे हेरा ने तँ गेलहुँहेँ। फेर मनमे एलै जे लोक तँ संगीक बीच हराइत अछि, असकरमे कोना हराएत। विचित्र स्थितिमे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होइ आ ने ककरोसँ किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मूँहे बिदा भेल। सड़कक किनछरिये सभमे खाइ-पीबैक छोट-छोट दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्मते ने होइत। जेबी टोबलक तँ दूटकही रहबे करै। मन पड़लैक मधुबनीक स्टेशन कातक होटल, जहिमे पाँच रुपैये प्लेट दैत। ई तँ सहजहि कलकत्ता छी। एहिठाम तँ आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ गर अँटबए लगल जे नहि भात-रोटी तँ एक गिलास सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- ‘‘आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?’’
  अपन बोली सुनि भोला घुसुकि कऽ दोकान लग पहुँचि पुछलक- ‘‘दादा, कोना खुआबए छहक?’’
  ‘‘तीन मास पहिने धरि आठे आनामे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आनामे खुआबै छिऐ।’’
  भोलाक मनमे संतोष भेल। पाइयेबला गहिकी जेकाँ बाजल- ‘‘कुरुड़ करैले पानि लाबह।’’
  भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना तँ रंग-विरंगक बस्तु देखैत मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम अँटकैत। देवाल सभमे साटल सिनेमाक पोस्टरपर आ सड़कपर चलैत ठेलापर। जाहि पोस्टरमे डान्स करैत देखए ओहि ठाम अटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी आकि पुरुख। गाम-घरमे तँ पुरुखे मौगी बनि डान्स करैत अछि। फेर मन पड़लै संगीक मुँहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्य हरिश्चन्द फिल्ममे मर्दे मौगिओक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल तँ अपने जेकाँ छौड़ाकेँ ठेला ठेलने जाइत देखि सोचए लगल जे ई काज तँ हमरो बुते भऽ सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी तँ करए नहि अबैत अछि। बिना सिखने रिक्शो कोना चलाओल हएत?  ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगलेमे एकटा ठेलाबलाकेँ चाह पीबैत देखलक। ओहिठाम जा कऽ ठाढ़ भऽ गेल। चाह पीबि ठेलाबला पुछलक- ‘‘कोन गाँ रहै छह?’’
  ‘‘विशौल।’’
  ‘‘हमहूँ तँ सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।’’
  गप-सप्‍प करैत दुनू गोटे धर्मतल्लाक पुरना धर्मशाला लग पहुँचल, ठेलाकेँ सड़केपर छोड़ि दीनमा भोलाकेँ धर्मशालाक भीतर लऽ जा कऽ कहलक- ‘‘समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।’’
  टंकीपर हाथ-पाएर धोए भोला दीनमासँ बीड़ी मांगि पीबि, पीलर लगा ओँगठि कऽ बैसि गेल। आँखि उठा कऽ तकलक तँ झड़ल-झुरल देवालक सिमटी,  तैपर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनमल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगूमे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पार्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भऽ गेल। सोचितहि-सोचितहि निन्न आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सुति रहल।
  गोसाँइ डूबितहि बुचाइ -दोसर ठेलाबला- आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- ‘‘कोन गाम रहै छह?’’
  आशा भरल स्वरमे भोला बाजल- ‘‘बिशौल।’’
  विशौलक नाओ सुनितहि मुस्की दैत बुचाइ पुछलक- ‘‘रुपनकेँ चीन्है छहक?’’
  ‘‘उ तँ हमरा कक्के हएत।’’
