Tuesday, October 4, 2011

रामाश्रय झा "रामरंग" सँ मृत्युपूर्व डॉ. गंगेश गुंजनक साक्षात्कार


रामाश्रय झा "रामरंग" प्रसिद्ध अभिनव भातखण्डे जीक १ जनवरी २००९ केँ निधन भऽ गेलन्हि। डॊ. गगेेश गु‍जन मृत्यु पूर्व हुनकासं साक्षात्कार लेने छलाह। प्रस्तुत अछि ओ अमूल्य साक्षात्कार- पहिल बेर विदेहमे।
पं0 रामाश्रय झाक इन्टरव्यू ।

प्रश्ननः1. अपनेक दृष्टि सं विद्यापति गीत-संगीत परंपरा कें कोन रूप मे देखल-बूझल जयवाक चाही? विद्यापति-संगीत परिभाषित कोना कएल जयवाक चाही? एतत्संबंधी कोनो स्वर-लिपि उपलब्ध अछि ?
उत्तर ः हमरा विचार सँ विद्यापतिक अधिकांश गीत पद; भजनबद्धगायन शैली एवं किछु गीत ग्रामीण गीत शैलीक अंतर्गत् बूझल जयवाक चाही। उदाहरण स्वरूप पद-गायन शैली मे-
1. नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर
धिरे धिरे मुरली बजाव ।
2. जय जय भैरवि असुर भयाउनि।
एवं अन्य श्रृंगार रस सँ सम्बन्धित पद। जेना-
क. कामिनी करय असनाने
ख. सुतलि छलौं हम घरवा रे
ग. अम्बर बदन झपाबह गोरी
घ. ससन परस खसु अम्बर रे, इत्यादि ।
टइ तरहक पद व गीत मिथिला प्रदेश मे लगभग 60 व 70 वर्ष सं जे गाओल जाइत अछि एकर धुन अर्धांशस्त्रीय संगीतक अंतर्गत् एवाक चाही। परन्तु अइ पदक जे मिथिला मे गायन शैली छैक ओकर एक अलग स्वरूप छैक। जेकरा प्रादेशिक संगीत कहवाक चाही। जहांतक लोक संगीत तथा ग्रामीण संगीत सं संबंधित विद्यापतिक गीत अछि, जेना-
क. आगे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जो। बुढ़ होयता जमाय,
ख. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर,
ग. उगना रे मोर कतय गेलाह,
घ. आज नाथ एक व्रत मोहि सुख लागत हे, इत्यादि ।
ई गीत सब लोक संगीतक धुनक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। यद्यपि अहू लोकधुन मे रागक दर्शन छैक मगर राग शास्त्र केर अभाव छैक। तें हेतु ई सब गीत लोक संगीत शैली मे अयवाक चाही।
उत्तर-1-ए. विद्यापति संगीतक कोनो भिन्न स्वरूप नहि अछि, केवल विद्यापति गीत मिथिला प्रादेशिक संगीत शैलीक अंतर्गत गाओल जाइत अछि। राग आओर ई अर्धांशस्त्रीय एवं धुन प्रधान लोक संगीत राग गारा,राग पीलू, राग काफी, राग देस, राग तिलक कामोद इत्यादि राग सं सम्बन्धित अछि। अभिप्राय ई जे जेना सूर, तुलसी, कबीर इत्यादि संत कविक पद भिन्न-भिन्न तरह सं गाओल जाइत अछि अइसंत कवि सबहक कोनो खास अपन संगीत नहि छैन्हि जे कहल जाय जे ई सूर व तुलसी तथा कबीरक संगीत थीक, एही रूप सं विद्यापति संगीतक रूप मे बुझवाक चाही।

प्रश्नन-2. विद्यापति संगीत-परंपराक विषय मे आइध्रिक स्थिति पर अपनेक की विचार-विश्लेषण अछि ?