  अपन भाएक ससुर बुझि भोलासँ सार-बहिनोइक संबंध बनबैत कहलक- ‘‘चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेनसँ गप-सप्‍प करब।’’
  कहि टंकीपर जा बुचन देह-हाथ धोए, कपड़ा बदलि भोलाकेँ संग केने दोकानपर गेल। आँखिक इशारासँ दोकानदारकेँ दू-दूटा पनितुआ,  दू-दूटा समौसा दैले कहलक। दुनू गोटे खा, चाह पीबि पानक दोकानपर पहुँचि बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोला बाजल- ‘‘पान छोड़ि दियौ। बीड़िये कीनि लिअ।’’
  बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मशालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलाबला सभ अबए लगलैक। बिशौलक नाओ सुनितहि अपन-अपन संबंध सभ फरियबए लगल। संबंध स्थापित होइतहि चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगीमे एहन स्नेह भाेलाकेँ पहिल दिन भेटलै। ठेलाबला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सभ व्यवस्था ठेलाबला सभ कऽ देलक। दोसर दिनसँ ठेला ठेलए लगल।
  शनि दिनकेँ सभ ठेलाबला रौतुका शो सिनेमा देखए जाइत। ओहि शोमे एक क्लासक कन्सेशन भेटैत अछि। भोलो सभ शनि सिनेमा देखए लगल।
  चौदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आएल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभले कपड़ा अनने अछि। धिया-पूताकेँ दू-दूटा चौकलेट देलक। धिया-पूताकेँ चौकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबए लगलीह। झबरी दादी आबि भोलाकेँ देखि बजए लगलीह- ‘‘कहू तँ एहिसँ सुन्नर पुरुख केहेन होइ छै जे सौंथ जरौनियाँ छोड़ि देलकै।’’
  दादीक बात भोलाकेँ बेधि देलक। आँखि नोराए लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानए लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की ताकए घरसँ निकलल। ओना लड़कीक तँ कमी नहि,  मुदा गाम-घर देखि कऽ कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मनमे रहै। लड़कीक कमी तँ ओहि समाजमे अधिक अछि जहिमे भ्रूण-हत्याक रोग धेने छैक। समयो बदलल। गिरहस्त परिवारसँ अधिक पसन्द लोक नोकरिया परिवारकेँ करैत अछि। बगलेक गाममे भोलाक विआह भऽ गेल।
  विआहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भऽ गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक।
सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाममे गुजारए लगल। गाम अबैत तँ अपनो घरक काज सम्हारि अनको सम्हारि दैत।
  तेसर साल चढ़ितहि भेलाकेँ जौँआ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़ितहि ओ गाम आबि गेल। मनमे आशो बनले रहैक जे पाइ-कौड़ीक दिक्कत तँ नहिये हएत। सभ ठेलाबला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध अपने केने अछि। मुदा पहिल बेर छी, कनियाँक देखभाल तँ कठिन अछिये। सरकारीक कोनो बेवस्थो नहिये छैक। मुदा समाजो तँ समुद्र थिक। बिनु कहनहुँ सेवा भेटैत अछि। जाहिसँ भोलोकेँ कोनो बेसी परेशानी नहिये भेलैक।
  समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरितहि भोला दुनू बेटाकेँ स्कूलमे नाओ लिखौलक। शहरक वातावरणमे रहने भोलोक विचार धिया-पूताकेँ पढ़बै दिशि झुकि गेल रहैक। मनमे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाए मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नीक ऑपरेशन करा देलक। जाहिसँ परिवारो समटले रहलैक।
पढ़ैमे जेहने चन्सगर रतन तेहने लाल। क्लासमे रतन फस्ट करैत आ लाल सेकेण्ड। सातवाँ क्लास धरि दुनू भाँइ फस्ट-सेकेण्ड स्कूलमे करैत रहल। मुदा हाइ स्कूलमे दुनू भाँइ आर्ट लऽ पढ़ए लगल जहिसँ क्लासमे कोनो पोजीसन तँ नहिये होइत मुदा नीक नम्बरसँ पास करए लगल।
  मैट्रिकक परीक्षा दऽ दुनू भाँइ कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेशी जेकाँ अपनो पिताकेँ बुझैत छल। तेँ मनमे रंग-विरंगक इच्छा संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत,    -छातीक बले ठेला घीचैत देखि- पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाँइ कऽ लेलक। पितेक जोरपर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छाकेँ मनेमे दुनू भाँइ दाबि लेलक। मुदा तइयो भोला दुनू बेटाकेँ फुलपेंट, शर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनि कऽ देलखिन।
  तीन मासक उपरान्त मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाँइ-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणीसँ पास केलक। फस्ट डिवीजन भेलोपर आगू पढ़ैक विचार मनमे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचए लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लगल। नोकरियोक तँ वएह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जाहिसँ समाजक मूल पूँजी –मानवीय- आगिमे जरैत सम्पति जेकाँ नष्ट भऽ रहल अछि।
  समए मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरबज्जा खुजल। गामक स्कूलमे शिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जाहिसँ नव ज्योतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवानमे भेलैक। ओना समएक हिसाबसँ शिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि, मुदा बेरोजगारीक हिसाबसँ तँ नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूलमे रतनो आ लालोक बहाली भऽ गेलैक। पाँच तारीककेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करत।
आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाँइक मनमे नहि रहैक ताहिसँ बेसी खुशी नोकरीसँ भेलैक। कोपर बुद्धिमे कलुषताक मिसियो भरि आगमन नहि भेलैक अछि। दुनू भाँइ बैसि कऽ अपन परिवारक संबंधमे विचारए लगल। रतन लालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, कोन धरानी बाबू अपना दुनू भाँइकेँ पढ़ौलनि से तँ देखले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहँचि गेल छी। तेँ  अपनो सभक की दायित्व बनैत अछि, से तँ सोचए पड़तह ?’’
  रतनक बात सुनि लाल बाजल- ‘‘भैया, अपना सभ ओहि धरतीक सन्तान छी जाहि धरतीपर श्रवण कुमार सन बेटा भऽ चुकल छथि। पाँच तारीकसँ पहिनहि बाबूकेँ कलकतासँ बजा लहुन। हम सभ ठेलाबलाक बेटा छी, एहिमे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हएत जहन ओ ठेला घीचताह आ अपना सभ कुरसीपर बैसि दोसरकेँ उपदेश देबै।’’
  मूड़ी डोला स्वीकार करैत रतना बाजल- ‘‘आइये बाबूकेँ जानकारी दऽ दैत छिअनि जे जानकारी पबितहि गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीखकेँ दुनू भाँइ ज्वाइन करए जाएब। दुनू भाँइक विचार अछि जे अहाँकेँ गोर लागि घरसँ डेग उठाएब।’’
  दुनू भाँइक विचार सुनितहि माएक मन सुख-दुखक सीमापर लसकि गेलनि। जरल घरारीपर चमकैत कोठा देखए लगलीह। आँखिमे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि।