उत्तर-2. विद्यापति पदक सम्बन्ध मे हमर ई विचार अछि जे विद्यापतिक पद मैथिली भाषा मे अछि तें हेतु केवल मिथिला प्रदेश मे अइ पदक गायन प्रादेशिक संगीतक माध्यम सं होइत अछि। हॅं, यदा कदा बंगाल प्रदेश मे बंगला कीर्तन मे अवश्य प्रयोग हाइत अछि। कहवाक अभिप्राय ई जे कोनो प्रादेशिक भाषा मे लिखल काव्य केर गुणवत्ताक आकलन ओइ काव्यक श्रृंब्द व साहित्य तथा भाव पर निर्भर करैत छैक। संगीत आकइ काव्य के रसमय एवं सौंदर्यवर्धन करइक हेतु परम आवश्यक तत्व अवश्य थिक परन्तु प्राथमिकता पदक थिकइ। मैथिली भाषा अत्यन्त सुकोमल भाषा अछि एवं अइ मे लालित्य अछि ।आर संगीत सुकोमल भाषा मे अधिक आनन्द दायक होइत छैक।अही हेतु विद्यापति पद संगीतक माध्यम सं मिथिलाक संस्कृति मे विद्वान जन सं ल’ क’ जनसाधारण तकक मानस के प्रभावित क’ क’ अपन एक सुदृढ़ परम्परा बनौने अछि एवं मिथिलावासीक हेतु परिचय पत्र समान अछि। तें हेतु समस्त मैथिल समाजक ई परम कर्तव्य थीक जे अइ अमूल्य धन कें धरोहर जकां जोगा क’ राखी।

प्रश्न-3. विद्यापति-संगीत आओर विद्यापति-गीत कें एकहि संग बूझल जयवाक चाही बा फराक क’? यदि हं तं किएक आ कोना ?

उत्तर : एहि प्रश्नक उत्तर उपरोक्त पहिल तथा दोसर क्रमांक मे लिखल गेल अछि।कृपया देखल जाय।

प्रश्नन-4. विद्यापति-संगीतक प्रतिनिधि गायक रूप मे अपने कें कोन-कोन कलाकार स्मरण छथि आ किएक ?

उत्तर : विद्यापति पदक गायक आइ सं किछु वर्ष पूर्व बहुत नीक नीक छलाह, जेना पंचोभक पं0 रामचन्द्र झा,पंचगछियाक श्री मांगन, तीरथनाथ झा, बलियाक पं0गणेश झा, लगमाक पं0 अवध पाठक, श्री दरबारी ; नटुआ द्ध श्री अनुठिया ; नटुआद्ध पं0 गंगा झा बलवा, श्री बटुक जी, आर पं0 चन्द्रशेखर खांॅ, अमताक पं0 रामचतुर मलिक, पं0 विदुर मलिक, लहटाक पं0 रामस्वरूप झा, खजुराक पं0 मधुसूदन झा एवं नागेश्वर चैधरी, बड़ा गांवक पं0 बालगोविन्द झा, लखनौरक पं0बैद्यनाथ झा इत्यादि। वर्तमान मे जे गायक छथि हुनका सबहक नाम अइ प्रकार छनि-पं0 दिनेश झा पंचोभ, श्री उपेन्द्र यादव, अमताक पं0 अभयनारायण मलिक, पं0 प्रेमकुमार मलिक इत्यादि। उपरोक्त जतेक गायकक हम नाम लिखल अछि ई सब गायक अधिकारपूर्वक विद्यापतिक पद कें गबै वला छलाह एवं वर्तमान मे छथि। कियेक तं ई सब मिथिलावासी छथि। विद्यापति पदक अर्थ भाव पूर्ण रूप सं बूझि क’ तहन प्रश्नकरैत छलाह व वर्तमान मे करैत छथि। तें हेतु ई सब गायक स्मरण करवा योग छथि।

प्रश्नन-5. पं0 रामचतुर मल्लिक, प्रो0 आनन्द मिश्र प्रभृत्ति तं इतिहास उल्लेखनीय छथिहे । किछु अन्यो गायकक नाम अपने कह’ चाहब ?ओना मल्लिकजी तथा आनन्द बाबूक विद्यापति-गीत गायकी मे की किछु विशेष लगैत अछि जे अन्य गायक मे नहि ?