Tuesday, November 4, 2008

कुसुम ठाकुर अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक !!

कुसुम ठाकुर
अलग राज्यक माँग कतेक सार्थक !!
ओना तs हमर स्वभाव अछि हम नहि लोक के उपदेश दैत छियैक आ नहि अपन मोनक भावना लोकक सोझां मे प्रकट होमय दैत छियैक । हम सुनय सबकेर छियैक मुदा हमरा मोन मे जे ठीक बुझाइत अछि ओतबा धरि करैत छियैक। एकर परिणाम इ होइत अछि जे हमरा सलाह देबय वाला केर कमी नहि छैक। सब के होइत छैन्ह जे ओ जे कहताह कहतिह से हम अवश्य मानि लेबैन्ह।अपन अपन भावना केर हमरा पर थोपय के कोशिश बहुत लोक करय छथि। परोपदेश देनाइयो आसान होइत छैक । मुदा हमर भलाई केर विषय मे के सोचि रहल छथि इ ज्ञान तs हमरा अछि । मुदा दोसराक विचार सुनालाक किछु फायदा सेहो छैक। लोकक विचार सुनि अपन विचार व्यक्त करय मे आसानी होइत छैक आ आत्म विशवास सेहो बढैत छैक।


एकटा कहबी छैक "कोठा चढ़ी चढ़ी देखा सब घर एकहि लेखा " सब ठाम कमो बेसी एके स्थिति छैक, मुदा दोसरा केर विषय मे कम बुझय मे, आ देरी सs बुझय मे आबैत छैक, अपन तs लोक के सबटा बुझल रहैत छैक। पारिवारिक हो सामाजिक हो वा देशक, सब ठाम आपस मे विचार मे मतान्तर होइत रहैत छैक जे कि मनुष्य मात्र के लेल स्वाभाविक छैक आ हेबाक सेहो चाहि । जखैन्ह दस लोकक विचार होइत छैक तs ओहि मे किछु नीक किछु अधलाह सेहो विचार सोंझा मे आबैत छैक। मुदा आजु काल्हि सब ठाम स्वार्थ सर्वोपरि भs जाइत छैक । लोक के लेल देश समाज सs ऊपर अपन स्वार्थ भs गेल छैक।


संस्था व न्यास केर स्थापना होइत छैक समाज आ संस्कृति केर उत्थानक लेल । मुदा संस्थाक स्थापना भेलैक नहि कि ओहि संस्थाक मुखिया पद आ कार्यकारणी मे सम्मिलित होयबाक लेल राजनीति शुरू भs जाइत छैक । एकटा संस्था मे कैयैक टा गुट बनि जाइत छैक । आ ओहि मे सदस्य ततेक नहि व्यस्त भs जाइत छथि कि हुनका लोकनि के सामाजिक कार्य आ संस्कृति के विषय मे सोचबाक फुर्सते कहाँ रहैत छैन्ह । आ ताहू सs जौं बेसी भेलैक आ बुझि जाय छथि जे आब हुनक ओहि ठाम चलय वाला नहि छैन्ह तs एक टा नव संस्था केर स्थापना कs लैत छथि। सामाजिक कार्य केर नाम पर साल मे एकटा वा दू टा सांस्कृतिक कार्यक्रम कs लैत छथि आ बुझैत छथि समाज केर उद्धार कs रहल छथि । ओहि कार्यक्रम मे पैघ पैघ हस्ती , नेता के बजा अपन डंका बजा लैत छथि।बाकि साल भरि गुट बाजी आ साबित करय मे बिता दैत छथि जे हुनक कार्यकाल मे कार्यक्रम बेसी नीक भेलैक। हम मानय छियैक जे कार्यक्रम अपन संस्कृति केर आइना होइत छैक, मुदा ओ तs स्थानीय कलाकार के मौक़ा दs कs सेहो करवायल जा सकैत छैक। इ कोन समाजक उत्थान भेलैक जे लोक सs मांगि कs कोष जमा कैल जाय आ मात्र कार्यक्रम मे खर्च कs देल जाय। बहुतो एहेन बच्चा शहर वा गाम मे छथि जे मेधावी रहितो पाई के अभाव मे आगू नहि पढि पाबय छथि। दवाई केर अभाव मे कतेक लोकक जान नहि बचा पाबय वाला परिवारक मददि केनाई समाजक उद्धार नहि भेलैक? आय काल्हि तs लाखक लाख खर्च करि कs एकटा कार्यक्रम कैल जाइत छैक। कहय लेल हम ओहि महान हस्ती केर पर्व मना रहल छी। कार्यक्रम करू मुदा कि अपन गाम शहर के भूखल के खाना खुआ तृप्त कs ओहि महान हस्ती के श्रद्धाँजलि नहि देल जा सकैत छैक। इ तs मात्र एक दू टा समाज के सहायतार्थ काज भेलैक ओहेन कैयैक टा सामाजिक काज छैक जे कैल जा सकय छैक । यदि सच मे लोक के अपन समाज आ संस्कृति सs लगाव छैन्ह तs जतेक कम संस्था रहतैक ततेक नीक काज आ समाजक उत्थान होयतैक। ओहि लेल मोन मे भावनाक काज छैक नहि कि दस टा संस्थाक ।