उत्तर ः हम जतेक गायक क नाम लिखल अछि सब अपना-अपना स्तर सं नीक छलाह एवं नीक छथि। विद्यापतिक पद गायन मे राग गायकीक जेना बड़का बड़का आलाप व तान तें गाओल नहि जाइत छैक। विद्यापति पद गायन मे पदक अर्थ भाव ध्यान मे राखि सरसतापूर्वक गाओल जाइत छैक। अइ सम्इन्ध मे एक सं दोसर गायकक तुलना करइक आवश्यकता नहि। तथापि पं0रामचन्द्र झा व श्री मांगनजी तथा पं0 रामचतुर मलिकजी,श्री बटुक जी,पं0 रामस्वरूप् झा,श्री दरबारी इत्यादि गायक बहुत प्रसिद्ध छलाह।
चूंकि प्रोफेसर आनन्द मिश्रजीकें हम कहियो गायन नहि सुनल तथा मिथिलाक गायक पंक्ति मे हुनक नाम हम नहि सुनल तें हेतु हुनका संबंध मे किछु लिखइ सं असमर्थ छी।

प्रश्न-6. विद्यापति-गीत मैथिली लोकगीत ध्रि कोना पहुंचल हेतैक ?एहि विषय मे अपनेक विश्लेषण की अछि?

उत्तर ः विद्यापति गीत मैथिलीक दू तरहक भाषा मे रचल गेल अछि।एकटा मैथिलीक परिष्कृत भाषा
मे रचल गेल अछि जेना-
1.नन्दक नन्दन कदम्बक तरुतर
2.अम्बर बदन झंपावह गोरी
3. उधसल केस कुसुम छिड़िआयल खण्डित अधरे । इत्यादि। अइ तरहक
मैथिलीक परिष्कृत भाषा मे जे गीत छैक से लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि बहुत कम पहुँचलै।
जे गीत ग्रामीण भाषाक माध्यम सं रचल गेल छैक।जेना-
1. आ गे माइ हम नहि आजु रहब एहि आंगन जं बुढ़ होयता जमाय....
2. हे भोलानाथ कखन हरब दुख मोर
3. जोगिया भंगिया खाइत भेल रंगिया हो भोला बउड़हवा.
4. उगना रे मोर मोरा कतय गेलाह.
इत्यादि।
अइ तरहक जे गीत छैक से लोकगीत;ग्रामीण अंचलद्धधरि अधिक सं अधिक पहुँचलए।एक बात आर ई जे लोकभषाक अधिक समकक्ष छैक तकरा जनाना सब अधिक गबैत छथि। हमरा बुझने विद्यापति गीत कें लोकगीत ;ग्रामीण अंचलद्धधरि पहुँचइके यैह कारण थीक। दोसर बात ई जे अपन मातृभाषा स्वभावतः बहुत प्रिय होइत छैक आर अपना मातृभाषाक माध्यम
सं जे काव्य रचल जाइत छैक आर ओइ मे लालित्य आ आकर्षण छैक तं ओ अपनहि आप विद्वान जन सं ल’ क’जनसाधारण तक प्रचारित भ’ जाइत छैक। आर विद्यापति पद तं लौकिक व पारलौकिक दुनू ृदृष्टिसं अत्यन्त उच्च कोटिक रचल गेल अछि, तथा सब तरहक गीत रचल गेल अछि जेना-भक्ति, भक्ति श्रृंगार, लौकिक श्रृंगार, श्री राधाकृष्णकें विलासक अत्यन्त मधुर गीत, भगवान श्रृंंकरक विवाह सं सम्बंधित जनसाधारण भाषाकके गीत एवं नचारी, समदाउनि,
बटगवनी,तिरहुत इत्यादि तरहक गीतक रचना केने छथि जे लोकरंजनके हेतु उच्चकोटिक एवं गायन के वास्ते बनल छैक। ई तंे बिना प्रयासहिं लोक मानस एवं लोकगीत धरि पहुँचि गेल गेल हेतैक।

प्रश्न-7.विद्यापति पदक मैथिली व्यवहार-गीत मे विलय होयवाक प्रक्रिया अपनेक दृष्टियें कोना आ की रहल हेतैक ?

उत्तर ः हमरा बुझने इहो प्रश्न 6ठमे प्रश्न सं संबंधित अछि। तें ओही पर विचार कएल जाय।

प्रश्न-8. विद्यापतिक पद यदि मिथिलाक सर्वजातीय माने-सभ वर्ग आ समाजक लोक मे स्वीकृत छैक ? तं तकर कारण विद्यापति-पदक साहित्यिक गुण बा ओकर सांगीतिकता छैक आकि एकरा मे निहित कोनो आन तत्व आ विशेषता छैक ?

उत्तर ः विद्यापति पद जे मिथिला समाजक सब वर्ग मे स्वीकृत छैक तकर मुख्य कारण विद्यापति पदक साहित्यिक गुण एवं सांगीतिक गुण दुनू छैक।मिथिला मे कवि विद्यापतिक पहिनहुं तथा बादहु मे बहुत कवि भेलाह मगर जनसाधारण मे तं हुनकर क्यो नाम तक नहि जनैत अछि। परंतु विद्यापति एवं विद्यापति गीत के तं एहेन क्यो अभागल मिथिलावासी हेताह जे नहि जनइत हेताह। विद्यापति पदक प्रचार-प्रसार मे साहित्यिक व संगीतक गुण के अतिरिक्त आन कोनो तत्व व कारणक जे अपने चर्चा कएल अछि, अइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे कवि विद्यापति भगवान के परम भक्त छलाहं हुनका भक्ति सं प्रभावित भ’ क’ भगवान शंकर जिनका घर मे नौकर के काज करैत रहथिन एहेन भक्त कविक कावय मे तं प्रचार-प्रसार हेबाक सब सं महत्वपुर्ण तत्व एवं कारण हुनका आराध्यदेवक कृपा बुझवाक चाही। भगवानक भक्ति सं हुनकर हृदय ओतप्रोत छलन्हि तें ओ अपन काव्य मे लिखैत छथि-
क. बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे ,
ख. हे भोलानाथ ;बाबाद्धकखन हरब दुख मोर , इत्यादि ।
ग. खास क’ भगवान राधाकृष्णक भक्ति व भक्ति-श्ाृंगार रस जे ओ अपना काव्य मे दरसओ
-लन्हि अछि ओ अत्यन्त हृदयस्पशर््ाी तथा संगीतमय अछि।

प्रश्न-9.लोकगीत एवं व्यवहार-गीत मे तत्वतः की-की भेद मानल जयवाक चाही ?

उत्तर ः लोकभाषा एवं लोकधुन मे जे गीत गाओल जाइत छैक तकरा लोकगीत कहल जाइत छैक। आर व्यवहार गीत क जे अपने चर्चा कएल अछि इउ सम्बन्ध मे हमर कहब ई जे एकरा अंतर्गत संगीतक सब शैली आबि जाइत छैक।परंतु हमरा बुझना जाइत अछि जे व्यवहा गीत सं अपनेक अभिप्राय संस्कार गीत सं अछि। हमरा विचार सं लोकगीत एवं व्यवहार गीत दुनू
के लोकसंगीत कहल जाइत छैक, अइ मे कोनो विशेष अंतर नइ छैक।

प्रश्न- 10.विद्यापति-संगीतक वर्तमान जे निश्चिते निराश कयनिहार अतः खेदजनक अछि। अपने कें तकर कारण की सब लगैत अछि ?
जखन कि बंगालक रवीन्द्र-संगीत-कला मे विद्यापति संगीत जकां कोनो प्रकारक पतनोन्मु -खता आइ पर्यन्त देखवा मे नहि अबैत अछि । तकरो कारण की आजुक उपभोक्तावाद, ब्जारवाद भू-मण्डलीकरण मात्रकें मानल जयवाक चाही बा आनो आन ऐतिहासिक, समाजा -आर्थिक परिस्थि ति आ सामाजिक कारण आ परिवर्तन कें ?