देश मे नित्य नव नव राज्यक माँग भs रहल अछि। ओहि मे मिथिलांचलक माँग सेहो छैक। हमरा सँ सेहो बहुत लोक पूछय छथि "अहाँ मिथिला राज्य अलग हेबाक के पक्ष मे छी कि नहि "? हम एकहि टा सवाल हुनका लोकनि सँ पूछय छियैंह "कि राज्य अलग भेला सँ मिथिलाक उत्थान भs जेतैक "? इ सुनतहि सब के होइत छैन्ह हम मैथिल आ मिथिलाक शुभ चिन्तक नहीं छी। बुझाई छैन्ह जे अलग राज्य बनि गेला सँ मिथिलांचलक काया पलट भs जेतैक । एक गोटे जे अपना के मिथिला के लेल समर्पित कहय छथि, साफ़ कहलाह "मैथिल के मोन मे मिथिला के लेल जे प्रेम हेतैक से दोसरा के नहि" । हमर हुनका सँ एकटा प्रश्न छल "कि पहिने बिहार मे मैथिल मुख्य मंत्री, मंत्री नहि भेल छथि "? जवाब भेंटल " ओ सब मैथिल छलथि मिथिलाक नहि"। अलग राज्य भेलाक बाद जे कीयो मुख्य मंत्री होयताह ओ मिथिलाक होयताह आ मात्र मिथिला के लेल सोचताह ।

हमरा इ बुझय मे नहि आबैत अछि जे लोकक मानसिकता के कोना बदलल जा सकैत छैक ? एखैंह ओ दरभंगा के छथि , ओ सहरसा के .....ओ मुंगेर के छथि ....कि अलग राज्य भेला सँ आदमी केर मानसिकता बदलि जेतैक .....कि दरभंगा , सहरसा आ कि मुंगेर वाला भेद भाव मोन मे नहि औतेक ? आ जौं इ भेद भावना रहतैक तs सम्पूर्ण राज्यक विकास कोनाक भs सकैत छैक ? कि मिथिलाक होइतो ओ सम्पूर्ण मिथिला केर विषय मे सोचताह ?


छोट छोट राज्य नीक होइत छैक , ओकर पक्ष मे हमहू छी मुदा बिना राज्यक बंटवारा केने सेहो बहुत काज कैयल जा सकैत छैक, जौं करय चाहि तs । ओना सब अपन स्वार्थ सिद्धि मे लागल रहय छथि इ अलग गप्प छैक। कि नीक स्कूल कॉलेज कारखाना के लेल बिना राज्य अलग बनने प्रयास नहि कैयल जा सकैत छैक? कि मात्र मिथिला राज्य बनि गेला सँ मिथिलाक उद्धार भs जयतैक ? मिथिला राज्यक अलग हो ताहि आन्दोलन मे अनेको लोक सक्रीय छथि , मुदा हुनका लोकनि सs एकटा प्रश्न .......ओ सब आत्मा सs पुछथि कि ओ सब मात्र राज्य आ समाज के लेल सोचय छथि कि हुनका लोकनि के मोन मे लेस मात्र स्वार्थक भावना नहि छैन्ह ?


कैयैक टा राज्य अलग भेलैक अछि मुदा बेसी केर स्थिति पहिने सs बेसी खराब भs गेल छैक, झारखण्ड ओकर उदाहरण अछि । खनिज संपदा सँ संपन्न राज्यक स्थिति बिहार सs अलग भेलाक बाद आओर खराब भs गेल छैक। एहि राज्य मे नौ साल के भीतर सात टा मुख्यमंत्री बनि चुकल छथि । लोक के उम्मीद छलैक जे १० साल के भीतर एहि राज्य केर उन्नति भs जयतैक। उन्नति भेलैक अछि, मुदा राज्य केर नहि नेता सब केर । चोर उचक्का खूनि सब नेता भs गेल छथि आ पैघ सs पैघ गाड़ी मे घुमि रहल छथि , देश आ जनता केर संपत्ति केर उपभोग कs रहल छथि इ कि उन्नति नहि छैक ?(साभार विदेह www.videha.co.in)