उत्तर ःअइ सम्बन्ध मे हम ई कहब जे संपूर्ण भारत मे अपना संस्कृति के छोड़ै मे जतेक मैथिल अगुआयल छथि तेना अन्य कोनो प्रदेश नहि। जे मैथिल मिथिला सं बाहर अन्य प्रदेश मे आबि गेलाहय सब सं पहिने ओ अपन मातृभाषाक प्रति उदासीन भ’ जाइत छथि आ अत्यंत हर्षपूर्वक ई कहैत छथि जे हमरा बच्चा के तं मैथिली बाजहि नहि अबैत छैक। अपना घर मे मैथिली नहि बजैत छथि। जखन अपना मातृभाषाक प्रति एहेन उदासीन छथि तहन अपना संस्कृति सं अपनहि आप दूर भ’ जेताह। अपना मॉं-बा पके डैडी व
मम्मी अन्य के अन्टी व अंकल कहैक रेवाज भ’ गेलै अछि तं हिनका सब सं की आश कयल जाय जे ई अपना संस्कृतिक रक्षा करताह। बंगाली,मद्रासी,पंजाबी,मराठी इत्यादि प्रदेशक लोक सब अपना संस्कृति के एखनहुं धरि संजोय क’ रखने अछि। मगर पश्चिमी सभ्यताक प्रभाव सब सं अधिक मैथिल पर छन्हि ते हेतु मिथिला संस्कृति मे एहेन हानिकारक परिवर्तन देखाय पड़ैत अछि।

प्रश्न-11.अपनेक स्मृति मे कोनो गायकक गायन बा अन्य कोनो संदर्भ हो जेकर वर्णन अपने कर’ चाही? हुनक विषय मे किछु सुनयवाक इच्छा हो।वर्तमान समेत आगां पीढ़ीक लाभ हेतैक। संगहि अपनेक किछु विशेष अभिमत जे देब’-कह’ चाही।

उत्तर ःहम शास्त्रीय संगीतक उपासक छी आर अत्यंत उदासीन भ‘ कहि रहल छी जे अपन मिथिला वर्तमान समय मे शास्त्रीय संगीत सं शून्य भ’ रहल अछि। वर्तमान समय सं पहिने पं0रामचतुर मलिक, पं0 बिदुर मलिक, पं0सियाराम तिवारी,;चूंकि पं0 सियाराम तिवारीक शिक्षा अमता गाम मे भेलन्हि तें हेतु हुनका मैथिल मानइ छियनि। पं0 चन्द्र शेखर खां,पं0 रघू झा, ई सब बहुत उच्च स्तरक गायक छलाह। खास क’क’ पं0 रामचतुर मलिक, व पं0 सियाराम तिवारी तं इतिहासिक गायक छलाह ध्रुवपद शैलीक गायन मे।
भावी पीढ़ीक शिक्षार्थी एवं जिज्ञासु के अइ गायक सबके जानइ के प्रयास व हिनका गायन व कार्यक सम्बंघ मे श्रृंोध करवाक चाही ताकि भावी पीढ़ी लाभान्वित एव धु्रुवपद शैली गायनक विशेषता सं परिचित होथि।

जय मिथिला जय मैथिली, जय जय जानकी अम्ब ।
जेहि रज मे मन्डन भेला, हरलन्हि शिव के दम्भ ।।

(साभार विदेह www.videha.co.in )

No comments:

Post a Comment